यार, ज़रा कह देना (Jansatta)

उन्‍हें बेटी की शादी के लिए लड़के को देखने जाना था । उनका फोन आया यार जरा कह देना । वे आपको जानते हैं, आपके गहरे दोस्‍त हैं । मुझे हामी भरनी ही थी । हॉं-हॉं बच्‍चों की शादी के लिए भला इतना भी नहीं करेंगे । मैं टटोलने की कोशिश करता हूं । कहॉं तक बात पहुंची है ? उनकी चुप्‍पी जानकर फिर पूछा । आपने लड़का तो देख लिया होगा ?‘नहीं अभी तो कुछ नहीं । आप पहले कह दो ।’

मैं माथा पकड़े बैठा हूँ कि क्‍या कह दूं ? कि लड़की के पिता बहुत भले आदमी हैं, जमींदार हैं, अफसर हैं, खानदानी हैं, मॉं धार्मिक, दादा, परदादा संस्‍कृत के विद्वान, लड़की लाखों में एक, जैसा कुछ । मेरा मन मदद करना चाहता है । मैंने कहा डियर मैं उन्‍हें जानता हूँ विश्‍वविद्यालय के दिनों से । कई बरस का साथ है । बेटी के बारे में तो कुछ बताएं ? आप तो हमें जानते ही हैं । आप कह दो बस । मैं कल उनके घर जा रहा हूँ ।

यों ‘जरा कह देने’ की गुहार या इशारा पहली बार नहीं हुआ । ऐसे अनगिनत वाकये हैं । नौकरी शुरू भी नहीं हुई थी कि ‘जरा कह देने वाले ’ पहले ही हाजिर । कभी घर, कभी दफ्तर, गॉंव या किसी दूर की रिश्‍तेदारी की पूँछ पकड़कर । शाम को घर पहुंचा तो दो-तीन लोग बैठे हुए थे । भईया ! ये तुम्‍हारो ही बालक है । पता चला कि अभी तो नौकरी का फार्म ही भरा है । बजाए पढ़ने के इन्‍होंने सिफारिश के लिए भाग-दौड़ शुरू कर दी । ऐसे प्रसंगों पर कई कहानियां लिखने के बाद भी कई दिमाग में जिंदा छटपटा रही हैं ।

क्‍या अंतर है गॉंव के अपढ़ और दिल्‍ली के इन दोस्‍तों में ? आखिर यह कहने का भाव आता कहॉं से है ? गलती दोस्‍त की है या उस देश की जिसकी अधिकांश संस्‍थाएं आजादी के बाद इसी कहने पर चलायी जा रही हैं ? ये दोस्‍त उस प्रदेश से हैं जो देश के लिए सबसे ज्‍यादा प्रधानमंत्री पैदा करने के दंभ में जीता है । क्‍या हम सबने यह सब उन्‍हीं कर्णधारों की संगत में नहीं सीखा जो सत्‍ता पर अपना दावा कभी वंश से साबित करते हैं,  कभी जाति के अनुपात में । दिल पर हाथ रखकर कहिये कि इस कहने में क्‍या दक्षिण पंथी, वाम, सैक्‍यूलर, समाजवादी, गांधीवादी सभी बराबर के अपराधी नहीं है ? क्‍या लोकतंत्र में टिकट जरा कहने से नहीं दी जाती ? क्‍या विश्‍वविद्यालय के वाईस चांसलर, प्रोफेसर, शिक्षक, सेवा आयोगों के सदस्‍य, चेयरमैन या ऐसे सैंकड़ों पद जरा सा कहने से ही नहीं लिये, दिये जाते ? क्रिकेट हो, हॉकी हो या दूसरे खेल कोई कोना ऐसा बचा है ? अंग्रेजों के कुछ समय को छोड़कर क्‍या यह पुन्‍य भूमि सदियों से ऐसी ही सिफारिशों, खैरातों से नहीं चलायी जाती रही ? आजादी के दिलाने वाले नेताओं ने अंग्रेजी हुकूमत से ही न्‍याय व्‍यवस्‍था, बराबरी, संविधान, संस्‍थाओं का निर्माण सीखा था । उनके जाने के बाद हम अपने नेताओं, नौकरशाहों से उल्‍टा सीख रहे हैं । और अब शादी में भी । हे राम ! धन्‍य है हिन्‍दी प्रदेश और उसके नागरिक । शादी में तो कम से कम लड़का-लड़की को खुद चुनने दो । इस पवित्र बंधन को तो सिफारिश से दूर रखो । क्‍या दोस्‍ती का अर्थ ऑंखें बंद कर सिफारिश करना है ? वरना याराने का मतलब ही क्‍या ?

शिक्षाविद डॉक्‍टर दौलतसिंह कोठारी देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी के काफी नजदीक थे । आए दिन लोग उनके पास सिफारिश के लिए आते थे । उन्‍होंने कभी किसी के लिए सिफारिशी चिट्ठी नहीं लिखी । उनका कहना था संस्‍थानों को अपने नियमों से काम करने दो । उसमें दखल मत दो । दुनिया जानती है कि गांधी जी ने अपने बेटे से इसी मुद्दे पर संबंध तोड़ लिये थे । बताते हैं कि बिहार में पिछले दो-चार साल से कानून और व्‍यवस्‍था की स्थिति में कुछ सुधार इसलिए आया कि मुख्‍य मंत्री ने किसी भी मामले में ‘जरा सा कहने’ से साफ मना कर दि‍या । फिरौती, चोरी की घटनाएं रातो-रात खत्‍म होने लगीं । हर सफल देश, राज्‍य, संस्‍थान की यही कहानी है ।

हम सबको अपने-अपने दामन में झॉंकने की जरूरत है । जरूरत इस बात की और ज्‍यादा है कि कैसे ऐसा पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाये कि कोई पिछले दरवाजे से कहने से प्रवेश करने की हिम्‍मत ही न करे । क्‍या पिछले दिनों देश के आकाश पर करोड़ों, अरबों के जो घोटाले सामने आये हैं क्‍या वह सब इसी जरा सा कहने का विस्‍तार नहीं हैं ?किसी अन्‍याय को रोकने के लिए कुछ कहना पड़े तो कभी मत चूकिए । अलग-अलग तर्क से अपने और अपने गिरोहों की ऐसी ही पैरवी करते रहे तो थोड़ी देर के लिए तो नेक, परोपकारी  मान लिये जाओगे, लेकिन देश और उसकी संस्‍थाओं को डुबोने के पाप से आप नहीं बच सकते । इसलिए दोस्‍तों ! जब भी जरा कहना पड़े तो जरा सोच कर ही कहें जिससे कि न आपके दिल पर आरी चले न देश की संस्‍थाओं पर ।

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