विश्वविद्यालयों का पतन

कई बातें एक साथ देश भर के विश्वविद्यालयों के पतन के बारे में सोचने को मजबूर कर रही हैं । वैसे तो पूरी शिक्षा व्यवस्था ही स्कूली शिक्षा से लेकर इंजीनियरी तक पूरी दिशा भ्रम का शिकार है लेकिन उस पर चर्चा फिर कभी । ताजा घटना अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीदो तानिया पर बर्बर हमला है । उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों पर नजर डालें तो दिल्ली ही एकमात्र ऐसी जगह है जहां उत्तर पूर्व के इन राज्यों के कुछ छात्र नजर आते हैं । अच्छा तो यह होता कि मेरठ,आगरा,इलाहाबाद,पटना,भागलपुर,जयपुर में भी इनकी पर्याप्त संख्या होती लेकिन इन राज्यों के विश्वविद्यालय तो खुद धीरे-धीरे बंजर हो रहे हैं । उत्‍तर प्रदेश, बिहार के छात्रों के लिए भी आगे पढ़ने का एकमात्र नजदीकी विकल्प दिल्ली ही है । उसके बाद उत्तर भारत से लेकर उत्तर पूर्व के इन सभी विद्यार्थियों के लिए रास्ता दक्षिण की तरफ ही जाता है । वह चाहे पूना हो या बंगलौर, बम्बई, नागपुर, मणिपाल आदि । काश ! देश की पूरी विविधता  हर विश्वविद्यालय के प्रांगण में नजर आती । हर कक्षा में भी उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के ‎विद्यार्थी होते और संकाय सदस्यों में भी । क्या विश्वविद्यालय ही इस देश की बहुलतावादी संस्कृति को दर्शाने की सबसे सुन्दर जगह नहीं है ? लेकिन देश की राजधानी होने के बावजूद भी ये घटनाएं और बेचैन करती हैं ।

विश्वविद्यालयों की ये विलुप्‍त होती बहुलतावादी संस्कृति और पतन गाथा का बखान करती रामचन्द्र गुहा की हाल ही में किताब आई है ‘पैट्रीओट एंड पार्टिशन’ । वर्ष 1857 केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए ही नहीं जाना जाता  इसी वर्ष एक दूसरी क्रांति भी हुई । प्रसिद्ध इतिहासकार रामचन्द्र गुहा के शब्दों में यह क्रांति थी अंग्रेजी शासन द्वारा 1857 में कलकत्ता,बम्बई और मद्रास विश्वविद्यालय की स्थापना । यही विश्वविद्यालय आने वाले दिनों में स्वाधीनता संग्राम और आधुनिकता के अड्डों के रुप में उभरे । यहीं पढ़कर हजारों भारतीयों ने जाति,सम्प्रदाय,क्षेत्रवाद से उपर उठकर राष्ट्रवाद की सीख ली और उन्हीं ब्रिटिश कानून से आजादी और न्याय के अर्थ जाने । बम्बई विश्वविद्यालय को फख्र है गांधी और अम्बेडकर पैदा करने का तो कलकत्ता युनिवर्सिटी से सुभाषचन्द्र बोस और चितरंजन दास निकले । मद्रास विश्वविद्यालय से चक्रवर्ती राजगोपालाचारी समेत और भी दर्जनों प्रखर राजनीतिज्ञ,चिंतक,लेखक,वकील आदि । विश्वविद्यालयों की यह क्रांति इन तीन शहरों तक ही नहीं रुकी । अगले दशकों में अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी,दिल्ली,बनारस और इलाहाबाद,पटना,पूना जैसे विश्वविद्यालयों ने वैसा ही नाम कमाया । लेकिन क्या  आजादीके बाद भी इन विश्वविद्यालयों की वैसी चमक आज भी कायम है ? शायद नहीं । रामचन्द्र गुहा लिखते हैं कि 1970 के आसपास शुरु हुआ जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की चमक नब्बे के दशक में धूमिल पड़ने लगी । उनका कहना है कि कलकत्ता और मद्रास 1940 तक बहुत अच्छा करते रहे तो दिल्ली विश्वविद्यालय भी पिछले 30-40 वर्षों में लगातार गिरावट की तरफ बढ़ रहा है । रामचन्द्र गुहा बड़े दु:ख के साथ लिखते हैं कि अंग्रेजों के समयशुरु हुए भारतीय विश्वविद्यालय बराबरी,धर्मनिर्पेक्षता,बहुलता के मूल्यों को आगे बढ़ाने के बजाये क्यों लगातार गहरे जातिवाद या क्षेत्रवाद के दलदल में फॅंसे नजर आ रहे हैं ? क्यों हमारे विश्वविद्यालयों में वैसी व्यवस्था नहीं हो पाई जैसी यूरोप,अमेरिका के विश्वविद्यालयों में है जहां एक छत के नीचे दुनिया के ज्यादातर देशों के बच्चे एक साथ पढ़ते और शोध करते हैं ? यहां तो कम से कम उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में शायद ही कोई दक्षिण भारतीय या पूर्वोत्तर भारत का नजर आता हो ।

ऐसा नहीं कि विश्वविद्यालयों की इस दुर्गति का अहसास हमारे राजनीतिज्ञों या केन्द्र सरकार को न हो लेकिन जो ठोस कदम उठाने चाहिए थे वैसा रोग के लक्षण जानते हुए भी नहीं किया जा रहा । रामचन्द्र गुहा भी खुद निष्कर्ष देते हैं कि इसका इलाज विदेशी विश्‍वविद्यालयों की तरफ पलायन और उन्‍हें भारत में लाना नहीं हो सकता । हमें खुद उन्हीं आदर्शों को पुनर्स्थापित करना होगा जो दुनिया भारत के विश्वविद्यालयों के आगे बढ़ने का आधार है । यह अचानक नहीं है जहां ऑक्सफोर्ड,कैम्ब्रिज या यूरोप के दूसरे विश्वविद्यालय तीन सौ, चार सौवीं जयंती मना रहे हों और अपने-अपने विश्वविद्यालयों से निकले सैंकड़ों वैज्ञानिकों नोबुल पुरस्कार विजेतों को याद करते हैं वहीं पिछले साठ सालों में हमारे विश्व‎विद्यालयों ने आजादी से पहले का गौरव भी खो दिया है । 1930 के दशक में कलकतता सी.वी.रमण,जगदीश चन्द्र बसु के लिए प्रसिद्ध था तो इलाहाबाद मेघनाथ साहा जैसे वैज्ञानिकों के लिए ।

हाल ही में एक वरिष्‍ठ पत्रकार ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में सन 80 के आसपास हावी  जातिवाद का जिक्र किया है । यह सिर्फ संकेत भर है इस बात का कि जब जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय जाति और धर्म की ऐसी संक्रीणताओं के शिकार हो सकते हैं तो मेरठ,पटना,आगरा की पतन गाथा कैसी भयानक होगी । दिल्ली में स्थापित विश्वविद्यालयों का पतन और  इसलिए दु:खी करता है कि कम से कम इन विश्वविद्यालयों में तो ठीक-ठाक संख्या वामपं‎थी बुद्धिजीवियों  की रही ही है । उनकी समझ और बौद्धिकता का लोहा भी पूरा देश मानता है । तो फिर वे किन राजनीतिक मजबूरियों में इन विश्वविद्यालयों का पतन देखते रहे ? या क्यों नहीं रोक पाये ? उम्मीद करनी चाहिये कि रामचन्द्र गुहा की तरह इन विश्वविद्यालयों में रहे प्रोफेसर, बुद्धिजीवी,लेखक भी उतनी ही निष्पक्षता से इन पतन गाथाओं पर रोशनी डालेंगे । बेहतरी का रास्ता जो इसी विमर्श से निकलेगा ।

पतन का सबसे मुख्य कारण नियुक्तियों में धांधली,भाई-भतीजावाद,क्षेत्रवाद और राजनीतिक विचारधारा का हावी होना बताया जाता है । दशकों से हम यही सुनते आ रहे हैं । लेकिन इन सभी विचारधाराओं के बुद्धिजीवियों ने संघ लोक सेवा आयोग जैसा विकल्‍प क्‍यों नहीं सुझाया ? कम से कम संघ लोक सेवा आयोग की भर्तियों पर तो अभी तक जातिवाद या क्षेत्रवाद का आरोप नहीं लगा । अभी भी दिल्ली विश्वविद्यालय में हजारों पदों पर  भर्ती की जानी है लेकिन कोई भी संगठन ऐसे निष्पक्ष प्रक्रियाओं या बोर्ड बनाने की बात नहीं कर रहा । हर संगठन अपने चमचों या विचारधारा के पिस्सुओं की नियुक्ति से आगे शायद नहीं सोच पाता । और तो और यू.जी.सी. द्वारा बनाए गए नेट (net)परीक्षाओं में भी पिछले दो दशक में कई बार सत्‍ता-सापेक्ष उलट फेर किए गए हैं । विश्वविद्यालयों की भर्ती आदि में हुए ऐसे कारनामों का संकेत पूरे समाज की न्याय व्यवस्था पर जाता है । विश्वविद्यालयों का सही चलना इसीलिए और भी जरुरी है ।

शिक्षा व्यवस्था या विश्वविद्यालय के और भी तेजी से पतन का कारण पिछले दो दशक में उदारीकरण के बाद नया मध्यवर्ग भी है । वैसे दोष इनका इतना नहीं जितना कि सत्ता का है तो विश्वविद्यालयों के पतन को जानने के बाद भी सही कदम उठाने में नाकामयाब रही है । यह नया मध्यवर्ग शुरु में तो दिल्ली,बम्बई,मद्रास,कलकत्ता पहुंचता है और अब अपनी पीढ़ी को सीधे अमेरिका,इंग्लैंड भेज रहा है । यदि इनके बच्चे इन्हीं विश्वविद्यालयों में पढ़ने को मजबूर होते तब शायद ‎किसी दबाव, गुट की खातिर ही विश्वविद्यालय इस दुर्गति को नहीं पहुंचते ।

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