विज्ञान दिवस का आइना (विज्ञान दिवस पर)

हर वर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है इस प्रति‍ज्ञा कोदोहराते हुए कि राष्ट्र के विकास के लिए विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना क्‍यों जरुरी है । यों हिन्दी दिवस, मातृभाषा दिवस, शिक्षा दिवस, शिक्षक दिवस, सद्भावना दिवस सभी एक राष्ट्रीय स्तर पर रीति में तब्दील हो चुके हैं लेकिन हाल ही में नरेन्द्र दाभोलकर की स्मृति में भारत सरकार के विज्ञान प्रसार आदि संगठनों द्वारा आई.आई.टी. दिल्ली में 21, 22 फरवरी को आयोजित परिसंवाद थोड़ा लीक सेहटकर था । अंधविश्ववास और जादू टोने के खिलाफ लड़ाई में अगस्त 2013 में शहीद हुए नरेन्द्र दाभोलकर के बेटे हामिद दाभोलकर के साथ सभी ने मिलकर संकल्प लिया कि जो कानून महाराष्ट्र में काला जादू और अंधविश्वास के खिलाफ बना है उसे पूरे राष्ट्र के ‎लिए भी बनाया जाएगा ।

लेकिन हम ऐसे संकल्प कब  तक दोहराते रहेंगे ? महाराष्ट्र में अंधविश्‍वास के खिलाफ कानून बने तीन महीने हो चुके हैं और अब तक लगभग चालीस व्यक्तियों के खिलाफ इस कानून के तहत मुकदमे दर्ज हो चुके हैं । यानि कि एकसंदेश फैल रहा है कि धर्म, जादू-टोने के बहाने आप गरीब जनता का शोषण नहीं कर सकते । लेकिन नरेन्द्र दाभोलकर की शहादत और पूरे राष्ट्र को आधुनिक बनाने वाले ऐसे कानून की जरुरत के बावजूद भी अभी तक दिल्ली क्यों सोई हुई है और क्यों देश के दूसरे राज्य ? क्या 28 फरवरी को दिवस मनाने की खाना पूरी पर्याप्त है ? क्या यह इस देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु का अपमान नहीं है जिनके लिए वैज्ञानिक चेतना रोजाना की जरुरत में शामिल था  और जिसे वे भूख और गरीबी के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार मानते थे । ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में वे बार-बार वैज्ञानिक चेतना की बात करते हैं । कहा जाता है कि 1947 के बाद आजाद हुए लगभग अस्सी देशों में भारत अकेला ऐसा देश है जिसने वैज्ञानिक चेतना को अपने संविधान में शामिल किया । लेकिन जमीन पर तो उस चेतना को आने में अभी मीलों चलना   है ।

स्मृतियों में सत्‍तर के दशक की मेरे बचपन की रील तैर रही है । गणेसी लाल पंडित आए दिन सामने वाले घर में बैठे रहते थे । कभी एक बच्चे का हाथ देखते हुए तो कभी दूसरे की पत्री या जन्म कुंडली । वाकई उनके पास ऐसा बहुत काम था । कई बार तो लोगों को इंतजार करना पड़ता पंडित जी से जन्म पत्री दिखाने को । चमकदार रेशमी कुर्ता, गले में गमछा, चारों तरफ भगतों की भीड़ यानि मौज ही मौज । चालीस साल बाद वो बूढ़े जरुर हो गये हैं लेकिन धंधा उतना ही चमक रहा है । अब तो उसमें भगवती जागरण और सत्संग भी जुड़ गये हैं । अलीगढ़ के एक और गांव में जाना हुआ तो वे बताने लगे कि सोलह गॉंवों का एक समूह है जिसमें बारी-बारी से हर शनिवार, रविवार को जागरण होता है और खाना-पीना भी । खाना-पीना कौन करता है  ? यह पूछने पर उन्होंने बताया कि दिल्ली और शहरों में रहने वाले वे पढ़े-लिखे लोग जो खूब कमाते हैं । वो कमाई रिश्वत या दलाली की । मैं नाराज हुआ तो कहने लगे कि खाली बैठे और क्या करें ? इन सत्संगों में इलाहाबाद,बनारस तक के पं‎ड़ितों को ये बुला लेते हैं और बदले में ये वहां जाते हैं । कभी-कभी भारतीय विश्वविद्यालयों के फरवरी, मार्च में होने वालेसेमिनारों की सी याद दिलाते ।

पिछले पांच-दस वर्षों से वैज्ञानिक चेतना के प्रचार प्रसार के आयोजनों में कभी-कभी शिरकत करता रहा हूं । हर सेमिनार नेहरु जी के बाजे से ही शुरु होता है और भगवान बुद्ध, कोपरनिक्स, गैलिलियो का नाम लेते हुए नेहरु जी पर ही खत्म । ऐसे ही एक आयोजन में मद्रास आई.आई.टी. के सदानन्द मेनन ने बताया कि वैज्ञानिक चेतना की बढ़ने के बजाय उलटी गिनती शुरु हो गई है । उन्होंने तमिलनाडू के उदाहरण देकर अपनी बात रखी कि उस रात जब मैं द्रविड़ आंदोलन, ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ शुरु हुआ था और पिछले 45 वर्षों से बारी-बारी से द्रविड़ राजनीतिक पार्टियां सत्ता में हैं । पश्चिम बंगाल के तैंतीस वर्षीय वामपंथी शासन से भी ज्यादा । लेकिन मूर्ति पूजा, दैवीय चमत्कार, टोटके, अंधविश्वासों में कोई कमी नहीं आई  बल्कि और बढ़े ही होंगे ।  वे मद्रास में बढ़ते जातिवाद से बेहद दु:खी थे । उन्होंने बताया कि चैन्ने आई.आई.टी. की कक्षाओं में बच्चे जातियों के झुंड में बैठते हैं एक-दसरे का मखोल उड़ाते । क्‍या एम्‍स., जे.एन.यू. सहित लखनऊ, पटना, इलाहाबाद की स्थिति भिन्‍न है ? काश ! वैज्ञानिक चेतना बढ़ी होतीतो जाति, धर्म की दीवारें कभी की ढह चुकी होतीं । क्या हिन्दू-मुस्लिम, सिख, आदिवासी, दलित, ठाकुर, ब्राह्मण का जीनोम अलग है ? क्या इसे खांप पंचायतों को बताने की जरुरत नहीं है ? वे किस नस्लीय शुद्धता की बात करते हैं ? क्या यह इतने अच्छे स्पष्ट वैज्ञानिक संविधान के बावजूद सत्ता और उसकी राजनीति की विफलता नहीं है ? जहां अभी भी लाखों लोग काला जादू, गण्डे-ताबीज के बहाने शोषण के‎ शिकार हो रहे हैं ।

कुछ और रीलें तैर रही हैं । मेरी उम्र रही होगी सात-आठ साल । बड़े भाई को शायद मोतीझरा निकला था । सुबह-शाम एक झाड़-फूंक वाला आता  । पता नहीं कैसे बचे । मेरी ऑंख में मां न जाने किसी ऐसे ही झोले छाप डॉक्टर की दवा डालती थी जिसे डालते ही मैं घंटों तड़पता रहता था और आखिर मैंने वो शीशी फैंक दी । मेरी उम्र का मेरा ही सहपाठी कुंवर पाल जामुन के पेड़ से गिरा, टांग टूट गई । गॉंव के पहलवान ने खपच्‍चा लगा दिया । महीनों बिस्तर पर पड़ा रहा पढ़ाई छूट गई बच तो गया लेकिन शरीर आज भी टेड़ा-मेड़ा है । वे कहते हैं तो क्या करें ? कौन डॉक्टर है यहां ? और कौन सा अस्पताल ? झाड़ फूंक वाले खपच्‍चा लगाने वाले पहलवान मिल तो जाते हैं । क्या हमने इन पंडित जी, मुल्ला जी, हकीमों का कोई विकल्प इस गरीब जनता को दिया है ?

चालीस वर्ष बाद पिछले हफ्ते फिर गॉंव में था । पड़ौसी रामवीर अपनी पुत्रवधु का इलाज कराकर शायद उज्जैन या इंदौर से लौटा था । हाल चाल पूछने परवह पु‎ड़िया में रखे कुछ पत्थरों को दिखाता है कि ये मंत्र से निकालकर दिया है बाबा ने । एक और पड़ौसी श्यामवीर एक और बाबा के कब्जे में है । हर सोमवार को उसके आश्रम की तरफ दौड़ते और बच्चों को भी साथ ले जाते । उत्तर भारत का तो हर घर इन बाबाओं के चंगुल में हैं । प्रसिद्ध वैज्ञानिक जयंत नर्लीकर का कहना है कि शहरी मध्यवर्ग में तो ज्योतिष, बाबावाद, अंधविश्वास पचास सालों में और पचास गुना बढ़ा है । इसका प्रमाण है कि पहले तो भी शादियां एक पंडित की सलाह से हो जाती थीं जब तो कंप्यूटर, पंडित,नाड़ी, ग्रह, नक्षत्र तक सब न मिल जाए तब तक वे कोई काम नहीं करते । ऊपर से वास्तु और दूसरे प्रपंच ।

ऐसे में क्या हमें विज्ञान दिवस मनाने का हक भी है ?

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