स्वराज बजट: नई शुरूआत

इस वर्ष के बजट में जहां केन्‍द्र सरकार ने स्वास्थ्य पर आवंटन को घटाकर कुल जीडीपी के 0.3 प्रतिशत पर पहुंचा दिया हो वहां आप सरकार द्वारा अपने पहले  ही बजट में स्वास्थ्य पर 30 प्रतिशत का आंवटन महत्त्वपूर्ण है। यह किसी से छिपा नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है। असल में एक के बाद एक केन्‍द्र सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के हवाले करने में जुटी हैं। विडंबना यह है कि जब राज्य सरकारर अपना बजट प्रस्तुत कर रही थी तो केन्‍द्र सरकार द्वारा नियंत्रित दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ऐसी बहुमंजिला रिहाइशी मकानों की  घोषणा कर रहा था जिनमें उच्च वर्ग के लिए ‘पेंट हाउसों का प्रावधान होगा।  आखिर करोड़ों रुपए कके इन फ्लैटों को खरीदेगा कौन? ये आम जनता के किस काम के होंगे।?

सत्ता संभालते ही चौतरफा विवादों से घिरी दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार ने इस नगरराज्य की जनता को एक ऐतिहासिक बजट दिया है। वैकल्पिक राजनीति का पहला कदम। इसे आप का पहला बजट ही कहा जाएगा। पिछले कार्यकाल के 49 दिनों में भी इसने शिक्षा, भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जो शुरुआत की थी उसमें भी इस नई पार्टी की सोच पूरी तरह स्पष्ट थी।

देखा जाए तो उसी का असर था कि दिल्ली की जनता ने इस नई पार्टी पर यकीन किशया और देश की दोनों बड़ी पार्टियों को धूल चटाते हुए इसे ऐतिहासिक जीत दिलाई। वैकल्पिक राजनीति की जिन बातों ने पूरे देश और विशेषकर नौजवान मेधावी मेहनती पीढ़ी का ध्यान खींचा था उनमें प्रमुख थी भ्रष्टाचार से मुक्ति, शिक्षा और अन्य महत्त्वपूर्ण मसलों पर जनभागीदारी या हस्तक्षेप। यह बजट आप के घोषणापत्र के अनुरूप ही कहा जा सकता है, विशेषकर दिल्ली की मुख्य समस्याओं शिक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था के मुद्दों पर।

पहले शिक्षा : आप के घोषणापत्र में शिक्षा सबसे ऊपर रही है। 2013 के चुनाव पूर्व के संकल्प पत्र (घोषणा पत्र नहीं) में पांच साल में पांच सौ सरकारी स्कूल खोलने का संकल्‍प था। यानी कि हर वर्ष सौ स्कूल। वर्ष 2014 के चुनावों में भी उसे फिर दोहराया गया। पार्टी की ईमानदार कोशिश देखिए कि पहले ही बजट में सौ की बजाय दो सौ छत्तीस नए स्कूल खोले जाएंगे। जितना सही सार्थक कदम है। पार्टी जनता के लगातार संपर्क में है विशेषकर गरीबों के। दिल्ली की अस्सी प्रतिशत जनता झुग्गीझोपडिय़ों, अनियमित कॉलोनियों में रहती है जहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। दिल्ली के अमीरों को सस्ती नौकरानियां, नौकर, मजदूर तो चाहिए लेकिन उन्हें (गरीबों) कोई सुविधा देना बर्दाश्त नहीं है। देश का हर महानगर इसका गवाह है। ऐसे परिदृश्य में देश की भावी पीढ़ी को शिक्षित बनाना शासन की पहली जिम्मेदारी है। आप ने इसीलिए शिक्षा पर खास जोर दिया है। बजट में शिक्षा पर दोगुने से भी ज्यादा आवंटन है। कुल बजट का 24 प्रतिशत। सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर भी खास जोर दिया जाएगा। शुरुआत में स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाकर और इनमें खेल आदि की सुविधाएं देकर। स्कूलों की संख्या बढ़ते ही जिन सरकारी स्कूलों में एकएक कक्षा में सौ से भी अधिक बच्चे होते हैं उसमें भी सुधार आएगा। यदि बजट की घोषणा के अनुरूप बीस हजार शिक्षको की भर्ती होती है तो स्तर सुधरते ही दिल्ली में निजी स्कूलों की मनमानी खुद ही समाप्त हो जाएगी।

वैसे आप सरकार ने निजी स्कूलों पर लगाम लगाने के लिए कई कदम उठाए हैं – जैसे दाखिले के फार्म को सस्ता करना, डोनेशन पर प्रतिबंध और दंड की व्यवस्था तथा दाखिले में पारदर्शिता। देखना यह है कि भ्रष्ट जंग के आगे इसमें कितनी सफलता मिलती है।

निजी स्कूलों में गरीब तबके के दाखिले के लिए जो पच्चीस प्रतिशत का प्रावधान किया गया था, उसकी गड़बडिय़ां हमारे नीति नियंताओं की आंख खोलने के लिए पर्याप्त हैं। जानेमाने शिक्षाविद प्रोफेसर अनिल सदगोपाल शुरू से ही इसके खिलाफ कहते रहे हैं। बच्चों के स्क्‍ूली स्तर पर ये विभाजन देश की नई पीढ़ी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। ऐसे आरक्षण ने ‘समान शिक्षा के पूरे सपने को धीरेधीरे खंडित किया है। न उन गरीबों का भला हुआ, न शिक्षा के स्तर में अंतर आया। आप की सत्ता को आने वाले वर्षों में सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाकर ऐसे आरक्षणों की समीक्षा करनी चाहिए।

बाहरी दिल्ली में नए आईटीआई बनाना और मौजूदा में सीटें बढ़ाना भी एक अच्छा कदम है। कालेज, विश्वविद्यालय स्तर पर भी बजट में कुछ होना चाहिए विशेषकर दिल्ली विश्वविद्यालय में सतत चलते विवादों के मद्देनजर। तीन वर्षीय पाठ्यक्रम का मसला जरूर सुलझ गया है, लेकिन क्रडिट सिस्टम अभी भी विवादित है। आप के बजट में कालेजों में दाखिले की नीति पर भी गौर करने की जरूरत है। दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग अस्सी कॉलेज हैं। इस वर्ष के आंकड़ों पर ध्यान दें तो एक सीट के लिए लगभग दस आवेदन आए हैं। हर नौजवान का हक है, देश के अच्छे संस्थानों में पढऩा। विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरपूर्व के कॉलेजों, विश्वविद्यालयों की तबाही का असर दिल्ली पर पड़ रहा है। समस्या के समाधान की तरफ तुरंत एक कदम यह हो सकता है कि सभी कॉलेजों और स्कूलों में दो या तीन पारियां शुरू की जाएं। अभी भी कुछ कालेजों में हैं ही। वैसे भी जब पुणे, नागपुर और दूसरे शहरों तथा कोचिंग संस्थानों में यह संभव है तो विद्यार्थियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए दिल्ली में क्यों नहीं है। समस्या बड़ी है तो समाधान भी अलग किस्‍म के खोजे जा सकते हैं। शोध, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं, सांस्कृतिक केंद्रो आदि पर इन कॉलेजों में विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

शिक्षा अपनी भाषामाध्यम में हो इसे स्कूल और कॉलेज दोनों स्तर पर लागू करने की जरूरत है। पता नहीं ‘स्वराज’ की बारबार दुहाई देने के बावजूद इस पक्ष पर उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और मुख्यमंत्री केजरीवाल का ध्यान क्यों नहीं गया। आम आदमी को जरूरत से ज्यादा विदेशी भाषा से भी मुक्ति चाहिए।

देश भर में बड़े शहरों में परिवहन की समस्या विकराल होती जा रही है। दिल्ली महानगर इस मामले में सबसे आगे है। बजट में दिल्लीवासियों के लिए आनेजाने यानी परिवहन व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार लगभग डेढ़ गुना बजट आवंटित है। परिवहन पर (20 प्रतिशत) शिक्षा (24 प्रतिशत) के बाद सबसे ज्यादा खर्च प्रस्तावित है। बसों की संख्या तो बढ़ेगी ही उसमें सुरक्षा के लिए मार्शल की तैनाती भी राजधानी में कानून व्यवस्था को देखते हुए अच्छा कदम है।

लेकिन दिल्ली में आनेजाने की व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कुछ मूलभूत कदम उठाने की जरूरत है।  परिवहन की समस्या के साथ ही पर्यावरण की समस्या भी जुड़ी है। दिल्ली देश का ऐसा शहर है जहां सबसे ज्यादा निजी गाडिय़ां हैं। देखना यह होगा कि इन पर कैसे लगाम लगाई जाए। अगर यह नहीं होगा तो ज्यादा बसों का लाना भी निरर्थक साबित होगा। सवाल है अगर सडक़ें निजी गाडिय़ों से भरी होंगी तो सार्वजनिक बसें चलेंगी कहां। इसके लिए जो कदम उठाए जा सकते हैं उनमें सबसे पहले है मेट्रो और बस सेवाओं का रात देर तक चलाया जाना, उसी तरह जिस तरह मुंबई में महानगरीय रेलें चौबीस घंटे में सिर्फ दो घंटे के लिए बंद होती हैं।  इससे सडक़ों पर शाम को पहुंचने का दबाव नहीं रहेगा। मेट्रो के विस्तार के साथ ही साथ उसमें यात्रियों की भीड़ को सीमित रखने के लिए गाडिय़ों की संख्या में वृद्धि जरूरी है। अभी होता यह है कि मेट्रो को चलाने के पीछे एक महत्त्वपूर्ण कारक लाभ है जो किसी भी सार्वजनिक सेवा का आधार न तो हो सकता है और न ही होना चाहिए।  इससे निजी गाडिय़ां चलाने का दबाव नहीं रहेगा और वायु के अलावा ध्वनि प्रदूषण भी कमहोगा। बीआरटी व्यवस्था अगर अहमदाबाद में चल सकती है तो दिल्ली में क्यों नहीं चल सकती। निजी गाडिय़ों को सीमित करने और सार्वजनिक वाहनों को बढ़ावा देने का यह एक महत्त्वपूर्ण तरीका है।

दिल्ली की यातायात व्यवस्था को सुधारने का एक बड़ा तरीका यह है कि निजी गाडिय़ों को सम और विषम संख्याओं के आधार पर ही चलने देना। इससे सडक़ पर गाडिय़ों की संख्या आधी हो जाएगी। गाडिय़ों, विशेष कर निजी गाडिय़ों की संख्या को सीमित रखने के और भी दूरगामी उपाय ढूंढे जाने चाहिए।

जहां दिल्ली मेें प्रवेश करने वाले डीजल के वाहनों पर टैक्स बढ़ाया गया है वहां डीजल की कार या व्यक्तिगत वाहनों को क्यों मुक्त रखा गया है। कार और विशेषकर बड़ी और लग्जरी कारों पर और टैक्स बढ़ाने की जरूरत है। टीवी व मनोरंजन पर कर बढ़ाना एक उचित कदम है।

बजट का तीसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए अधिक राशि का आंवटन है। इस वर्ष कुल बजट का 17 प्रतिशत अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निर्धारित किया गया है। इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। दिल्ली जो कि देश की राजधानी है उसमें स्वास्थ्य की क्या दशा है इसे इसी माह हुई डॉक्टरों की हड़ताल से समझा जा सकता है। इस हड़ताल में डॉक्टरों की मूलत: मांग यह थी कि हस्पतालों में दवाएं, पट्टियां आदि जरूरी चीजों को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाया जाए। इसी तरह वे अस्पतालों में संरचनागत व अन्य सुविधाओं की भी मांग कर रहे थे।

राज्य सकार ने इस बजट में लगभग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तीस प्रतिशत वृद्धि करके एक मिसाल कायम की है। यह बात इसलिए भी ध्यान देने योग्य है कि केंद्र सरकार के बजट में कुल सकल घरेलू आय का सिर्फ 0.3 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवंटित किया गया है। मोदी सरकार ने स्वास्थ्य की मद में इस बार लगभग 25 प्रतिशत की कमी की है। इसके पीछे मंशा सरकार की अपनी जिम्मेदारी से बचने के अलावा स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी और कॉरपोरेट पूंजी को बढ़ावा देना है जो कि सिर्फ उसकी सेवा करता है जिसके पास पैसा हो।

पिछली सभी सरकारें शिक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य को नजरअंदाज करती रही हैं। बजट में सरकार ने तीन नए अस्पताल तो खोलने की घोषणा की है।  ग्यारह अस्पतालों में चार हजार नए बिस्तरभी जोड़े जाएंगे। सबसे अच्छा प्रस्ताव पांच सौ मोहल्ला क्लीनिक खोलने का है। ये ऐसे महत्त्वपूर्ण कदम हैं जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और गरीबों को निजी अस्पतालों द्वारा लूटे जाने से भी बचाएंगे।

वैकल्पिक राजनीति के बुनियादी कर्तव्य अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन की दिशा तो दुरस्त है, देखना यह है कि इनका कार्यान्वयन कितनी सक्षमता से होता है। क्योंकि छह दशक की हर अच्छी योजना को हमारी जातिवादी भ्रष्ट नौकरशाही और राजनीति के गठजोड़ ने हर बार फेल कर दिया है। अब तो इसमें मुनाफाखोर कारपोरेट जगत भी शामिल है। ऐसे खतरे आम आदमी की सत्ता पर भी लगातार मंडरा रहे हैं।   

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