शिक्षा, प्रशासन और भाषा

भाषा और शिक्षा का बड़ा सीधा संबंध है । इसीलिए मैं अपनी बात इन्हीं दो मुद्दों के आस-पास प्रमुख रूप से केंद्रित करना चाहता हूँ ।

पहली – जब तक हमारी शिक्षा अपनी भाषाओं में नहीं दी जाती तब तक शिक्षा का अर्थ और मकसद तो अधूरा रहेगा ही, अपनी भाषाएं या कहिये भारतीय भाषाओं की स्थिति भी कमजोर होती जाएगी ।

दूसरी अंग्रेजी का प्रयोग आज दुनिया की वास्तविकता है इसलिए उससे बचने या हटने के नारे देश और भाषा को बहुत दूर तक नहीं ले जाएंगे लेकिन अपनी भाषाओं के माध्यम से शिक्षा की जो समझ बनेगी उसके बाद अंग्रेजी सीखना या उसका प्रयोग ज्यादा आसान होगा बजाए कि अंग्रेजी शुरू से ही पढ़ाई जाए या उसे माध्यम भाषा के रूप में बच्चों पर थोपा जाए ।

लेकिन मौजूदा स्थितियों में हो इसके ठीक विपरीत रहा है ।
अंग्रेजी परस्त ऐसी स्थिति तो 1947 में भी नहीं थी जैसी आज 60 वर्ष के बाद बना दी गई है । अपनी बात को मैं हाल में ही हुए अनुभव से विस्तार देना चाहूंगा । अगस्त 2011 के अंतिम सप्‍ताह में मैं दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में था । यों इस पुस्तक मेले की भव्यता उतनी नहीं होती जितनी विश्‍व पुस्तक मेले की होती है लेकिन ईद की छुटटी का दिन होने के कारण अच्छी खासी चहल पहल थी । मेरे साथ दिल्ली विश्‍वविद्यालय के एक प्राध्यापक और उनका बेटा भी था । बेटा दिल्ली के एक जाने-माने निजी स्कूल में पढ़ता है और उसी स्कूल के मिजाज के अनुकूल उसने जितनी भी किताबें खरीदीं वे सब अंग्रेजी की ही थीं । अपनी मर्जी से कार्टून/कॉमिक्स आदि तो हमारी सलाह, दबाव से विज्ञान आदि की किताबें । मेरे विशेष आग्रह पर उसने एकलव्य पुस्तक स्टाल से जे.बी.एस. हाल्डेन की एक किताब खरीद तो ली लेकिन यह कहते हुए कि ‘अंकल हिन्दी की किताबें तो हमारी क्लास में कोई नहीं पढ़ता’ । मेले में आगे बढ़ते हुए हम एक और स्टाल पर खड़े हुए जहां मेरे मित्र पंचतंत्र खरीदना चाहते थे । हम किताबें उलट-पुलट ही रहे थे कि एक मध्यवर्गीय महिला अपने नौ दस वर्षीय बेटे के साथ आकर उन्हीं किताबों को देखने लगी । बेटा भी हिन्‍दी का पंचतंत्र उलट-पुलट कर देखने लगा । मां की नजरें अंग्रेजी के पंचतंत्र को तलाश रहीं थीं । शायद कुछ गलतफहमी में उन्होंने हमें दुकानदार समझा और हमसे पूछने लगी कि क्या अग्रेजी का पंचतंत्र आपके पास नहीं है ? हमने उसको रुकने के लिए कहा कि अभी प्रकाशक से पूछ लेंगे, लेकिन आपका बेटा तो हिन्दी का पंचतंत्र आराम से पढ़ रहा है आप हिन्दी की किताब को क्यों नहीं लेने देतीं ? उन्होंने संकोच से, लेकिन पूरी ईमानदारी से तुरंत स्वीकार किया कि मैं भी अपनी अंग्रेजी ठीक करना चाहती हूं । स्कूल में अंग्रेजी का होमवर्क मिलता है । मुझे अंग्रेजी आ जाएगी तो मैं भी बच्चे की मदद कर सकती हूं । हम वहां से आगे बढ़ गये, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि उन्होंने किताब अंग्रेजी की ही ली होगी ।

इस घटना से तुरंत दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं । एक तो बच्चे की शिक्षा के संबंध में कि बच्चों को वह नहीं पढ़ने दिया जा रहा है जो वे सहज गति से पढ़ना चाहते हैं । विशेष रूप से अपनी भाषा की किताबें, क्योंकि हर जगह, हर स्कूल में यही दबाव है कि उन्हें अंग्रेजी अच्छी आनी चाहिए अपनी भाषाएं चाहे आएं या न आएं । इसका अनुभव मुझे हिंन्दी के शिक्षकों से बातचीत करते हुए और तीव्रता से हुआ जब उन्होंने बताया कि बच्चों को हिन्दी पढ़ाना सबसे मुश्किल होता जा रहा है । क्योंकि बच्चों पर हर समय यह दबाव रहता है कि हिन्दी तो तुम्हें आती ही है विज्ञान, गणित, अंग्रेजी पर ध्यान दो इसलिए बच्चे रात-दिन उन्हीं विषयों को पढ़ते रहते हैं । यहां तक कि हिन्दी की क्लास करते वक्त भी वे कई बार हिन्‍दी से इतर दूसरे विषयों के नोट्स या अभ्यास में लगे रहते हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण तो पिछले एक दशक के उत्तर प्रदेश बोर्ड का परिणाम हैं जहां बच्चों के हिन्दी में नम्बर सबसे कम आ रहे हैं । और इसी से ही अगला निष्कर्ष निकलता है कि सिर्फ बच्चे ही अंग्रेजी की तरफ नहीं धकेले जा रहे हैं वह चाहे स्कूल, हो या मीडिया या पूरा परिवेश । इसका असर मां-बाप पर भी आ रहा है जहां उन्हें भी यह ललक आकर्षित कर रही है कि काश ! वे भी अपनी अंग्रेजी बेहतर कर पाते । घरों में काम वाले नौकर तक अंग्रेजी सीखने की कोशिश कर रहे हैं ।

शिक्षा में गलत भाषा नीति का यह असर होता है जब न केवल अगली पीढ़ी बल्कि पिछली पीढ़ी भी यह सोचने के लिए मजबूर हो जाए कि उसे अच्छी अंग्रेजी आनी चाहिए ।

लेकिन ऐसा रातो-रात नहीं हुआ । अफसोसजनक पहलू यह है कि संविधान की दुहाई देने वाले राजनेता, बुद्धिजीवियों के देखते-देखते यह हो रहा है और इसके खिलाफ कोई चूं भी नहीं कर रहा । संघ लोक सेवा आयोग द्वारा भारतीय प्रशासनिक और अन्य केंद्रीय सेवाओं के लिए आयोजित परीक्षा के प्रथम चरण में ही अंग्रेजी के प्रवेश के बाद तो अब हिन्‍दी और बाकी भारतीय भाषाओं की उल्टी गिनती शुरू होने में कोई शक ही नहीं रहा । आश्‍चर्य और क्षोभ की बात तो यह है कि भारतीय भाषाओं के खिलाफ लिये गये इस कदम के खिलाफ जितनी व्यापक प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी वैसा नहीं हुआ । पूरा सन्नाटा व्याप्‍त है । संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग और इधर नौकरी की ज्यादातर प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार बढ़ती अंग्रेजी की नीतियों पर रोशनी डालने से पहले यहां तक पहुंचने की यात्रा के इतिहास से गुजरना बेहतर रहेगा ।

1947 में जब हम स्वतंत्र हुए तो जन साधारण की मांग थी कि अपनी भाषाएं यानि प्रादेशिक भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाया जाए । उसके कारण बहुत स्पष्‍ट थे :-

  1. राष्ट्रीय भावना की बात ।
  2. शिक्षा में उन बच्चों की भागीदारी जो अंग्रेजी नहीं जानते थे और तीसरे कि उच्चतर शिक्षा प्रादेशिक भाषाओं में देने से ज्यादा प्रभावी रहेगी । आंकड़े बताते हैं कि 1947 तक मैट्रिक तक शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रादेशिक भाषाओं का खूब प्रयोग हो रहा था । अंग्रेजी के स्कूल भी थे लेकिन उनकी संख्या बहत कम थी ।

यह इसलिए भी हुआ कि स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर महात्मा गांधी समेत सभी प्रमुख नेताओं ने प्रादेशिक भाषाओं के प्रयोग की बात उठाई थी और इसीलिए आजादी के तुरंत बाद वस्तुस्थिति यह थी कि शिक्षा के माध्यम की समस्या का केवल विश्‍वविद्यालय स्तर पर समाधान होना बाकी था । जनता को यह आशा थी कि राष्ट्रीय नेतृत्व जल्दी ही इसका समाधान ढूंढ़ लेगा । लेकिन दुर्भाग्यवश ये आशाएं निराधार सिद्ध हुईं । इसमें कुछ हिन्‍दी वालों का हट बाधा बना तो कुछ अंग्रेजी के पक्ष में दुराग्रह । आजादी के तुरंत बाद 1947-49 में गठित विश्‍वविद्यालय शिक्षा आयोग ने भी प्रादेशिक भाषाओं को शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाने की बात कही लेकिन हर दशक के बाद शिक्षा में अंग्रेजी का प्रयोग बढ़ता गया । (शिक्षा आयोग और उसके बाद ; जे.पी. नायक (पृष्ठ 65)

कोठारी आयोग (1964-66) – शिक्षा में अपनी भाषाओं की सबसे पुरजोर वकालत डॉ. दौलत सिंह कोठारी आयोग ने की । डॉ. दौलत सिंह कोठारी एक जाने-माने शिक्षाविद, भौतिक शास्त्री, विज्ञान प्रचारक थे । इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में जाने-माने भौतिक शास्त्री, मेघनाथ साहा के विद्यार्थी थे । कैम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय से लार्ड रदरफोर्ड के साथ पी.एच.डी. पूरी की । लार्ड रदरफोर्ड ने दिल्ली विश्‍वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर सर मॉरिस ग्वायर को लिखा था कि ‘ मैं बिना हिचकिचाहट कोठारी को कैम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करना चाहता हूं परंतु यह नौजवान पढ़ाई पूरी करके तुरंत देश लौटना चाहता है ।’

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विज्ञान नीति में जो लोग शामिल थे उनमें डॉ. कोठारी, होमी भाभा, डॉ. मेघनाथ साहा और सी.वी. रमन थे । डॉ. कोठारी रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार रहे । 1961 में विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए जहां वे दस वर्ष तक रहे । डॉ. कोठारी ने यू.जी.सी. के अपने कार्यकाल में शिक्षकों की क्षमता, प्रतिष्ठा से लेकर केंद्रीय विश्‍वविद्यालय और उच्च कोटि के अध्ययन केंद्रों को बनाने में विशेष भूमिका निभाई ।

स्कूली शिक्षा में भी उनकी लगातार रुचि रही । इसीलिए उन्हें राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (1964 से 1966) का अध्यक्ष बनाया गया । आजाद भारत में शिक्षा पर संभवत: सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज, जिसकी दो बातें बेहद चर्चित रही हैं । पहली – समान विद्यालय व्यवस्था (common schooling system) और दूसरी देश की शिक्षा स्नातकोत्तर स्तर तक अपनी भाषाओं में दी जानी चाहिए ।

तत्कालीन शिक्षा मंत्री एम.सी. छागला और डॉ. त्रिगुण सेन समेत देश के अधिकांश बुद्धिजीवी, भाषाविद, उच्च शिक्षा अपनी भाषा में देने के हिमायती थे । यहां डॉ. त्रिगुण सेन के विचारों को जानना बहुत उपयोगी रहेगा जो उन्होंने कुलपतियों के सम्मेलन 1967 को संबोधित करते हुए कहे थे । त्रिगुण सेन ने आश्चर्य प्रकट किया कि ‘ऐसा प्रतीत होता है जैसे सभी विश्‍वविद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई हो रही है और शिक्षा मंत्रालय ने यहां यही प्रस्ताव रखा है । इसमें कोई सच्चाई नहीं है । क्योंकि अपनी भाषाओं में पढ़ाने की शुरूआत पहले ही हो चुकी है । इस समय देश में पैंतीस विश्‍वविद्यालय ऐसे हैं जो प्रादेशिक भाषाओं में भी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं । लगभग पंद्रह विश्‍वविद्यालयों में नब्बे प्रतिशत या उससे अधिक छात्रों ने प्रादेशिक भाषा का विकल्प अपनाया है और सत्रह विश्‍वविद्यालयों में स्नातक स्तर पर प्रादेशिक भाषाओं का प्रयोग किया जा सकता है ।’ अपनी भाषाओं में शिक्षा क्यों जरूरी है ? डॉ. त्रिगुण सेन कहते हैं ,’क्योंकि राज्य सरकारों की ऐसी तीव्र इच्छा है । इसके साथ-साथ राज्य सरकारें प्रशासकीय कार्यों के लिए प्रादेशिक भाषाओं का प्रयोग तो आरंभ करना ही चाहती हैं । अनेक स्थितियों में शिक्षा माध्यम के रूप में अंग्रेजी के प्रयोग में कठिनाई भी आ रही है । उन्होंने तो यह भी कहा कि मैं धीमी गति से चलने वाले इस आंदोलन में सुनियोजित और व्यवस्थित प्रगति का कोड लाना चाहता हूं । यदि इसे पाप समझा जाता है तो मैं इसका भागी हूं । मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हूं कि यह पूर्णत: शैक्षिक निर्णय है और किसी भी प्रकार की राजनीति से प्रभावित नहीं है । मुझे हर्ष है कि भारत सरकार भी इसके पक्ष में है । (कोठारी आयोग और उसके बाद : पृष्ठ 68) ।

त्रिगुण सेन स्वयं भारतीय भाषाओं के इस्तेमाल को उच्चतर शिक्षा में जल्दी से जल्दी शुरू करना चाहते थे क्योंकि जैसा कि शिक्षा आयोग ने अपनी सिफारिशों में कहा कि समय के साथ समस्या और जटिल और कठिन होती जाएगी ।

वाकई शिक्षा आयोग की बात सच हुई ।
आगे बढ़ने से पहले यहां तत्कालीन राजनीति के एक और महत्वपूर्ण पक्ष और सामाजिक परिवेश को भी समझना जरूरी है ।

देश की जनता और राजनेता जनता के दबाव में प्रादेशिक भाषा के हिमायती थे तो अंग्रेजी वाले भी चुप नहीं बैठें । लोहिया जैसे अनेक राजनेता हिन्‍दी और प्रादेशिक भाषाओं के घोर हिमायती थे । शायद इसी का असर रहा होगा कि शिक्षा की उच्च प्रशासनिक सेवाओं के लिए आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के रिव्यू के लिए एक कमेटी गठित की गई और डॉ. कोठारी को 1974 में फिर उसका अध्यक्ष बनाया गया ।

इस कमेटी ने 1976 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जिसके आधार पर 1979 से भारत सरकार के उच्च पदों आई.ए.एस., आई.पी.एस. और बीस दूसरे विभागों के लिए एक कॉमन परीक्षा का आयोजन प्रारंभ हुआ । सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम जो इस कमेटी ने सुझाया वह था :- अपनी भाषाओं में (संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी भारतीय भाषाओं ) और अंग्रेजी में उत्तर देने की छूट और दूसरा उम्र सीमा के साथ-साथ देश भर में परीक्षा केंद्र भी बढ़ाए जिससे दूर देहात-कस्बों के ज्यादा से ज्यादा बच्चे इन परीक्षाओं में बैठ सकें और देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं देश के प्रशासन में समान रूप से हाथ बटाएं । कोठारी कमेटी को मुख्य रूप से निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करने के लिए कहा गया था :-

  1. क्या मौजूदा आई.एस.एस., आई.पी.एस. और केंद्रीय सेवाओं के लिए ली जाने वाली तीन अलग-अलग परीक्षाओं के बजाए एक कॉमन परीक्षा की जा सकती है ?
  2. क्या साक्षात्कार परीक्षा की मौजूदा पद्धति ठीक है ?
  3. क्या इंजीनियरी, मेडिकल, कॉमर्स जैसे विषय शामिल किए जाएं और किन विषयों को बाहर निकाला जाए ?
  4. कोई अभ्यर्थी कितनी बार परीक्षा दे सकता है ? आदि

यह शुरू की शर्तें थीं । उसके बाद कुछ और निम्नलिखित बातों पर भी समिति को विचार करने के लिए कहा गया :-

  1. क्या आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं के ज्ञान की अनिवार्यता आई.ए.एस., आई.एफ.एस., आई.ई.एस. की भर्ती परीक्षा में भी होनी चाहिए ?
  2. साक्षात्कार में भी क्या भारतीय भाषाओं में बोलने की छूट दी जा सकती है ?
  3. क्या इंडियन फारेस्ट सर्विस, इंडियन इक्नॉमिक्स सर्विस, इंडियन स्टेटिक्स सर्विस में भी वैकल्पिक विषयों को भारतीय भाषाओं में लिखने की छूट दी जा सकती है ?
  4. क्या आई.ई.एस., आई.एफ.एस., आई.एस.एस. को भी कॉमन सिविल सेवा परीक्षा आदि में शामिल किया जा सकता है ?
  5. रटंत को कैसे कम किया जाए ?
  6. और चुने हुए उम्मीदवारों की ट्रेनिंग, प्रशिक्षण को कैसे प्रभावी बनाया जाए ? आदि ।

यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने और साक्षात्कार के मुद्दे समिति को बाद में दिए गए । अनुमान लगा सकते हैं जिस समिति के अध्यक्ष दौलत सिंह कोठारी थे और जो परीक्षा देश की सर्वोच्च सेवाओं के लिए आयोजित की जाती हो उसमें अपनी भाषाओं के ज्ञान के बिना कैसे काम चल सकता है । सभवत: प्रोफेसर कोठारी ने खुद अपने विवेक और प्रभाव से इन मुद्दों को शामिल कराया होगा ।

उच्च सिविल सेवाओं के बारे में जवाहर लाल नेहरू को उदधृत करना ठीक रहेगा :- प्रशासन का उद्देश्य कुछ करके दिखाना है और न कि किसी प्रकार के काल्पनिक जगत में रहकर, किन्हीं कार्य विधियों के नियमों का अनुसरण कर और अपने आप पर इतराते हुए उस पर पूर्ण संतुष्टि अनुभव करना है । वस्तुत: प्रशासन का विषय मनुष्य और उनका कल्याण हैं ।

 

सिविल सेवा की भर्ती का संक्षिप्त इतिहास
भारत के लिए पहली बार 1885 में परीक्षा आयोजित हुई तब उसे इंडियन कोविनेटिड (Indian Covenated) सिविल सर्विस का नाम दिया गया । उम्र थी 18-23 साल । यूनिवर्सिटी की डिग्री की अनिवार्यता भी नहीं थी लेकिन परीक्षा का स्तर इंग्लैंड की फर्स्ट डिग्री के बराबर था । 1926 में फेडरल पब्लिक सर्विस की स्थापना हुई और इस परीक्षा का नाम रखा आई.सी.एस. । 1937 से फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा सिविल सर्विस परीक्षा नियमित रूप से आयोजित हुई । आजादी के बाद ऑल इंडिया सर्विस एक्ट बना । फेडरल सर्विस कमीशन का नाम बदलकर यूनियन पब्लिक कमीशन बना और साथ-साथ इंडियन सिविल सर्विस (ICS) का नाम बदलकर इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IAS) हुआ । इस परिवर्तन के पीछे सरदार पटेल की विशेष भूमिका थी ।

  • आजाद भारत में कोठारी समिति (1979) की सिफारिशों के लागू होने से पहले इन सेवाओं में उम्र की सीमा भी 20 से 24 तक आगे पीछे होती रही । लब्बो लुबाव यह कि चंद पढ़े-लिखे शहरी और वे भी अधिकतर अंग्रेजी जानने वाले ही इन परीक्षाओं में बैठते रहे और नौकरियां पाते रहे ।
  • 1950 में परीक्षा देने वालों की संख्या मात्र साढ़े तीन हजार थी जो 1970 में बढ़कर साढे ग्यारह हजार हो गई । लेकिन कोठारी समिति की सिफारिशें लागू होने के बाद 1979 में परीक्षा में बैठने वाले अभ्यर्थी एक लाख से ज्यादा थे 1970 के मुकाबले लगभग 10 गुने । उम्र सीमा बढ़ाने का तो असर पड़ा ही, अपनी भाषा में लिखने की छूट ने मानो भारत के गरीब, पिछड़ों को एक अभूतपूर्व अवसर दिया :-

तालिका

वर्ष परीक्षा में बैठने वाले अभ्यर्थी उत्तीर्ण होने वाले अभ्यर्थी
1950 3,647 240
1960 10,000 333
1970 11,710 428
1979 1,00,742 703

आजादी के बाद हिन्दी और भारतीय भाषाओं को लेकर लगातार एक असमंजस की स्थिति बनी रही । राजभाषा आयोग उसकी संस्तुतियाँ, दक्षिण से हिन्दी के खिलाफ आवाज आदि 1964-1966 में गठित शिक्षा आयोग ने पहली बार भाषा और शिक्षा के संबंधों की विस्तृत पड़ताल की । डॉ. कोठारी इसके अध्यक्ष थे । संक्षेप में उन्होंने निम्नलिखित बातों की सिफारिश की :-

  • नई भाषा नीति :- शिक्षा के सभी चरणों में, प्रादेशिक भाषाओं को शिक्षा का माध्यम होना चाहिए (प्रारम्भिक शिक्षा में मातृभाषा को सर्वाधिक प्राथमिकता दी जाएगी) । इस उद्देश्य के लिये एक निश्चित, सुनियोजित और समयबद्ध कार्यक्रम तैयार करना होगा । अंग्रेजी भाषा संसार से हमारी संचार का मुख्य माध्यम है और आधुनिक वैज्ञानिक युग के बढ़ते हुए ज्ञान को प्राप्त करने का मुख्य साधन है । अत: अंग्रेजी को प्रोत्साहन और महत्व मिलना चाहिए, जिसमें उसे पढ़ने और उसको समझने पर विशेष बल दिया जाए । अन्य अन्तर्राष्‍ट्रीय भाषाओं जैसे – रूसी, स्पेनिश, फ्रेंच और जर्मन के अध्ययन को भी बढ़ावा मिलना चाहिए । राष्ट्रीय स्तर पर सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी को बढ़ावा दिया जाए तथा गैर-हिन्दी क्षेत्रों में हिन्दी के अध्ययन को प्रोत्साहित किया जाए । भारत की सभी राष्ट्रीय भाषाएँ एक तरह का सम्पर्क स्थापित करने में सहायक हो सकती हैं । अत: प्रत्येक भाषायी क्षेत्र में उनके अध्ययन की व्यवस्था होनी चाहिए । स्कूल में, माध्यमिक चरण में तीन भाषायी फॉर्मूला अपनाया जाए । दूसरी भाषा छ: वर्ष तक, और तीसरी भाषा तीन वर्ष तक (कम से कम) पढ़ाई जाए । उच्चतर माध्यमिक चरण में दो भाषाओं का अध्ययन हो और विश्‍वविद्यालय चरण में सामान्यत: किसी भी भाषा का अध्ययन अनिवार्य न किया जाए, जब तक कि उस भाषा का विद्यार्थी के कार्य से अन्तरंग संबंध न हो ।
  • समान्य स्कूल प्रणाली :- वर्तमान शिक्षा प्रणाली में सम्पन्न वर्गो और गरीब जनता के बीच सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ प्रतिबिम्बित होती हैं । इसमें एक ओर तो हर स्तर के लिए उच्च कोटि की शिक्षण संस्थाएं हैं जिनमें अमीरों तथा सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण समूहों के बच्चे पढ़ने जाते हैं । परन्तु सरकार द्वारा चलाई जाने वाली अधिकांश संस्थाएं निम्न कोटि की हैं और अधिकांश गरीब तथा सीमावर्ती लोगों के लिए केवल वे ही उपलब्ध हैं । सामाजिक और राष्ट्रीय एकीकरण की दृष्टि से, यह पृथक्करण अति आपत्तिजनक है । अत: राष्ट्रीय स्कूल प्रणाली को चाहिए कि वह सामान्य स्कूल प्रणाली अपनाए जो इस पृथक्करण को समाप्त कर देगा और सभी बच्चों को स्कूलों की एक सामान्य प्रणाली में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर देगी जिनका स्तर लगभग समान होगा । प्राथमिक शिक्षा के लिये विशेष रूप से इसे पड़ोसी स्कूल का प्रतिमान अपनाना चाहिए, जिसमें सब बच्चे- चाहे वे किसी भी जाति, प्रजाति, धर्म, लिंग या वर्ण के हों – मोहल्ले के एक सामान्य प्राथमिक स्कूल में पढ़ने जाएं ।

संसद में इस आयोग की सिफारिशों पर लम्बी बहस चली और लेकिन न केवल हिन्दी भाषी बल्कि दूसरी भाषाओं के विद्वानों ने भी पुरजोर ढंग से इस बात की वकालत की कि शिक्षा अपनी भाषाओं में ज्यादा प्रभावी और सफल होती है ।

शायद इसी माहौल का असर रहा होगा कि 1970 में पहली बार भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में निबंध और सामान्य ज्ञान के परचों को अंग्रेजी के अलावा भारतीय भाषाओं में भी लिखने की छूट दी गई । यों इन पेपरों के नंबर बहुत ज्यादा नहीं थे लेकिन अभी तक के कायम अंग्रेजी माहौल के सन्नाटे को तोड़ने के लिए ये कदम महत्वपूर्ण कहे जा सकते हैं ।

  • आई.ए.एस. आदि परीक्षा में 1970 में निबंध का पेपर अपनी भाषा में देने वाले लगभग 15-17 प्रतिशत थे और सामान्य ज्ञान अपनी भाषाओं में देने वाले 9-10 प्रतिशत । इसमें भी नब्बे प्रतिशत ने अपनी भाषाओं में हिन्दी माध्यम चुना । 1970 के अंग्रेजी के माहौल को देखते हुए यह कदम भी बहुत बड़े मायने रखता है ।
  • शिक्षा आयोग द्वारा अपनी भाषाओं में विश्‍वविद्यालयी शिक्षा देने का विकल्प, वैज्ञानिक शब्दावली, आयोग के प्रयास हिन्दी निदेशालय अनुवाद ब्यूरो की स्थापना और अनुवाद के कामों को बढ़ावा देने और भारत की उच्च सेवाओं आई.ए.एस., आई.पी.एस. में निबंध और सामान्य ज्ञान के परचे अपनी भाषाओं में देने की छूट जैसे कदमों का व्यापक स्वागत हुआ । सामाजिक विषयों, इतिहास, राजनीति शास्त्र, अर्थ शास्त्र, मनोविज्ञान की अंग्रेजी पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुआ और मौलिक किताबें भी सामने आईं । लोहिया और दूसरे राजनेताओं के प्रयासों को भी यहां याद रखने की जरूरत है ।
  • इसी का अगला कदम कोठारी समिति का गठन कहा जा सकता है । शायद यह लोकतंत्र की अंदरूनी जरूरत थी कि कैसे सेवाओं में आने वाले अभ्यर्थियों को आधार बढ़ाया जा सके और साथ-साथ ही पूरी चुनाव (Selection) प्रक्रिया में भागीदारी का ।
  • समिति ने इस बात का उल्लेख किया कि राष्ट्र के सम्मुख चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए इन सेवाओं के सदस्यों में न केवल अपेक्षित ज्ञान और कौशल होना चाहिए बल्कि समाज के साथ और समाज के लिए कार्य करने के लिए सामाजिक भाव प्रवणता और नैतिक गुणों का होना भी जरूरी है । हम इन विचारों से सहमत हैं और महसूस करते हैं कि यद्यपि तेजी से हो रहे परिवर्तन के युग में नवीन प्रक्रिया को लाने के लिए उच्च सिविल सेवाओं के लिए बौद्धिक गुणों, अपेक्षित ज्ञान और क्षमता का होना आवश्यक है लेकिन इन सेवाओं के अधिकारियों में प्रशासन को एक सहभागी कार्य बनाने के लिए जनता में घुल-मिल जाने की सामाजिक विशेषता भी होनी चाहिए । अपने क्षेत्र में सफल होने के लिए इन अधिकारियों में देश के संविधान में उल्लिखित उच्च आदर्शों के प्रति दृढ़ आस्था के साथ-साथ घोर परिश्रम करने की क्षमता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, कार्य सार्थकता और धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण भी होना चाहिए ।
  • 1.01 भारत में उच्च सिविल सेवाओं के लिए चयन की पद्धति की समीक्षा सम्भावी प्रशासक की तैनाती के परिवेश में करनी होगी क्योंकि उसमें कार्यों के बारे में व्यापक जानकारी और उन्हें कुशलतापूर्वक करने के लिए आवश्यक क्षमता होती है । उच्च सिविल सेवाओं के लिए चयन की वही योजना उपयुक्त होगी जो इन उद्देश्यों की पूर्ति करने में सफल होती है ।

कोठारी आयोग की मुख्य सिफारिशें :-

  • सभी सेवाओं के लिए एक ही परीक्षा हो ।
  • तीन चरण होंगे प्रारंभिक, मुख्य परीक्षा (मेन) और पर्सनलिटी टेस्ट (साक्षात्कार) वैकल्पिक विषयों की संख्या बढ़ाई गई
  • उम्र सीमा 26 सुझाई जिसे बाद में बढ़ाकर 28 किया गया ।
  • भाषा माध्यम संबंधी सुझाव – समिति ने साफ शब्दों में कहा कि समानता के अवसर के नाते जो छूट निबंध और सामान्य ज्ञान के परचे के लिए दी जाती है वह वैकल्पिक विषयों के उत्तर देने में भी होनी चाहिए । अभ्यर्थी आठवीं अनुसूची में शामिल अंग्रेजी समेत किसी भी भाषा को चुन सकते हैं । भाषा आयोग का यह सुझाव प्रारंभिक परीक्षा के लिए भी था और मुख्य परीक्षा के लिए भी । प्रारंभिक परीक्षा के लिए कोठारी समिति का सुझाव पांच परचों का था । 300-300 नंबर के पांच परचों का एक भारतीय भाषा, दूसरा अंग्रेजी भाषा, तीसरा सामान्य ज्ञान और दो परचे वैकल्पिक विषय के ।

सरकार ने अंतिम रूप से जो सिफारिश मंजूर की वे निम्नलिखित है :-
प्रारंभिक परीक्षा (चरण I)
पेपर एक- 150 नंबर -सामान्य ज्ञान, पेपर दो- 300 नंबर- वैकल्पिक विषय (इतिहास, गणित ….राजनीति शास्त्र …….कोई भी विषय) । प्रीलिमिनरी परीक्षा का उद्देश्य छंटनी करके उन अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा में आगे लाना था जो विशेष रूप से सेवाओं में रूचि रखते हैं । इससे उनके उत्तरों की जाँच और गंभीरता से की जा सके । मोटा-मोटी लगभग दस गुना अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा में बैठने की अनुमति की संस्तुति की गई ।

 

मुख्य परीक्षा का विस्तृत विवरण (चरण II)

  1. भाषा ज्ञान – कोई भी भारतीय भाषा 300 नंबर (स्तर दसवीं तक)
  2. पेपर-2 अंग्रेजी 300 नंबर (स्तर दसवीं तक)
  3. सामान्य ज्ञान एक, सामान्य ज्ञान दो प्रत्येक 300-300 नंबर
  4. वैकल्पिक विषय- दो हर वैकल्पिक विषय के पेपर एक 300 नंबर पेपर दो 300 नंबर

 

यानि कि कुल 1800 । साक्षात्कार के नंबर 250 कुल योग 2050 ।
यहाँ रेखांकित करने वाली बात यह है कि कोठारी समिति ने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि भारतीय भाषाओं की वजह से कोई भेदभाव न हो । इसीलिए भाषा ज्ञान के नंबरों को अंतिम मूल्यांकन में शामिल नहीं किया गया । उन्हें सिर्फ क्वालिफाइंग नंबरों के रूप में ही रखा गया ।
 कोठारी समिति की परीक्षा के माध्यम के बारे में टिप्पणी (ऑबजर्वेशन)

  • अभी तक की परीक्षाओं में अभ्यर्थियों को अंग्रेजी में ही उत्तर देने होते हैं । उन्हें भारतीय भाषाओं में देने की कोई सुविधा नहीं है । इससे वे विद्यार्थी जिन्होंने भारतीय भाषाओं के माध्यम से अपनी पढाई की है वे हतोत्साहित रहते हैं ऐसे विद्यार्थियों की संख्या शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ लगातार बढ़ रही है । उदाहरण के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय जहाँ से इन सेवाओं में सबसे ज्यादा चुने जाते हैं वहाँ हिन्दी ऑनर्स डिग्री में हिन्दी माध्यम में पढ़ने वाले लगातार बढ़ रहे हैं । 1974 में दिल्ली विश्‍वविद्यालय में इतिहास, इक्नोमिक्स और राजनीति शास्त्र में क्रमश: 18, 12 और 37 प्रतिशत छात्रों ने ऑनर्स की डिग्री हिन्दी माध्यम में ली है । आगे यह संख्या और भी बढ़ेगी ।(पैरा 1034)
  •  इसलिए यह सिफारिश की जाती है जैसे निबंध और सामान्य ज्ञान में अपनी भाषाओं में उत्तर लिखने की छूट है वैसी ही छूट वैकल्पिक विषयों में होनी चाहिए । शैक्षिक दृष्टि के साथ-साथ यह समानता के अधिकार की भी बात है ।(पैरा 1035)
  • जहाँ तक समान आंकलन और भाषा के बीच एक समान पैमाने का मामला है यह कुछ पेचीदा जरूर है लेकिन ऐसा नहीं कि इसे हल नहीं किया जा सके । (पैरा 1036)

1974 से वर्ष 2011 यानि कि पैंतीस सालों में यदि कोठारी का स्वप्न सच होता तो भारतीय भाषाओं में पढ़ने वालों की स्थिति बदल गई होती । ये शोध का विषय हो सकता है फिर दिल्ली विश्‍वविद्यालय या दूसरे केंद्रीय विश्‍वविद्यालयों में जहां सरकार पूरे अनुदान देती है वहां अपनी भाषाओं में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध है भी या नहीं और यदि है भी तो कितनी ? पिछले दशक में अपनी भाषाओं में पढ़ने, पढ़ाने की तस्वीर दिल्ली विश्वविद्यालय में और बिगड़ी है ।
अच्छा रहेगा विंश्‍वविद्यालयों के प्रोफेसर इस विषय में शोध और सूचना इकट्ठी करके सरकार के सामने अधिकर के रूप में अपनी भाषाओं में पढ़ाने की इन मांगों को उठाएं । क्या आम जनता और विद्यार्थियों के हित में आरक्षण की बातें भी इसी से मिलती जुलती नहीं हैं ? भाषा का मसला क्या जाति से कम महत्वपूर्ण है ?

दूसरी मूल्यांकन समिति  – सतीश चन्द्रा कमेटी
कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुकूल लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा की समीक्षा और मूल्यांकन के लिए प्रोफेसर सतीश चन्द्रा (पूर्व अध्यक्ष विश्वविद्यालयअनुदान आयोग) की अध्यक्षता में एक समिति 1988 में नियुक्त की ।

  1. मुख्य रूप से इसके सामने निम्नलिखित जरूरतों के बारे में जाँच करने के लिए कहा गया :-
  2. चिकित्सा संबंधी विषयों को शामिल करना और साथ ही अन्य विषयों को निकाल देने के बारे में सिफारिश ।
  3. भर्ती की प्रक्रिया में भाषण, सामूहिक चर्चा (Group Discussion) मनो विज्ञान और अभिक्षमता परीक्षण (Aptitude Test) आदि के बारे में विचार करना ।

छह महीने में समिति को यह कार्य करना था लेकिन मई 1989 में जब समिति अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रही थी तब निम्नलिखित पहलू भी इस समिति को सौंप दिये गए :-

  1. सभी सेवाओं के लिए परीक्षा की बहुभाषा पद्धति को लागू करने संबंधी संघ लोक सेवा आयोग के मामले ।
  2. संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित अंग्रेजी के अनिवार्य प्रश्न पत्र को बंद करने की माँग ।

 

समिति की मुख्य अनुशंसायें सारांश में इस प्रकार हैं :-

  1. समिति ने भारतीय सूचना सेवा, रेलवे कार्मिक सेवा, सुरक्षा बल समेत सात सेवाओं को सिविल सेवा परीक्षा से बाहर करने की अनुशंसा की ।
  2. साथ ही केंद्रीय सेवाओं में जो उम्मीदवार एक बार प्रीलिमिनरी पास कर लेते हैं उन्हें अगले साल परीक्षा में प्रीलिमिनरी में बैठने की छूट दी जानी चाहिए ।
  3. डॉक्टर, इंजीनियरों को भी सिविल सेवाओं में बैठने की पात्रता बनी रहनी चाहिए ।
  4. निम्नलिखित विषयों को पाठयक्रम से निकाल दिया जाना चाहिए – जैसे- फ्रेंच, जर्मन, रूसी, चीनी । और इलेक्ट्रानिक्स, टेलीकम्यूनिकेशन और मेडीकल साइंस भी शामिल होनी चाहिए ।
  5. प्रधान (Main) परीक्षा में दो सौ अंक का एक निबंध का प्रश्न पत्र शामिल किया जाना चाहिए । यह अंग्रेजी अथवा संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित किसी भी भारतीय भाषा में हो सकता है ।
  6. साक्षात्कार के 250 अंकों  के बजाए 300 अंक  होने चाहिए ।
  7. इस प्रकार कुल मुख्य परीक्षा के अंक हो जाएंगे 2050 के बजाय 2300 (दो सौ निबंध के जुड़ गये और पचास साक्षात्कार टेस्ट में)

सतीश चंद समिति के कुछ और निष्कर्ष :-

  1. 1984-87 तक की अवधि के डेटा से विदित होता है कि सामान्य उम्मीदवारों का 20 प्रतिशत, अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों का 55 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों का 48 प्रतिशत, निम्न आय वर्ग से सम्बन्धित है ।
  2. सफलता प्राप्त उम्मीदवारों में पहली पीढ़ी के पढ़े-लिखों की भारी संख्या है ।
  3. 1984-87 में जन्मस्थान और स्कूल शिक्षा प्राप्त करने के अधिकांश भाग की दृष्टि से सफलता प्राप्त उम्मीदवारों का अच्छा अनुपात ग्रामों अथवा छोटे कस्बों से आया है ।
  4. जिन राज्यों का उच्च सिविल सेवाओं में प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, उन राज्यों में राज्य सरकारों द्वारा कोचिंग केंद्र शुरू किए जाने चाहिए ।
  5. इस समय उम्मीदवारों को परीक्षा अंग्रेजी अथवा संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित किसी एक भारतीय भाषा में देने की अनुमति है । यह पद्धति ठीक है और किसी भाषाई वर्ग के पक्ष में पक्षपात नहीं है ।
  6. वैकल्पिक विषयों के पाठयक्रमों की विस्तारपूर्वक व्याख्या और प्रत्येक पांच वर्ष अथवा और जल्दी इसका पुनरीक्षण और उसे अद्यतन किया जाना चाहिए ।

मोटा-मोटी सतीश चन्द्रा कमेटी ने भाषा और अवसरों की दृष्टि से कोठारी आयोग की आत्मा को और विस्तार ही दिया यानि कि भाषा के मसले पर पूरा समर्थन । महिलाओं की संख्या बढ़ाने, अनुसूचित जाति, जनजाति के अभ्यर्थियों को कैसे आगे बढ़ाया जाए या वे राज्य जहाँ से बहुत कम लोग आते हैं वहाँ सिविल सेवाओं के बारे में प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए आदि बातें ।

सरकार ने बहुत सारी बातों को लम्बे विचार विमर्श के बाद मान लिया । निबंध का पेपर 1993 से शुरू हो गया है । साक्षात्कार के नंबर 250 से बढ़ाकर 300 कर दिये । कुछ विषयों को अनुशंसाओं के अनुकूल शामिल किया गया तो कुछ को बाहर भी किया गया । ग्रुप डिस्कशन टेस्ट जैसे बातों को मंजूरी नहीं मिली । उसका कारण यही कि गाँव, देहात के लोगों पर इसका कोई विपरीत असर न पड़े ।

 

Third Review committee – डॉ.वाई.के.अलघ कमेटी

1999 तक कोठारी आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा के लगभग बीस वर्ष पूरे हो चुके थे । सतीश चन्द्रा रिपोर्ट के मद्देनजर कुछ फेर बदल जरूर हुए थे । इसलिए यू.पी.एस.सी. ने 1999 में एक समिति बनाई जिसमें मसूरी, हैदराबाद, शिमला, बड़ोदरा के प्रशिक्षण केंद्रों के प्रतिनिधि भी थे । 19 जुलाई 2000 को प्रोफेसर योगेन्द्र कुमार अलघ की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया । सात और भी अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वान इसमें शामिल थे । समिति के सामने मुख्य बिन्दू निम्नलिखित थे :-

  1. सिविल सेवाओं में आने वाले अधिकारियों की ट्रेनिंग और अपने कार्य क्षेत्र में काम का मूल्यांकन ।
  2. साक्षात्कार को और प्रभावी बनाने के लिए या उसके नंबर बढ़ाने के लिए ।
  3. कितनी बार परीक्षा दी जा सकती है या शैक्षिक योग्यताओं की समीक्षा
  4. अलग-अलग नौकरियों की जरूरतें अलग होती हैं इसलिए क्या विभिन्न सेवाओं में आबंटन का कोई नया आधार विकसित किया जाए ।
  5. प्रीलिमिनरी या मुख्य परीक्षा के बारे में विषयों में परिवर्तन आदि का कोई सुझाव ।

सबसे अच्छी बात सिविल सर्विस, एडमिनिट्रेशन और संघ लोक सेवा आयोग की यह कही जा सकती है कि कम से कम यह संस्थान लगातार समीक्षा और मूल्यांकन में यकीन करता रहा है । 1950 के बाद लगातार कई समितियाँ गठित हुई और उनकी सिफारिशों को लागू किया गया । कोठारी समिति की रपट, प्रोफेसर सतीश चन्द्रा समिति या प्रोफेसर योगेन्द्र कुमार अलघ तीनों की प्रतिवेदन बहुत सुन्दर, तथ्यात्म्क और वस्तुपरक ढंग से मूल्यांकन पेश करते हैं । इन रपटों या सिफारिशों को शिक्षाशास्त्री, समाज शास्त्री और सरकारी सेवाओं से जुड़े हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिए । ये मूल्यांकन एक संकेत भी देते हैं कि ऐसे मूल्यांकन, विश्‍वविद्यालयी शिक्षा या सरकारी सेवाओं में आरक्षण जैसी नीतियों के भी हों तो अच्छे परिणाम सामने आएंगे । इन प्रतिवेदनों में तथ्य समझ और दृष्टि की पारदर्शिता और विवेचन, विश्लेषण की गंभीरता काबिले तारीफ है ।

प्रश्‍न उठ सकता है कि फिर नए पैटर्न (2011) से डर कैसा और क्यों ?
जब प्रादेशिक भाषाओं को या भारतीय भाषाओं को बढ़ाने की बात और उन्हें जानने के महत्व को कोठारी समिति ने भी रेखांकित किया, सतीश चन्द्रा समिति ने भी और प्रोफेसर योगेन्द्र अलघ समिति ने भी तो अचानक प्रारंभिक परीक्षा के पहले चरण में ही अंग्रेजी कहाँ से आ टपकी ।

कोठारी समिति की तरफ एक बार फिर लौटे तो उन्होंने भी प्रारंभिक चरण में अंग्रेजी और सभी भारतीय भाषाओं को शामिल करने की बात कही थी । 1989 में गठित सतीश चन्द्रा कमेटी ने जब दस साल के परीक्षा परिणामों के आधार पर आंकलन किया तब भी भारतीय भाषाओं और गरीब पिछड़ों के प्रतिनिधित्व को बहुत अच्छा संकेत माना । उन्होंने बार-बार इस बात को रेखांकित किया कि सामान्य उम्मीदवार के लगभग बीस प्रतिशत और एस.सी., एस.सटी. को पचास प्रतिशत इस अवधि में निम्न आय वर्ग से आए हैं और उनमें से अधिकतर पहली पीढ़ी के पढ़े-लिखे हैं । और यह भी समिति ने निष्कर्ष निकाला था कि अधिकांश गाँवों और छोटे कस्बों से आए हैंयदि परीक्षा देने वालों की संख्या पर गौर करें तो 1970 में यह मात्र ग्यारह हजार थी । कोठारी आयोग लागू किए गए वर्ष 1979 में संख्या अचानक एक लाख से भी अधिक हो गई लगभग दस गुनी । इसमें आयु सीमा 28 किए जाने का तो असर रहा ही होगा लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण बात प्रादेशिक भाषाओं में उत्तर देने की सुविधा रही है । अपनी भाषाओं में जैसे ही परीक्षा देने की सुविधा हुई गाँव, कस्बों के हर गरीब आदिवासी, देहात को मानो पंख लग गए और नतीजा सामने है सही मायने में लोकतंत्र में भागीदारी । सतीश चन्द्रा की रिपोर्ट में ये आंकड़े खुद बोलते हैं । लगभग इन्हीं निष्कर्षों की प्रशंसा डॉ. अलघ समिति भी करती है । फिर अंग्रेजी को इसी चरण पर रखने की जरूरत किन दबावों में की गई है ?

एक तर्क प्रोफेसर अलघ समिति की रपट में यह आया है कि दुनिया भर के विकसित देशों में भारत की पूछ अंग्रेजी की वजह से बहुत उंची मानी जाती है । इसलिए इन सेवाओं में अंग्रेजी ज्ञान को ज्यादा महत्व मिलना चाहिए । इसको कोठारी समिति और कोठारी आयोग की अनुशंसाओं के बरक्स रखकर जरा गौर करें जहाँ कोठारी स्पष्ट रूप से कहते हैं :-

  •  भारतीय भाषाएं और अंग्रेजी -हम पूरे विश्वास से यह कहना चाहते हैं जो अभ्यर्थी अखिल भारतीय सेवाओं की नौकरी में आना चाहते हैं उन्हें आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं का ज्ञान होना अनिवार्य है जिसे ये भाषाएं नहीं आती वह सरकारी सेवाओं के लिए कतई उपयुक्त नहीं है । वास्तव में एक सही व्यक्तित्व के विकास के लिए यह जरूरी है कि हमारे नौजवानों को हमारी भाषाओं और उसके साहित्य का ज्ञान हो । इसलिए हमारी जोरदार सिफारिश है कि पहले और दूसरे चरण दोनों पर ही आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं की परीक्षा अनिवार्य हो । (पैरा 3.22)
  • हमने परीक्षाओं के संदर्भ में अंग्रेजी की बात पर भी विचार किया । अंग्रेजी का हमारे देश में एक महत्वपूर्ण स्थान है । यह अखिल भारतीय स्तर के प्रशासन के लिए संपर्क भाषा भी है । बहुत सारी यूनिवर्सिटीज का माध्यम भी अंग्रेजी ही है । दुनिया भर के ताजा हालातों और विशेषकर विज्ञान और तकनीकी ज्ञान के लिए अंग्रेजी बहुत जरूरी भी है और इसीलिए अंग्रेजी का भी अनिवार्य पेपर होना चाहिए । (पैरा 3.23)

स्पष्ट है कि कोठारी अंग्रेजी का विरोध नहीं करते लेकिन अपनी भाषाओं की वकालत कहीं पुरजोर से करते हैं ।

प्रोफेसर अलघ ने परीक्षा के माध्यम को लेकर कुछ बातें जरूर उठाई हैं । जैसा कि आठवीं अनुसूची में परीक्षा देने पर मूल्यांकन के बीच एकरूपता और गोपनीयता (Confidentiality) की एक बड़ी चुनौती है । लेकिन ऐसा नहीं कि पूरे देश के प्रशासन के हित में कोई रास्ता न खोजा जा सके ।

 

डॉ. वाई.के.अलघ समिति की मुख्य अनुशंसाएं/निष्कर्ष

अपनी रिपोर्ट में प्रोफेसर अलघ ने chapter-IV में The Existing Scheme- A Critical Analysis दिया है । कुछ आंकड़े और तालिकाओं का भार : –

 

Place of birth Eighties (%) Nineties (%)
Village 36 29
Town 37 43
City 27 23

 

  • 1970 के बाद हुई भर्तियों में गाँवों के बच्चे लगातार बढ़ते गए । 70 में जहाँ 18 प्रतिशत थे, सन 80 तक 30 प्रतिशत हो गए और शहर के घटकर 65 से 50 । छोटे कस्बों में भी यह वृद्धि दिखाई देती है । वे 15 से बढ़कर 20 प्रतिशत हो गई । 80 से 90 के बीच कस्बों से आने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है हालाँकि बड़े शहरों और गाँव दोनों की घटी है ।
  • 4.2. एवं 4.3 आय ग्रुप – 90 से 2000 के दशक में एच.आई.जी. (उच्च आय वर्ग) के अभ्यर्थियों की संख्या लगातार बढ़ी हैं । 35 प्रतिशत से बढ़कर 45 प्रतिशत । वहीं कम आय वाले कम होते गए हैं । उदारीकरण के बाद का असर साफ जाहिर है । अंग्रेजी के वर्चस्व के बाद क्या अंजाम होगा-यह साफ जाहिर है ।
  • 4.2.9 कुछ और बातें – सरकारी स्कूलों के पढ़े हुए बच्चे, पहली पीढ़ी, अनुसूचित जातियों के स्टेंडर्ड में सुधार और लड़कियों की लगातार बढ़ती संख्या ये कुछ ऐसी बातें हैं जो पिछले दिनों संभव हुई हैं ।
  • 4.3 भारतीय भाषाओं के माध्यम का असर – भारतीय भाषाओं की शुरूआत करने के पीछे भावना यह रही कि ग्रामीण और पिछड़ी पृष्ठ भूमि से आने वाले अभ्यर्थी विशेष रूप से एस.सी., एस.टी. ज्यादा आ सकें । 70 के बाद इनकी संख्या लगातार बढ़ी है । मौजूदा टेबल 4.11 से इसे समझा जा सकता है :-

विभिन्न भाषाओं को माध्यम के रूप में चुनने के आंकड़े (प्रतिशत में) :

माध्यम 1995 1996 1997 1998 1999
अंग्रेजी 84.9 83.7 83.2 77.3 85.9
हिन्दी 11.4 12.1 13.3 16.9 8.5
अन्य भारतीय भाषाएं 3.7 4.1 3.5 5.8 5.6
  • जहाँ हिन्दी माध्यम से आने वाले 9 से 16 प्रतिशत तक रहे हैं अन्य भाषाओं से आने वाले पांच प्रतिशत से कम हैं । संक्षेप में माध्यम की पॉलिसी अपने उद्देश्यों को पूरा करने में सफल रही है । यह जरूर है कि अंग्रेजी में पढ़ने वाले लगातार ज्यादा चुने जाते हैं ।
  • 6.7 प्रारंभिक परीक्षा की बजाए यदि अभिक्षमता परीक्षण (Aptitude Test) जिसमें लॉजिकल रीजनिंग (logical reasoning and problem solving abilities) रखी जाए तो अच्छा रहेगा । हालाँकि एक मत यह भी है कि रिपोर्ट आदि की परीक्षा की जरूरत कुछ विशेष तरह के शैक्षिक पाठयक्रमों में प्रवेश के लिए होती है सरकारी नौकरियों के लिए नहीं । इसलिए कुछ ऐसा रास्ता निकालने की जरूरत है जिसमें रीजनिंग भी आ जाए और कमेटी की अनुशंसा सामान्य ज्ञान के पेपर की बजाए अभिक्षमता परीक्षण (Aptitude Test) किया जाए । यह objective type ही रहेगा …
  • 8.4.4 वैकल्पिक विषय भी रहे, लेकिन उसका स्तर एक अच्छे विश्‍वविद्यालय के ऑनर्स डिग्री के बराबर हो । गौर करने की बात यह है यहां प्रोफेसर अलघ ने भी सिर्फ अंग्रेजी को बढ़ाने की बात नहीं की ।
  • 8.3.1 अंग्रेजी भाषा – कुछ लोगों की चिन्ता यह भी है कि कुछ अभ्यर्थी पर्याप्त अंग्रेजी नहीं जानते । अमेरिका के बाद आज अंग्रेजी बोलने वालों की सबसे अधिक जनसंख्या हिन्दुस्तान में रहती है । तीसरी दुनिया के देशों में अंग्रेजी की वजह से भारत की विशेष हैसियत है । क्योंकि भारतीय सेवाओं के अधिकारियों को देश-विदेश के विभिन्न संगठनों के साथ संवाद करना होता है विशेष रूप से व्यापार, निवेश और दूसरे आर्थिक, सामाजिक मामलों में इसलिए आर्थिक राजनयिक के नाते अंग्रेजी को व्यापक महत्व मिलना चाहिए । विदेश सेवा में इसलिए अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान और भी अनिवार्य है ।
  • इसलिए अंग्रेजी के स्तर को बढ़ाकर 10+2 करना चाहिए लेकिन इससे भारतीय भाषाओं में बैठने वालों पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए । हालाँकि डर इस बात का भी है कि यदि जब तक यह क्वालिफाइंग रहेगी तब तक अंग्रेजी की परीक्षा अभ्यर्थी गंभीरता से नहीं लेंगे ।
  • 8.3.9 किसी क्षेत्र विशेष के समाज और संस्कृति को जानने के लिए कम-से-कम एक भारतीय भाषा का होना अनिवार्य है । अपनी भाषा बेहतर संवाद करने और तर्कशील चिंतन के लिए भी आवश्यक है । इसलिए जो अपनी भाषा नहीं जानते वे इस देश की सामाजिक सेवाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं । हालाँकि दूसरी तरफ यह भी सच है कि सभी सेवाओं के काम में अपनी भाषाओं को जानने की जरूरत नहीं । उन अखिल भारतीय सेवाओं को छोड़कर जहाँ की भाषा उन्हें सीखनी ही पड़ती है ।

 

निश्चित रूप से वाई.के. अलघ की रिपोर्ट यथार्थ के करीब है । अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है और दुनिया भर में बढ़ रहा है । लेकिन दुनिया भर के देशों पर गौर करें तो अपनी भाषाओं और प्रशासन में उसकी भूमिका को शायद ही किसी विकसित देश ने नजर अंदाज किया हो । जब एक तरफ इस देश के प्रशासन को चलाने, जानने और समझने के लिए अपनी भाषा को अनिवार्य मान रहे हैं तो यदि पहले ही चरण में वे अंग्रेजी की वजह से वे नहीं चुने गए तो मुख्य परीक्षा या अंतिम चुनाव तक सेवाओं में कैसे आएंगे ?

पिछले तीस वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि हर वर्ष लगभग दस से पंद्रह प्रतिशत हिन्दी माध्यम से आए हैं । दूसरी भाषाओं से आने वालों की संख्या बहुत कम रही है इसीलिए विरोध का स्वर या चुनौती हिन्दी भाषी क्षेत्रों को ही लेनी पड़ेगी ।

70 के दशक में डॉ. कोठारी बार-बार शिक्षा परीक्षा और प्रशासन में भागीदारी के दायरे को बढ़ाने की वकालत करते हैं । शिक्षा आयोग की सिफारिशें इसका प्रमाण हैं । केवल डा. कोठारी ही ऐसा कर सकते हैं जिसके सामने कोई चुनावी वोट बैंक न हो । लेकिन अचानक ही उन सिफारिशों को चुपचाप एक तरफ सरकाते हुए अंग्रेजी इसी चरण में शामिल कर दी गई है । जबकि तमाम तथ्य बताते हैं कि पिछले तीस वर्षों में गाँव, कस्बों की तरफ से इन सेवाओं में आने वालों की संख्या और भागीदारी बढ़ी है । हालाँकि अभी भी दिल्ली, इलाहाबाद, जयपुर जैसे महानगर आगे हैं और पिछले दिनों से लगातार फिर आगे होते जा रहे हैं । भारतीय भाषाओं की भागीदारी यदि कम हुई तो ये शिक्षा जगत के लिए तो दुर्भाग्यपूर्ण होगा ही पूरे देश के समग्र विकास के खिलाफ भी बात जाती है । क्योंकि उन स्थितियों में अच्छी अंग्रेजी, अच्छी कोचिंग केवल महानगरों में ही है । तो प्रोफेसर अलघ जिस कोचिंग, जिस रटंत को कम करने की बात कह रहे थे, ये निर्णय तो समाज और शिक्षा व्यवस्थाओं को फिर वहीं पहुंचा देगा ।

क्या दिल्ली, मुम्बई महानगर सारे देश के नौजवानों की महत्वाकांक्षाओं का भार ढो पाएंगे ?
फिर अचानक अंग्रेजी यहाँ क्यों ?

यदि अभी इसका विरोध नहीं किया गया तो कौन जाने मुख्य परीक्षा में भी अंग्रेजी के नंबरों को अंतिम मैरिट में जगह मिले और भारतीय भाषाएं फिर छूट जाएं । इसके परिणाम बहुत भयानक होंगे ।

क्या गाँव, देहात के मोची, बढ़ई या मजदूर के बच्चे से उतनी अंग्रेजी की उम्मीद की जा सकती है जितनी शहरों के बच्चों को आती है । इसका अर्थ है कि उनके दरवाजे जो कोठारी समिति ने खोले थे वे फिर से बंद होने लगेंगे । वैसे तो नई आर्थिक नीतियाँ, अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार, निजी स्कूलों में धुंआधार अंग्रेजी के रटंत पर जोर यह सब ग्रामीण और पिछड़े अभ्यर्थियों को प्रभावित कर रहे हैं लेकिन यह IAS जैसी उच्च सरकारी नौकरियों में चोट शायद सबसे अधिक भारी पड़ेगी । कहां तो कोठारी समीति ने भारतीय वन सेवा, आर्थिक सेवा, सांख्यिकी सेवा में भी भारतीय भाषाओं के विकल्प की सिफारिश की थी और कहाँ एक मात्र सिविल सेवा परीक्षा में भी भारतीय सेवाओं के लिए उल्टी गिनती शुरू ।

सिविल सेवाओं में भारतीय भाषाओं की शुरुआत का ही असर था कि इतिहास, राजनीति शास्त्र से लेकर अनेकों विषयों में हिन्‍दी माध्यम की किताबें उपलब्ध होने लगीं । महत्वपूर्ण पुस्तकों के हिन्‍दी और भारतीय भाषाओं में अनुवाद धड़ाधड़ आए । राज्यों में स्थापित उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान ग्रंथ अकादमियां भी सक्रिय हो उठीं । दिल्ली विश्वविधालय की अनुवाद यूनिट ने अनेकों महत्वपूर्ण किताबें उपलब्ध करायीं । जबकि आज दिल्ली विश्वविधालय में स्थिति यह है कि शायद ही स्नातकोत्तर में बच्चों को अपनी भाषाओं में कोई पढ़ा रहा हो । राजनीति शास्त्र के एक प्राध्यापक ने तो कुछ वर्ष पहले विद्यार्थियों से यहां तक कह दिया कि हिन्‍दी माध्यम में पढ़ना हो तो लौटकर इलाहाबाद और पटना चले जाओ । आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि इस वर्ष एम.ए. इतिहास में पढ़ रहे बिहार, उत्तर प्रदेश से आने वाले बच्चों का रिजल्ट बहुत खराब रहा है । तब उन्होंने वाइस चांसलर के दफ्तर के आगे धरना दिया । कारण वही कि हिन्‍दी माध्यम में पढ़ने की कोई व्यवस्था ही नहीं है । विडंबनापूर्ण स्थिति तो यह है कि विश्वविद्यालय ये ऑंकड़े भी नहीं दे रहे कि कितने विद्यार्थी, कितने विषयों में कितने प्रतिशत हिन्‍दी माध्यम अपना रहे हैं । जबकि 1974 में कोठारी आयोग में जब अपनी भाषाओं में लिखने की छूट दी थी तो उनके सामने दिल्ली विश्वविद्यालय के सारे ऑंकड़े उपलब्ध थे । दिल्ली का असर धीरे-धीरे बाकी राज्यों के तरफ भी फैल रहा है । ऐसा हिन्‍दी भाषी राज्यों समेत सभी राज्यों में हो रहा हे । जब बच्चों के लिए न किताबें उपलब्ध होंगी न पढ़न- पढ़ाने की व्यवस्था और अब सिविल सेवा परीक्षा, कर्मचारी चयन आयोग, बैंक अधिकारी जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं में भी अंग्रेजी का बोलबाला हो तो भारतीय भाषाओं को कौन पढ़ना चाहेगा ?

Leave a Reply

Your email address will not be published.