रोमन में हिंदी (समकालीन जनमत-फरवरी-2015)

अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक चेतन भगत का भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में लिखने की वकालत करना अंग्रेजी बाजार को बढ़ाने की एक और चाल से ज्‍यादा कुछ नहीं है । नौकरियों की संभावना, समाज में सम्‍मान   और मनोरंजन से लेकर नयी तकनीक की बातें अंग्रेजी के पक्षधर दशकों से कहते रहे हैं । दरअसल पिछले बीस वर्षों में उदारीकरण के नाम पर जो बयार बह रही है भाषा और संस्‍कृ‍ति में चेतन भगत जैसे नाम उसके प्रतिनिधि हैं । अंग्रेजी का बाजार बहुत सावधानी से ऐसे नामों को आगे बढ़ाता है । चेतन आई.आई.टी. में पढ़े हैं जिसे भारतीय समाज का मध्‍यवर्ग बहुत कमाई कामधेनु की तरह देखता है । और ऊपर से अंग्रेजी जिसकी गुलामी से अंग्रेजी राज खत्‍म होने के बाद भी मुक्‍त नहीं हो पाया । उनका भाव इन्‍हीं कारणों से बढ़ा हुआ है । अंग्रेजी और आई.आई.टी. का मुकुट पहने वे जो कुछ लिख रहे हैं इसकी भी पड़ताल इसी आतंक में गंभीरता  से ही नहीं की जाती जब कि हकीकत यह है कि चेतन भगत की पहली किताब फाइव प्‍वाइंट समवन में जरूर कुछ हमारे अकादमिक जगत और हमारे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्‍थानों में शिक्षा के नाम पर जो हो रहा है उसकी झलक मिलती है । वरना उनकी उसके बाद आई तीन-चार किताबें अपनी शैली और भाषा के स्‍तर पर बिल्‍कुल वैसी हैं जो छठे-सातवें दशक में हिंदी में गुलशन नंदा, रानू, काम्‍बोज लिखते थे । हां लगभग हर रेलवे स्‍टेशन और फुटपाथ पर वे जरूर उपलब्‍ध रहती थीं । हिंदी पाठक को बढ़ाने की दृष्टि से इसका कम महत्‍व नहीं है । लेकिन यह रेखांकित करने की जरूरत है कि चेतन भगत का पढ़ा जाना उसी अंदाज में अंग्रेजी सीखने की लालसा से आगे कुछ नहीं है । इसे भारतीय समाज के दुचित्‍तेपन का एक और नमूना माना जाना चाहिए । जो मध्‍यवर्ग रानू और नंदा के उपन्‍यासों को छिपकर अपराधबोध से पढ़ता था वही चेतन भगत के उपन्‍यासों को हाथ में लिये-लिये फिरता है । वह फख्र से उन किताबों का नाम लेता है जिसके रोमांस के चित्रण यदि हिंदी में सार्वजनिक किये जाएं तो उत्‍तर भारत की जनता अशलील कहकर शायद सड़क पर होली जलाने को निकल पड़े । यह राजनीति करते हुए कि चेतन भगत के उपन्‍यास भारतीय साहित्‍य संस्‍कृति को नष्‍ट कर रहे हैं ।

चेतन भगत फिल्‍मों की पटकथा आदि का उदाहरण देते हैं । दुनिया भर में फिल्‍मों की दुनिया में ऐसा होता होगा लेकिन क्‍या जापानी, चीनी या सैंकड़ों अन्‍य भाषाओं ने रोमन लिपि अपना ली है ? चेतन भगत भूल रहे हैं कि अमिताभ बच्‍चन, नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी जैसे दिग्‍गज अभिनेता रोमन में लिखा पढ़ने से साफ मना कर देते थे । दिल की गहराईयों तक पहुंचने वाले संवाद, शब्‍दों के लिये कोई भी विदेशी भाषा लिपि पर्याप्‍त नहीं हो सकती । आप कैसे हैं ? मैं तुमसे प्‍यार करता हूँ जैसे चंद वाक्‍यों तक ही क्‍या हिंदी की अभिव्‍यक्ति सीमित करना चाहते हैं ? समझने की जरूरत है कि फिल्‍मी रोबोट की तरह चंद वाक्‍य बोलना एक बात है गंभीर विमर्श एकदम दूसरी । चेतना, दर्शन, मनोविज्ञान, इतिहास, साहित्‍य के विपुल भंडार, शैली, अलंकार, वक्रोति क्‍या रोमन लिपि संभाल पायेगी ? जिस हिंदी और देवनागरी की वैज्ञानिकता का लोहा पूरा भारतीय महाद्वीप मानता है और इसीलिये देश की ज्‍यादातर भाषाएं देवनागरी के करीब हैं, अंग्रेजी का नया षड़यंत्र उसी को मिटाना चाहता है । चेतन को कौन समझाये कि हर भाषा का एक-एक शब्‍द सदियों के प्रवाह में चलकर रूप, अर्थ, आकार लेता है लिपि उसकी वाहक है जिससे छेड़छाड़ करना पूरे साहित्य को नष्‍ट करना है । 60-70 के दशक में कुछ किस्‍से रोमन में हिंदी लिखने के सुनने को चारो तरफ मिलते थे । तत्‍कालीन प्रधानमंत्री को रोमन में नर्मदा नदी पर बोलना था । बोलते वक्‍त मुंह से निकलता था नर मादा । वैसे ही लिख कर दिया गया था कि कश्‍मीर के मसले पर बात होनी चाहिए मुंह से निकल रहा था कश्‍मीर के मसालों पर । हमें ऐसी विकृतियों से तुरंत बचने की जरूरत है ।   

चेतन का यह कहना कि अंग्रेजी समाज में सम्‍मान दिलाती है कम से कम भारतीय संदर्भ में हकीकत के बहुत करीब है । हिंदी की जिन किताबों से मध्‍य वर्ग का अमीर नाक-मुंह सिकोड़ता है वही बिना विषय वस्‍तु को जाने अंग्रेजी की किताबों को जबरदस्‍ती उन्‍हें बच्‍चों के ऊपर थोपता है । अंग्रेजी स्‍कूलों का बढ़ना मध्‍यवर्ग की इसी चाह का विस्‍तार है और इसीलिए स्‍कूल, कॉलेजों में भी चेतन भगत जैसे लेखक पूरी शिक्षा को तहस-नहस करते हुए प्रसार पा रहे हैं ? अफसोस यहां यह भी है कि भारतीय समाज का गरीब और दलित वर्ग भी कॉंचा इलैया जैसे अंग्रेजी के मारे विचारकों के बहकावे में आकर अंग्रेजी में ही अपनी मुक्‍ति‍तलाश रहा है । अंग्रेजी के उन पक्षधरों को अफ्रीकी लेखक और न्‍यूगी की बातों को नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजी के साम्राज्‍यवाद ने ऐसे ही हथकंडों से स्‍थानीय दुनिया भर में भाषा, बोली और संस्‍कृति को खत्‍म किया है ।

अंग्रेजी को बढ़ाने में पिछले साठ-पैंसठ वर्ष की नीतियों का भी कम योगदान नहीं रहा है । सरकार द्वारा अंग्रेजी की वकालत करने वाले कुछ कदमों को याद कीजिए । पिछले दो-तीन वर्षों से सी.बी.एस.ई. के आदेशानुसार दिल्‍ली के स्‍कूलों में अंग्रेजी बोलने के लिए व्‍यवस्थित प्रोग्राम की शुरूआत की गई है । एक समझौते के अधीन     ब्रिटेन की एक संस्‍था दिल्‍ली के स्‍कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षित कर रही है । इन शिक्षकों को भी इंग्‍लैंड भेजा गया है जिससे ये और उत्‍साह से लौटकर अपनी कक्षाओं में अंग्रेजी बोलने की धाक जमा सकें । इसके पीछे सोच यह है कि भारतीय बच्‍चे उसी अंदाज में अंग्रेजी बोलें जैसे ब्रिटेन और अमेरिका में बोली जाती है । क्‍या कभी हिंदी या भारतीय भाषाएं कैसे बोली जाएं या उनका विस्‍तार कैसे हो इस पक्ष पर सी.बी.एस.ई. या हमारे शिक्षा मंत्रियों का ध्‍यान गया ?

पिछले वर्ष भारत सरकार के राजभाषा विभाग ने तो हद ही कर दी जिसमें यह कहा गया कि फाइलों या आदेशों को हिंदी में लिखते वक्‍त अंग्रेजी का जो भी शब्‍द आपको अपने हिसाब से सहज लगे (जनता के हिसाब से नहीं) उसे वैसा ही लिख दिया जाए । क्‍या राजभाषा विभाग में करोड़ों रुपये अंग्रेजी के शब्‍दों का प्रयोग बढ़ाने के लिए खर्च किये जा रहे हैं ? क्‍या अंग्रेजी के शब्‍द ही सरल और सहज होते हैं उर्दू, ब्रज, अवधी और अन्‍य भाषाओं के नहीं ? अच्‍छा तो यह रहता कि राजभाषा विभाग भाषा को और सहज, सरल बनाने के लिए भारतीय भाषाओं के आम बोलचाल के शब्‍दों की वकालत करता । लेकिन नहीं । पूरी व्‍यवस्‍था पर ‘चेतन प्रभाव हावी हो चुका है । दिल्‍ली के कई अखबार तक इस चेतन प्रभाव से मुक्‍त नहीं हैं मानों वे हिंदी भाषि‍यों को अंग्रेजी सि‍खाने के लिए निकाले जा रहे हों । हॉं, बाजार के तर्क से उनका धंधा सफल है जैसे चेतन भगत का और यदि लाखों में भुगतान हो तो और भी जल्‍दी । दोहराने की जरूरत नहीं कि 2011 में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में प्रथम चरण पर अंग्रेजी का थोपना ऐसे ही चेतन प्रभाव का अंजाम था ।

रोमन लिपि की वकालत उसी का अगला कदम है । चेतन को अंग्रेजी ने इसीलिये और आगे बढ़ाया है जिससे कल वह उनका प्रतीक बन सके । ठीक उसी तर्ज पर जब भारत के बाजारों में सौंदर्य प्रसाधन बेचने के लिये दस वर्ष पहले एक के बाद एक विश्‍व सुंदरियां भारत में खोज निकाली गयी थीं । विकसित देश इतनी दूरदृष्टि के साथ काम करते हैं कि भारत जैसे गरीब देशों की जनता की तो बात ही क्‍या है लेखक, बुद्धिजीवी जब तक समझ पाये तब तक संस्‍कृति, भाषा नष्‍ट हो चुकी होती है । अफ्रीका के देशों में यह हुआ और भारत में यह हो रहा है ।

सच में तो यह सुझाव काबिले बहस भी नहीं । चेतन भगत इतने बड़े भाषाविद, विद्वान नहीं हैं जिसकी बातों पर गौर भी किया जाये । लेकिन ऐसे उच्‍छवासों के पीछे छिपी हकीकत को भी जनता को बताने की जरूरत है । और यह हकीकत अंग्रेजी भाषा के साम्राज्‍य को बढ़ाने की सैंकड़ों कुटिल चालों से अधिक कुछ नहीं है ।   

One thought on “रोमन में हिंदी (समकालीन जनमत-फरवरी-2015)”

  1. प्रेमपाल जी आप बहुत अच्छा लिखते हैं – वर्तमान में मैं खाड़ी देशों में हिंदी की सेवा में रत हूँ – प्रस्तुत है वहाँ का आँखों देखा हाल :— Dr.Ashok Kumar Tiwari
    Yesterday at 9:37pm •
    अच्छी खबर ! ओमान के गाँवों में भारतीय मज़दूरों ने घर-घर हिंदी को पहुँचा दिया है, आपस में भी ये मज़दूर सभी भारतीय भाषाएँ सीख रहे हैं, ये सम्मान के सच्चे हकदार हैं – मैं भी कुछ गाँव वालों को हिंदी सिखाने जाता हूँ !! बहुत उत्साहवर्धक परिणाम मिल रहे हैं !!!
    इसी तरह भारत के महानगरों में रहने वाले अन्य भाषाभाषियों के बीच भी गहन प्रशिक्षण अभियान चलाने की ज़रूरत है, आप योजनाएँ बनाइए मैं जुलाई में आपकी मदद के लिए पहुँच जाऊँगा !

    Rishi Raj Sharma created a doc in the group: Dainik Nyaya Sabke Liye.
    April 11, 2011 •
    ओमान में खुलेगा हिंदी रेडियो स्टेशन :—
    दुबई। ओमान में कई व्यावसायिक रेडियो स्टेशनों के मालिकों ने यहाँ हिंदी एफ.एम. स्टेशन खोलने की पैरवी की है ताकि हिंदी भाषी लोगों तक पहुंच बनाई जा सके।
    ‘एंटरटेनमेंट नेटवर्क कंपनी’ के प्रमुख मकबूल हमीद अल सालेह ने हिंदी रेडियो स्टेशन खोलने के विचार का समर्थन किया है। ओमान के पड़ोसी देश संयुक्त अरब अमीरात में कई हिंदी और उर्दू रेडियो स्टेशन हैं, जो भारतीय प्रवासियों के बीच खासे लोकप्रिय हैं।
    समाचार पत्र ‘ द टाइम्स ऑफ ओमान ‘ के मुताबिक ओमान में सात लाख से अधिक हिंदी भाषी लोग रहते हैं। हिंदी रेडियो स्टेशन उन्हें आपस में जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है।
    ज़नाब सालेह ने कहा कि इस स्टेशन पर न सिर्फ हिंदी गीत प्रसारित किए जाएंगे, बल्कि श्रोता समाचार, विचार और अन्य तरह के कार्यक्रम भी सुन सकेंगे । उन्होंने कहा कि इस बारे में वे संबंधित मंत्रालय को पत्र लिख चुके हैं।
    Dr.Ashok Kumar Tiwari
    Yesterday at 9:21pm •
    हिंदी के बढ़ते कदम ——————-

    Arvind Pareek watching ICC World Twenty20.
    March 9 •
    ओमानकी टीम बिलकुल इंडिया A की तरह है।सभी खिलाड़ी हिंदी बोल रहे हैं और खेल भी उसी तरहसे रहे हैं। C – International Cricket CouncilSports Team • 15,825,037 Likes

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