रेलवे विभाग में सुधार: राष्‍ट्रीय जरुरत

वक्‍त बदल रहा है और बहुत तेजी से । उसी रफतार से देश, दुनिया और उसके विभाग संगठन भी। न बैंक पांचवे दशक के अंदाज से चल रहे, न टेलीफोन और हवाई जहाज भी। रेल में परिवर्तन जारी है लेकिन उसमें देश की जरुरतों, आकांक्षाओं के मद्देनजर और तेजी सक्षमता की दरकार है। इसलिए हर हालत में पहला कदम होना चाहिए किसी भी सुझाव, विचार पर संवाद। खुलेपन से । बेहतरी के लिए। जनतांत्रिक देश में जन को सर्वोपिर रखते हुए। क्‍या हम इसके लिए तैयार हैं?

पहले कुछ अनुभव: 17 जून 2015 रेल भवन के नीचे स्‍टेट बैंक का कांउन्‍टर। रेलवे बोर्ड का एक अधिकारी अपने फिक्‍सड डिपोजिट के नवीनीकरण के लिए आता है। बैंक कर्मचारी ने नवीनीकरण तुरंत कर दिया। लेकिन अधिकारी फिर भी आग बबूला। ब्‍याज दर कम कैसे कर दी?  आपका बैंक बहुत खराब है आदि आदि। बैंक वालों ने मिलकर समझाया कि यह सब नियमानुसार है । एक बैंक महिला कर्मी के तो रेल अधिकारी की डांट से आंसू भी आ गए। इस अधिकारी में इतना ताव इसलिए था कि वह   महान भारत सरकार का हिस्‍सा है और उतना ही दर्प, निडर इस  बात से कि वह कैसी भी बदतमीजी करे, उसका ट्रांस्‍फर नहीं हो सकता । उसका कोई भी बालबांका नहीं कर सकता। जबकि बैंक कर्मचारी की शिकायत होते ही नौकरी भी जा सकती है।

रेल भवन में ऐसे नजारों की भरमार है। आरपीएफ के एक जबान ने पहचान पत्र मांगा तो अधिकारी उखड़ गया। हमें नहीं जानते? साठ सत्‍तर साल की व्‍यवस्‍था ने रेलवे समेत सरकार के हर कर्मचारी में ऐसी अकड़ संवेदनहीनता पैदा की है। नौकरी का स्‍थायित्‍व, सुरक्षा, भविष्‍य निधि पेंशन सभी उसे सामान्‍य नागरिक बनने से दूर रखते हैं। इसलिए परिवर्तन के हर सुझाव से ही वह बिदक उठता है। उसे मानों अपनी गद्दी हिलती नजर आती है।

नयी सरकार के आते ही पुर्नगठन की बात शुरु हो गई है। वैसे ही उसका तीखा विरोध। क्‍या पुर्नगठन शब्‍द इतना बदवूदार है कि उसे सुनते ही भड़क उठें ? क्‍या डेड़ सौ वर्ष पहले जिस हिचकोले खाते डिब्‍बों में हम यात्रा करते थे आज कर पायेंगे? जब डिब्‍बा, पटरी, टिकट की तकनीक में परिवर्तन स्‍वीकार किए गए हैं तो संगठनों/विभागों के परिवर्तन की बात क्‍यों नहीं होनी चाहिए। क्‍या टेलिफोन विभाग उसी रुप में है जो आठवें दशक में होता था ? माना सुधार, पुर्नगठन के नाम पर सब कुछ अच्‍छा ही नहीं हुआ, शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य के संगठनों पर बंहुत उल्‍टा असर भी हुआ है लेकिन दुनिया भर में परिवहन के विकास और अपने देश की जरुरतों के मद्देनजर भारतीय रेल के पुर्नगठन या आधुनिकीकरण करण से अब और नहीं बचा जा सकता।

रेल के विकास और आधुनिकीकरण के लिए पैसा और प्रौद्यौगिकी चाहिए । ये कोई नई बात नहीं है। उदारीकरण के बाद पैसा जुटाने की कौशिश लगातार हो रही है। पिछली सरकार के दस वर्षों में भी यही होता रहा है । यदि निजी पूंजी नहीं चाहिए तो विरोधी विकल्‍प सुझाएं। एक निश्चित समन्‍वय योजना के साथ। आधे मन से पूरी रेलवे का विकास नहीं हो सकता।  इस रस्‍साकसी में न रेल संगठन बचेगा न रेल सेवाएं। और रेल प्रणाली का डूबना देश का दुर्भाग्‍य होगा।

एनएफआईआर और एआईआरएफ रेलवे की दोनों फेडरेशनों ने रेलवे के विकास और संगठन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। कर्मचारियों के हितों और कल्‍याण के लिए सतत संघर्ष किया है। संगठन की समृद्वि और प्रगति के  लिए सजग रहीं है।  याद कीजिए कुछ वर्ष पहले जब सत्‍ताधारी दल वोट बैंक की राजनीति के आगे नतमस्‍तक होते हुए किराए न बढा़ने की सनक पर रेलवे का बंटाधार करने पर आमादा थे, तब एनएफआईआर और एआइआरएफ दोनों ने ही रेलवे को आर्थिक रूप से बचाने के लिए किरायों की समीक्षा और बढा़ने  की मांग की थी। ये मांगे इनके आका राजनेताओं के सोच से एक दम अलग थीं। इन्‍होंने हिम्‍मत दिखाई रेलवे के हित में। ऐसा ही पीएनएम और दूसरी बैठकों के दौरान यह बात अक्‍सर सभी उच्‍च अधिकारी मानते रहे हैं कि रेल के अंतिम आदमी की पीडा़ उसके कष्‍ट, सपनों की जितनी प्रमाणिक समझ इन यूनियनों के नेताओं को है शायद उतनी अधिकारियों को नहीं।

ऐसा ही अवसर फिर सामने है। सत्‍ता और विपक्ष की राजनीति उसी टकराव की तरफ बढ़ रही है राजनीति के धर्म में इस में कुछ गलत नहीं है। लेकिन रेल विभाग  के हित में फेडरेाशनों यूनियनों को अपना अलग रास्‍ता  चुनना होगा । रेलवे के आंकड़ों –कर्मचारी आय, खर्च, भविष्‍य की नीतियों और बदलती तकनीक के जर्रे-जर्रे का विश्‍लेषण करते हुए इसके लिए इन्‍हें अपने अपने संगठनों में भी उतने मेधावी संवेदनशील, नौजवान पीढी़ के नेताओं की जरुरत है जो रेल प्रबंधन से प्रगतिशील और रचनात्‍मक मुठभेड़ करने में सक्षम हो जांए। जाहिर है उन्हें उस कुर्ते को बदलना पड़ सकता है जो देश की राजनीति के रंग में रंगा है । रेल के हित में उसे छोड़ना भी पड़ सकता है।

पुर्नगठन की बात सिर्फ कहने या एक फैशन के लिए नहीं की जा रही है। यदि रेलवे को बचाना है तो इसकी सख्‍त जरूरत है।  इसके निर्णय कार्यक्षमता में सुधार के लिए। इसके लिए इसकी बुनियाद में भी तबदीली चाहिए। रेलवे बोर्ड के स्‍तर पर भी और रेलों पर भी। पिछले दिनों कुछ कदम उठाए गए हैं जैसे रेलवे बोर्ड में पिछले दिनों सहायकों की भर्ती की योग्‍यता में कम्‍पयूटर अनिवार्य किया गया है। निम्‍न श्रेणी कर्मचारियों के दर्जनों अलग अलग पदों को अब एक एमटीएस नाम दिया गया है । नई सरकार ने समय पालन के लिए  बायोमैट्रिक प्रणाली शुरु की है। देर सवेर इसके अच्‍छे परिणाम जरुर होंगे।

रेलवे बोर्ड में पिछले दिनों कई समितियों का गठन किया गया हे और उनकी सिफारिशों को लागू करने का काम भी शुरु हो चुका है। हमारे देश की नौकरशाही में सबसे बडी समस्‍या एक न्‍याय संगत पारदर्शी ट्रांस्‍फर नीति का न होना है । उसके कुछ सामाजिक राज‍नीतिक कारण भी है। देश के अलग अलग हिस्‍सों में स्‍कूल, आवास, कानून की सही व्‍यवस्‍था का अभाव । इसलिए अखिल भारतीय सेवाओं में होने के बाबजूद भी हर कर्मचारी की कोशिश रहती है कि दिल्‍ली मुंबई, कोलकाता जैसे नगरों से बाहर न जाना पड़े। यही  खेल शुरु होता है जुगाड, राजनीतिक दाव-पेंच, सिफारिशों का। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों के बाबजूद भारतीय  रेल समेत पूरी नौकरशाही की कार्यक्षमता पर इससे विपरीत असर पड़ रहा है। उम्‍मीद है पुर्नगठन की इस प्रक्रिया में इस मुद्दे को पूरी प्राथमिकता मिलेगी और नयी ट्रांस्‍फर नीित सामने आएगी। जब राष्‍ट्रीयकृत बैंकों और दूसरे संगठनों में ट्रांस्‍फर नीति का पालन हो सकता है तो रेलों में क्‍यों  नहीं? हम सबको अपने गिरेवानों में झांकने की जरुरत है।

रेलवे बोर्ड में भी ट्रांस्‍फर की एक मुकम्मिल नीति की जरुरत है। माना कि हर कर्मचारी कुछ अपने आराम की खोह में और कुछ निहित स्‍वार्थों की खातिर एक सीट से दूसरी सीट पर भी नहीं जाना चाहता लेकिन इसकी ज्‍यादा जिम्‍मेदारी उच्‍च अधिकारियों की है। ज्‍यादातर मामलों में वे स्‍वयं अपने अधीनस्‍थों का ट्रांस्‍फर इसलिए नहीं होने देते हैं कि उन्‍हें काम में असुविधा होगी। हर कुछ वर्ष के अंतराल पर ट्रांस्‍फर का शिगूफा उठता है लेकिन अंजाम वही ढाक के तीन पात। नयी पुर्नगठन नीति में इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।

ऐसी नीतियों की बजह से पिछले कुछ वर्षों में सबसे ज्‍यादा हालत बिगडी है रेलवे बोर्ड सचिवालय सेवा की। जाहिर है इसका असर पूरी कार्यप्रणाली पर भी पडे़गा। यों यही वह दौर रहा है जब कार्मिक कार्यालय के निर्णयों के अनुरुप केन्‍द्रीय सचिवालय सेवा का पुर्नगठन किया गया और रेलवे बोड में सभी स्‍तरों पर पद बढा़ए गए । लेकिन कुछ नियमों की अनदेखी और शेष कुछ जातिवादी आग्रह, दुराग्रहों, कोर्ट कचहरी ने मिलकर ऐसा तांडव किया है कि पूरा संवर्ग ही निष्‍प्राण और दिशाहीन हो चुका है। कमी शीर्ष की भी कम नहीं है। कभी भी यह कह कर पल्‍ला झाड़ लेते हैं के ये आपका अन्‍दरुनी मामला है या आप तो खुद पैनल बनाते हो या जब तक कोर्ट केश है हम कुछ नहीं कर सकते। शीर्ष यह भूल जाता है यदि फौज में उत्‍साह नहीं रहा तो पूरे बोर्ड की क्षमता पर असर पडे़गा। यों नाममात्र की कुछ यूनियनें भी सचिवालय सेवा में है लेकिन व्‍यवस्थित विचार-विनिमय या सभी सदस्‍यों के साथ मिल बैठकर रेल के मुद्दों पर बात करना  कभी नहीं सीखा । काश ये इरपोफ, एनएफआइआर और एआइआरएफ से भी कुछ सीख पाते।

ऐसा नहीं कि सब कुछ काला ही है । इसी रेलवे संगठन ने सैंकडो़ रचनात्‍मक काम भी किए हैं।याद किजिए अस्‍सी–नब्‍बे दशक तक टिकट खिड़कियों का आलम। बडे़ बड़े रजिस्‍टरों में आरक्षण के विवरण लिखता बाबू। टिकटों के कंप्‍यूटरीकरण ने सब कुछ बदल दिया और यह आज भी जारी है। इस वर्ष 2015 का तोहफा। टिकट पक्‍का होने पर मोबाइल से सूचना। गदगद हो उठता है यात्री। कुछ वर्ष पहले सिविल सेवा दिवस पर रेलवे को क्रिस संगठनों को भारत के प्रधानमंत्री ने पुरस्‍कृत भी किया था। यदि लक्ष्‍य स्‍पष्‍ट हो तो भारतीय रेल के कर्मचारी भी उतने ही सक्षम हैं। इतने बड़े देश की परिवहन व्‍यवस्‍था को भारतीय रेल ही संभाल सकती है। निजी हाथों में सौंपने तो देवरॉय कमेटी भी नहीं चाहती, न रेल मंत्री जी जैसा कि उनके वक्‍तव्‍यों से ध्‍वनित होता है लेकिन रेल वहीं खड़ी नहीं रह सकती, जहां पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों से खड़ी है। हम सबको उत्‍साह के साथ पुनर्गठन में शरीक होना चाहिए।   

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