PP Sharma Interview – दैनिक जागरण/स्मिता

प्रश्‍न 1. आप रेलवे से जुड़े रहे हैं, फिर साहित्‍य की ओर किस तरह मुड़े?

उत्‍तर: साहित्‍य से पहले जुड़ा हूँ, रेलवे से बाद में। बी.एस.सी के कॉलिज के दिनों में ही साहित्‍य से जुड़ाव शुरू हो गया था। उन दिनों जितना विज्ञान पढ़ा होगा, साहित्‍य उससे कम नहीं। प्रेमचंद, शरत, धर्मयुग, दिनमान सभी कुछ। एकाध कहानियां भी लिखीं। जयप्रकाश आन्‍दोलन ने भी खूब झकझोरा। इन सबके साथ  पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के गांव दीघी से दिल्‍ली पहुंच गया। 1977 में दिल्‍ली प्रशासन में पहली नौकरी शुरू की। तभी किस्‍मत से आयी कोठारी समिति की रिपोर्ट जिसने सभी भारतीय भाषाओं में सिविल सेवा के उत्‍तर लिखने की छूट थी। वस खुल गयी लॉटरी और पहले प्रयास में 1979में ही सफलता मिल गयी। आत्‍म विश्‍वास जगा जो आज तक नहीं थमा। परीक्षा के उन दिनों के तीन-चार वर्ष जरूर साहित्‍य से दूरी रही, फिर तो रेल अपनी जगह, साहित्‍य अपनी रफ्तार पर। वर्ष 1986 में सारिका में कहानी छपी फिर हंस, दिनमान, हिन्‍दुस्‍तान….वस सिलसिला चल पड़ा।

प्रश्‍न 2. हिन्‍दी का लेखक आज कितना सफल है व्‍यावसायिक और पाठकों की पहुंच, दोनों दृष्टिकोणों से।

उत्‍तर: हिन्‍दी का लेखक भारतीय लोकतंत्र की तरह ही बहुत दयनीय स्थिति में है। न उसका नाम है, न नामा। कारण पिछले सत्‍तर सालों में अंग्रेजी ने हिन्‍दी को उत्‍तरोत्‍तर हाशिये पर धकेल दिया है। पिछले बीस वर्षों में तो हिन्‍दी और तेजी से शिक्षा, प्रशासन, संसद, नौकरी से गायब हो रही है। तो जब जीवन के इतने पक्षों, क्षेत्रों में उसकी जगह न हो तो कौन पढ़ना चाहेगा। हिन्‍दी की कहानी , उपन्‍यास, लेख। पाठक अखवार पढ़ लेता है वस, वह भी चटपटी खबरों, रोजमर्रा की राजनीति के लिए। किताबों तक नहीं जाता। उसकी जरूरत ही नहीं उसे और उसे हिन्‍दी पढ़ने, सीखने का फायदा भी क्‍या? नतीजतन सत्‍तर करोड़ की हिन्‍दी आबादी के बीच पांच सौ प्रतियों का संस्‍करण। ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं। क्‍या तो उसे रायल्‍टी मिलेगी और क्‍या प्रकाशक मालामाल होगा। हिन्‍दी के सब से बुरे दिन! आगे भयानक यदि यही रफ्तार रही तो।

प्रश्न 3. एक साहित्‍यकार विशुद्ध रूप से रचनात्‍मक लेखन करता है। आपके तीन कहानी संग्रह एक उपन्‍यास और एक कविता संग्रह लिख चुके हैं, लेकिन पिछले कई सालों से आप सिर्फ लेख विशेषकर शिक्षा, भाषा पर लिख रहे हैं। ऐसा क्‍यों?

उत्‍तर: तो इन स्थ्‍िातियों में, मैं अपनी अभिव्‍यक्ति के औजार बदल दूं तो क्‍या आश्‍चर्य! मैंनें मुख्‍यत: कहानी लिखने से शुरुआत की थी, एक पहचान भी बनी। धर्मयुग, सारिका से शुरुआत। पढ़ने की भी, छपने की भी। राजेन्‍द्र यादव के हंस ने भी कुछ दिन लेखक–पाठकों को सहारा दिया लेकिन नई आर्थिक, शैक्षिक नीतियों, अंग्रेजीदां ज्ञान- आयोग कांग्रेस-सत्‍ता-अमीरी के गठजोड़ ने हिन्‍दी को पहले स्‍कूल, कॉलिजों से निकाला फिर नौकरियों से। धीरे धीरे यह होने लगा कि कहानेी के पाठक ही नहीं बचे। यह भी कि इस भाषाई अपसंस्‍कृति के खिलाफ लड़ाई कहानी उपन्‍यास से नहीं लड़ी जा सकती। तुरंत हस्‍तक्षेप की जरूरत थी और यह संभव था सिर्फ लेखों से। रेडियो, दूरदर्शन हर मोर्चे पर। गुरिल्‍ला लड़ाई की तरह। कई अखवारों, पत्रिकाओं ने जमकर छापा। सैंकड़ो लेख। पांच-सात किताबें। आखिर लिखना एक परिवर्तनकामी आकांक्षा है वह जैसे भी संभव हो सके। लड़ाई जीतने के लिए हर हथियार की जरूरत है।

प्रश्‍न 4. आप अक्‍सर अपने लेखों में शिक्षा में सुधार की बातें कहते हैं। आजादी के बाद से अब तक कितनी सुधरी है भारतीय शिक्षण प्रणाली?

उत्‍तर: निसंदेह लेखों में सबसे ज्‍यादा चिंता शिक्षा की उभरी है। और केवल मेरा नहीं, गांधी जी, नेल्‍सन मंडेला, अम्‍बेडकर से लेकर बड़े बड़े शिक्षाविद भी मानते हैं कि देश , समाज की तस्‍वीर बदलने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी अस्‍त्र है। अफसोस की इतनी बुरी स्थिति तो हमारे विश्‍वविद्यालयों , स्‍कूलों की ब्रिटिश काल में भी नहीं थी। सत्‍तर-अस्‍सी के दशक के बाद तो ये संस्‍थाऐं बहुत तेजी से गिरावट की तरफ है। याद कीजिए सी.वी.रमन, जगदीश चंद्र वसु, सेठना, होमी भाभा, मेघनाथ साहा सब आजादी के पहले दौर में सामने आये। जितनी चमक आजादी से पहले इलाहाबाद, बनारस, कलकत्‍ता विश्‍वविद्याल में थी आज नहीं। बच्‍चे अच्‍छी शिक्षा के लिए विदेश भागने को मजबूर हैं। यानि शिक्षा व्‍यवस्‍था वरवादी के करीब।

प्रश्‍न 5. इन दिनों आप क्‍या लिख रहे हैं। आगे किस विषय पर लिखने की योजना है।

उत्‍तर: आजकल इन्‍हीं विषयों पर लिख रहा हूं। शिक्षा, समाज की विगड़ती स्थितियों, सरकारी ढ़ोंग, बुद्धिजीवियों के आचरण की फांक और राजनीति के कोलाज और घर्षण से रोज कुछ न ऐसा लिखना हो जाता है, जिसे लिखे बिना चैन नहीं। अभी हाल ही में दो कहानी पूरी की हैं। एक कथादेश में छप चुकी है, दूसरी आने वाली है। कहानी की तरफ  फिर लौट रहा हूं लगभग पांच वर्ष के अंतराल के बाद। कहानी का अपना आनंद है। वस पाठक नहीं है।

प्रश्‍न 6. इन दिनों हिन्‍दी उपन्‍यास खूब लिखे और पढ़े जा रहे हैं। फिर भी आप अक्‍सर हिन्‍दी की प्रगति को लेकर निराशावादी बाते कहते हैं ऐसा क्‍यों।

उत्‍तर:  देश के सात-आठ राज्‍य और सत्‍तर करोड आवादी को सामने रखकर देखिये कि ‘खूब लिखे और पढ़े जाने’ की क्‍या हैसियत और हकीकत है। खूब पढ़े जाते तो क्‍या संस्‍करण पांच सौ प्रतियों के निकलते? हां कुछ तिकड़मों से जो किताब पाठयक्रम में लग गई हो किसी भी विश्‍वविद्यालय के वो जरूर कुछ हजार में छप जाती है। उसमें भी उससे कई गुना उसकी कुंजी बिकती है क्‍योंकि बच्‍चों को परीक्षा देनी होती है।  और परीक्षा, पाठयक्रम के लिए पढ़ना, पढ़ना नहीं होता। निराशा के रोज नए अनुभव होते हैं। इसी हफ्ते साहित्‍य अकादमी से पुरस्‍कृत हिन्‍दी कवि और दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एक हिन्‍दी के प्राध्‍यापक एक साथ टकराए। मैंने प्राध्‍यापक को हिन्‍दी कवि के बारे में बताया। फिर भी उन्‍होंने कवि से पूछा कि क्‍या आप भी कुछ लिखते हैं? कवि सिकुड़ गए क्‍योंकि वे तो वर्षों से वरिष्‍ठ हैं, अकादमी पुरस्‍कार भी मिले दो दशक हो गए, पाठयक्रम में भी शामिल हैं और जब हिन्‍दी पढ़ाने वाला दिल्‍ली का प्राध्‍यापक भी उन्‍हें नहीं जानता, न उनकी कविता को पढ़ा तो पूरे परिदृश्‍य को निराशवादी नहीं कहा जाए तो क्‍या कहें। अब तो दिमाग में कहानी, उपन्‍यास, कुलबुलाने के बावजूद भी उत्‍साह ठंडा बना रहता है कि किसके लिए ? क्‍यों? रातें काली क्‍यों करें?

प्रश्‍न 7. हिन्‍दी की पहुंच बढ़ाने के नाम पर कई लेखक सिर्फ कॉलेज लाइ, सेक्‍स, प्‍यार-धोखा पर आधारित कहानियां पाठकों के सामने परोस रहें हैं। ऐसे लेखको को बेस्‍टसेलर का तमगा भी मिल रहा है। इसके बारे में आपकी क्‍या राय है।

उत्‍तर:  माफ करना हिन्‍दी कथा उपन्‍यास में सेक्‍स, धोखा, प्‍यार के तड़के के वावजूद भी जुम्बिश पैदा नहीं हो रही । सम्‍पादक बताते हैं कि प्रतिक्रिया के पत्र भी बहुत कम आते हैं। इंडिया टुडे तक ने वर्षों पहले कहानी बंद कर दी। हां अंग्रेजी में यह सब कुछ बिक रहा है। रोचकता के कारण नहीं, अंग्रेजी तो भी ठीक हो जाएगी। मानों पूरा देश अंग्रेजी सुधारने, सीखने में लगा है। स्‍कूल के होमवर्क में अंग्रेजी के चेतन भगत जैसे लेखकों पर लिखने –पढ़ने को हिन्‍दी भाषी राज्‍यों और निजी स्‍कूलों में जोर दिया जाता है। जहां स्‍कूल में डंके की चोट पर हिन्‍दी बोलने की मनाही हो वहां हिन्‍दी किताब वैस्‍ट सेलर कभी नहीं बन सकती। सरकार की भाषा- शिक्षा नीति ने सब कुछ चौपट कर दिया।

प्रश्‍न 8. लेखकों और प्रकाशकों के बीच छत्‍तीस का आंकड़ा क्‍यों होता है।

उत्‍तर:  कंगाली में गीला आटा ‘मुहावरा’ यहीं फिट बैठता है। लेखक इतनी मेहनत से लिखता है। रात दिन एक करके किन्‍तु उसे बदले में कुछ नहीं मिलता तो उसका गुस्‍सा प्रकाशक की तरफ मुड़ जाता है। प्रकाशक दूध के धुले नहीं हैं। वे भी देश के दूसरे धंधेवाजों की तरह हैं। लेकिन प्रकाशन के धंधे में वे ही सफल हैं जो रिश्‍वत आदि के बूते किताब खपा देते  हैं। पाठक के बूते तो मौजूदा दौर में कमाई नहीं हो सकती। यहां हिन्‍दी लेखक, संघ प्राध्‍यापक हिन्‍दी अधिकारी बरावर के अपराधी हैं। मिलकर हिन्‍दी भाषा को बढ़ाने से ही दोनों का भला है।

प्रश्‍न 9. पढ़ने के लिए आपकी रूचि के कौन-कौन से विषय हैं। आजकल आप कौन से लेखक और उनकी किताबें पढ़ रहें हैं।

उत्‍तर: सच कहूं तेा कौन सा विषय है जो मुझे पसंद नहीं है।  कहानी, उपन्‍यास तो मेरा जीवन है ही, इतिहास, जीवनियॉं, वैज्ञानिक शोध और पिछले दिनों तो इस तंत्र की गुत्‍थी खोलने वाली सभी किताबें मैंने पढ़ी हैं। इतिहासकार रामचंद्र गुहा की तीन चार किताबें, प्रधानमंत्री के सलाहकार रहे संजय वारू की ‘एक्‍सीडेन्‍टल प्रधानमंत्री’, विनोद राय की ‘नॉट जाट अकांउट्रेंट’, राजदीप सरदेसाई, इतिहासकार सुधीरचंद्र की ‘गांधी एक असंभव संभावना।‘ और फिलवक्‍त एकलव्‍य प्रकाशन की  ‘विज्ञान की शिक्षा’ और शिवरतन थानवी की ‘ भारत में सुकरात’ पढ़ रहा हूं। शिक्षा की बहुत अच्‍छी किताबें हैं ये।

प्रश्‍न 10. जन-जन तक हिन्‍दी को प‍हुंचाने के लिए आपके विचार से क्‍या करना चाहिए।

उत्‍तर:  बहुत आसान उपाय है। सिर्फ प्रायमरी स्‍तर पर शिक्षा को अपनी भाषा में देना अनिवार्य कर दें। केवल हिन्‍दी नहीं सभी मातृभाषाओं में अंग्रेजी केवल एक विषय के रूप में पढ़ाई जाए। अध्‍ययन का माध्‍यम किसी भी स्‍तर पर नहीं- चाहे मेडिकल की पढ़ाई हो या इंजीनियरिंग प्रबंधन या कानून। केवल शिक्षा में ही क्रांति नहीं आएगी, पूरे सामाजिक ढांचे में आयेगी। अंग्रेजी  गैर-बरावरी बढ़ाने बच्‍चों की रचनात्‍मकता को खत्‍म करने के लिए पूरी तरह जिम्‍मेदार है। नयी केन्‍द्रीय सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है। बच्‍चे जिस भाषा में पढ़ेंगे वही भाषा आगे बढ़ेगी और उसी से बचेगी भारतीय संस्‍कृति और समाज।

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