पिताजी (स्मृति)

मेरे एक पाठक ने बड़ी सहजता से एक दिन कहा कि आपके सारे लेखन में पिताजी कहीं नहीं आते । बात बिल्कुल सही थी । मॉं का जिक्र कई कहानियों में हुआ है । ‘मॉं और मेरी शिक्षा’ में थोड़ा और खुलकर मॉं आईं हैं लेकिन पिताजी शायद कहीं नहीं हैं । ठहर कर सोचूं तो कई कारण इसके पीछे रहे हैं ।

इसे अतिशयोक्ति न माना जाए । इतना मेहनती, सक्रिय कम-से-कम हमारे आस-पास और खानदान में तो मैंने नहीं देखा । नि:संकोच किसी भी विवाद में अपना पक्ष रखने वाला और यदि गलत लगे तो तुरंत अपनी गलती मानने वाला । लेकिन इतने ही गुस्सेबाज, तुनक मिजाज भी । उनको गुजरे अभी दो साल भी नहीं हुए लेकिन जितना उनके गुजरने के बाद मैंने याद किया है उतना पूरी उम्र भी नहीं । एक अफसोस मन में उभरता है कि मैं अंतिम दिनों में उतना समय नहीं दे पाया जितना मुझे देना चाहिए था । कारण तो हर आदमी गिना सकता है । दफ्तर की व्यस्तता से लेकर अपनी घर-गृहस्थी तक । मैं नियमित रूप से जाता जरूर था, उनके पास बैठता था लेकिन लगता है कि मुझे और देर तक बैठना चाहिए था । यों छियासी की उम्र ठीक-ठाक ही कही जायेगी जिसमें वे अचानक चले गये । लेकिन कभी-कभी लगता है कि जिस बाजू के दर्द के बारे में वे हल्का सा बताते थे कहीं वो दिल की किसी बीमारी का इज़हार तो नहीं था जिसे हमने गंभीरता से नहीं लिया । यह करने के पीछे भी उनके व्यवहार की जिद सी थी । डॉक्टर से बचते हुए । वे खुद बता देंगे कि यहां तकलीफ है । अंतिम दिन से एक दिन पहले ही उन्होंने मृणालिनी से मालिश की कोई दर्द निवारक ट्यूब मंगाई थी ।

मेरे और उनके बीच रेल की पटरियों की तरह चंद मुद्दों पर समानांतर मतभेद भी शायद रहे । विचित्र बात यह कि किताबों के इतने शौकीन, इतने पढ़ाकू होने के बावजूद कम-से-कम शुरूआत के दिनों में उनका मेरे लिखने-पढ़ने के प्रति कोई अच्छा नजरिया नहीं रहा । इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि जब छोटे भाई ओमा शर्मा भी लिखने-पढ़ने की दुनिया की तरफ बढ़ने लगे तो वे बोले कि अभी तक तो ‘एक ही बावला था अब दोनों हो गये ।’ निश्चित रूप से काले-सफेद की तरह उनकी शब्द और किताबों से उतनी दूरी नहीं थी । हकीकत तो यह है कि हमारे घर में जितनी भी किताबें हैं या ओमा शर्मा की व्यक्तिगत लाइब्रेरी में मुम्बई, अहमदाबाद में पिताजी ने जितनी पढ़ी होंगी, हम दोनों ने भी नहीं । पिछले पच्चीस वर्षों से उनका जीवन यदि चल रहा था तो अखबार और किताबों के ही बूते । एक खत्म करके दूसरी ले जाते । पिछले दिनों उन्हें मैत्री पुष्पा का लेखन बहुत अच्छा लगता था । क्योंकि उसमें उस पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तस्वीर थी जहां वे रहे थे । ‘अल्मा कबूतरी’ पढ़ ली तो अगली किताब भिजवा दी । प्रेमचंद से लेकर नये-से-नये लेखक को उन्होंने पढ़ा । बड़ौदा के दिनों की तो उनकी पढ़ने की यादें और भी अच्छी हैं । जितना असंतोष मुझे पिछले दिनों उनको कम समय देने का होता है उतना ही संतोष सर्दियों में दिसंबर, जनवरी के महीनों में उनका बड़ौदा मेरे पास आकर रहने का लगता है ।

शीशे या स्टील की तरह कडक थे तो कुछ मामलों में उतने ही लचीले भी । सारी उम्र दिल्ली में रहने के बावजूद बड़ौदा का लाल बाग और वहां का पूरा परिवेश उन्हें इतना भाता कि उन्होंने हमें अपने तुरंत निर्णायक स्लभाव के अनुरूप सलाह दी कि यहीं रहो, यहीं घर बनवा लो । कम बुजुर्ग ही ऐसे होते हैं वरना अपने बाकी बच्चों या मूल जगहों की तरफ ही बच्चों को खींच कर ले जाने की कोशिश करते हैं । स्टॉफ कॉलेज की लाइब्रेरी से बीसियों किताबें मंगवा लेते । एक के बाद एक । हरिशंकर परसाईं के तो ऐसे दीवाने हो गये कि मेरा बड़ा बेटा जो उन दिनों आठवीं, नौवीं क्लास में था जैसे ही स्कूल से लौटता, पिताजी परसाईं की किताब के अंश पढ़कर सुनाते एक के बाद एक । मैं भी दूर से मन-ही-मन आनंदित होता कि लेखक की ताकत यह होती है । यानि प्रेमचंद, परसाईं की मेरी पीढ़ी भी दीवानी है, मेरे पिताजी की भी और धीरे-धीरे अगली पीढ़ी भी होगी बशर्ते उन्हें इस अंग्रेजी के माहौल ने पढ़ने दिया । बच्चे परसाईं को जानते हैं तो पिताजी की वजह से । यानि कि एक विचित्र स्थिति थी कि जहां अपने बच्चों को वो सायास लेखक बनने से दूर रखना चाहते थे उनके जीवन के अंतिम दिनों में सिर्फ किताबें-ही-किताबें थीं । शायद बाद के दिनों में उन्होंने हमारे लेखक बनने की नियति स्वीकार कर ली थी । मेरा उपन्यास ‘चौराहे’ वे अपने साथ अहमदाबाद ले गये थे । लौटकर मॉं ने बताया । ‘बहुत प्रसन्न थे कि वह तो इतना अच्छा’ लिखता है ।’

ईश्वर ने उनको एक अलग ही मिट्टी से बनाया लगता था । क्या कोई सोच सकता है कि जिसकी शिक्षा सिर्फ मिडिल क्लास तक हुई हो (सातवीं कक्षा तक) और वह भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में स्थित ठेठ संस्कृत के एक गुरूकुल किस्म के आश्रम में वह हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू पर भी समान अधिकार रखे । हमारे पूरे खानदान में उर्दू सिर्फ उन्हीं को आती थी । प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘आजकल’ उर्दू में भी निकलती थी । वे मुझसे उसे लाने के लिए कहते तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होती थी आखिर कोई तो इस साझी विरासत के साथ है । यह सब उन्होंतने निजी मेहनत से अर्जित किया था और भी बड़ी बात यह थी कि वे किसी शिक्षा या पठन-पाठन के व्य्वसाय में नहीं थे । दिल्ली में कमला नगर, बंगलो रोड की प्रिंटिग प्रैस में काम करते थे । प्रैस अंग्रेजी प्रकाशन की । मशीन मैन का काम तो फरमे-दर-फरमे छापना होता है । सुबह से शाम तक काले हाथ-पैर । लेकिन इस प्रेस की बदौलत उन्हें अंग्रेजी भी अच्छीत आ गई । कोर्ट कचहरी, स्कूपल कॉलेज की छोटी-मोटी अंग्रेजी की जरूरतों पर कोई उन्हेंछ मूर्ख नहीं बना सकता था । इसी प्रैस की बदौलत वे देश के जाने-माने विद्वानों, वाइस चांसलर, वैज्ञानिकों के नामों से भी परिचित थे क्योंककि हिन्दुमस्ताकन प्रीटिंग प्रेस जहां वे काम करते थे वहां इन विद्वानों की किताबें छपती थीं । अपने बेटों को भी ऐसा बनते देखने का सपना यहीं से उपजा हो ।

जीवन के कुछ अनुभवों का असर कहिए या जो भी कहो मेरे उनसे असहमति के कुछ बिन्दूव ऐसे ही परिस्थितिजन्य थे । जैसे दसवीं क्ला स में मेरे प्रथम श्रेणी में पास होने से वे बेहद गद-गद थे और चाहते थे कि मैं डॉक्ट र बनू । यह भी कि मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वगविद्यालय में प्री- मेडिकल कोर्स जो ग्याभरहवीं कक्षा के समकक्ष होता है, में दाखिला लूं । एक सामान्ये मजदूर की जिन्देगी के बावजूद उनकी बच्चोंी के प्रति महत्वाककांक्षाएं उन्हें पढ़ाने, बेहतर नागरिक के रूप में (हर पिता की तरह) अनंत थीं । अचानक दिल्लीि से गॉंव पहुंचे । मुझे याद है कि हम उस समय टीका-टीक दोपहरी में मक्काक के खेत में काम कर रहे थे । वे दिल्लीा से अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शायद फिजिक्स‍ डिपार्टमेंट के अध्यरक्ष रईस अहमद के नाम अपने मालिक से एक पत्र लाए थे । मुझे पत्र लेकर तुरंत अलीगढ़ भेजा गया । रईस अहमद के बंगले पर मैं उनसे मिला भी लेकिन एक चीज जो मेरे अंदर ऐसे अनुभवों से पैदा हुई वो यह कि मैं किसी के दरवाजे पर ऐसी सिफारिश के लिये कभी नहीं जाऊंगा। क्यों ? कैसे ? यह मुझे भी नहीं पता । यह मेरे लिए अच्छा ही रहा । अपने बूते आगे बढ़ने के लिए । खैर !

स्वाुभिमानी, खुद्दारी उनमें भी कम नहीं थी लेकिन शायद बच्चों के प्रति मोह में आदमी हर संभव कोशिश करता है ।

कभी-कभी लगता है कि वे क्याद नहीं थे । घर में कोई तख्ता या चारपाई लड़खड़ा जाए तो तुरंत हथौड़े, कील, लकड़ी लाकर दुरुस्त् । उसी पल । घर का नक्साज बनवाना हो, मिस्रीूं बुलाना हो या बिजली का कोई काम पहले तो खुद ही कर डालते वरना न कर पाने की स्थिति में मिस्त्री को बुलाते । उनके रहते हमें कभी इन चिंताओं से नहीं गुजरना पड़ा दशकों तक । क्याम लिखने-पढ़ने की दुनिया में मैं डूबा रहा इसमें पिताजी और परिवार का कम योगदान है ? ऐसी चिंताओं से एकदम मुक्ति । और तो और अपनी तीसरी पीढ़ी यानि मेरे बच्चों के लिए हर समय जान छिड़कते । मजाल की किसी बच्चे को कोई चोट उनकी नजर में आ जाए ! और बस उनकी डॉक्टडरी शुरू । मेडिकल स्टोनर से डिटोल या जो भी दवाएं पट्टी कहिये हाजिर और उपचार शुरू । बच्चोंु के बचपन में लगने वाले टीके आदि की भी मुझे कभी याद नहीं सब काम खुद उन्हों ने संभाल लिये थे । कभी बच्चों का होमवर्क कराने में विशेषकर बंटी को जब उसकी मॉं डॉंटती तो तुरंत उनकी कड़क आवाज नीचे से आती ‘क्योंम डॉंट रही हो ? कहीं एक दिन में कलेक्टंर नहीं बन जाएगा ?’ तो कभी-कभी यह भी कि स्कूहल से लौटने के बाद जब बच्चेभ घर के अन्दटर ही धमा-चौकड़ी मचाते, क्रिकेट-बल्लास खेलते, उनकी नींद में खलल डालते तो उनकी मॉं (यानि कि मेरी पत्नीध) के बैंक में फोन करते कि छोड़ दो नौकरी और संभालों बच्चोंे को । रोज खट्टी-मीठी नोंक-झोंक । डांटते-पुचकारते हुए । बच्चोंो का भी इसीलिए उनकी प्रति बेहद लगाव रहा । बच्चों के पास बैठते ही पूछते कहॉं कॉलिज है ? कैसे जाता है ? खाना ले जाया कर और बस में दरवाजे से हटकर खड़े होना । इतना जिज्ञासु, तर्कपूर्ण मन मस्तिष्को कि छोटा बेटा बंटी कहता है कि बाबा जी आई.आई.टी. का एग्जाणम देते तो उसमें भी पास हो जाते ।

दिल्लीा में शादी-विवाह के मसलों पर जब भी कोई लड़का या लड़की बताने के बारे में पूछता है तो पिताजी तुरंत स्मृनति में हाजिर हो जाते हैं । किसी के भी साथ चलने को तुरंत हाजिर । दोनों पक्षों के समझौते और ‘चट मंगनी और पट ब्यासह’ वाले अंदाज में शादी संपन्नग । कुछ शादियों की कच्चीु-पक्कीह तो हमारे घर-ऑंगन में ही हुई । कभी बुराई-भलाई मिली भी तो उसकी परवाह नहीं की । अगले की जरूरत के हिसाब से फिर हाजिर । कौन अपने चैन को छोड़ कर धूप-ताप और शीत में निकलता है दर-दर ? हमारा वक्ती तो ऐसा आ गया है कि छूटते ही या तो यह कह देते हैं कि हमें नहीं पता या चुप्पी- साध लेते हैं । निकलते भी हैं तो व्यतक्तिगत स्वाेर्थ, समय का आगा-पीछा सोचते हुए ।

लेकिन बेहद तर्कशील वैज्ञानिक दृष्टिकोण के होते हुए भी स्त्री विरोधी भावना उनमें कहीं-न-कहीं जरूर थी । शायद यह चीज जिस पश्चिमी क्षेत्र उत्तरर प्रदेश के रहने वाले वे थे, उस समाज का असर हो । जैसे जो खुशी उनके चेहरे पर घर-परिवार में लड़के पैदा होने पर होती थी उतनी लड़कियों के प्रति नहीं । प्रत्यपक्षत: कुछ न कहने के बावजूद भी लड़कियां को बोझ शायद ज्यालदा मानते हों । सीधा संबंध तो शायद नहीं खोजा जा सकता लेकिन अपनी दोनों बेटियों को उन्होंिने पांचवीं से आगे आखिर क्यों नहीं पढ़ाया ? एक कारण यह हो सकता है कि वे इतने बड़े परिवार की परवरिश की जद्दोजहद में एक से दूसरी प्राइवेट नौकरी की तलाश करते हुए उन दिनों दिल्ली में थे और हम सब भाई-बहन गांव में और गांवों के उन दिनों के माहौल को देखते हुए पांचवी से आगे जब कोई भी बेटी पढ़ने के लिए नहीं भेजी जाती हो तो उन्होंउने भी बाबाजी, चाचाजी की राय को स्वी कार कर लिया हो । यह बात मुझे और भी बैचेनी पैदा करती है कि हमारी बहनों को भी शिक्षा मिलती तो वे भी उतना ही अच्छाय करतीं, वरना जिन भाइयों-बहनों में से दो अखिल भारतीय सिविल सर्विसेस में चुन लिये जाएं और बाकी भी अच्छीे बड़ी गैर-सरकारी नौकरियों में हों वहां बेटियां इतना पीछे क्यों रहती ? बेटा-बेटी के इस फर्क को समाज में तुरंत दूर करने की जरूरत है ।

लेकिन सिर्फ इसी कारण से उनकी वैज्ञानिक सोच को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । पड़ोस के मंदिर से यदि जोर की आवाज आती तो जाकर सरेआम मना करते । मुझे नहीं लगता कि वे कभी किसी मंदिर में पूजा भाव से गये होंगे । कर्म सिद्धांत की अटल प्रतिमा । हर ढोंग और रीति-रिवाज के खिलाफ । मजाल कि कोई उनके सामने ज्यो्तिष, पत्री, मंत्र, ताबीज की बात करें । यों सब भाइयों की शादी जाति के घेरे में ही हुई, लेकिन मेरे मामले में यदि मृणालिनी किसी और जाति की भी होती तब भी पिताजी सबसे पहले हॉं करते । शायद मेरे बेटे की शादी (मार्च 2012) जिसकी आस करते-करते वह चले गये (23 सितम्ब र 2010) और जिसकी जाति का कोई विवरण कभी किसी ने नहीं पूछा वे, होते तो वे भी उतने ही प्रसन्नम होते । अपनी सीमाओं में मैंने उन्हें सभी बहुओं से खुद बोलते, लड़ते और उन्हेंं मनाते देखा है । परदे की औपचारिकताओं को ठेंगा दिखाते हुए । मृणालिनी के प्रति अतिरिक्त स्ने़ह कहा जा सकता है । पता चलता कि मणि ऊपर आयी हुई है, तुरंत नीचे से ऊपर आ जाते और अधिकार के साथ बातचीत में शरीक हो जाते । उनकी पीढ़ी के किसी भी बुजुर्ग में मैंने इतनी आधुनिक सोच नहीं देखी । हमारे एक चाचाजी तो इसी कुढ़न में बने रहते हैं कि बहुएं परदा नहीं करतीं । कभी जाति, धर्म के सॉंचे का समर्थन करते नहीं देखा । घूंघट, परदा जैसी बातों का तो सरेआम विरोध ।

वर्षों तक मैं उनके ऊपर एक लम्बीच कहानी लिखने के बारे में सोचता रहा । मेरे कागजों के कबाड़ में ऐसे बहुत सारे नोट्स और टीपें होंगी । क्रोध के मामले में तो किसी दुर्वासा से कम नहीं। यदि उड़द की दाल नहीं बनी तो बस तूफान । सब्जीक में मन-माफिक तड़का नहीं लगा तो मॉं की खैरियत नहीं । वे खुद भी बहुत अच्छान खाना बनाना जानते थे । जैसे कि पहले कहा कि कौन सा काम ऐसा था- किसानी, साइकिल ठीक करने से लेकर डॉक्टकरी तक । खाना, पकवान तो उनका बनाया ऐसा बेजोड़ कि आप उंगली काट लें । मॉं समेत हम सबके दिल्ली पहुंचने तक, तीस वर्ष तो उन्होंलने खुद ही बनाया, खाया था ।

मुझे उनसे अपनी असहमतियों पर कोई अफसोस नहीं होता और शायद पिताजी को भी नहीं । रचनात्म क, द्धंद्धात्मोक संबंध । मेरी छोटी-मोटी सफलताओं पर आशीष भाव से यह कहते भी थे कि यदि मैं ऐसा नहीं कहता, तो तुम ऐसा न कर पाते । संक्षेप में मैं दिल्लीस आकर एक सरकारी नौकरी में लग गया और कुछ ट्यूशन से पैसा कमाता था । उनके लिए यही परम सुख की प्राप्ति थी । वे मेरे सिविल सर्विसेस में बैठने के भी लगभग खिलाफ थे । अपनी परिस्थितिजन्यी सीमाओं व सोच के कारण । उनका मानना था कि आई.ए.एस. जैसी परीक्षा गॉंव के ऐसे बच्चेव पास नहीं कर सकते । हमने उनका यह भ्रम उन्हींप की चुनौतियों से प्रेरित होकर शायद तोड़ा हो ।
अनंत स्मृ तियां हैं । फिर छियासी की उम्र भी ठीक-ठाक ही कही जा सकती है । अंतिम तीन-चार वर्षों में उनकी ऑंख की तकलीफ भी बढ़ गई थी । फिर भी मुझे लगता है कि मेरे दायित्यों में कुछ चूक जरूर हुई है । हो सकता है कि विधि का विधान इसी को कहते हों ।

One thought on “पिताजी (स्मृति)”

  1. Apke pita ji se ek bar ghar par aise he bat chal rahi thi to apke bare me bole chahe dono bhale hi IAS ho gaye hai lekin yadi kabhi urdu ka shabda aa jaye to fir arth janne ke liye mere pass hi aate hain. ye unke shabd mujhe aise yad hai jaise kal ki bat ho bhale hi in shabdo ko karib 20 year ho chuke hain.

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