नष्‍ट हों ये बाबा और बाबावाद (जनमत जनवरी-2015 )

जब किसी विदेशी ने सौ-दो सौ वर्ष पहले भारत के बारे में यह कहा था कि यह बाबा और सपेरों का देश है तो वह गलत नहीं था । आज के भारत में तो यह बाबा और बाबावाद और भी बढ़ रहे हैं । सपेरें तो बेचारे रोजी-रोटी के लिए तरस गये लेकिन बाबाओं की चॉंदी बरकरार है । सरकार कोई भी हो कभी वो राम रहीम के आगे घुटने टेकती है तो कभी रामपाल के र विश्‍व गुरू के सपने में डूबा भारत असहाय देखता रहता है । बताते हैं कि रामपाला के आश्रम को खाली कराने के लिए कुछ तीस-चालीस करोड़ खर्च करने पड़े । जिस देश के स्‍कूल के लिए भवन न हों, शिक्षक न हों, टायलेट न हों लेकिन नियम कानून तोड़ने वाले बाबा और उनके भक्‍तों को बचाने के लिए इतना पैसा आखिर क्‍यों खर्च किया जाता है । दिल्‍ली के आसपास और हरियाणा में तो इन बाबाओं की मानों बाढ़ ही आ गई है । अमीरी के गुड़ पर जैसे मक्खियां । कहीं राम रहीम का अखाड़ा तो कहीं आशुतोष महाराज, रामपाल जैसों का । ये तो बड़े नाम हैं करोड़ों में खेलने वाले इनके छोटे अवतार भी सारे भारत में उतनी ही संख्‍या में है । कहीं ऐसा न हो जितने इस देश में सॉंप न हो अब उससे ज्‍यादा ये बाबा हैं । हिन्‍दू धर्म और किसी मामले में भले ही आगे न हो बाबाओं को पैदा करने में तो उसका कोई जवाब नहीं ।

एक कुतर्क के साथ बाबाओं के पाखंड को धर्म की आध्‍यात्मिक छवि के साथ गड्डमड्ड कर दिया गया है और जब धर्म के साथ मिला दिया जाए तो ऐसे काम कितना रक्‍तपात कराते हैं दुनिया भर में धर्मों की भूमिका यह बताती है ।

आखिर भारत भूमि बाबाओं के लिए इतनी उर्वरक क्‍यों बनी हुई है ? बाबा रामपाल के संदर्भ में जो खबरें सामने आईं उन सबके पीछे गरीबी, अशिक्षा के कारण स्‍पष्‍ट हैं । दिल्‍ली के करीब रहने वाला शिवपाल श्रीवास्‍तव बीमार रहता था । आसपास के छोटे बाबाओं ने उसके ऊपर किसी देवी का असर बताया फिर किसी और भक्‍त ने उसे रामपाल के आश्रम तक पहुंचा दिया । उसने रामपाल के कारनामे टी.वी. पर भी देखे थे और मुफ्त में बांटी जाने वाली ज्ञान गंगा जैसी किताब भी पढ़ी थी । बस तीन बच्‍चों के साथ आश्रम पहुंच गया । थोड़ी-बहुत राहत मिली । हो गया भक्‍त । संगरूर की रहने वाली मिल्कियत कौर को अस्‍थमा है । देश में डॉक्‍टर तो हैं नहीं और हैं भी तो निजी अस्‍पतालों का खर्चा गरीब कैसे उठा सकता है । मरता क्‍या न करता पहुंच गई आश्रम । थोड़ा-बहुत फायदा हुआ होगा बस हो गई भक्‍त । हजारों किस्‍से ऐसे हैं और इसमें से नब्‍बे प्रतिशत शारीरिक मानसिक बीमारों के । क्‍या आपको नहीं लगता इस देश की गरीबी, अव्‍यवस्‍था इन बाबाओं की प्राणवायु है ? यदि एक तर्कसंगत शिक्षा इनको बचपन में दी गई होती जो  एक स्‍वतंत्र राज्‍य का कर्तव्‍य भी है और सारे अस्‍पताल भी ठीक से काम कर रहे होते तो क्‍या इन बाबाओं के पास पहुंचने की नौबत आती ? बाबाओं की पकड़ सिर्फ इन मरीजों तक ही सीमित नहीं है । उनके बच्‍चों में भी ऐसा ही विश्‍वास पनपने लगता है और यही होती है बाबाओं की ऐसी पैदावार ।

अभी रामपाल की खबर तो शांत हुई ही नहीं थी कि आशुतोष महाराज उर्फ महेश कुमार झा के मामले में कोर्ट को कहना पड़ा है कि 15 दिन में उसका दाह संस्‍कार किया जाए । मूल रूप से बिहार के रहने वाले महेश झा उर्फ आशुतोष महाराज 29 जनवरी 2014 को खत्‍म हो चुके हैं लेकिन उनके भक्‍तों ने उनकी लाश को एक फ्रिज में रखा हुआ है । उनके अनुयायियों को यह भ्रम देते हुए कि बाबा समाधि में हैं । क्‍या किसी और देश की धरती पर यह संभव है ? प्राचीन ज्ञान पुष्‍पक विमान, गणेश जी की सूण्‍ड सर्जरी और ईसा पूर्व न्‍यूक्लियर विस्‍फोट की टपोरी बातें कहने और सुनने के बीच पूरे देश की छवि को ऐसी खबरों से बट्टा लगता है ।

सबसे दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति यह है कि यह सब दिल्‍ली से दस किलोमीटर के घेरे में स्थित हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में हो रहा है । कहां हैं दिल्‍ली के बुद्धिजीवी, पत्रकार और मध्‍यवर्ग के हर समय मोमबत्‍ती हाथ में लिये हुए नागरिक ? क्‍यों इन मोमबत्तियों से हम इन डेरों को नहीं जला पा रहे ? कहां गये उत्‍तर दक्षिण के सभी राजनीतिक दल जो इनके खिलाफ उठती आवाजों में धीमे स्‍वर में हां में हां तो मिलाते हैं लेकिन वोट बैंक के डर से फिर इन्‍हीं की शरण में जाते हैं । इन सभी बाबाओं और आश्रमों का इतिहास बताता है कि ये सब बाबा बारी-बारी से किसी न किसी राजनीतिक दल को समर्थन देने का वायदा करते रहे हैं। उससे भी बड़े अफसोस की बात है कि इन आश्रमों में स्त्रियों और समाज के दलित पिछड़े लोगों की संख्‍या ज्‍यादा है । यानि कि समाज से हांसिये पर धकेला गया हिस्‍सा इन बाबाओं के आश्रम में शांति पा रहा है । एक हल्‍के तर्क से सोचा जाए तो गरीबों के लिए रास्‍ता बचता ही क्‍या है ? गांव के जमींदारी, जातिवादी सरपंच उनकी नहीं  सुनते । सरकार तक उनकी कोई पहुंच नहीं । तो वे परमात्‍मा के इन्‍हीं पाखंडियों के पास तो पहुंचेंगे । यह अचानक नहीं है कि घरों के दड़बे में रहने वाले और दलितों में भी दलित स्त्रियों को ऐसे आश्रम में जीने की ऑक्‍सीजन मिलती है । यहां तक कि कुछ-कुछ स्‍वच्‍छंदता भी । आखिर कोई रोजाना के पीटे जाने से मुक्ति तो मिलती है । और एक जीवित मनुष्‍य के नाते अगर वो बाबाओं के आश्रम में उनको शोषण भी होता है तो हुआ करे । क्‍या इस सभी तरह के शोषण से मुक्ति की माया का नाम ही आश्रम नहीं है ?

नरेन्द्र दाभोलकर ने इन्हीं सब के खिलाफ आवाज उठाई थी और अगस्‍त 2013 में उन्‍हें जान से हाथ धोना पड़ा । आज तक उन हत्‍यारों का सुराग नहीं मिल पाया है और धीरे-धीरे अब नरेन्‍द्र दाभोलकर को भी भूलते जा रहे हैं । लेकिन नरेन्‍द्र दाभोलकर की शहादत खाली नहीं गई । देर से ही सही महाराष्‍ट्र सरकार ने जादू टोने और ऐसे धंधों के खिलाफ कानून भी बनाया है जिसके तहत अभी तक सैंकड़ों गिरफ्तार भी हुए हैं । फिर ऐसे कानून हरियाणा, पंजाब, उत्‍तर प्रदेश, दिल्‍ली में क्‍यों नहीं बनाए जाते ? क्‍यों जब केंद्र सरकार फिर से विश्‍व गुरू बनने के चक्‍कर में बड़ी-बड़ी घोषणा कर रही है तो सभी राज्‍यों के लिये ऐसा समान कानून क्‍यों नहीं ? बाबावाद किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है जहां भी गरीबी, अशिक्षा है वहां बाबावाद उतना ही ज्‍यादा ।

अनुभव बताता है कि राजनेताओं के भरोसे इस समस्‍या को नहीं छोड़ा जा सकता । संसद में ऐसी बातों पर चर्चा नहीं होती । संसद निर्मल बाबा पर भी चुप रहती है, भविष्‍य बताने वाली तीन देवियों पर भी और मीडिया के खिलाफ भी । क्‍योंकि उन सबके अपने-अपने बाबा हैं । कोई पेड़ पर रह रहे देवराह बाबा का पंजा चूमता है तो कोई साईं बाबा को । खोज-खोज कर पहाड़ों में छिपे बाबाओं के साथ तस्‍वीर खिंचवाते हैं । इलेक्‍शन से पहले भी और इलेक्‍शन के बाद भी । विज्ञान ने कंप्‍यूटर का आविष्‍कार किया लेकिन हमारे राजनेताओं और पिछले दिनों हार्बर्ड, इंग्‍लैंड और आई.आई.एम. से पढ़े हुए नौजवानों ने साथ मिलकर उन कंप्‍यूटरों का इस्‍तेमाल क्षेत्रवार, जातियों, धर्मों के आंकड़ों के लिए किया है । न्‍याय मूर्ति काटजू यह बात पूरे जोरों से उठाते रहे हैं कि ऐसी ‘सोच के चलते हम जाति और धर्म की जकड़न से कभी मुक्‍त नहीं हो सकते । अगर वैज्ञानिक सोच नहीं हुई तो क्‍या पूरा लोकतंत्र ही खतरे में नहीं है ?’

यदि महाराष्‍ट्र के राज्‍य में ‘अंधविश्‍वास निर्मूलन कानून’ बन सकता है तो यह उत्‍तर भारत के लिए और भी जरूरी है और सोचें तो पूरे देश के लिए क्‍यों नहीं ? क्‍यों संसद चुप रही इस मुद्दे पर ? एक तीखी टिप्‍पणी यह आई कि उत्‍तर भारत के बुद्धिजीवी और नेता इस हत्‍या के खिलाफ वक्‍तव्‍य तो दे देंगे लेकिन अपने जीवन में उन्‍हें कौन लागू करेगा ? नरेन्‍द्र दाभोलकर की शहादत को सबसे बड़ी श्रंद्धाजलि यही होगी कि हम सभी ऐसे अंधविश्‍वासों के खिलाफ लड़ें और वैज्ञानिक चेतना को फैलाने में जी-जान से जुट जाएं । खंड-खंड में धर्म और जाति में विभाजित समाज की मुक्ति भी इसी रास्‍ते से ही संभव है ।

हमारे जनवादी संगठन यदि चाहें तो इसमें पहल कर सकते हैं । क्‍यों न नरेंद्र दाभोलकर की शहादत पर हर साल एक सप्‍ताह का पूरे अगस्‍त में आयोजन किया जाए । बाबावाद को समूल नष्‍ट करने से ही आम आदमी की मुक्ति संभव होगी ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.