मंदिर के प्रांगण में (Jansatta)

पुरी के मंदिर में वैसे दूसरी बार आया हूं पर पुरानी एक भी स्‍मृति साथ नहीं दे रही । बीस बरस  पहले आया था । बस इतनी याद बाकी है कि इतनी ही भीड़ थी । एक तरफ से घुसती दूसरी तरफ निकलती । कहीं कुछ छूट न जाने वाले अंदाज में । हर मूर्ति के आगे सिर झुकाती, मंत्र सा कुछ बुदबुदाती या टुकुर-टुकुर मुंह बंद किये नकल करती । आज वर्ष 2014 में मुलाकात उसी भीड़ के दृश्‍य से है । और भी ज्‍यादा । क्‍यों ? आज गुरूवार है न इसलिये । एक चोटीधारी पंडा जवाब देता है । क्‍यों ? इसका जवाब देना वह जरूरी नहीं मानता । शायद उसे भी नहीं पता हो । हर पांच-सात के झुंड के बीच एक पंडा होता है । तरह-तरह की बातें बनाता, बताता; कुछ कुछ करने के लिये कहता । यहां घी, बत्‍ती जलाओ और यहां दंडवत । यहां पानी का आचमन और यहां देवी दर्शन । इस देश का कोई देवता नहीं बचा जि‍से पुरी के मंदिर में जगह न मिली हो ।

मेरे खुरापाती मन में इस मंदिर में भी उड़ीसा की गरीबी के आंकड़ें आ-जा रहे हैं । बीमारू का ‘ओ’ । ‘उड़ीसा’ से नाम बदल कर ‘ओड़ीसा’ हो गया । हाल ही में ओडीसा भाषा को ‘क्‍लासिक’ का दर्जा मिल गया है लेकिन भूख से मुक्ति नहीं मिली । बाढ़ और तूफान से भी नहीं । भूख से बचने के लिये दिल्‍ली मुम्‍बई कोलकाता की तरफ भागते । ज्‍यादातर उड़ीसा के लोग पानी के नल ठीक करने वाले यानि प्‍लम्‍बर्स के रूप में जाने जाते हैं । आखिर कितनों को यहां पंडा बनने का लाइसेंस मिल सकता है ? कुछ सौ या हजार बस । नये-नये नौजवान चेहरों को पंडई के धंधे में देख कोफ्त भी होती है । क्‍या ये पिता, दादा की गद्दी के वारिस हैं या इन्‍हें भी रेल के कुलियों की तरह लाइसेंस मिलते हैं ।

जब चंद संस्‍कृत के वाक्‍यों को उछालकर जिंदगी में इतना खाने पीने को मिल जाये तो क्‍या जरूरत है हाड़-तोड़ किसान, मजदूर, सफाई का काम करने की ? ऊपर से मान सम्‍मान भी  पंडे पंडित जी का । मेहनतकशों की छाया से भी डरते । लोकतंत्र के बाद भी जकड़न इतनी बरकरार कि डर लगता है ।

डर की बात जरूरी है । कल से ही साथ आया कल्‍याण निरीक्षक कह रहा था कि आप पंडों से कुछ मत कहना यानि उलझना नहीं । नाराज होकर हमला भी कर देते हैं । बस चुप रहिये । यहां इन्‍हीं की चलती है । यहॉं केवल हिन्‍दू धर्म वालों को ही प्रवेश मिलता है । कोई विधर्मी यदि पकड़ा जाये तो सजा है । इन्‍होंने एक बार इंदिरा गांधी को भी रोक दिया था ।

क्‍यों इंदिरा गांधी चुप लगा गयी ?

मुख्‍यमंत्री विदेश में रहे, पढ़े हैं । वे भी आखिर क्‍यों चुप हैं ?

लोकतंत्र क्‍या ऐसी मूर्खताओं को परपंरा के नाम पर बनाये रख कर सत्‍ता पर काबिज होने का नाम है ?

मैं मंदिर के प्रांगण में ही एक कोने पर बैठ गया हूं । लो ! प्रसाद वाला यहां भी आ टपका । मैंने अपने कागजों में निगाह गढ़ा ली लेकिन वह नहीं माना…। मुझे बड़ा डर लगता है प्रसाद से । बीमारी के चलते-फिरते नारद । न हाथ धुले, न बर्तन । कभी-कभी दक्षिण के प्रसाद में उत्‍तर भारत पहुंचते-पहुंचते बदबू आने लगती है । खायें तो मुश्किल, बीमारी को न्‍यौता, फैंकने या मना करने का डर अंदर ।

मंदिर दर्शन के लिये साथ आये रेल के साथी भी इतने भक्तिरस में डूबे थे कि या तो वे हर देवता की गद्गद् प्रशंसा में उडि़या मिश्रित हिन्‍दी में कुछ न कुछ बताते चल रहे थे या संस्‍कृत के श्‍लोक बुदबुदा रहे थे । भीड़ भरे अंधेरे में ये सब आवाजें ऐसे नाटक का दृश्‍य बना रही थीं जिसे सिर्फ घोर नरक के समकक्ष रखा जा सकता है ।

मंदिर के पूरे अहाते में भीड़ से मुक्ति कहीं नहीं । जहां जगह खाली है वहां बंदर कूदकर आ जाते हैं । प्रसाद चाटते हाथों से कुछ छीनने की जुर्ररत करते । पंडों की तरह इनकी भी कई पीढियां यहीं पैदा और स्‍वर्ग जाती रही होंगी । बीच में न जाने कैसे पीपल का पेड़ ऐसा बड़ा आकार ले पाया है जिस पर तुरंत ये पंडे की और उसके डंडे की आवाज से भागकर चढ़ बैठते हैं । कम से कम ये पंडों से तो ज्‍यादा मलूक लगते हैं ।

न जाने कितने दरवाजे और कौने हैं पूरे मंदिर में और हर जगह एक से एक नये कारनामों की श्रृंखला । कई जगह कुछ छोटी से संटियां (टहनी) लेकर पंडा सिर या कंधों पर छुआता है आशीर्वाद देने की मुद्रा में । लेकिन खाली हाथ न जाने का आग्रह सा करता हर जजमान से हर आदमी अपनी मुद्रा से कुछ चढ़ावा वहां डालकर आगे बढ़ जाता है । इन्‍हें छड़ीमार कहें या चिड़ीमार ।

रुकने की तो जगह ही नहीं । हो भी नहीं सकती असंख्‍य भक्‍तों के रेवड़ में । सिवाय तब जब कोई बुजुर्ग लाठी के सहारे धीमे धीमे बढ़ रहा हो किसी सहारे के । कई चेहरे इतने कृशकाय, धनुष बने हुए मानो पुरी के अंतिम दर्शन के लिये ही उनकी सांसें रूकी हुई हैं ।

मैंने पत्‍नी को एक जगह एकत्रित भयानक भीड़ से बचने की सलाह दी तो उनका तपाक से जवाब था । मैं जरूर जाऊंगी । ‘वंश इन लाइफ टाइम’ में ही तो आना होता है यहां । और वे भीड़ में घुस गयीं । यदि ये इसे ‘वंश इन लाइफ टाइम’ मानती हैं तो ये बेचारे गरीब तो पूरी उम्र में एक बार ही निकलते हैं राधा-माधव के दर्शन करने ।

इन सबसे बेखबर इस मंदिर में कुछ देवत्‍व है तो वे जो मंदिर के पुनरुद्धार में या सफाई के लिये मंदिर के ऊपर बासों पर चढ़े सफाई या मरम्‍मत में लीन है । पंडों, पुजारी, भक्‍तों के सारे दंद्-फंद, डर, श्रद्धा लूट की जमीन से वाकई ऊपर । विरासत की रक्षा में लगे मजदूर श्रम देवता ।

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