जनसंख्‍या की राजनीति (जागरण – 17.1.15)

कुछ प्रश्‍नों को सदा के लिए जनता के ऊपर नहीं छोड़ा जा सकता । विशेषकर तब जब जनता को शासन ने ऐसा सोचने- समझने में समर्थ ही न बनाया हो । जनसंख्‍या का प्रश्‍न भी उन्‍हीं में से एक है । दोहराने की जरूरत नहीं कि बावजूद इस चेतावनी के यदि भारत में जनसंख्‍या की वृद्धि यही रही तो बहुत जल्‍दी ही हम चीन को पीछे छोड़ देंगे । गरीबी, भुखमरी से लेकर बच्‍चों की मृत्‍युदर, डायबिटीज, दिल की बीमारी, अंधों की संख्‍या जैसे सभी मामलों में भारत दुनिया का नंबर एक बना हुआ है । यदि भारत के दो बडे धर्म और उनकी राजनीति का ऐसा ही दौर चलता रहा तो चीन को हम उम्‍मीद से पहले ही पछाड़ देंगे लेकिन क्‍या हमारी पवित्र भारत भूमि इतना वजन ढो पाऐगी ?

 

ताजा विवाद सत्‍ता पक्ष के एक महत्‍वपूर्ण नेता का बयान है जिसमें उन्‍होंने कहा कि हर हिन्‍दू महिला को कम से कम चार बच्‍चे पैदा करने चाहिए । लगभग ऐसी ही बातें दूसरे धर्मों के ठेकेदारों से सुनने में आती रही हैं जिसका भावार्थ यह होता है कि -क्‍योंकि लोकतंत्र में संख्‍या सबसे महत्‍वपूर्ण है इसलिए परिवार नियोजन जैसी बातों पर ध्‍यान न दें । अफसोस की बात है कि पिछले कई दशकों से ऐसा हो रहा है । तीस-चालीस साल पहले परिवार नियोजन की कुछ बातें हुई लेकिन कुछ नीतियों को बलपूर्वक लादने से अन्‍याय के ऐसे मामले सामने आए कि राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने कारणों से सदा के लिए इस समस्‍या से कान मूँद लिये । भारतीय बुद्धिजीवियों का एक बहुत बड़ा वर्ग भी इस मसले पर लगभग चुप रहा है क्‍योंकि वह मानता है कि इसकी समस्‍या में गरीबी और अशिक्षा है और गरीबों के बच्‍चे उनके ऊपर बोझ नहीं होते वे तो उनकी जीविका के साधन होते हैं । यानि कि जितने हाथ होंगे उतना ही कमाई का साधन । इन स्थितियों में जब कोई राजनेता जरा ऊँची आवाज में किसी धर्म विशेष के अनुयायियों से ज्‍यादा बच्‍चे पैदा करने की हुँकार भरता है तो थोड़ी देर के लिए सन्‍नाटा टूटता सा लगता है ।

 

अब सवाल उठता है कि आखिर सरकार एक मुकम्मिल स्‍पष्‍ट, समान जनसंख्‍या नीति के साथ सामने क्‍यों नहीं आती और क्‍यों सभी राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों में इस मुद्दे को प्रकारांतर से भी नहीं छुआ जाता ? क्‍या लोकतंत्र सिर्फ ऐसी संख्‍या बल का नाम है जो बेबस गरीबी, अभाव और बीमारियों में रहने के लिए अभिशप्‍त हो ? विज्ञान और तकनीक के बूते देश के कई क्षेत्रों ने तरक्‍की की है लेकिन जनसंख्‍या में कई गुना ज्‍यादा वृद्धि के कारण हर जगह सुविधाओं का अभाव ज्‍यादा दिखता है । गॉंवों, कस्‍बों से लेकर महानगरों तक में न पर्याप्‍त पानी, न रहने की सुविधाएं, न टायलेट, न स्‍कूल । मिसाल के तौर पर भारतीय रेल ने शहरों को जोड़ने वाली शताब्दियां चलाई हैं और हर वर्ष न जाने कितनी रेल गाडि़यां जोड़ी जाती हैं लेकिन बढ़ती जनसंख्‍या के अनुपात में यह बिल्‍कुल ऊँट के मुँह में जीरा है । क्‍या इस सारे विकास को यह बढ़ती जनसंख्‍या का दानव नहीं निगले जा रहा ? माना कि दुनिया भर में हमारी युवा जनसंख्‍या की संख्‍या बल के आधार पर तारीफ हो रही है लेकिन क्या हम उसका पूरा फायदा भी उठा पा रहे हैं ? उन करोड़ों हाथों का क्‍या करें जिनके दिमाग अच्‍छी शिक्षा से बेहतर नहीं बनाया गया हो । यदि हमारे युवाओं पर हमें इतना ही नाज है तो क्‍यों हम दुनियाभर में हथियारों का सबसे ज्‍यादा आयात करते हैं ? सबसे ज्‍यादा दवाओं का आयात करते हैं ? क्‍यों नौकरी, रोजगार के लिये सारी दुनिया में पलायन करने के लिये अभिशप्‍त हैं ?

 

जनसंख्‍या नीति के संदर्भ में पिछले दिनों कभी-कभी कुछ अच्‍छे कदम उठाने की भी कोशिश की गई थी । जैसे कुछ राज्‍यों में एक कानून लाया गया कि किसी भी जनप्रतिनिधि के दो से ज्‍यादा बच्‍चे नहीं होने चाहिए । देखा जाए तो इसकी तारीफ की जानी चाहिए । इस मामले पर भी ध्‍यान हाल ही में तब सामने आया जब गुजरात के एक जनप्रतिनिधि को तीसरा बच्‍चा होने पर अयोग्‍य घोषित किया गया । लेकिन जनप्रतिनिधि‍यों के दो से अधिक बच्‍चे न होने की शर्त पर कुछ राजनैतिक पार्टियां और सेक्यूलर किस्‍म के बुद्धिजीवियों तक ने ऐसा शोर मचाया कि आज तक लागू नहीं हो पाया । ऐसा ही मिलता-जुलता कदम राजस्‍थान सरकार ने भी अभी हाल ही में उठाया है जिसमें जनप्रतिधि के लिए आठवीं तक की शिक्षा अनिवार्य की गई हे । शिक्षा और जनसंख्‍या का सीधे-सीधे संबंध न भी हो लेकिन दुनियाभर के अनुभवों को देखते हुए ये भी कदम कारगारी साबित हो सकते हैं । यदि जनप्रतिनिधि के लिए आठवीं तक पढ़ा होना अनिवार्य है तो उम्‍मीद की जानी चाहिए राज्‍य ऐसे स्‍कूल खोलेगा जिससे कि कोई निरक्षर न रहे । अच्‍छी शिक्षा एक ऐसी समझ पैदा करेगी जो स्‍वयं बच्‍चों की बेहतर परवरिश जीवन की खातिर जनसंख्‍या वृद्धि पर आत्‍मनियंत्रण रखेगी । तब धर्म का कोई ठेकेदार मासूम जनता को बरगला भी नहीं सकता ।

 

यदि हम एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते हैं जहां सुख समृद्धि चारों तरफ दिखाई दे तो हमें जनसंख्‍या नीति की भी तरफ तुरंत देने की जरूरत है । आश्‍चर्य और अफसोस की बात है कि जहां हर विमर्श में चीन की प्रगति और समृद्धि का हवाला दिया जाता हो वहां चीन के जनसंख्‍या नियंत्रण के पक्ष पर एकतरफा चुप्‍पी क्‍यों बनी हुई है ? ज्‍यादा बच्‍चे पैदा करने की बात भले ही गले न उतरे लेकिन समस्‍या पर उंगली तो रखती ही है । नयी सरकार के लिये यह चुनौती भी है और अवसर भी ।

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