जाति की जमीन (Jansatta)

वे एक मेधावी महिला थीं । पचास के पेटे में । वर्ष 1972 में दिल्‍ली बोर्ड की हायर सैकेंडरी परीक्षा में 20वीं रैंक माने रखती है । उन दिनों बोर्ड का टॉपर 75 प्रतिशत के आसपास होता था । फिर आपने हिन्‍दी विषय क्‍यों चुना ? मैंने क्‍यों चुना ? मैं तो अर्थशास्‍त्र पढ़ना चाहती थी । गणित भी अच्‍छा था । साईंस भी मुझे अच्‍छी लगती थी । मेरे मॉं-बाप का फैसला था । मॉं की बातें अभी भी दिमाग में गूंजती है । यह फैसला मां को मेरे नाना का दिया हुआ था । उन्‍होंने कहा ब्राह्मणों की लड़कियों को साईंस कोई नहीं पढ़ाता । क्‍या दाई, डॉक्‍टर बनाकर आदमी औरत को हाथ लगाती फिरेगी हमारी बेटी ? ब्राह्मणों की बेटियों को तो संस्‍कृत, हिन्‍दी पढ़नी चाहिए । बस हो गया दाखिला । उनकी अंतिम बात और भी आहत करने वाली थी । पढ़ने के साथ घर का काम करना पड़ता । छोटे तीन भाईयों में मैं सबसे बइी थी इसलिए मैं ही उन्‍हें खाना खिलाती, उन्‍हें तैयार करती और जैसे ही फुरसत मिलती मां, बाबूजी रामायण पढ़ने बिठा देती । एक बार पड़ोस में काम करने वाली ने अपने घर पर पूजा रखी । जिन पंडित जी को आना था वे कई घंटों के इंतजार करने के बाद भी नहीं आए । पंडितजी शायद पैसे वालें जजमानों के यहां व्‍यस्‍त रहे होंगे । काम वाली का नंबर तो सबसे बाद में आता है । भूख के मारे उसका चेहरा पीला पड़ रहा था । मॉं ने ममता दिखाते हुए मुझे ही कथा करने के लिए भेज दिया । बस फिर तो जब तब कथा करने के लिए जाना पड़ता । रह गए सपने डॉक्‍टरी, अर्थशास्त्र सब पढ़ने के । तो ऐसे गढ़े जाते हैं ब्राह्मणवादी संस्‍कार ।

इन्‍हीं संस्‍कारों का विस्‍तार ऐसे उदाहरण हैं जब उत्‍तर प्रदेश, बिहार के पाण्‍डे, मिश्रा स्‍कूलों में चपरासी तो बन गए सरकारी नौकरी के आनंद और लुत्‍फ उठाने के लिए, लेकिन उन्हें झाड़ू लगाने के लिए या बरतन धोने के लिए कहो तो वे तुनक पड़ते हैं यह कहते हुए कि ‘कैसा कलियुग आ गया है जो ब्राह्मणों को झाड़ू लगानी पड़ रही है ।’ यानि कि बिना काम किए हुए मुफ्त की तनख्‍वाह लेना कलियुग नहीं है, काम करना पाप है । यही कारण है कि कम से कम हिन्‍दी पट्टी के राज्‍यों में उदारीकरण के पूरे दौर के बावजूद भी इंजीनियरिंग कॉलेजों में तो लड़कियां पहुंच गई हैं नर्स जैसे पेशे से वे अभी भी बचती हैं । दूसरों की सेवा करना इतना आसान काम नहीं है । हिन्दू समाज का जो वर्ग सच्‍चाई से आपकी सेवा टहल कर रहा है, पाखाने साफ कर रहा है वे वाकई ईश्‍वर का काम कर रहे हैं । इससे बड़ा पुण्‍य क्‍या होगा लेकिन यह व्‍यवस्‍था उनके काम को गंदा मानती हैं और उन्‍हें अछूत भी ।

लेकिन मरने के बाद भी कहां पीछा छूटता है जाति से । कुछ वर्ष पहले पिताजी की अस्‍थि‍यां विसर्जन के लिए गढ़ गंगा जाना हुआ । जैसे रेलवे स्‍टेशन पर उतरते ही रिक्‍शे वाले, ऑटो वाले, टैक्‍सी वाले आपकी तरफ दौड़ते हैं वैसा हाल वहां था । वे पूछ रहे थे आप किस जाति के हो यानि की उन अस्थियों की अंतिम क्रिया के लिए भी जातिवार व्‍यवस्‍था थी । जीवन से मुक्ति के बाद भी जाति से मुक्ति नहीं ।

विश्‍वकर्मा दिवस सरकारी दफ्तरों में भी मनाया जाता है बड़ी अच्‍छी बात है हाथ से काम करने वालों के लिए सरकारी स्‍तर पर श्रद्धा, उनके काम को अहमियत देने का भाव । इस दिन सामूहिक स्‍तर पर पूजा, खानपान आदि की व्‍यवस्‍था होती है । संयुक्‍त सचिव के नाते मेरी भी इस आयोजन में शामिल होने में रूचि थी । वहां भी एक पंडित मौजूद था । मुझे सामने बिठाया गया कलाई में धागा बाद में बांधा पंडित जी पूछने लगे ‘आपकी जाति क्‍या है ?’ मैंने बचने की कोशिश की । उन्‍होंने फिर पूछा बताईये । आप क्‍या कर लेंगे ?

कई ऊंचे दर्जे के बुद्धिजीवियों में भी यह रोग उतना ही गहरा है । एक राजनेता ही केवल वोट मांगने के लिए साम पित्रोदा की जाति नहीं बताता फिरता । दिल्ली के बुद्धिजीवी तो और दस कदम आगे हैं । अरे ! नाम का ही मिश्रा, सिन्‍हा है । हैं तो यह भूमिहार । चमडि़या अनुसूचित जाति नहीं बनिये होते हैं और ये केसरी भी बनिया । बिहार में ये सब ओ.बी.सी. में शामिल हैं । और दूसरों के कान में बताएंगे भी फुसफुसाकर । आखिर इतना ज्ञान क्‍यों रखते हैं ये बुद्धिजीवी और इसकी जरूरत किसे है ? आप तो सारी दुनिया के सामने जाति न मानने का चेहरा रखते हैं । क्‍या यह कम बड़ा अपराध है ? उनको क्‍या कहें जो चालीस बरस चाणक्‍य पुरी में रहकर भी अपने को दलित बताते हैं और गॉंव के मेरे छीतरमल का हक उसी वीभत्‍स अंदाज में चबा रहे हैं जैसे मोटे-मोटे पंडित ।

दुर्भाग्‍यपूर्ण पक्ष यही है कि स्‍कूल के स्‍तर से लेकर शासन व्‍यवस्‍था राजनीति के सभी स्‍तरों पर जाति की ये जड़ें और तेजी से फैलती जा रही हैं । अच्‍छी श्क्षिा इन जड़ों, जालों को साफ कर सकती थी । लेकिन यहां भी जाति की परिभाषा पहले सिखाई जा रही है, संविधान की उसके बाद ।

दिनांक : 13/11/2013

4 thoughts on “जाति की जमीन (Jansatta)”

  1. Aaj ka abhishap jati ke bare me likha lekh bahut achcha laga. Lekin iske nistaran ke bare me nahi likha. fir bhi meri samajh ke anusar jati pratha pahale bhi raja maharao ki chalayi gayi vyvastha hai aur khatma karne ka dayitwa bhi aaj ke raja maharaja (uchch adhikari va sansad ) ka hi hai, pryasha vahi se hona hai. jisaka prarambha riservetion ke samapan se ho sakata hai. Lekin bat ye hai ki Ghanti kaun bandhe.

  2. हमारे जातिगत अंतर्विरोध और स्तरीय गिरावट के साथ अवसरवादिता ने समाज के तानेबाने को बहुत कमजोर किया है । इस दृष्टि से बहुत ही विचारोत्तेजक लेख है जिसमें नए को नहीं अपनाने , परंतु नई अवसरवादी स्थिति के प्रयासोंको रेखांकित किया गया है ।

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