हिन्दी में साहित्येतर लेखन और प्रकाशन (रविवार्ता)

पुस्‍तक मेले में शामिल नयी-पुरानी हिन्‍दी की किताबों पर नजर डाली जाये तो मोटा-मोटी साठ-सत्‍तर प्रतिशत कहानी, कविता की हैं । बीस प्रतिशत धर्म, अध्‍यात्‍म की, आठ-नौ प्रतिशत राष्‍ट्रवादी किस्‍म की जीवनियां,चरित्र गाथाएं व मुश्किल से एक प्रतिशत हिन्‍दी में लिखे मौलिक चिंतन इतिहास, राजनीति शास्‍त्र की होंगी । हिन्‍दी में अर्थशास्‍त्र, समाज शास्‍त्र, मनोविज्ञान की और भी कम । इंजीनियरिंग, चिकित्‍सा जैसे वैज्ञानिक तकनीकी विषयों पर सरकारी हिन्‍दी में लिखी कुछ नकली अबूझ सी किताबों पर कुछ सरकारी पुरस्‍कार तो मिलते हैं, बाजार में ये भी  नहीं दिखती । आखिर साहित्‍येतर लेखन इतना कम क्‍यों ? इसके मूल कारणों में है शिक्षा का अपनी भाषा में न दि‍या जाना ।

देश की हर समस्या की तरह हिन्दी में कहानी, कविता के अलावा मौलिक पुस्तकें उपलब्ध न होने का रोना पिछले दो-तीन दशक में और तेज हुआ है । बात सही भी है । इस पर विचार करते हुए एक नजरिया तो यह उभरता है कि दर्द से कराहता हुआ आदमी जैसे अंत में प्राण त्याग कर ही शांत होता है कहीं वैसा ही हश्र हिन्दी के साहित्येतर लेखन का न हो जाए । आखिर हर कराहने की भी एक हद होती है । क्या हिन्दी के बुद्धिजीवियों ने यह पराजय स्वीकार कर ली है कि सिर्फ अंग्रेजी में ही अच्छा लेखन उपलब्ध है ?कम से कम दिल्ली के बु‎द्धिजीवी तो आए दिन यही कहते रहते हैं कि जो अंग्रेजी अखबारों, पत्रिकाओं का स्तर है वह हिन्दी का नहीं । यदि इस बात को स्वीकार कर भी लिया जाए तो क्या हिन्दी के बुद्धिजीवियों को यह स्वीकार होगा कि जिस अंग्रेजी के जानने वाले इस देश में अभी  भी पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं, तो क्या सारी अक्ल इन्हीं के पास है ? इस पैमाने पर यह बात किसी  तर्क से स्वीकर नहीं की जा सकती कि प्रतिभा सिर्फ अंग्रेजी जानने वालों के पास ही होती है । इस तर्क से तो हम न केवल भारतीय भाषाओं की 95 प्रतिशत जनता को बेवकूफ मानेंगे बल्कि अंग्रेजी न जानने वाले यूरोप, चीन, रुस समेत बाकी दुनिया को भी ।

मूल बिन्दू पर आते हैं । विज्ञान सहित सारे सामाजिक विषयों में हिन्दी में मौलिक लेखन के न आने की जड़ में पूरी शिक्षा व्यवस्था है । जब भारत जैसे तीसरी दुनिया के गरीब मुल्क में शिक्षा का पर्याय ही अंग्रेजी माना जाता हो वहां हिन्दी समेत भारतीय भाषाओं में लेखन धीरे-धीरे बंद पड़ेगा ही । दो-तीन उदाहरणों से बात स्‍पष्‍ट करना चाहूंगा । तमिलनाडू का शहर उटी । सुबह के नौ बजे थे । अलग-अलग पोशाकों में लड़के-लड़कियां अपने-अपने स्कूलों की तरफ बढ़ रहे हैं । मैंने पूछा कौन सी कलास में पढ़ते हो और विषय क्या हैं ? आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ‎विज्ञान और इतिहास, अर्थशास्त्र विषयों के साथ ग्यारहवीं, बारहवी कर रहे ये सभी बच्चे तमिल माध्यम में पढ़ रहे थे । न केवल तमिल माध्यम बल्कि बारहवीं की इन कक्षाओं में तमिल भाषा भी एक विषय था । निश्चित रुप से इन बच्चों कोअंग्रेजी बोलने में दिक्कत आ रही थी इसलिए मैंने तमिल दुभाषिए का भी सहयोग लिया । लेकिन बच्चों से बातचीत में उनके ज्ञान का आत्मविश्वास उनके चेहरे से साफ टपक रहा था यानि कि ग्यारहवीं, बारहवीं में फिजिक्स, कैमिस्ट्री, ज्यूलॉजी, बॉटनी भी ये बच्चे तमिल माध्यम में पढ़ रहे हैं । और साथ ही एक विषय के रूप में तमिल भाषा साहित्य भी ।

मेरा स्‍वाभाविक प्रश्‍न था राष्ट्रीय स्तर की  आई.आई.टी. प्रवेश परीक्षा या मेडिकल परीक्षा बिना अंग्रेजी के कैसे देंगे ? इसका उत्तर तमिलनाडू सरकार ने इन बच्चों के पक्ष में किया है । तमिलनाडू शायद उन चंद राज्यों में से एक है जहां इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज में दाखिला बारहवीं कक्षा के नंबरों के आधार पर होता है । जिन्हें राज्य से बाहर जाना है वो अंग्रेजी पर जोर दें । और खोजबीन करने पर पता लगा कि मद्रास शहर में अन्ना यूनिवर्सिटी के मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई तमिल माध्यम से ही होती हैं । यानि कि बच्चों की प्रतिभा उनकी अपनी भाषा में आगे बढ़ने और कैरियर चुनने का पूरा मौका । जब तमिल माध्यम में शिक्षा बारहवीं तक इतने व्यापक स्तर पर दी जाएगी जाहिर है तमिल में सभी विषयों की पुस्तकें भी उपलब्ध होंगी । क्या यह शिक्षा जनता और उनकी अपनी भाषा, साहित्‍य सभी के पक्ष में नहीं है ?

क्या तमिल माध्यम में पढ़ने-पढ़ाने से तमिलनाडू, उत्तर-प्रदेश, बिहार या दिल्ली से किसी मायनों में कमतर   है ? क्या तमिलवासियों की अंग्रेजी उत्तर भारत के राज्यों से कमजोर है ? क्या तमिलनाडू में शिक्षा का स्तर उत्तर भारत से पिछड़ा है ? सभी का उत्तर ‘ना’ होगा । इस बात का प्रमाण यह भी है कि तमिलनाडू सहित दक्षिण के इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज उत्तर भारत के बच्चों से भरे पड़े हैं ।

क्या दिल्ली के किसी  स्कूल में बारहवीं में भौतिक, रसायन या जीव विज्ञान के बच्चों के पास हिन्दी विषय  कहीं देखने को मिलेगा ?दिल्ली के तथाकथित चमकीले स्कूलों में तो शायद इतिहास, भूगोल के साथ भी नहीं । मुझे शक है कि दिल्ली के महंगे स्कूलों में  ग्यारहवीं, बारहवीं में हिन्दी विषय औपचारिकता से आगे पढ़ाया भी जाता है ?अपनी भाषा हिन्दी बची भी हुई है तो सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीबों की खातिर । यहां फिर अफ्रीकी लेखक और चिंतक न्यूगी का कथन याद आता है कि ‘दुनिया भर में भाषा बोली बची हुई हैं तो गरीब जनता के कारण । इन गरीबों को भाषा, संस्कृति का रक्षक कहा जा सकता है ।’

दूसरा उदाहरण । कथाकार संजीव की नातिन पूना में रहती है और नवीं कक्षा की छात्रा है । एक दिन रात को नौ बजे उसका फोन आया कि हमारी टीचर ने कहा है कि आपको चेतन भगत का उपन्‍यास पढ़कर आना है । मुझसे उसकी अपेक्षा यह थी कि चेतन भगत के कई उपन्‍यासों में से कौन सा पढ़ना चाहिए ? ऐसे मौकों पर बड़ी अजीब स्थिति बन जाती है कि क्‍या सलाह दी जाए । अगर सलाह यह दी जाए कि चेतन भगत का कोई भी उपन्‍यास पढ़ने लायक नहीं है तो क्‍या उसकी शिक्ष‍िका इस बात को स्‍वीकार करेगी और हो सकता है ऐसा कहने पर शिक्षक नाराज भी हो जाए । दूसरी चुनौती यह कि मैं कैसे यह पता लगाऊं कि चेतन भगत के कौन-कौन से उपन्‍यास हैं और फिर और किसी से सलाह लेकर इस नवीं कलास की बच्‍ची को सलाह दूं । यह भी संभव नहीं क्‍योंकि मेरे आसपास जानने वाले भी चेतन भगत के प्रशंसक नहीं हैं । बच्‍ची से बात करने पर पता लगा कि इस प्रश्‍न से कथाकार संजीव भी नाराज हो गए जो बहुत स्‍वाभाविक है भी कि आखिर इन स्‍कूलों में अंग्रेजी इस हद तक क्‍यों थोपी जा रही है । ऐसे कई अनुभवों से मैं गुजरा हूं जब स्‍कूल, कॉलेज के विद्यार्थियों के सामने यह प्रश्‍न रखा गया कि पिछले पांच वर्षों में क्‍या किसी हिन्‍दी लेखक की कोई नयी किताब पढ़ी तो सभाग्रह में चुप्‍पी छा गई लेकिन अंग्रेजी में पढ़ी किताबों के पूछने पर पूरे सभाग्रह में हाथ खड़े हो गये । हमारे स्‍कूल, विश्‍वविद्यालय, कॉलेज, शिक्षण संस्‍थान ही वे कुम्‍हार हैं जहां ये बच्‍चे एक विदेशी भाषा में गढ़े जा रहे हैं । इसके उलटा यह और हो रहा है कि जहां निजी स्‍कूल डंके की चोट पर बच्‍चों को यह कह रहे हैं कि यदि हिन्दी में बात की तो जुर्माना होगा या नंबर काट लिऐ जाएंगे । क्‍या भाषा विशेष के खिलाफ ऐसी टिप्‍पणियां वैसा ही अपराध नहीं माना चाहिए जैसा अनुसूचित जाति, जनजाति एक्‍ट की धाराओं में है । शिक्षा के नाम पर विदेशी भाषा भी तो इस देश की जनता को एक-दूसरे से अलग कर रही हैं ।

दिल्‍ली मैट्रो का अनुभव भी यहां बांटना उपयुक्‍त रहेगा । सुबह-सुबह कई विद्यार्थी खड़े-खड़े या बैठे-बैठे पढ़ते हुए दिखते हैं । हाथ के लिखे हुए नोट्स हों या किताबें मैंने अभी तक किसी के हाथ में हिन्‍दी के अक्षर नहीं देखें । यानि कि सरकारी स्‍कूलों को छोड़कर किसी भी स्‍कूल, संस्‍थान में हिन्‍दी माध्‍यम होता ही नहीं । इक्‍का-दुक्‍का हिन्‍दी अगर दिखती है तो उन परेशान चेहरों के हाथों में जो या तो हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं या किसी और बाबा की किताबें ।

गॉंव की लायब्रेरी का एक अनुभव भी प्रासंगिक है :- 2007 में गांव में पहली लायब्रेरी खोली थी और उस समय घर में मौजूद हंस, कथादेश, समयांतर या पुरानी जो भी पत्रिकाएं थीं सारी भिजवा दीं । दूसरी किताबें भी- पाठ्यक्रम की भी और साहित्‍य की भी । कुछ दिनों बाद पाया कि साहित्‍य की इन पत्रिकाओं में उनकी कोई रुचि नहीं है । स्‍पष्‍टत: दो कारण पहला कि वहां के स्‍कूलों में शिक्षा का ऐसा स्‍तर बचा ही नहीं है न पढ़ने के ऐसे संस्‍कार डाले गये जो इन पत्रिकाओं का आनंद ले सके । लेकिन इससे भी बड़ा कारण यह कि उन्‍हें नौकरी में इस कहानी, कविता से क्‍या मदद मिलेगी ? क्‍या आप अपने बच्‍चे को पाठ्यक्रम की कीमत पर एक सीमा के बाद इस साहित्‍य को पढ़ने के लिए प्रोत्‍साहित करेंगे ? शायद नहीं । इसीलिए यह और भी जरूरी है कि विद्यार्थियों के लिए साहित्‍य से इतर मौलिक किताबें हिन्‍दी में ज्यादा से ज्‍यादा लिखी जायें ।

काश ! दिल्ली समेत हिन्दी भाषी राज्य बारहवीं तक नहीं तो दसवीं तक ही अपनी भाषा के रुप में हिन्दी को अनिवार्य बना पाते । यदि ऐसा  हो पाए तो भावी पी‎ढ़ियों के शिक्षा संस्कारों में हिन्दी कुछ तो प्रवेश करेगी और यही संस्कार अपनी भाषा में कुछ साहित्येतर मौलिक लेखन के लिए जमीन तैयार करेंगे । हिन्‍दी भाषी जिन राज्‍यों में हिन्‍दी माध्‍यम से पढ़ाई बची है वहां अच्‍छी मौलिक किताबों के अभाव में सस्‍ती कुजियॉं आ गयी हैं जिनमें कई बार तथ्‍य भी गलत होते हैं और भाषा भी । इस मोर्चे पर हमें बेहतर तैयारी के साथ लड़ने की जरूरत है ।

यानि कि शिक्षा व्यवस्था में हर स्कूल बच्चों को सिर्फ चेतन भगत या दूसरे सतही अंग्रेजी लेखनको बढ़ावा दे रहा है और तो और नब्बे प्रतिशत निजी स्कूलों में हिन्दी के प्रति हिकारत का भाव है और कहीं-कहीं तो सरेआम दंड की व्यवस्था भी है । क्या हिन्दी के लेखक, बुद्धिजीवि‍यों ने अपनी भाषा के इस अपमान के खिलाफ कभी आवाज उठाई ? क्या वह खुद इस दुचित्तेपन का शिकार नहीं है कि वह तो हिन्दी के पक्ष में बोलता रहे लेकिन उनके निजी आचरण में अंग्रेजी हावी रहे । यदि हम सब ऐसे ही टुकुर-टुकुर देखते रहे तो अगले दस-बीस वर्षों में न हिन्दी लेखक बचेगा, न प्रकाशक । इससेबड़ी खतरे की घंटी क्या होगी कि पचास करोड़ से ज्यादा बोलने वाले हिन्दी प्रदेशों में कहानी, उपन्यास का संस्करण तीन सौ, पांच सौ तक का निकलता है । कौन प्रकाशक हिन्दी की किताबें छाप कर धन्नासेठ हो जाएगा और कौन लेखक हिन्दी में लिखकर जिंदा रह सकता है ? इसलिए साहित्येतर लेखन की दशा और दिशा कोबदलना है तो शिक्षा की बुनियाद बदलनी होगी और इस बुनियाद का सबसे बड़ा पक्ष अपनी भाषा है । क्या जर्मनी, चीनी, रूसी, पुर्तगाली अपनी भाषा में ही शिक्षा नहीं दे रहे ? तो फिर इस देश में ही अंग्रेजी का दखल इस स्तर तक क्यों ? एक विकल्प भाषा के रुप में अंग्रेजी सीखने में कोई बुराई नहीं लेकिन इसकी अति से एक सांस्कृतिक, भाषायी, शैक्षिक संकट पैदा हो रहा है ।

हाल ही में अंग्रेजी को आगे बढ़ाने की दो और भी विचित्र योजनाएं सामने आयी  हैं । दिल्ली के स्कूलों में बीस नंबर अंग्रेजी बोलने के लिए रखे गये हैं और युद्ध स्तर पर शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है । इस प्रशिक्षण में इंग्लैंड की एक मशहूर यूनिवर्सिटी के साथ समझौता किया गया है । यानि कि हमारे बच्चे हिन्दी बोलना,लिखना सीखें या न सीखें उन्हें अंग्रेजी जरुर अमेरिकन और ब्रिटिश स्टाइल में आनी चाहिए ।

नौकरी का पक्ष भी यहां सबसे ज्‍यादा महत्वपूर्ण है । जब गेटकीपर तक की नौकरी के ‎‎लिए अंग्रेजी जरुरी हो तो उन्हें अच्छी हिन्दी सीखने की जरुरत ही क्या है । हिन्दी के करोड़ों में छपने वाले अखबारों से हिन्दी के आगे बढ़ने का भ्रम मत पालिए और न गीता प्रेस गोरखपुर या भगवान रजनीश की किताबों के बिकने से । यह सब सांस्कृतिक शून्यता का ही विस्तार है । हिन्दी के आगे बढ़ने का पैमाना है कि कितने शोध पत्र हिन्दी में ‎लिखे और प्रस्तुत किए जा रहे हैं ? कितनी मौलिक किताबें शिक्षा शास्त्र से लेकर इतिहास, समाज शास्त्र या दूसरे विषयों में आ रही हैं ? आजादी के बाद के दो-तीन दशकों तक तो हिन्दी का मौलिक लेखन आगे बढ़ता भी रहा । नब्बे के बाद तो यह लगातार गिरावट की तरफ है । यहां डॉ. दौलत सिंह कोठारी को याद करने की जरुरत है जिनकी वजह से भारत की प्रशासनिक सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं में उत्तर देने की सन् अस्सी के दशक में छूट मिली है । मैकमिलन प्रकाशक से लेकर राजस्थान अकादमी, मध्यप्रदेश अकादमी सहित सैंकड़ों संस्थानों में हिन्दी में मौलिक पुस्तकें प्रकाशित कीं ।  लेकिन धीरे-धीरे भाषा का गरम लोहा ठंडा होता जा रहा है । जिस दिल्ली विश्वविद्यालय में सत्तर के दशक में लगभग बीस प्रतिशत विद्यार्थी इतिहास, राजनीति शास्त्र, समाज शास्त्र हिन्दी माध्यम से पढ़ते थे आज वहां सन्नाटा है । कहॉं है डूटा और हर दल के दर्जनों विद्यार्थी संगठन ? इस सबकी राजनीति में भी हिन्‍दी भाषी ही हावी हैं तो इनकी चुप्‍पी का क्‍या अर्थ माना जाये ?ऐसे में शाहिद अमीन से लेकर ज्ञानेद्र पांडेय या दूसरे विद्वान हिन्दी में मौलिक लेखन क्यों करें और किसके लिए ? क्या तीन सौ से पांच सौ पुस्तकों के संस्करण के लिए ?

पिछले दो-तीन सालों में कोठारी समिति की अनुशंसाओं को उलटते हुए आई.ए.एस. की प्रारंभिक परीक्षा में अंग्रेजी की गैर-जरुरी वापसी हो चुकी है । सरकार ने कोशिश तो मुख्य परीक्षाओं से भी भारतीय भाषाओं को बेदखल करने की की थी लेकिन महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों के हस्तक्षेप से सरकार ऐसा नहीं कर पाई । हिन्दी क्षेत्र के राजनेता यहां भी पिछलग्गू ही रहे । दरअसल उनके लिए जितनी दुधारु गाय जाति और धर्म हैं उतनी भाषा नहीं । प्रारंभिक परीक्षा में अंग्रेजी के हावी होने के दुष्परिणाम आने शुरु हो गये हैं । पिछले दो-तीन सालों में पटना, इलाहाबाद जैसे केन्द्रों से चयनित होने वाले छात्रों में कमी आई है । यही दौर रहा तो ये भी मजबूरी में अंग्रेजी सीखने की कोशिश में लग जाएंगे । कर्मचारी चयन आयोग द्वारा आयोजित सहायक, आयकर निरीक्षक, पुलिस इंसपैक्‍टर के पदों के लिये परीक्षाओं में पचास प्रतिशत अंग्रेजी है । भारतीय भाषाएं नहीं । बैंकों आदि की नौकरियों में पूरी अंग्रेजी । जब तक शिक्षा अपनी भाषा में उपलब्ध कराने के बुनियादी परिवर्तन नहीं किए जाते तब तक ‎हिन्दी में साहित्येतर लेखन सामने आने की कोई संभावना नहीं है । इस संभावना पर ही हिन्दी लेखक और प्रकाशक का भविष्य टिका है और यह तस्वीर राजनीति या सत्ता के दखल के बिना असंभव है ।

लेकिन क्या अपने को चिंतक, बुद्धिजीवी कहलाने वाला हिन्दी का लेखक अपनी भाषाओं को बचाने के लिए सड़कों पर उतरने के लिए तैयार है ? 2014 के चुनाव सामने हैं क्‍या कोई दल नयी आप पार्टी सहित शिक्षा और भाषा के मुद्दे को अपने घोषणा-पत्र में शामिल  करेगा ?

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