हरियाणा की हिंसा

एक साथ कई विरोधाभासों का अड्डा बन रहा है हरियाणा राज्‍य । एक तरफ देश में प्रतिव्‍यक्ति सबसे अधिक आय वाले राज्‍य में से एक तो वहीं सबसे शर्मनाक बात देश के स्‍त्री-पुरुष अनुपात में सबसे कम स्त्रियों की आबादी का राज्‍य । एक तरफ समृद्धि का टापू तो वहीं आए दिन जातिवाद की लड़ाई और दलितों पर अत्‍याचार की खबरें । बीच-बीच में खॉंपों के फरमान तो आपने सुने ही होंगे । कभी प्रेमी विवाहित जोड़े की हत्‍या तो कभी जमीन जायदाद के हिंसक झगड़े । और तो और साधू, संतों के आश्रम भी सबसे ज्‍यादा यहीं फल फूल रहे हैं । पिछले दो वर्षों में कुछ अच्‍छी खबरें भी हरियाणा से मिलती रही हैं । कॉमन वेल्‍थ खेल, एशियन खेल और ओलम्पिक में हरियाणा के पहलवानों और मुक्‍केबाजों ने पूरे देश का नाम रोशन किया है । बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल भी हरियाणा की हैं और एथलीट कृष्‍णा पूनिया भी ।

लेकिन पिछले एक दशक में धर्म और आस्‍थाओं के नाम पर चलने वाले आश्रमों और उनके लड़ाई-झगड़ों, के लिए भी हरियाणा मशहूर रहा है । राम, रहीम संप्रदाय का आश्रम भी हरियाणा में है जिसके झगड़े ने कई जिलों की शांति दो-तीन वर्ष पहले भंग कर दी थी । ताजा विवाद भी हरियाणा के रोहतक जिले का है जहां 13 मई को हिंसक झड़पों में तीन लोगों की जान चली गई । यहां भी झगड़ा आश्रम को लेकर ही है । यहां का आर्य समाज संप्रदाय नहीं चाहता कि तथाकथित संत राम पाल का सतलोक आश्रम वहां रहे । यह आश्रम भी वैसे ही विवादों में है जैसा देश के दूसरे आश्रम । जायदाद, देह शोषण और ऐसी शिक्षा का प्रचार-प्रसार जो समाज में कटुता बढ़ाती है । यह तो तारीफ की जानी चाहिए की रोहतक के डिप्‍टी कमीश्‍नर विकास गुप्‍ता और दूसरे पुलिस अधिकारियों की जो तीन दिन की कोशिश के बाद आश्रम से करीब तीन हजार अनुयायियों को खाली करा पाई । वरना ऐसी हिंसा होती कि जो हम सबको कलंकित कर सकती थी ।

आखिर ये अनुयायी हैं कौन ? तथाकथित संत राम पाल के पास भी ये हजारों में हैं और राम रहीम के आश्रम में भी । और ऐसे एक दो नहीं दर्जनों आश्रम हरियाणा में बताते हैं । उनका आश्रम में रहने का इंतजाम होता है, वहीं भजन कीर्तन या दूसरी शिक्षा, कुशिक्षा । आश्‍चर्य की बात है कि जो हरियाणा आर्य समाज का एक प्रमुख केन्‍द्र रहा है और आज भी है और जिसे कुछ हद तक हिन्‍दु धर्म की तार्किकता से भी जोड़ा जाता है वहां एक कठमुल्‍लापन, सम्‍प्रदायतावाद के ऐसे आश्रम या बेले कैसे फल फूल रही हैं ?

इन घटनाओं के आर-पार इस समाज की गहराई से जांच-पड़ताल की जरूरत है । पहला कारण जो समझ में आता है वह है असमानता, गरीब अमीर के बीच बढ़ती खाई । ऐसे में अमीर राजनीतिक पार्टियों के आसपास गोलबंद हो रहे हैं तो गरीब इन आश्रमों की तरफ । गरीबों के लिये कुछ रोटी की उम्‍मीद तो कुछ धर्म भी । बेरोजगारी तो दोनों के बीच मूल कारण है ही । रोहतक प्रशासन के एक उच्‍चाधिकारी ने बताया कि जिन दिनों फसलें कटने का समय होता है, खेती का काम चल रहा होता है उन दिनों बहुत कम लोग मिलने आते हैं । प्रतिदिन मुश्किल से तीस-चालीस जबकि बाकी दिनों में इससे दस गुना ज्‍यादा । तरह-तरह की शिकायतें लिए हुए झूठी सच्‍ची सभी तरह की । तो ऐसे बेरोजगार युवक युवतियों को ऐसे आश्रमों में आसानी से पनाह मिली है और दूसरी सुख-सुविधाएं भी यहां हैं । इसी वजह से इनके अनुयायियों की संख्‍या बेरोजगारी के अनुपात में बढ़ रही है । पिछले दो दशक से तो राजनीतिक पार्टियां तक भी इन आश्रमों में मत्‍था टेकती हैं वोट की खातिर । कुछ लोग तो यह आरोप तक लगाते हैं कि इन आश्रमों में सभी तरह के कुकर्म होते हैं विशेषकर स्‍त्री देह के शोषण के । बात सच भी लगती है कि जहां लड़कियों की संख्‍या इतनी तेजी से गिर रही हो उस समाज में ऐसी विकृतियां आएंगी ही ।

घटती स्त्रियों की संख्‍या ने हरियाणा और पश्चिम उत्‍तर प्रदेश के समाज को और कुरूप बना दिया है । हरियाणा का शायद ही कोई गांव होगा जहां आए दिन बंगाल, उड़ीसा, असम, झारखंड से लेकर नेपाल तक की लड़कियां या महिलाएं खरीदकर न लाई जाती हों । जो समाज लड़के लड़कियों को मोहब्‍बत करते नहीं देख सकता और जिसकी खांप पंचायतें धर्म की दुहाई देते हुए उन्‍हें सरेआम कत्‍ल करने का फरमान सुना देती हों वे इन खरीदी हुई औरतें, जिन्‍हें वे मोल-की कहते हैं कैसे स्‍वीकार कर लेता है ? यह समाज का कितना बड़ा ढ़ोंग और विरोधाभास है । अपनों को कत्‍ल कर देना या जन्‍म से पहले ही मार देना और फिर दूसरे राज्‍य की स्त्रियों की खरीद-फरोख्‍त करना । देश का शायद ही कोई राज्‍य होगा जहां के गांव में अलग-अलग राज्‍य की इतनी स्त्रियां पाई जाती हों । यह 21वीं सदी में भारतीय स्‍त्री की त्रासदी का भी बखान है जिसे एक राज्‍य में तो पैदा भी नहीं होने दिया जाता और दूसरे राज्‍यों में वे गाय भैंस की कीमत पर बेची खरीदी जाती हैं । और तो और दिल्‍ली में बलात्‍कार की घटना और इधर बढ़ती ऐसी घटनाओं के मद्देनजर हरियाणा की कुछ खांप पंचायतों ने लड़कियों का स्‍कूल जाना बंद करा दिया है । इस पर मानवाधिकार आयोग ने सरकार से जवाब भी मांगा है । बलात्‍कार और स्‍त्री के प्रति हिंसा देश भर के मुकाबले सबसे ज्‍यादा दिल्‍ली, हरियाणा या पश्चिम उत्‍तर प्रदेश में हैं और यही हैं सबसे खराब स्‍त्री-पुरुष अनुपात । गौर कीजिये यह वह राज्‍य हैं जहां राजधानी से घंटे दो घंटे में पहुंचा जा सकता है । जहां आई.टी. का प्रमुख केन्‍द्र गुड़गांव है और इधर कई नये विश्‍वविद्यालय भी खुले हैं ।

पिछलें दिनों कुछ और भी सामाजिक, आर्थिक कारणों से ऐसा हो रहा है । गुड़गांव जैसे केन्‍द्रों की समृद्धि से आए पैसों से बाजार, मॉल और मौज मस्‍ती के नये अड्डे खुले हैं । दिल्‍ली के आसपास पानी की कमी हो सकती है लेकिन शराब की नहीं । शराब के नशे में मस्‍त नौजवानों की बड़ी-बड़ी गाडि़यां आए दिन सड़कों पर टकराती रहती हैं । दिल्‍ली के करीब होने के कारण न केवल गुड़गांव, बल्कि नोएडा, गाजियाबाद, बुलंदशहर तक जमीन के दाम बढ़े हैं । किसान परिवारों के नौजवानों को जो पैसा मिला है वह भी कई विकृतियां पैदा कर रहा है । अचानक ऐसे आया हुआ पैसा भी इन आश्रमों को बढ़ाने के लिए कम जिम्‍मेदार नहीं है । कई अमीर परलोक या मोक्ष की आशा में इन आश्रमों का खर्चा उठा रहे हैं तो बेरोजगार और गरीब वहां इसलिए हैं कि खाली बैठे और क्‍या करें ।

हरियाणा का महेन्‍द्रगढ़ जिला अकेला नहीं है जहां लड़कियां स्‍कूल, कॉलिज जाने में असुरक्षित समझती हैं । सटे राज्‍य उत्‍तर प्रदेश के पश्चिम जिलों में भी यही तस्‍वीर है । आप यहां के आंकड़े देख लीजिये । कॉलिजों में तो नियमित छात्राओं की संख्‍या नगन्‍य है । जो हैं भी वे उसी शहर की हैं जहां कॉलिज या संस्‍थान स्थित हैं । आसपास के गांवों की लड़कियां रोजाना उन बसों, ट्रेनों में आने-जाने की हिम्‍मत ही नहीं कर पातीं । क्‍या अंतर है इन स्थितियों में और पड़ौसी पाकिस्‍तान या पाकिस्‍तान के तालिबानियों में । 21वीं सदीं में महान भारत की चर्चाएं 20वीं सदी के अंतिम दशक में ही परवान चढ़ने लगी थीं लेकिन दिल्‍ली के तो आस-पास अंधेरा और बढ़ रहा है जहां नागरिक की सुरक्षा का भी भरोसा नहीं रहा ।  केन्‍द्र की स्थिर सरकार के बाजूद भी पूरे तंत्र की विफलता ही इसे कहा जाएगा ।

रोहतक के सतलोक आश्रम या राम रहीम आश्रम की घटनाएं हमारी सत्‍ता और पूरे समाज की ऑंखे खोलने के लिए पर्याप्‍त हैं कि शिक्षा, स्‍त्री-पुरुष अनुपात और रोजगार के मोर्चे पर तुरंत प्रभावी कदम नहीं उठाये गये तो सारी समृद्धि के बावजूद भी भविष्‍य में ऐसी हिंसा बढ़ती ही जाएंगी ।

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