जी.के. की किताब – जनसत्ता – 6/7/2013

शहर जयपुर । नवंबर का महीना । गनगुनाती धूप के चलते पुस्तक मेले में ठीक-ठाक भीड़ थी । एकलव्य का स्टाल नंबर 47 । एक अधेड़ पति-पत्नी बच्चों के लि‍ए किताबें चुन रहे हैं । पत्नी उठाती तो पति उसे वापस रख देता और पति के चुनाव को पत्नी नहीं मानती । कभी एक उठाते हैं और उसे छोड़कर फिर दूसरी । किंकर्त्तकव्यविमुढ़ । इधर-उधर देखते हैं मानो पूछना चाह रहे हों किसे लें ? आखिर मालिक से मुखातिब होते हैं । जी.के. की किताब नहीं रखते आप ? जी.के. यानि जनरल नॉलिज । प्रकाशक अपने अंदाज में समझाता है ये सब जी.के. की ही तो हैं । इतिहास क्या है, विज्ञान क्या है, खेल-खेल में विज्ञान, बाल वैज्ञानिक, सामाजिक विज्ञान, मिडिल स्कूल में रसायन, बड़ों का बचपन । लेकिन पति-पत्नी की आंखों से लग रहा है कि वे संतुष्ट नहीं हैं । नहीं ! उन पर तो लिखा होता है ‘जी.के.’ । उन्हों ने अपनी मांग दोहराई । उस किताब में दुनिया भर की चीजें होती हैं । देश के राष्ट्र पति का नाम, सबसे बड़ी नदी, सबसे बड़ा महासागर, मनुष्य के शरीर में कितनी हड्डियां । प्रकाशक अपनी जगह से उठा और मनुष्य के शरीर से संबंधित किताब उठा लाया । इसमें दे रखी है मानव शरीर की जानकारियां । उन्होंने उलटा पुलटा और फिर वही प्रश्न । लेकिन और जानकारी तो इसमें नहीं है ?

 

मुझे बीच में पूछना पड़ा ‘आपका बच्चा कितना बड़ा है ?’ उन्होंने बताया पांच साल का । ‘यानि पांच साल के बच्चेा के लिए आप जी.के. की ऐसी किताब तलाश रहे हैं जिसे इनसाइक्लोपीडिया कहते हैं । बच्चे को साथ लाते । उसे ही चुनने देते ।’ हम सबने उन्हें समझाने की कोशिश की लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए ।

 

ज्यादातर हमारी शिक्षा या पूरी व्यवस्था ने ज्यादातर नागरिकों को ऐसे ही मां-बाप में बदल दिया है जो शिक्षा का अर्थ कुछ रटे हुए तथ्यों को मानते हैं । माने भी क्यों न । क्लास में शाबाशी भी तो इसी रटंत को मिलती है । क्या संघ लोक सेवा आयोग से सफल अभ्यनर्थी ऐसे ही रटे हुए प्रश्नों का जवाब नहीं देते और इससे कई गुना रटंत के उदाहरण हैं आई.आई.टी. की प्रवेश परीक्षा, मेडिकल की परीक्षा या दूसरी परीक्षाएं । मुझे याद आता है सत्तर के दशक में कुछ अमीर दोस्तों के घर में इनसाइक्लोपीडिया के भारी भरकम आठ-दस ग्रंथ होते थे । ड्राइंग रूम या किसी ऐसे कोने में सजे हुए और मुनादी करते हुए ‘देखिए ज्ञान और ज्ञानी यहां हैं ।’ धीरे-धीरे कंप्यूटर आया और पिछले दिनों गांव के पुस्तकालय के संदर्भ में दोस्तों से जो किताबें आनी शुरू हुईं उनमें ऐसी इनसाक्लोंपीडिया बहुतायत में थी । मां-बाप की इन्हीं आकांक्षाओं को पहचानते हुए निजी स्कूल बच्चों के बस्ते में जी.के. किस्म की ऐसी किताबें खूब भरवाते हैं जिससे स्कूल की तिजोरियां भी भरती हैं और मां-बाप का अहम संतुष्टी पाता है । ‘स्कूल वाकई बहुत अच्छा है ।’ यानि कि पूरे पैसे वसूल हो रहे हैं । एक सहकर्मी का बेटा दिल्ली के प्रसिद्ध मॉडर्न स्कूल में था । एक दिन निराशा में उनके मुंह से निकला कि हमें तो नहीं पसंद आया स्कूल । न तो अंग्रेजी पर जोर देते और उनका कोर्स भी बहुत कम है ।

 

इन चिंताकुल मध्य वर्गीय भारतीयों को कौन समझाए कि दुनिया भर की जी.के. की किताब पढ़ने के बाद भी कई बार आप कहीं नहीं पहुंचते । पीसा नाम की अंतर्राष्ट्रीय परीक्षा में हम सत्त्र देशों में सबसे पीछे होते हैं तो दुनिया शीर्ष 200 विश्वाविद्यालयों में कहीं नहीं । इन्हें समझने की जरूरत है कि रटंत के बूते आप रट्टू क्लास में तो अव्वल आ सकते हो समझदारी की परीक्षा में नहीं ।जबकि कभी-कभी ज्यादातर आवारा घोषित किए गए डार्विन जैसे व्यक्ति दुनिया की खाक छान कर विकासवाद का सिद्धांत देते हैं । शरतचंद्र चटर्जी इसी आवारापन से बेशकीमती उपन्यास चरित्रहीन, श्रीकांत गढ़ते हैं तो मै‍क्सिम गोर्की स्कूल की किताब न पढ़ कर मां की अलमारी से एक रुब्बल चुराकर अपनी मनपसंद कहानियों की किताब खरीदते हैं । चोरी पकड़ी गई, पिटाई हुई तो वे लिखते हैं कि पिटाई का गम नहीं । गम था तो किताब छीने जाने का । यही बालक मॉं, मेरा बचपन का मशहूर कथाकार लेखक मैक्सिम गोर्की बना ।

 

पिछले कई पुस्तक मेलों में मैंने किताबें बच्चों को ध्यान में रखकर खरीदी हैं । वैज्ञानिकों की जीवनियां, लोक कथाएं, बाल कथाएं, छोटे-छोटे उपन्यास आदि । अपने पढ़ने के लिए कम अपने गांव या दोस्तों के बच्चों को ध्यान में रखकर उनको देने के लिए । क्या‍ पता किताबों में उनकी रूचि जागे । पिछले दिनों से पहली बार एक नया संकट महसूस कर रहा हूं । इससे पहले कि बच्चा किताब लेने से मना करे मां-बाप सकुचाते हुए कहते हैं कि ये हिंदी की किताब नहीं पढ़ता । कोई अंग्रेजी की हो तो दे दो । कोई जी.के. की हो तो और अच्छा । कौन जिम्मेदार है इसके लिए । गलत वे भी नहीं हैं इसके लिए शिक्षा के ढॉंचे में जितना जोर अंग्रेजी पर है उतना किसी और विषय पर नहीं । एक और मित्र ने बताया कि चकमक या दूसरी पत्रिकाएं आती तो हैं लेकिन बच्चे उन्हें पढ़ते नहीं हैं । मैंने कहा कि उन पुस्तकों को किसी और बच्चे को दे दो । उनका साफ कहना था कि हिंदी की पत्रिकाओं को कोई भी नहीं लेता । उनकी बात में सच्चाई है । मैं घर पर बढ़ती जाती हिंदी पत्रिकाओं के ढेर की तरफ दिल्ली के दोस्तों को इशारे से कहता हूं कि कोई चुन लो तो उनकी उदासीनता में भी मुझे यही उत्तर दिखाई देता है ।

 

कौन जिम्मेदार है इस सबके लिए ? क्या भाषा के मसले पर भी हम एक हैं ? कुछ दलित चिंतक पिछले दिनों से एक नया राग अलाप रहे हैं कि सिर्फ अंग्रेजी से ही उन्हें मुक्ति मिलेगी । बिना यह अहसास किए कि बेचारे समाज के इन सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों को अंग्रेजी सिखाएगा कौन ? सवर्ण, अमीर इस गुमान में हिंदी नहीं पढ़ रहे कि उन्हें तो दिल्ली, मुम्बई और वहां से उड़ कर अमेरिका, इंग्लैंड जाना है । दोनों की हरकतों से लगता है कि कहीं दूर बैठी ताकतें यह सब करा रही हैं ।

 

दरअसल जब शिक्षा का पूरा उद्देश्य ही सीमित हो जाए तो समाज भी वैसी ही किताबें चुनता है । नौकरशाहों के बारे में चुटकी आपने सुनी होगी । उनके घर में तीन किताबें जरूर होती हैं एक रेलवे टाइम टेबल कि पता नहीं उसका कब ट्रांसफर हो जाए, दूसरी कोई फिल्मी पत्रिका क्यों कि यह उसकी अभिरूचियों में शामिल है और सबसे जरूरी सिविल लिस्ट जिसमें उसकी पूरी नौकरशाही के नाम और जन्मतिथि दर्ज हैं ।
क्या समझे ? इन बच्चों को मनमर्जी चांद सितारे छूने दो । जी.के. की पुस्तक पढ़ कर तो ये हम जैसे ही हो जाएंगे ।

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