ममता कालिया : शहर और सपने (समीक्षा)

ममता कालिया को हिंदी के ज्‍यादातर पाठक एक कथाकार, उपन्‍यासकार के रूप में जानते हैं, लेकिन ‘कितने शहरों में कितनी बार’ पढ़कर संस्‍मरणकार के रूप में उनका एक अलग रूप सामने आता है जिसका गद्य हिंदी में बेमिसाल ही कहा जाएगा. एक-एक शब्‍द अनुभवों की पूरी पोटली लिए. कई परते हैं ऐसी यादों की. एक लेखक के बनने में उसके परिवेश का असर, चुनौतियां, अलग-अलग शहरों का समाजशास्‍त्र. लेखक या कलाकार की हैसियत, घर-परिवार सभी कुछ. ऐसा अनुभव न किसी उपन्‍यास को पढ़ने पर मिलता न कविता से और भाषा भी इतनी मोहक, पारदर्शी हो तो सोने पे  सुहागा.

पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के वृंदावन, मथुरा में पैदा, पली-बढ़ी ममता की शुरूआत मथुरा क्षेत्र से ही होती है. नाना-नानी पाकिस्‍तान के एबटाबाद से दिल्‍ली पहुंचे और मथुरा में बस गए. बड़ा परिवार बुआ, चाची, मामा, मामी जैसाकि उन दिनों होता था. तीनों बुआओं की अपनी-अपनी कष्‍टदायक जिंदगी थी पर मिलने आतीं तो कैसी लहककर मिलतीं. वे हम सबको दुपहर में अधन्‍ने-अधन्‍ने की मलाई बरफ खिलातीं. हरे पत्‍ते पर चाकू से पतली-पतली परत काटकर. पश्चिमी उत्‍तर-प्रदेश में रहने वाला हर आदमी मलाई की बर्फ की इन स्‍मृतियों को पहचान सकता है. मथुरा की स्‍मृतियों में चार मामा, नाना-नानी के बहाने विभाजन, गांधी की हत्‍या के प्रसंग भी इतिहास में ले जाते हैं. यह जानकर अच्‍छा लगा कि गांधी बाबा की गोद में बैठने का सौभाग्‍य इस लेखिका को मिला.

पिता आकाशवाणी में थे और पढ़ने-लिखने के संस्‍कार, असर ममताजी पर आया. पढ़ाई में मेधावी. अंग्रेजी में एम.ए. करते ही दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में लेक्‍चरर की नौकरी मिल गई. उसी बीच कथाकार रवीन्‍द्र कालिया के साथ मुलाकात प्रेम प्रसंग और अंत में शादी में बदल गई. उन दिनों के कॉलेज को कैसे याद करती है ममता. ‘रवीन्‍द्र कालिया से एक ही दिन के परिचय ने मेरे अंदर इतनी ऊर्जा, ऊष्‍मा और उमंग भर दी कि मैं एड़ी से चोटी तक हरी हो गई. दिल्‍ली के खरदिमाग ऑटोचालकों के प्रति मन कृतज्ञ हो आया. अगर वे सीधे से मुझे शक्तिनगर पहुंचा आए होते तो कहां आता जीवन में प्रेम. पड़ी रहती किसी मनहूस महिला कॉलेज में, लड़कियों की कॉपियां जांचती. उम्र चौबीस से चौंतीस, चौंतीस से चवालीस होती जाती, रेगिस्‍तान रोज नजदीक आता जाता. कॉलेज में ऐसी सहकर्मियों की कमी नहीं थी जो लाल मिर्च की तरह तेज, पतली और रूखी दिखाई देतीं. वे अकेली मिकाडो में बैठी चाउमीन खातीं, ओडियन में फिल्‍म देख लेतीं  और गर्मी की छुटिटयों में अकेली मसूरी घूमने चली जातीं. मेहंदी उनके हाथों की जगह बालों में लगती जाती और अपनी लाल केश राशि से वे अलग पहचान में आतीं. कॉमेडी पढ़ाते हुए भी उनकी मुखमुद्रा ट्रेजिक बनी रहती. इनके विपरीत विवाहित प्राध्‍यापिकाएं ज्‍यादा सुगम्‍य और संतुलित थीं. किंचित मृदुल, किंचित पृथुल, ये एक आंतरिक लय से अपना काम संपादित करतीं. इन्‍हें क्‍लास में जाने की कोई जल्‍दी न होती. अलबत्‍ता घर पहुंचने की बेकली जरूर दिखाई देती. (पृष्‍ठ 106)

पापा थे पढ़ाकू, अध्‍ययनशील लेकिन अंग्रेजी के प्रति झुके हुए. उन्‍हें हिंदी लेखक रवीन्‍द्र कालिया के प्रति शायद  इसीलिए शुरूआती दुराग्रह रहा हो. ये हिंदी वाले बड़े लापरवाह होते हैं. तुम्‍हें छह बजे तक वापस आना ही आना है. ममता भड़क गई. फिर जिस शब्‍द से मेरे अंदर  उनके लिए खिलाफत आंदोलन  भड़क उठता वह था हिंदीवाले. ‘जाहिर है पापा अपने आपको अंग्रेजीवाला समझकर फतवे जारी कर रहे थे. जबकि मैं इतने ही दिनों में सिर से पैर तक हिंदीवाली हो गई थी. इंग्लिश मेरे लिए सिर्फ नौकरी की भाषा रह गई. मैं ढूंढ-ढूंढकर  हिंदी की पुस्‍तकें पढ़ती. रवि ने मुझे सर्वेश्‍वर की एक कविता सुनाई- इधर आओ चांदनी का एक स्‍कार्फ तुम्‍हारे चेहरे पर बांध दूं. बावली होकर मैं सर्वेश्‍वर का समस्‍त साहित्‍य पढ़ गई. रवि को मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन की कई पंक्तियां कंठस्‍थ थीं जिन्‍हें वे अक्‍सर दुहराया करते – लगता है तुमने अपनी आंखों से इन कोरे पृष्‍ठों पर बहुत कुछ लिखा है. ये पृष्‍ठ अब कोरे कहां हैं मल्लिका. इन पर एक महाकाव्‍य की रचना हो चुकी है. अनंत सर्गों के एक महाकाव्‍य की. मैं राकेश साहित्‍य का पारायण कर डालती. (पृष्‍ठ 110)’ हमारे संस्‍कार कैसे एक-दूसरे की दोस्‍ती की छांव में रूप लेते हैं इसका सर्वश्रेष्‍ठ उदाहरण.

दो सौ पृष्‍ठों की किताबों के हजारों चित्र हैं जिन्‍हें आप भूले नहीं भूल सकते और ऐसी भाषा स्‍मृतियों की चाशनी में पगी पुसी कि पूरी फिल्‍म ही सजीव हो उठे.

मथुरा से चलकर दिल्‍ली, पूना, इंदौर और फिर दिल्‍ली. ‘उतनी खराब नहीं दिल्‍ली मुंबई’ अध्‍याय में पत्रकारिता, लेखक बनने के शुरूआती दिनों के संस्‍मरण हैं. फिर अचानक मुंबई छोड़ना पड़ा और पहुंच गई इलाहाबाद. लेखन की नींव. अश्‍क, ज्ञानरंजन, नंदन के सहारे सानिध्‍य में. इलाहाबाद एक ऐसा शहर जो  हम दोनों के मन में कबूतर की तरह फड़फड़ा रहा था. ‘हॉस्‍टल का एक चित्र देखिए. हॉस्‍टल में शामें काटना आसान नहीं था. शा‍म से पहले हर कमरे से लड़कियों की चहल-पहल और चहचहाट आनी शुरू हो जाती. साढ़े चार, पांच बजे से लड़कियां अपनी डेट के लिए तैयार होना शुरू करतीं. तरह-तरह की सुगंधें गलियारे में उड़ती, टैल्‍कम पाउडर, सैंट, डियोडरेंट, हेयर स्‍प्रे. छिपाकर रखे गए आयरन से कपड़े प्रेस किए जाते, ढीले कमीज तंग किए जाते, तंग चूड़ीदार ढीले किए जाते, मैचिंग चप्‍पलें अदली-बदली जातीं, दस बार आईना देखा जाता, बीस बार घड़ी. कमरे की खिड़की से झांका जाता पर आठवें माले से महबूब की झलक मिलना उतना आसान भी न होता. सो कान दरवाजे की खट-खट पर होते, कब शांता बाई आकर आवाज लगाए और दरवाजा खड़काए – ₺वर्षा, हर्षा तमारो विजिटर₺.  जिसका विजिटर आ जाता वह तितली की तरह उड़ जाती.(पृष्‍ठ 137)

जब तक आपके पास एक संवेदनशील दृष्टि न हो तब तक समाज की इन बारीकियों को आप नहीं समझ सकते.

रग-रग में बसा यही इलाहाबाद नौकरी के अंतिम दिनों में ममताजी को सचमुच लहुलुहान कर देता है. हिंदी पट्टी में कानून व्‍यवस्‍था, आचरण का जंगलीपन जो साल दर साल बढ़ता ही गया.    22 वर्षीय  अरुण सिंह नामक नौजवान को अपनी बहन के प्रवेश, परीक्षा पर कुछ समझाने की कोशिश की तो कांच का भारी पेपरवेट लड़के ने ममता के सिर पर दे मारा और भाग लिया. खून की धार अफरा-तफरी. वे लिखती हैं – मुझ जैसी मूर्खा को अच्‍छा सबक मिला जिसके भावतन्‍तु कॉलेज के अस्तित्‍व के साथ ऐसे जुड़ गए थे कि मैं सर्दी-गर्मी चौमासा, टिक-टिक घड़ी की तरह अविराम नौकरी पर जाती रही, पति की पार्ट टाइम पत्‍नी, बच्‍चों की क्‍वार्टर टाइम मॉं बनी लेकिन नौकरी फुलटाइम बजाती रही. छुटिटयों में बाहरी इम्‍तहान करवाती रही. 15 अगस्‍त, 26 जनवरी सब दिन कॉलेज को समर्पित कर दिए. कच्‍चे कॉलेज को पक्‍का बनाने के लिए मैंने इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, दिल्‍ली एक कर दिए. रचनाकार विभूति नारायण राय शायद इसलिए कहते हैं नौकरी को नौकरी की तरह करना चाहिए. उनका आशय होता है कि नौकरी में अपनी उम्‍मीदें, सपने और विश्‍वास नत्‍थी नहीं करने चाहिए, तीनों दुख देते हैं. उत्‍तर प्रदेश, बिहार में आए दिन ऐसा होता रहता है. कवि मानबहादुर सिंह की हत्‍या के पीछे वजह थी कि कॉलेज में ‘‘ वर्ग की नियुक्तियों के मामले में एक असफल अभ्‍यर्थी ने उन्‍हें दिन दहाड़े तलवार से काटकर उनके अंग-प्रत्‍यंग कॉलेज परिसर में जगह-जगह उछाल दिए. उस कॉलेज में दो हजार छात्र पढ़ते थे, सौ से अधिक अध्‍यापक थे. दोपहर बारह बजे यह वारदात हुई जब सब उपस्थित थे. लेकिन पुलिस के यह पूछने पर कि क्‍या किसी ने हत्‍यारे को देखा, सब चुप्‍पी खींच गए.

कोलकाता के बिना पुस्‍तक कैसे पूरी होती. 2003 के आसपास भारतीय भाषा परिषद के बुलावे पर कालिया दंपत्ति कोलकाता पहुंचे. शुरू के पृष्‍ठों में ही कोलकाता का रूप पहचाना जा सकता है. ‘फिर भी इसमें शक नहीं कि कोलकाता में अपराध बहुत नगण्‍य है. सुबह का अखबार पढ़ने पर यह बात साफ हो जाती है. बांग्‍लाभाषी जनता आत्‍मोन्‍मुखी, बौद्धिक, अध्‍ययनप्रिय और भावुक होती है. उसके पास पढ़ने को आज का अखबार हो, पेट में चिंगड़ीभात हो और छोटी सी मासिक तनख्‍वाह हो तो उसे ज्‍यादा कुछ नहीं चाहिए

कलकत्‍ते में नाट्यकर्म पुणे की तरह चलता है, नियमित, नित्‍य और नवीन. माइकेल मधुसूदन दत्‍त सभागार में उषा गांगुली का नाटक ‘काशीनामा’ देखा. सात सौ सीटों का हॉल खचाखच भरा था. अधिकांश दर्शक बांग्‍लाभाषी. अगर वह अपने बच्‍चों की सफलता पर गर्व नहीं कर सकता तो वह टैगोर और नजरुल पर गर्व कर संतोष कर लेता है. कभी-कभी लगता है कोलकाता का बाबू मोशाय इतिहास में जितना मगन मन रहता है उतना भूगोल में नहीं. अतीत के गौरव ग्रंथों से वह जरा-सा सिर उठाकर वर्तमान में झांकता है और वापस गौरव ग्रंथों में डूब जाता है.(पृष्‍ठ 193)

हिंदी लेखक की तुलना ममताजी ने ठीक ही किसान से की है. ‘हिंदी के लेखक की स्थिति का साम्‍य शायद किसान की वर्तमान दशा से सटीक बैठता है. जैसे किसान अपना खून पसीना एक कर खेत में ललहाती फसल तैयार करता है उसी तरह लेखक महीनों बल्कि वर्षों की मेहनत से एक रचना अथवा पुस्‍तक पूरी करता है. दोनों ही मुंह अंधेरे उठते हैं. एक कुदाल-फावड़ा लेकर खेत पर जाता है, दूसरा कलम कागज लेकर मेज पर जुट जाता है. खेती का मूल्‍य किसान की मेहनत, उम्‍मीद और लागत तीनों से कम आंका जाता है. एक पुस्‍तक पूरी लिख लेने में लेखक की मेहनत का भी मूल्‍यांकन कुछ इसी प्रकार होता है. जीवन के सभी मनोरंजन से स्‍वयं को काटकर, विचारों को केन्‍द्रीभूत कर, आंखों में आईड्राप टपकाकर, एक नन्‍हीं कलम या कंप्‍यूटर के सहारे रात-रात जागकर लेखक जो लिखता है, उसके पास कोई आश्‍वासन नहीं होता यह किताब छपकर बाजार में कब आएगी या आएगी भी या नहीं. प्रकाशक की खॉंटी शब्‍दावली में किताबें बिकती ही नहीं हैं.

यह किताब न केवल शहरों बल्कि पूरे चालीस साल की लेखक की यात्रा का जिंदा चलचित्र है और ऐसे नायाब गद्य के जो उनके कथाकार पर भी इक्‍कीस ही ठहरेगा. हिंदी पाठकों के लिए एक जरूरी किताब.

 

पुस्‍तक

कितने शहरों में कितनी बार – ममता कालिया

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन,

दरियागंज, दिल्‍ली

मूल्‍य-300/-

 

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