बस्ते का बोझ या अंग्रेजी का ? ( जनसत्‍ता रविवारीय)

च्चों की परीक्षाएं नजदीक हैं और उनमें बढ़ता तनाव भी। यह वाकई ‘बस्ते का बोझ’ है या इसके दूसरे कारण हैं जैसे अंग्रेजी माध्यम, परीक्षा प्रणाली सहित पूरी क्रूर शिक्षा व्यवस्था और डार्विन के “शब्‍दों में कहा जाये तो योग्यतम का जीवित रहने की कश-म-कश उर्फ अंतिम चुनाव। यह चाहे आई.आई.टी., मेडिकल, लॉ, प्रबंधन के अच्छे कॉलिजों में प्रवेश हो या फिर नौकरियां। अकेले कोटा “शहर में पिछले एक वर्ष में दो दर्जन से अधिक आत्महत्याओं ने इस बहस को फिर जिंदा कर दिया है कि पढ़ाई का बोझ कैसे कम किया जाये जिससे हमारी मासूम पीढ़ी ऐसा कोई आत्मघाती कदम न उठायें। वाकई दशको से लगातार रिश्‍ते घाव की तरह बहस जारी है। इधर दिल्ली सरकार ने शिक्षा में सुघार के लिए कुछ कदम उठाये हैं तो केन्द्र सरकार ने पूर्व केबिनट सचिव टी.एस.आर. सुब्रामणयम की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है जो शिक्षा के सभी पहलुओं पर विचार करेगी।

 

दरअसल वर्ष 1992 में जब से प्रोफेसर यशपाल समिति ने अपनी रिर्पोट में ‘बस्ते का बोझ’ की बात उठाई तब से हर मंच पर हर आदमी को मानों इस मसले पर बोलने का अधिकार मिल गया है। यही वह दौर है जब शिक्षा का जो निजीकरण 1980 के मध्य में शुरू हुआ था उसे गुणवत्ता, आदि के नाम पर बहुत तेजी से बढ़ाया गया। हजारों नुक्स निकाले गये सरकारी स्कूलों में, पाठ्यक्रम में, परीक्षा प्रणाली में और देखते-देखते हर खाली जगह निजी स्कूलों के हवाले होती गयी। कुछ जनसंख्या का दबाव, कुछ ग्लोवलाइजेशन की हवा और शेष सरकारी वित्तीय कारण जिन्हें गिनाते हुए सरकारी स्कूलों से पैर सिकोड़ने का नजरिया कि जहॉं आजादी के शुरू के दशकों में समान शिक्षा नब्बे प्रतिशत बच्चों को उपलब्ध थी, अब धीरे-धीरे घटकर पचास प्रतिशत के आसपास हो चुकी है। भला हो ग्रामीण भारत का जिसकी बदौलत समानता का यह आंकड़ा कुछ तो तसल्ली देता है वरना महानगर, शहर, कस्बों का खाता-पीता वर्ग पूरी तरह निजी शिक्षा की तरफ मुड़ गया है। सविधान में समानता, समाजवाद की दुहाई देने वाली हर रंग की सरकार और उसकी संसद का मौन नागरिकों की इस बुनियादी जरूरत पर चिंताजनक है।

 

आखिर हम आयोग या समितियॉं बनाते क्यों हैं? क्यों देश की जनता को झांसा दिया जाता है? दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में बने शिक्षा-आयोग वर्ष 1964-66 की सिर्फ दो महत्वपूर्ण सिफारिशों को दोहराना यहॉं पर्याप्त रहेगा। पहली-सभी के लिये समान शिक्षा हो और दूसरी-न केवल स्कूली शिक्षा बल्कि उच्च शिक्षा भी भारतीय भाषओां के माध्यम से दी जाये। यानि कि रोग के लक्षण कोठारी जैसे शिक्षाविद, वैज्ञानिक, प्रशासन ने साठ के दशक में ही बहुत अच्छी तरह पहचान लिये थे, संसद ने विचार भी किया लेकिन पतनाला वही गिरा। देखा जाये तो ‘बस्ते का बोझ’ बढ़ने की शुरुआत भी तभी होती है। निजी स्कूलों को मुनाफे के लिए पहले अपना व्यवसाय, धंधा देखते हैं बाद में कुछ और। और धंधे के लिए सबसे मुफीद लगी अंग्रेजी। केवल विषय के रूप में ही नहीं नब्बे के इस दशक में पहले उसे छठी की बजाय प्राइमरी कक्षाओं से पढ़ाने की बात आगे बढ़ी और फिर 21वीं सदी शुरू होते-होते प्राइमरी में भी एक विशय के बजाये अंग्रेजी ने माध्यम भाषा की जगह ले ली। अंग्रेजी का मोह सैम पित्रोदा और उसके बांकुरों ने ज्ञान आयोग, जैसे मोहक नारो में लपेटकर ऐसा प्रचारित किया कि सरकारी स्कूल बंजर होते गये। दिल्ली जैसे शहर में भी सरकार और नौकरशाह इस भाषा में बात करने लगे कि सरकारी स्कूलों के बंद करने से इतने अरब-खरब मिल जायेंगे और अध्यापकों की तनख्वाह और दूसरे खर्च कम होंगे सो अलग। गलती पूरी तरह उनकी भी नहीं थी। सरकारी नीतियों ने सरकारी स्कूल, उसके अध्यापकों की हालत ही ऐसा कर दी कि जनसंख्या के इतने दबाव के बावजूद वहॉं बच्चों ने आना बंद कर दिया। आज भी 99 प्रतिशत बच्चे गरीब, मजदूर समुदायों के ही इन स्कूलों में पढ़ते हैं।

 

हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समान शिक्षा के पक्ष में जो निर्णय दिया है क्या उसे दिल्ली सरकार को भी नहीं मानना चाहिये? याद दिला दें कि इस निर्णय के अनुसार सभी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और प्रशासन से जुड़े हर नागरिक को सरकारी स्कूल में पढ़ाना अनिवार्य बनाया जाये। अभी तक तो इस मुद्दे पर चैतरफा चुप्पी है। संसद तो चलती ही बंद होने के लिए है।

 

‘बस्ते के बोझ’ की बुनियाद में शिक्षा का यही अंध, अनैतिक, अनिन्यत्रित निजीकरण है। अंग्रेजी के साथ-साथ निजी स्कूलों ने मध्यवर्ग की सुरसा इच्छाओं को भापते हुए यह होड़ भी पैदा की कि हमारे यहॉं इतने विषय ज्यादा पढ़ाये जाते हैं। किसी ने जर्मनी, फ्रैंच के आवरण में विदेशी नौकरियों का लालच दिया तो दूसरे नुक्कड़ स्कूलों ने जापानी, चीनी का। इन देशों के दूतावासों ने अपनी-अपनी संस्कृति, भाषा के राष्‍ट्रीय एजेंडा को बढ़ाते हुए भी बड़ी भूमिका निभाई या कई आज भी निभा रहे हैं। जर्मन भाषा के पक्ष में जर्मनी की प्रमुख का हाल ही में दिल्ली दौरा और नयी सरकार के साथ तालमेल उसी की कड़ी है। केवल इतना ही नहीं जिन विषयों को पढ़ाने की बच्चे की उम्र, समझ के लिये जरूरत ही नहीं है उनको भी बच्चे के बस्ते में ठूंस दिया गया है। दुहरा फायदा-बच्चों के अभिभावकों से और पैसा वसूल। और ऊपर से ये आतंक, लालच कि हमारा स्कूल क्यों सबसे अच्छा है। बिल्कुल फिटजी, नारायण, बंसल जैसी उन कोंचिग संस्थाओं की तर्ज पर कि यदि आप आई.आई.टी. या दूसरी राष्‍ट्रीय परीक्षाओं में सफल होना चाहते हो तो बारहवीं की बजाये नवीं कक्षा से ही इन किताबों पर जुट जाइये। उपर से कुछ और भी कराटे, एबेकस, शतरंज या मंहगे खेलों का दबाव। इसमें सबसे ज्यादा कसूरवार हैं तो यह अमीर अंग्रेजीदां वर्ग जो खुद स्कूलों में जाकर यह शिकायत करता है कि आप बच्चों को होमवर्क कम देते हैं। पड़ोस का स्कूल तो इतनी मेहनत कराता है। स्कूल प्रबंधन को और क्या चाहिए। वे दो किताबें और लगा देते हैं। अफसोस कि कई बार पूरे साल इन किताबों को खोलने की फुरसत भी बच्चो को नहीं मिलती।

 

इन सब चक्कियों के बीच आखिर पिसा कौन? मासूम बच्चे और बच्चियों जिनकी आत्म हत्या की खबरें शिक्षा व्यवस्था की पूरी दुनिया को हिलाने के लिये पर्याप्त है। प्रोफेसर यशपाल के ही शब्‍दों में आई.आई.टी. आदि में न चुने जाने वाले तो पूरी उम्र हार महसूस करते ही है, जो चुने भी जाते हैं वे भी बहुत एकांकी व्यक्तित्व होते हैं।

 

हिन्दी पट्टी के बुद्धिजीवी, पत्रकार, प्रोफेसर यहॉं और भी बडे़ अपराधी के रूप में उभरते हैं। वे पुरस्कारों, अकादमियों, विश्‍वविद्यालयों, कॉलिजों के पद की राजनीति में तो दशकों से लिप्त हैं स्कूलों कॉलिजों में अपनी भाषा के पक्ष में वे आजतक न सामने आये न अपनी भाषा के पक्षधर उन आंदोलनों के साथ खड़े होते।क्या कभी ऐसे मुद्दों पर मेरे सवेदनशील,सहिष्णु ,सेकुलर ,या धरम संस्कृति के ध्वज –रक्छ्को ने कोई आन्दोलन किया ? शायद वे ज्यादा समझदार हैं कि अंग्रेजी और इसी भारी बस्ते की बदौलत उनकी संततियां इस देश और उसकी समस्याओं से मुक्ति पाकर विदेश में चुपचाप जाकर बस सकती हैं।

 

अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर धीरे धीरे सब कुछ नस्त कर रही है .उत्तेराखंड के हल्द्वानी और उत्तेरप्रदेश के मेरठ में रहने वाले आठवी क्लास के अमीर बच्चे कहते है अंकल हिंदी लिखना बहुत मुस्किल है.यह कहते हुए उनके चेहरे पर कोई संकोच नहीं है.हो भी क्यों ?वाकई उनका कोई अपराध नहीं है .अब पहली क्लास से ही अंग्रेजी माध्यम भाषा के रूप में महानगरो के बाद इन छोटे नगरो,कस्बो तक पहुँच चुकी है .यही कारन है कि दिल्ली में आयोजित पुस्तक मेले में जहाँ हिंदी के मंडप में सिर्फ साथ वर्ष छूटे और पर किये हुए लेखक फेरीवालों की तरह घूमते और गले मिलते दीखते है स्कूल कॉलेज के बच्चों छात्रों की हजारों की भीड़ अंग्रेजी के मंडपों में|

 

हमारे समाज में शिक्षा की उलटवासियों भी अजीब हैं। साठ-सत्तर की उम्र छूता हुआ हर नागरिक अपने बचपन में पढ़ने के आनन्द, अपनी भाषा, आजादी पर खूब मगन होता है लेकिन अपने आसपास इसकी रक्षा के लिये लड़ने को कतई तैयार नहीं है। क्या इन सबको पूरा व्यवस्था सहित इस अपराध से मुक्त किया जा सकता है?

 

याद कीजिए, जितनी वकालत ज्ञान आयोग अंग्रेजी के लिये कर रहा था उसी रफ्तार से भारत के शीर्ष संस्थान आई.आई.टी. समेत दुनिया के नक्षे पर अपनी साख खोते जा रहे हैं। कारण-विदेषी भाषा में पढ़ाई, प्रशासन में हर रचनात्मकता को खत्म कर देती है। गांधी टालस्टाय न्यूगी से लेकर दुनिया भर के शिक्षाविद बार-बार यह कहते रहे हैं। लेकिन सिर्फ भारत में बहस को बस्ते के बहाने किसी और दिशा में मोड़ दिया है। भारतीय राजनीति का तो यह अपराध है ही।

 

हाल ही में दिल्ली के कुछ शिक्षकों और बच्चों से बातचीत में भी इस बात की पुष्टि हुई। जहॉं सरकारी स्कूल के बच्चों ने बस्ते के बोझ की शिकायत उतने मुखर शब्‍दों में नहीं की जितनी महंगे निजी, अंग्रेजीदां स्कूल के बच्चों ने। जाहिर है निजी स्कूलों ने अपनी कमीज ज्यादा सफेद चमकाने और बताने की होड़ में सरकारी स्कूलों के मुकाबले बस्ते का बोझ बिना किसी तर्क के ज्यादा बढ़ाया है। सबसे अच्छा पक्ष लगा-सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का एक स्वर से यह कहना कि पाठ्यक्रम कतई ज्यादा नहीं है। पूरे वर्ष में हम मजे से इसे पूरा कर सकते हैं वशर्ते कि हमारा साठ प्रतिशत समय दूसरे फालतू कामों जैसे मतदाता सूची सोलह तरह के वजीफे के हिसाब-किताब, जनगणना, बच्चों के बैंक में खाते खुलवाने जैसे कामों में न लगाया जाये। बस्ते के बोझ में अंग्रेजी बोलना, पढ़ने पर अतिरिक्त जोर देना इन शिक्षकों सरकारी बच्चों को भी ज्यादा तनाव में ला रहा है।
निजी स्कूलों की होड़ा-होड़ी दिल्ली के सरकारी स्कूलों में भी अच्छी अंग्रेजी बोलने के लिये ब्रिटेन की एक संस्था के साथ करार हुआ है। क्या कभी भारतीय भाषाओं, हिन्दी समेत के लिए भी सत्ता को कोई चिंता हुई। अफसोस कि बस्ते के बोझ में इन पहलुओं को हर सरकार नजर अंदाज कर रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि केन्द्र सरकार द्वारा गठित सुब्रामण्‍यम समिति शिक्षा में अपनी भाषाओं के पक्ष को जरूरी रेखाकित करेगी। वर्श 2014 में ‘संघ लोक सेवा आयोग’ की सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी के अतिरिक्त प्रवेश के विरोध में पूर्व केबिनेट सचिव ने खुलकर भारतीय भाषाओं की वकालत की थी।
‘बस्ते के बोझ’ को लेकर दिल्ली की नयी सरकार भी संवेदनशील लगती है। सरकारी स्कूलों को बढ़ाना, उनमें सुविधाओं को दुरस्त करना तथा शिक्षकों के पढ़ाने के अलावा दिये जाने काम को कम करने से निश्चित रूप से बेहत्तर माहौल बनेगा। अभिरुचि, क्षमता के हिसाब से कई किस्म के व्यावसायिक पाठ्यक्रम जैसे होटल, खेल, नाटक, फ़िल्म, बढ़ईगिरी, भवन निर्माण, इलेक्‍ट्रीशियन, साहित्य की शुरुआत भी बस्ते के बोझ को अतंतः कम ही करेगी। प्रोजेक्ट, ट्यूशन आदि के बहाने निजी स्कूलों की उन अतिरिक्त, अवैज्ञानिक किताबों पर जरूर लगाम लगाने की जरूरत है। हां पाठ्यक्रम को कम करने में भी समीक्षा में जरूर धैर्य से काम लेना होगा। सभी कक्षाओं में विषय की निरंतरता, समझ के सोपान और राष्‍ट्रीय-अन्तराष्‍ट्रीयय स्तरों को भी ध्यान में रखने की जरूरत है। यह बहुत जल्दबाजी में नहीं हो सकता। पूरी पढ़ाई में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पढ़ने के आनंद को बच्चों में जगाये रखना होना चाहिए। परीक्षा पद्धतियों में सी.बी.एस.ई. और एन.सी.ई.आर.टी. ने मिलकर कुछ अच्छे कदम उठाये हैं।

 

एक विकल्प हर स्कूल में ऐसे पुस्कालयों को बढ़ाना भी है जहां विविध विषयों की किताबें, सी.डी. उपलब्ध हों और बच्चे मनमर्जी वहॉं बैठ सकें। सारा ज्ञान बच्चे के बस्ते में ही भारतीय समाज क्यों ठूंसना चाहता है? जबकि मुहावरा सब को पता है कि मूर्खों का ही बस्ता सबसे ज्यादा भारी होता है।
क्या इसका उल्टा भी उतना ही सच नहीं है?’

One thought on “बस्ते का बोझ या अंग्रेजी का ? ( जनसत्‍ता रविवारीय)”

  1. आपने मूल समस्या को अच्छी तरह समझाया है। बहुत बहुत धन्यवाद !

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