बनारस और भारत रत्‍न (Jansatta)

पिछले दिनों चुनावों के शोर के बीच बनारस लगातार चर्चा में रहा । चुनाव से पहले भी और चुनाव के बाद भी । गंगा के घाट, बनारस की सांझी संस्‍कृति, पप्‍पू की चाय से लेकर सड़कों पर रास्‍ता रोके सांड भी चर्चा में आए लेकिन बनारस के हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय की जो धूम तीस-चालीस साल पहले थी वह सब की नजरों से अलग छिपी ही रह गई । चुनाव के उस दौर में संयोग से मैं भी दो दिन के लिए बनारस में था । क्‍या विशाल भव्‍य प्रांगण है विश्‍वविद्यालय का ! लगभग सत्‍तर विभाग, आई.आई.टी., मेडिकल से लेकर भाषा साहित्‍य, कला से लेकर विज्ञान के आधुनिक शास्‍त्रों तक । समकोण से कटी चौड़ी-चौड़ी सड़कें और उन्‍हें आच्‍छादित करते विशाल वृक्ष । उतने ही पुराने जितना कि विश्‍वविद्यालय । शायद 100 वर्ष पहले ये वृक्ष भी महामना मदन मोहन मालवीय और शिक्षा के उन ऋषियों ने लगाए होंगे । लेकिन अफसोस कि पेड़ तो अब भी सघन छाया और फल दे रहे हैं विश्‍वविद्यालय अपनी चमक अकादमिक क्षेत्रों में तेजी से खोता जा रहा है ।

इसके इतिहास पर नजर नहीं गई होती यदि हाल ही में भारत रत्‍न से नवाजे वैज्ञानिक प्रोफेसर सी.एन. राव के साक्षात्‍कार में यह नहीं पढ़ा होता कि उन्‍होंने अपनी मास्‍टर डिग्री इसी विश्‍वविद्यालय से ली थी । प्रोफेसर राव ने अपनी बी.एस.सी. की पढ़ाई कर्नाटक में की थी और उच्‍च शिक्षा के लिए वे बनारस हिन्‍दू यूनिवर्सिटी आए । यानि पचास वर्ष पहले उत्‍तर भारत के इन विश्‍वविद्यालयों बनारस, इलाहाबाद को इतनी प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त थी । इलाहाबाद का तो आपको पता ही है कि आक्‍सफोर्ड ऑफ द ईस्‍ट कहा जाता था । मेघनाथ साहा जैसे दिग्‍गज वैज्ञानिक इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में थे तो उसी स्‍तर के दर्जनों विद्वान बनारस में भी । विज्ञान के एक और प्रसिद्ध लेखक और वैज्ञानिक जयंत नर्लीकर भी बनारस विश्‍वविद्यालय में पढ़े थे और हिन्‍दी में विज्ञान लेखन को समृद्ध करने वाले गुणाकर मुले भी । पिछले दिनों वैज्ञानिकों की जीवनियों के लिए मशहूर हुए विज्ञान प्रसार के सुबोध मेहंती ने भी बनारस हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय में ही पढ़ाई की है । मेरे अनुभव से शायद ही देश में कोई विश्‍वविद्यालय ऐसा होगा जिसमें आई.आई.टी. और मेडीकल कॉलेज विज्ञान और मानविकी के अन्‍य इतने विभाग एक प्रांगण में इतने आसपास उपस्थित हों । वाकई ज्ञान और शिक्षा के सभी विषय ऐसे ही एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और आवाजाही करते हैं । और ऐसे वातावरण में ही पीढि़यां शिक्षा के सनातन मूल्‍य और संस्‍कार पाती हैं । इस लिहाज से क्‍या ब्रिटिश हुकूमत गंगा और बनारस के ज्‍यादा माकूल नहीं थी ?

लेकिन वाकई बनारस वह बनारस नहीं रहा । शायद इलाहाबाद और पटना भी । एक वक्‍त था कि जब दक्षिण भारत समेत पूरे देश के मेधावी छात्र इन विश्‍वविद्यालयों में पढ़ने आते थे लेकिन आज इंजीनियरिंग और व्‍यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए भी उत्‍तर भारत बेंगलौर, पूना, बैल्‍लोर, हैदराबाद की तरफ कूच कर रहा है । यों देश के अलग-अलग हिस्‍सों में मन माफिक विश्‍विद्यालयों में पढ़ना अच्‍छी बात है और प्रसिद्ध इतिहासकार रामचन्‍द्र गुहा के शब्‍दों को उधार लूं तो सही मायनों में विश्‍वविद्यालय कहलाने का अधिकार तभी है जब उस प्रांगण में विश्‍व भर के कुछ विद्यार्थी,शिक्षक तो दिखाई दें । उत्‍तर भारत के तो ज्‍यादातर विश्‍वविद्यालयों में विदेशी  तो छोड़ो दक्षिण और पश्चिम के भी विद्यार्थी ढ़ूढ़े नहीं मिलेंगे । यही स्थिति शिक्षकों के परिदृश्‍य में है । काश ! विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर या शिक्षक भी देश के सभी हिस्‍सों के होते और आदिवासियों से लेकर दूसरे समुदायों से भी एकाध विदेशी विद्वान भी । अभी तो यहां जातियों के कबीले, और संगठन हैं । लेकिन यह तब होता जब शिक्षा और उसके व्‍यापक संदर्भ वाकई किसी राजनीतिक दल के एजेंडे में होते । अब तो पढ़ने-लिखने के लिए दक्षिण, सत्‍ता की राजनीति के लिए गंगा घाटी । क्‍या यह महज संयोग है कि देश का उगता सूर्य राजनीति की उर्वर भूमि बनारस आया है ?

प्रोफेसर राव ने हाल ही में अपने साक्षात्‍कार में शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए एक और महत्‍वपूर्ण बात कही कि हमारे यहां शिक्षक के पेशे को सबसे नीचे माना जाता है । यूरोप के कई देशों में प्रशासनिक ओहदों और दूसरे पदों पर आप आसानी से भर्ती हो सकते हैं शिक्षक बनने के लिए कसौटी बहुत कठिन है विशेषकर प्राथमिक शिक्षा में । उन्‍हें कई परीक्षणों से गुजरना होता है । यदि थोड़ा भी इस ओर ध्‍यान दिया जाए तो तस्‍वीर बदल सकती है ।

तो बनारस वासियों सुन रहे हो न ! गंगा और कबीर की आरती और अजान की बातें  बहुत हो चुकी यदि आधुनिकता के मंदिर विश्‍वविद्यालयों को ठीक कर पाये तो भविष्‍य का फिर कोई भारत रत्‍न बनारस पर फख्र करेगा । हम और आप भी ।

दिनांक : 17/6/14

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