अंग्रेजी का हमला

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आ‍योजित सिवि‍ल सेवा की मुख्‍य परीक्षा में बदलाव से देश भर में खलबली मच गयी है । महाराष्‍ट्र में कुछ नौजवानों ने धमकी दी है कि वे परीक्षा नहीं होने देंगे तो दिल्‍ली में भी संघ लोक सेवा आयोग के बाहर विरोध प्रदर्शन हुए हैं । मौजूदा संसद सत्र में भी कई संसद सदस्‍यों ने अंग्रेजी को भारतीय भाषाओं के मुकाबले आगे रखने पर विरोध जताया है । यह विरोध जायज कहा जा सकता है क्‍योंकि‍ नयी प्रणाली में किसी भी भारतीय भाषा को न जानने के बावजूद आप देश की बीस सर्वोच्‍च सेवाओं में जिनमें आई.एस, विदेश सेवा, पुलिस सेवा सहित रेलवे , आयकर सेवाएं भी शामिल हैं, में आप जाने के हकदार हैं । बस अंग्रेजी जरूर आनी चाहिए ।

पहले कुछ तथ्य । हाल ही में घोषित नयी परीक्षा प्रणाली के बारे में सामान्य ज्ञान के तीन-तीन सौ के दो पर्चों के स्थान पर 250-250 नंबर के चार परचे होंगे । छह छह  सौ के दो वैकल्पिक विषयों के बजाय 250-250 के एक ही वैकल्पिक विषय के दो पर्चे होंगे । यहां तक तो चलो ठीक हैं । तीन सौ नंबर का जो एक और पेपर होगा उसके दो खंड होंगे । दो सौ नंबर का निबंध और सौ नंबर का अंग्रेजी ज्ञान आ‎दि-आदि । पुरानी प्रणाली में अपनी किसी भी भारतीय भाषा का दसवीं तक का ज्ञान अनिवार्य था जो अब समाप्त हो गया है ।

आइये इस नयी प्रणाली को कोठारी समिति की मूल अनुशंसाओं के आईने में परखते हैं । कोठारी समिति (1974-76) ने अपनी अनुशंसा 3.22 शीर्षक ‘भारतीय भाषा और अंग्रेजी’ में  स्पष्ट रुप से लिखा –  ‘अखिल भारतीय सेवाओं की नौकरी में जाने के इच्छुक हर भारतीय को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कम से कम एक भाषा का ज्ञान जरूरी होना चाहिए ।  यदि किसी को इस देश की एक भारतीय भाषा भी नहीं आती तो वह सरकारी सेवा के योग्‍य नहीं माना जा सकता ।  एक अच्‍छी समझ के लिए उचित तो यह होगा कि सिर्फ भाषा ही नहीं उसे भारतीय साहित्‍य से भी परि‍चित होना चाहिए ।  इसलिए हम एक भारतीय भाषा की अनिवार्यता की अनुशंसा करते हैं ।  उन्‍होंने अनुशंसा 3.23 में अंग्रेजी के पक्ष पर भी विचार किया और दुनिया के ज्ञान से जुड़ने और कई राज्‍यों में परस्‍पर संवाद की अनिवार्यता को देखते हुए अंग्रेजी के ज्ञान को भी जरूरी समझा ।  यानि दोनों पक्ष बराबर ।

 

कौन थे डॉ. दौलत सिंह कोठारी (6 जुलाई, 1906-1993)

डॉ.दौलत सिंह कोठारी एक जाने-माने शिक्षाविद, भौतिक शास्त्री, विज्ञान प्रचारक थे ।  शिक्षा में अपनी भाषाओं की सबसे पुरजोर वकालत डॉ.दौलत सिंह कोठारी आयोग (1964-66) ने की । इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जाने माने भौतिक शास्त्री, मेघनाथ साहा के विद्यार्थी थे । कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से लार्ड रदरफोर्ड के साथ पी.एच.डी. पूरी की । लार्ड रदरफोर्ड ने दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर सर मॉरिस ग्वायर को लिखा था कि  ‘ मैं बिना हिचकिचाहट कोठारी को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करना चाहता हँ परंतु यह नौजवान पढ़ाई पूरी करके तुरंत देश लौटना चाहता है । ‘

 

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विज्ञान नीति में जो लोग शामिल थे उनमें डॉ. कोठारी, होमी भाभा, डॉ.मेघनाथ साहा और सी.वी. रमन थे । डॉ. कोठारी रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार रहे । 1961 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए जहां वे दस वर्ष तक रहे ।  डा. कोठारी ने यू.जी.सी. के  अपने कार्यकाल में शिक्षकों की क्षमता, प्रतिष्ठा से लेकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय और उच्च कोटि के अध्ययन केन्द्रों को बनाने में विशेष भूमिका निभाई ।

स्कूली शिक्षा में भी उनकी लगातार रुचि रही । इसीलिए उन्हें राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (1964 से 1966) का अध्यक्ष बनाया गया । आजाद  भारत में शिक्षा पर संभवत: सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज, जिसकी दो बातें बेहद चर्चित रही हैं । पहली – समान विद्यालय व्यवस्था (common schooling system) और दूसरी  देश की शिक्षा स्नातकोत्तर स्तर तक अपनी भाषाओं में दी जानी चाहिए ।

शायद इसी का असर रहा होगा कि शिक्षा की उच्च प्रशासनिक सेवाओं के लिए आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के रिव्यू के लिए एक कमेटी कठित की गई और डॉ. कोठारी को 1974 में फिर उसका अध्यक्ष बनाया गया ।

इस कमेटी ने 1976 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जिसके आधार पर 1979 से भारत सरकार के उच्च पदों आई.ए.एस., आई.पी.एस. और बीस दूसरे विभागों के लिए एक कॉमन परीक्षा का आयोजन प्रारंभ हुआ । सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम जो इस कमेटी ने सुझाया वह था :- अपनी भाषाओं में  (संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी भारतीय भाषाओं ) और अंग्रेजी में उत्तर देने की छूट और दूसरा उम्र सीमा के साथ-साथ देश भर में परीक्षा केन्द्र भी बढ़ाये जिससे दूर देहात कस्बों के ज्यादा से ज्यादा बच्चे इन परीक्षाओं में बैठ सकें और देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं देश के प्रशासन में समान रूप से हाथ बटाएं ।

 

कोठारी समिति की इन सिफारिशों पर गहन विचार-विमर्श के बाद सरकार ने यह फैसला लिया कि अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए । इसीलिए 1979 से शुरु हुई मुख्य परीक्षा में सभी अभ्यर्थियों के लिए भारतीय भाषा के ज्ञान के लिए दो सौ नंबर का एक पर्चा रखा गया और दो सौ अंग्रेजी का । दोनों का स्तर दसवीं तक का । और भी महत्वपूर्ण  पक्ष यह है कि इन दोनों ही भाषायी ज्ञान के नंबर चुनावी मेरिट के अंतिम नंबरों में नहीं जुड़ेंगे ।

 

फिर अचानक ही प्रशासनिक सेवा में या देश के ऊपर कौन सा संकट आ गया कि अपनी भाषा का ज्ञान या पर्चा तो गायब हो गया लेकिन अंग्रेजी के सौ नंबर पिछले दरवाजे और चालाकी से निबंध के पर्चे में जोड़ दिये गये और वे नम्‍बर अंतिम मेरिट में जोड़े भी जाएंगे ? क्या चार-पॉंच लाख मेधावी छात्रों के बीच गलाकाट प्रतियोगिता में सौ नंबर कम होते हैं ? और क्या भारतीय संविधान अपनी भाषाओं को खारिज करके अंग्रेजी को उसके उपर रखने की इजाजत देता है ? क्या इतने महत्वपूर्ण फैसले पर संसद या विश्‍वविद्यालयों में बहस नहीं होनी चाहिए ?

यूपीएससी परीक्षा के एक पक्ष की तारीफ की जानी चाहिए कि यह अकेली ऐसी संवैधानिक संस्‍था है जो कोठारी समिति की सिफारिशों को पालन करते हुए लगभग हर दस साल में  इस प्रणाली की विधिवत समीक्षा करती रही  है । उदाहरण के लिए ध्‍यान दिला दें कि आरक्षण नीति की संविधान निर्माताओं की सिफारिशों के बावजूद भी साठ बरस में समीक्षा नहीं की गई ।  उसे ‘धर्म’ की श्रेणी में रख दिया गया है और आपको पता ही होगा कि  धर्म के संरक्षक  क्‍या क्‍या अधर्म करते  है । क्रीमीलेयर के चलते आरक्षण के फायदों को गरीबों तक पहुँचने की कितनी कम गुजाइश बचती है ।

 

सन 1979 में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में कोठारी आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद से समय-समय पर दूसरी समितियों ने भी परीक्षा पद्धति से लेकर भर्ती प्रणाली आदि का मूल्‍यांकन किया है ।  वर्ष नब्‍बे के आसपास सतीश चंद्र समिति बनी थी जिसने इस पर विचार किया था कि कौन-से विषय मुख्‍य परीक्षा में रखे जाएं या बाहर किए जाएं और यह भी कि किन केंद्रीय सेवाओं को इस परीक्षा से बाहर रखा जाए ।  लगभग बारह वर्ष पहले जाने-माने अर्थशास्‍त्री और शिक्षाविद् प्रो वाई के अलघ की अध्‍यक्षता में बनी समिति को भी ऐसी समीक्षा की जिम्‍मेदारी दी गई, जिससे अपेक्षित अभिक्षमता के नौजवान इन सेवाओं में आएं ।  उनके सामने यह चुनौती भी थी कि भर्ती के बाद प्रशिक्षण कैसे दिया जाए, विभाग किस आधार पर आवंटित हों, आदि ।

 

अलघ समिति की संस्‍तुतियों में अन्‍य बातों के साथ-साथ यह भी कहा गया था कि अभ्‍यार्थियों की उम्र अगर कम की जाए तो अच्‍छा रहेगा ।  शायद इसके पीछे यह सोच था कि एक पक्‍की उम्र में आने वाले नौकरशाहों और उनकी आदतों को बदलना आसान नहीं होता ।  हालांकि ‘इंडियन एक्‍सप्रेस ‘ में छपे अपने एक लेख में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा था कि उम्र की वजह से गरीब और अनुसूचित जाति-जनजाति के अभ्‍यर्थियों की संख्‍या पर उलटा असर नहीं पड़ना चाहिए ।  इसके अलावा ‘होता कमेटी’ ने भी कुछ मुद्दों पर सुझाव दिए ।

 

निश्चित रूप से वाई.के.अलग की रिपोर्ट यथार्थ के करीब है । अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है और दुनिया भर में बढ़ रहा है । लेकिन दुनिया भर के देशों पर गौर करें तो अपनी भाषाओं और प्रशासन में उसकी भूमिका को शायद ही किसी विकसित देश ने नजर अंदाज किया हो । जब  एक तरफ इस देश के प्रशासन को चलाने, जानने और समझने के लिए अपनी भाषा को अनिवार्य मान रहे हैं तो अब भारतीय  भाषाओं को क्‍यों बाहर कर दिया 2011 में पहले  चरण में और अब मुख्‍य परीक्षा में ।

 

लेकिन हाल ही के 2011 में गठित अरूण निगवेकर समिति की सिफारिशों से यह नहीं लगता कि भारतीय भाषाओं के इतने संवेदनशील मुद्दे पर बहुत गहराई से विचार हुआ है ।  अभी भी इसमें सुधार की तुरंत गुंजाइश है । वह यह कि कोठारी समिति द्वारा लागू मातृभाषा और अंग्रेजी की अनिवार्य अहर्ता वाले परचों को पुरानी प्रणाली की तरह ही रहने दिया जाये ।  इससे एक तो हर नौकरशाह को एक भारतीय भाषा को जानने, समझने, पढ़ने की अनिवार्यता बनी रहेगी और दूसरे अंग्रेजी वालों को अतिरिक्‍त लाभ भी नहीं मिलेगा । यह कैसा समाजवाद, स्‍वराज है जो विदेशी भाषा को रोज रोज के प्रशासन में ज्‍यादा तरजीह देता है ।  या‍द कीजिए आजादी के अंतिम वर्ष । 1945-46 में ही आजादी के पिता गांधी अपनी भाषा और हिंदुस्‍तानी की वकालत पूरे जोश से करने लगे थे । 1945 में गांधी ने जो लम्‍बा पत्र हिन्‍द स्‍वराज को लागू करने के लिए लिखा था वह अंग्रेजी के बजाय हिंदुस्‍तानी में था ।  15 अगस्‍त 1947 के दिन बीबीसी को भी उनका संदेश था कि दुनिया को बता दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता ।

 

अब अंग्रेजी जानने वालों के लिए खुली चिकनी सड़क देखिए । पहले ही  2011 से पहले चरण से प्रीलीमिनरी में अंग्रेजी आ गई है । ये सामान्य ज्ञान का पेपर अंग्रेजी में देंगे । निबंध अंग्रेजी में,  इंटरव्यू अंग्रेजी में । यानि यदि आप सारी उम्र इंग्लैंड, अमेरिका में भी रहे हैं या वहीं पढ़ाई हुई है तब भी भारत की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में जाने से आपको कोई नहीं रोक सकता । तंत्र में आने के बाद आप इस दंभ में भी इतरा स‍कते हैं कि दिल्‍ली के  रामजस कॉलेज समेत सिवान, इलाहाबाद वालों को वह अंग्रेजी नहीं आती जो सेंट स्‍टीफन या इंग्‍लैंड में पढ़े हुए की बराबरी कर सके ।  भारतीय भाषाओं का माध्यम जरुर अभी बचा हुआ है । लेकिन यदि यही दौर रहा तो आने वाले वर्षों में वह भी समाप्त हो जाएगा । पर वे अंतिम  चुनाव तक अंग्रेजी की बाधाओं के बाद पहुंचेंगे कैसे ?

 

इसीलिए भारतीय नौकरशाही के संदर्भ में कोठारी आयोग की रिपोर्ट प्रशासनिक सुधारों में सबसे क्रांतिकारी मानी जाती है ओर यह हकीकत भी है । पिछले तीस सालों के विश्‍लेषण बताते हैं कि कैसे कभी पूना के मोची का लड़का तो कभी पटना के रिक्‍शे वाले ने अपनी भाषा में परीक्षा देकर भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया‍ है । हर वर्ष सैकड़ों ऐसे विद्यार्थी इन नौकरियों में आते रहे हैं ।  किसी सर्वेक्षण से यह सामने नहीं आया कि अपनी भाषा से आए हुए ये नोजवान कर्तव्‍य-निष्‍ठ, कार्य-क्षमता में किसी से कम साबित हुए हैं ।  कहॉं तो यूपीएससी की भारतीय इंजीनियरिंग, मेडिकल, वन, सांख्‍यिकी सभी परीक्षाओं में भारतीय भाषाऍं आनी थी, कहॉं उसका एक मात्र द्वीप भी डूब रहा है। यूपीएससी की होड़ाहोड़ी, कर्मचारी चयन आयोग की भी सभी परीक्षाओं में अंग्रेजी और दो कदम आगे है ।  यहॉं तो भारतीय भाषाऍं हैं ही नहीं।

 

देश की दूसरी भाषाओं के साथ तो हिंदी से भी बदतर सुलूक किया गया है । कहां तो कोठारी समि‎ति की सिफारिश थी कि अभ्यर्थियों को न केवल भाषा बल्कि भारतीय साहित्य की भी जानकारी होनी चाहिए और कहां नयी स्कीम से भाषा के साथ-साथ साहित्य पूरी तरह बाहर कर दिया गया है । जारी अधिसूचना के अनुसार आठवीं अनुसूची में उल्लिखित 22 भाषाओं के साहित्य को विकल्प के रुप में तभी ले सकते हैं जब ‘गेजुएशन लेवल’ पर आपने  उस भाषा का साहित्य पढ़ा हो । क्यों ? क्या डिग्री ही साहित्य के ज्ञान का सबसे प्रमाणिक सूचक है ? क्या विज्ञान और इतिहास का विद्यार्थी अपने देश की भाषा और साहित्य का पंडित नहीं हो सकता ? ग्लोबीकरण के बाद तो हम अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों से भी सीख सकते हैं  जहां कोई भी, किसी भी विषय में किसी भी स्‍तर पर छलांग लगा सकता है । प्रसिद्ध लेखक स्तंभकार और प्रबंधन गुरु चरण दास पढ़ने गये थे विदेश में रसायन शास्त्र, फिर कानून पढ़ने लगे और उसे भी छोड़कर किया एम.बी.ए. । चार वर्ष पहले भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक वेंकट रामाकृष्णन बड़ौदा में भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी थे । अमेरिका पढ़ने गये तो रसायन शास्त्र की तरफ झुक गये और उसके बाद जीव रसायन जहां इनकी खोज के लिए 2009 में नोबल पुरस्कार मिला । हमारे  आयोग के कानून मानते तो न वे पढ़ पाते, न कोई शोध कर पाते । मेंडेल आस्ट्रिया के पादरी थे । आपका बस चलता तो आप कहते कि आप जैनेटिक्स में रिसर्च नहीं कर सकते । मेंडेल को दुनिया ‘जैनेटिक्स के पिता’ के रुप में जानती है । सार यह कि रचनात्‍मकता या योग्‍यता किसी डिग्री की गुलाम नहीं होती ।

कहने की जरुरत नहीं कि हिंदी साहित्य उन लोगों ने ज्यादा समृद्ध किया है जिन्होंने एम.ए. हिंदी में नहीं किया । अज्ञेय, रामविलास शर्मा, बालकृष्ण राव, फिराक गोरखपुरी से लेकर संजीव, पंकज बिष्ट, ज्ञान चतुर्वेदी, ओमा शर्मा और संजय चतुर्वेदी तक । साहित्य और भाषा इस देश के हर नागरिक की सांझी विरासत है और किसी आयोग या कानून को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह ऐसा एक तरफ फैसला ले ।

वैकल्पिक साहित्य के विषय के अलावा आयोग ने माध्यम भाषा चुनने के लिए भी बाधाएं डाल दी हैं । यानि कि यदि उन्होंने ग्रेजुएशन तेलुगू, हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा के माध्यम से किया है केवल तभी आप सिविल सेवा में सामान्‍य ज्ञान और निबंध उस भाषा में दे सकते हैं । कितना घातक सुझाव है भाषा माध्यम को टुकड़ों-टुकड़ों में देखता हुआ ? इसका मतलब हुआ कि यदि किसी ने गणित में एम.एस.सी. किया है और यदि उसका माध्यम अंग्रेजी रहा है तो उसे सामान्य ज्ञान में इतिहास, राजनीतिक शास्त्र भी अंग्रेजी में लिखना पड़ेगा । क्या सामाजिक विषयों को किसी विदेशी भाषा में इतने असरदार ढंग से अभिव्यक्त किया जा सकता है ? शिक्षा शास्त्र कहें या भाषा विज्ञान की दृष्टि से एकदम खारिज किये जाने लायक सुझाव । अड़ंगे पर अड़ंगे ।

और तो और इस ‘माध्यम भाषा’ के ऊपर एक और कठोर प्रतिबंध लगाया गया है । वह यह कि उस माध्यम भाषा के मुख्‍य परीक्षा देने वाले कम-से-कम 25 अभ्यर्थी होने अनिवार्य हैं । अभ्यर्थी को कैसे पता लगेगा कि 25 हो पाएंगे या नहीं ? हिंदी के तो चलो मिल भी जाएंगे, सिंधी, संथाली, मणिपुरी, बोडो, डोगरी भाषा में तो कोई मुख्‍य परीक्षा कभी लिख ही नहीं पाएगा और विडंबना देखिए कि आयोग इसके साथ-साथ यह सुझाव भी दे रहा है कि यदि अपनी भाषा में लिखें तो कोष्ठक में अंग्रेजी शब्द भी दे सकते हैं । अंग्रेजी के लिए सरासर झुकाव । हो सकता है कि अगले वर्ष यह भी कह दें कि पूरा उत्तर साथ-साथ अंग्रेजी में भी दो ।

यानि कि भारतीय भाषा को पढ़ने वाले उम्मीदवारों के ‎लिए धमकी-धमकी-धमकी । कि यदि भारतीय भाषाओं की तरफ देखा भी तो देखते हैं आप कैसे चुने जाते हैं । कहां तो भारतीय संविधान लाखों के बीच अकेली आवाज को भी अहमियत देता है और कहां ये हिटलरी ‘अंग्रेजी फरमान’ ।

 

2011 में लागू परीक्षा प्रणाली के दुष्परिणाम आने शुरु हो गये हैं । इंडियन एक्सप्रेस में 31 जुलाई 2012 की छपी रिपोर्ट बताती है कि 2002 से 2011 के बीच ग्रामीण युवा 36 प्रतिशत से घटकर 29 प्रतिशत रह गये हैं । 2009 में ग्रामीणों का प्रतिशत था 48 जो 2011 में घटकर 29 प्रतिशत रह गया है ।  कोठारी समिति की सिफारिशों के चलते आजाद भारत में पहले वार पहली पीढ़ी के पढ़े या ग्रामीण क्षेत्र के बच्‍चे नौकरियों में आ रहे थे ।  वह रथ अब उल्‍टा चल पड़ा है । क्‍योंकि उसके सारथि अब वे हैं जो पढ़े तो अमेरिका, इंग्‍लैंड में हैं लेकिन शासन यहॉं करना चाहते हैं ।  अफसोस और दुख बस यह है कि जिन पर शासन करना चा‍हते हैं उनकी भाषा, साहित्‍य से परहेज क्‍यों ।  इतना तो इनके अंग्रेजी आकाओं ने भी सीखा था ।

अखबारों में छपी खबरों के अनुसार महाराष्ट्र से तो भी मराठी के पक्ष में आवाज उठी है और उन्होंने धमकी दी है कि यदि मराठी बाहर रही तो यू.पी.एस.सी. की परीक्षा नहीं होने देंगे । कोठारी समिति की सिफारिशों का सबसे अधिक फायदा हिंदी भाषी राज्यों के विद्यार्थियों को मिला । औसतन हर वर्ष हिंदी माध्‍यम से 15 प्रतिशत चुने गए विशेषकर गरीब, दलित, आदिवासी तबके के । दूसरी भाषाओं के सब मिलाकर लगभग पांच प्रतिशत इसलिए वे शायद उतने मुखर नहीं हैं । लेकिन कहां गये वे जो रोज दिल्ली में भोजपुरी और अवधि अकादमी की मांग रखते हैं ? और कहां गये वे बुद्धिजीवी जिनमें से कोई हिंदी के नाम पर अतिथिगृह मांगता है, तो कोई बीमार कोष और सामाजिक न्‍याय की आड़ में सिंहासनों पर भगवान की तरह पसरे नेता । हिंदी के दस राज्‍य और 70 करोड़ हिंदी भाषी अब तो जागो ।

क्या गाँव, देहात के मोची, बढ़ई या मजदूर के बच्चे से उतनी अंग्रेजी की उम्मीद की जा सकती है जितनी शहरों के बच्चों को आती है । इसका अर्थ है कि उनके दरवाजे जो कोठारी समिति ने खोले थे वे फिरे से बंद होने लगेंगे । वैसे तो नयी आर्थिक नीतियाँ,  अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार, निजी स्कूलों में धुंआधार अंग्रेजी के रटंत पर जोर यह सब ग्रामीण और पिछड़े अभ्यर्थियों को प्रभावित कर रहे हैं और इसीलिए अब तो वे अपनी भाषाओं में पढ़ना-लिखना और भी छोड़ देंगे ।

उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका कुर्रतुल हैदर ने दशको पहले यह कहा था‎ कि ‘जो भाषा रोटी नहीं दे सकती उस भाषा का कोई भविष्य नहीं है ।’ यदि भारतीय भाषाओं की जरुरत नौकरी के लिए नहीं रही तो लेखकों के पोथन्नों को भी कोई नहीं पढ़ेगा । । हिंदी लेखक, संस्‍कृति कर्मियों को यह याद रखना चाहिए ।

लेकिन क्‍या भाषा के साथ देश उसकी सांस्‍कृतिक, साहित्यिक विरासत और पहचान भी नहीं जुड़ी हुई ? मत भूलिए कि भाषा के मुद्दे पर ही पाकिस्‍तान से बांग्‍लादेश अलग हुआ । विशाल सोवियत संघ के टूटने के पीछे भी भाषा और संस्‍कृति की पहचान के मुद्दे रहे । श्रीलंका का मसला भी भाषायी अल्‍पसंख्‍यकों की पहचान से जुड़ा हुआ था और सबसे बड़ी बात ये कि हम इस देश के करोड़ों गरीबों से प्रकृति प्रदत्‍त उनकी भाषा, बोली हम क्‍यों छीन रहें हैं ? आजाद देश में अंग्रेजी की  ऐसी गुलामी की तो किसी ने भी कल्‍पना नहीं की थी

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