अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय-छात्राओं से भेदभाव (Views on News)

वैसे तो भारतीय समाज का शायद ही कोई कोना हो जहां लड़कियों और महिलाओं को बराबरी के अधिकार मिले हुए हों लेकिन यह सब एक विश्‍वविद्यालय के अंदर हो और वह भी मौलाना आजाद जैसे शिक्षाविद के नाम पर मशहूर लाईब्रेरी में तो यह पूरे देश के लिए शर्म की बात है । सर सैय्यद अहमद खान द्वारा स्‍थापित किया गया यह विश्‍वविद्यालय दुनिया के मशहूर विश्‍वविद्यालयों में गिना जाता है । देश के ही नहीं विदेश और विशेषकर मुस्लिम देशों के विद्यार्थी यहां पढ़ने आते हैं । पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश का एक महत्‍वपूर्ण सांस्‍कृतिक, शैक्षिक केन्‍द्र राजनैतिक रूप से भी उतना ही सक्रिय । लेकिन किसी को भी ऐसा गुमान नहीं था कि यहां छात्राओं को लाईब्रेरी में बैठकर पढ़ने की इजाजत नहीं है । और दुर्भाग्‍यपूर्ण बात यह रही जब वाईस चांसलर ने नव-निर्वाचित संगठन की मांग को ऐसी हिकारत से खारिज किया कि हर यूनियन ऐसी मांग करती रही है और हम इसे स्‍वीकार नहीं कर सकते । उनका यह कहना कि लड़कियों के पुस्तकालय में आने से लड़के चार गुना ज्‍यादा आएंगे पूरे भारतीय महाद्वीप की महिलाओं के लिए अपमानजनक है । और तो और जब विश्‍वविद्यालय प्रशासन की यह बात एक अखबार के माध्‍यम से मीडिया में आई तो उस रिपोर्टर को धमकी दी गई कि वे विश्‍वविद्यालय कैम्‍पस में न दिखाई दें और संभव हो सके तो अलीगढ़ शहर भी छोड़ दें । प्रशासन यहीं तक नहीं रुका इससे और दो कदम आगे बढ़ता हुआ टाइम्‍स ऑफ इंडिया अखबार के प्रवेश पर भी विश्‍वविद्यालय में प्रतिबंध लगा दिया है । हालॉंकि एडिटर गिल्‍ट के अध्‍यक्ष और दूसरे संगठनों ने विश्‍वविद्यालय के इस अलोकतांत्रिक और असहिष्‍णुतावादी रवैये पर विरोध जताया है और लड़कियों के लाईब्रेरी में प्रवेश की मांग भी दोहराई है लेकिन विश्‍वविद्यालय प्रशासन अभी भी अपने अडि़यल पर डटा हुआ है ।

जिस वर्ष पड़ौसी मुल्‍क पाकिस्‍तान की मलाला को ऐसी ही समान शिक्षा के मुद्दे पर नोबल पुरस्‍कार दिया गया हो और भारत में बच्‍चों की शिक्षा के सुधार के लिए कैलाश सत्‍यार्थी को चुना गया हो वहां एक ऐसे प्रसिद्ध विश्‍वविद्यालय के वाईस चांसलर की बातें किसी भी आधुनिक समाज में हजम नहीं हो सकती और इसीलिए चारों तरफ हंगामा चल रहा है । प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब ने भी कहा कि लड़कियों का लाईब्ररी में प्रतिबंध करने से उनकी पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ता है । अच्‍छा होता देश के अन्‍य प्रगतिशील बुद्धिजीवी और आगे आकर ऐसे प्रतिबंध के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आवाज उठाते ।

मौजूदा विवाद के मद्देनजर अब समय आ गया है कि हम लड़का-लड़की की बराबरी के मुद्दे पर फिर से विचार करें । क्‍या उपकुलपति के पास इस बात का कोई जवाब है कि जब पुस्‍तकालय में लड़कों को जाने की आजादी है तो किस कानून के तहत लड़कियों पर प्रतिबंध लगाएंगे या लगाया जा रहा है ? क्‍या यह बाजारू वक्‍तव्‍य पूरी भारतीय स्त्रियों के लिए अपमानजनक नहीं है कि यदि लड़कियां पुस्‍तकालय में आएंगी तो लड़के चारों तरफ मंडराएंगे ? इसमें दोष लड़कियां का है या उन गुंडे लड़कों का ? इसका विस्‍तार तो यह भी हो सकता है कि कल आप यह कहने लगें कि लड़कियों को सड़कों पर जाने से भी रोका जाना चाहिए । और इसी को आगे बढ़ाते हुए कि न वे दफ्तरों में काम करें और न दूसरी सामाजिक जगहों पर दिखाई दें । आपका धर्म उन्‍हें बुरके में रखना चाहता है तो आपके पड़ौसी का धर्म उन्‍हें घूंघट में लपेट कर । क्‍या इन सबको देखकर यह कहा जा सकता है कि भारत 21वीं सदी में प्रवेश कर गया है ?     

क्‍या अंतर है विश्‍वविद्यालय के वाईस चांसलर और खॉंप पंचायतों के फरमानों में जिसकी गाज हर बार महिलाओं/लड़कियों के ऊपर ही गिरती है । पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश के एक मौलाना और ऐसे ही नेता का पिछले वर्ष बयान था कि चालीस वर्ष से कम की महिलाओं/लड़कियां को मोबाईल नहीं दिया जाना चाहिए और न ही अकेले बाजार जाने की इजाजत । दूसरे संगठन और उनके नेता आए दिन लड़कियों के कपड़ों पर रोक लगाते हैं और बलात्‍कार के लिए लडकियों और उनके कपड़ों को जिम्‍मेदार मानते हैं । जब तब ऐसे रूढि़वादी संगठनों के विरोध में आवाजें उठती तो जरूर हैं लेकिन भारतीय समाज विशेषकर उत्‍तर भारती आधुनिक होने के बजाय लड़कियों पर और शिकंजा कस रहा है ।     

इतिहास पर नजर डालें तो निराश होने की कतई जरूरत नहीं है । 100 वर्ष पहले प्रसिद्ध शिक्षाविद् मारिया मांतेश्‍वरी ने जब डॉक्‍टरी पढ़ने की इच्‍छा प्रकट की तो उसका चौतरफा विरोध हुआ था । वे इटली की पहली महिला डॉक्‍टर थीं लेकिन आज इटली समेत दुनिया भर के राष्‍ट्रों में ऐसे किसी प्रतिबंध की कल्‍पना भी नहीं की जा सकती । यहां तक कि डॉक्‍टर, नर्स जैसे पेशे में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले और भी ज्‍यादा हैं । हमारे ही देश में केरल जैसे प्रगतिशील राज्‍यों में महिला नर्सें पूरे देश में बढ़-चढ़ कर सेवाओं में लगी हैं । यहां मलेशिया जैसे राष्‍ट्रों से भी सीखने की जरूरत है । मलेशिया मुस्लिम देश है लेकिन वहां के दफ्तरों और सामाजिक जगहों पर आधे से ज्‍यादा मुस्लिम महिलाएं काम करती नजर आएंगी । यह संभव हुआ है उनको बराबरी की शिक्षा देने और अवसरों में समानता के कारण । यह पूछने पर कि फिर पाकिस्‍तान, अफगानिस्‍तान में क्‍यों महिलाओं पर इतनी पाबंदियां थोपी जाती हैं ? एक बुजुर्ग मलेशियाई महिला का जवाब था कुरान या इस्लाम में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है ।

यदि ऐसा है तो फिर भारत जैसे देश के प्रतिष्ठित विश्‍वविद्यालय अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लड़कियों को पुस्‍तकालय में बैठकर पढ़ने से वंचित क्‍यों रखा जा रहा है ? और भी आश्‍चर्यजनक यह लगता है कि जहां इरफान हबीब जैसे प्रगतिशील इतिहासकार रहे हों, हिंदी के जाने-माने कंम्‍यूनिस्‍ट साहित्‍यकार कुंवर पाल सिंह और दूसरे साहित्‍यकार रहे हों वहां छात्राओं के साथ ऐसा क्‍यों हो रहा था ? जो अलीगढ़ और उसके आसपास के क्षेत्र से परिचित हैं वे जानते हैं कि महिलाओं को जितनी कड़ी पाबंदियों में यहां रहना पड़ता है उतना शायद दुनिया के किसी भी हिस्‍से में नहीं । हिंदू है तो घूंघट काढ़े, गठरी बनी हुई और वैसा ही हाल मुस्लिम लड़कियों और‍महिलाओं का बुरके ओढ़े । लगभग भेड़ की शक्‍ल और झुण्‍डों में ।

सामाजिक जीवन के ज्‍यादातर क्षेत्रों में महिलाओं की यही स्थिति है । पिछले दिनों शिक्षा को समर्पित एकलव्‍य संस्‍थान ने एक कैलेंडर छापा था जिसमें महिला वैज्ञानिकों के चित्र थे । तब अपने अंतर्मन को टटोलने पर पाया कि शायद ही हमारे समाज में महिलाओं को वैज्ञानिक बनने की तरफ प्रेरित किया जाता हो । कारण बहुत स्‍पष्‍ट हैं । विज्ञान की स्‍नातक या स्‍नातकोत्‍तर शिक्षा के लिए प्रयोगशाला जाना जरूरी होता है । ऐसा भी हो सकता है कि किसी प्रयोग को पूरा करने के लिए आपको देर तक प्रयोगशाला में रहना पड़े । यदि शाम या रात हो गई तो लड़कियां या बेटियां लौटेंगी कैसे ? न वे दिल्‍ली जैसे महानगरों में सुरक्षित हैं, न गॉंवों में । यानि बिना किसी कानूनी प्रतिबंध के भी उन्‍हें वह आजादी हासिल नहीं जो यूरोप या पिछले दिनों दक्षिण-पूर्व एशिया के मुल्‍कों में वे हासिल कर चुकी हैं । इस अकेले पैमाने से चॉंद पर छोड़े गये यान और महाशक्ति बनने के दावों की पोल खुल जाती है ।

क्‍या देश की आधी आबादी को ऐसे नियंत्रण में रखने से देश प्रगति कर सकता है ? वक्‍त आ गया है कि हमारी अपनी माला और मलाला मुल्‍ला, पंडितों और खांप के मुखियाओं को चुनौती दें कि हमें संसद और विधान सभाओं में आरक्षण नहीं  चाहिए । हमें चाहिए ऐसी आजादी कि हम मनमर्जी अपने स्‍कूल-कॉलिज चुन सके, पुस्‍तकालय में बैठ सकें, मोबाईल रख सकें जैसे दुनिया की बाकी औरतें कर रही हैं । यदि जरूरत हो तो हमें अमेरिका, यूरोप जैसे मुल्‍कों से सीखने की जरूरत है । बताते हैं कि अमेरिका में जगह-जगह सार्वजनिक पुस्‍तकालय बने हुए हैं और बिना धर्म, जाति, लिंग के सभी के लिए खुले हुए हैं । यहां तक कि एक पुस्‍तकालय से ली हुई किताब किसी दूसरे पुस्‍तकालय में भी जमा की जा सकती है । यह होता है तरीका देश के हर नागरिक को समान अवसर देने और उसे सक्षम बनाने का । आखिर देश नागरिकों से ही तो मिलकर बनता है । भारत जैसे देश में तो पुस्‍तकालय को बढ़ाने और बिना किसी प्रतिबंध के सबको आजादी देने की और भी जरूरत है । यह गरीब देश है । न हर व्‍यक्ति किताबें खरीद सकता और न उसके पास बैठने की सुविधाएं । यहां तो विश्‍वविद्यालय ने भी अति कर दी । छात्राएं विश्‍वविद्यालय पढ़ने के लिए आती हैं वह कलास रूम हो या लाईब्रेरी या दूसरे सेमीनार कक्ष । छात्राओं को वंचित रखना ही समानता के सभी सिद्धांतों का उल्‍लंघन हैं । अच्‍छा हुआ ऐसी खबरों से बराबरी के ढोंग की हकीकत पता लग गई है और छात्राओं के पक्ष में कुछ सकारात्‍मक परिवर्तन आयेगा ।

एक सूत्र में कहा जाए तो किसी समाज या देश की नब्‍ज जानना हो तो आप महिलाओं के साथ उनके सलूक से अंदाजा लगा सकते हैं । दिल्‍ली और मुम्‍बई का अंतर इस बात से जाहिर है कि यहां दिल्‍ली में शाम होने के बाद महिलाएं पूरी तरह से असुरक्षित अनुभव करती हैं । बम्‍बई, केरल या हैदराबाद में अपेक्षाकृत नहीं । पिछले दिनों उत्‍तर-पूर्व की महिलाओं को उनकी विशेष पहचान के कारण दिल्‍ली में और भी परेशानियों का सामना करना पड़ा है ।

महिलाओं के प्रति यह क्रूरता अधिकतर मामलों में उनके धर्म का प्रतिबिम्‍बन है और जब से धर्म और जाति वोट बैंक की तरह देखे जा रहे हैं तब से राजनीतिक सत्‍ताएं इसमें दखलअंदाजी नहीं करना चाहतीं । हाल ही में प्रकाशित कुलदीप नैय्यर की बायोग्राफी में इस बात का जिक्र है कि साठ के दशक में अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय के एक कुलपति बहुत प्रगतिशील विचारों के पक्षधर थे । वे कुछ नये सुधार करना चाहते थे जिससे विश्‍वविद्यालय धर्मांधता से मुक्‍त हो सके । जैसे ही बात तत्‍कालीन दिल्‍ली की सत्‍ता तक पहुंची उन्‍हें संकेत दिया गया कि धर्म के मामलों से दूर रहें । इसके पीछे कारण था कि उत्‍तर प्रदेश के चुनाव बहुत नजदीक थे और किसी भी कारण से वे अल्‍पसंख्‍यक वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहते थे । जब तक अल्‍पसंख्‍यक या बहुसंख्‍यक वोट बैंक की तरह देखे जाते रहेंगे तब तक माला और मलाला दोनों की मुश्किलें बनी रहेंगी । शिक्षा के जिन संस्‍थानों को बराबरी सिखानी चाहिये वहां इसका उल्‍लंघन तो मानवाधिकारों का भी हनन है । हमें ऐसा नेतृत्‍व चाहिये जो आधुनिक समाज के मंदिर कहे जाने वाले स्‍कूलों, विश्‍वविद्यालयों में ऐसे किसी भेदभाव को न होने दे । अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय को तुरंत कदम उठाकर छात्राओं को लाइब्रेरी में पढ़ने की इजाजत दे देनी चाहिये ।

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