हिन्‍दी लेखक की ग्रंथियां

हाल ही में ‘आउटलुक’ पत्रिका द्वारा पूछे प्रश्‍न के जवाब में वरिष्‍ठ कथाकार व चिंतक निर्मल वर्मा ने शताब्‍दी-पुस्‍तकों में जिन लेखकों के नाम गिनाए हैं वे हैं प्रुस्‍ट, विलियम फाकनर और टामस मॉन। लगभग एक वर्ष पहले ‘जनसत्‍ता’ में छपे दस पुस्‍तकों के नाम गिनाए थे उनमें कोई भी उस हिन्‍दी -साहित्‍य की नहीं थी जो इस शताब्‍दी-वर्ष में लिखी गई थी। जो पुस्‍तकें गिनाई वे हैं :

 

  1. महाभारत—भगवद् गीता
  2. रामचरितमानस
  3. गालिब
  4. शेक्‍सपियर के नाटक
  5. जॉन क्विकजोट (सेर्वान्‍ते का उपन्‍यास)
  6. मलार्मे की कविताएं
  7. काफका/ट्रायल
  8. मारकेस (लव इन दि टाइम्‍स ऑफ कॉलरा)
  9. वोरखेस (लेबीरिंथ)
  10. उपनिषद्

 

प्रश्‍न था किसी भी भाषा या देश की कौन-सी 10 पुस्‍तकें हैं जिन्‍होंने आप और आपके लेखन पर असर डाला है ? 10 में से केवल 4 भारतीय हैं और गौर से देखें तो गालिब को छोड़कर शेष तीन हिन्‍दी -साहित्‍य में धर्मग्रंथ के रूप में ज्‍यादा जाने जाते हैं। क्‍या हम इतने दरिद्र हैं ? प्रेमचंद, रवींद्र, शरत्, निराला, नागार्जुन, सुब्रह्मयम भारती से लेकर समस्‍त भारतीय भाषाओं में पिछले सौ-दो सौ साल में कोई इस लायक नहीं हुआ जो इन महानुभवों को प्रभावित कर पाता ?

 

निर्मलजी, कुँवरजी अकेले नहीं हैं प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष ऐसी घोषणाओं में। वर्ष के अंत में होने वाले साहित्‍य-संकलनों में भी ऐसे ही स्‍वर होते हैं । ‘इंडिया टुडे’ (अंग्रेज़ी) हर माह सबसे ज्‍यादा बिकने वाली पुस्‍तकों और उनके प्रकाशकों का ब्‍योरा देते हैं। मैंने आज तक हिन्‍दी  की किताब का नाम उसमें नहीं देखा। हिन्‍दी  की पुस्‍तक का नाम अंग्रेज़ी वाले और दूसरी भाषाओं वाले तो खैर लेते ही नहीं, स्‍वयं हिन्‍दी  वाले भी बड़ी कंजूसी से लेते हैं।

 

 

हम सब ग्‍लोबलाइजेशन के नाम से ही बिदकते हैं और उसमें उपभोक्‍तावाद, अपसंस्‍कृति, पश्चिम की दादागिरी के परचम उठाए,‘स्‍वदेशी स्‍वदेशी’ चिल्‍लाने लगते   हैं । तब इन्‍हें हर सामने वाला देशद्रोही, अपसंस्‍कृति का पोषक और पश्चिम का पुछल्‍ला नजर आता है। पेप्‍सी के साथ-साथ विदेशी स्‍कॉच पीते हुए भी ये बड़ी बेशर्मी से आलू के चिप्‍स खाने वाले बच्‍चों और उनके बापों की खबर लेना इनका दैनिक व्‍यसन है।

 

हिन्‍दी -आलोचना तो मानो विदेशी छोंक लगाए बिना आलोचना ही नहीं है। ‘पूर्वाग्रही घराने’ द्वारा डंके की चोट पर शुरू किए गए इस अभियान ने अब दिल्‍ली के आलोचकों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है, विशेषकर दो-एक नए आलोचक तो अपनी समीक्षा की टिप्‍पणी किसी विदेशी लेखक के उद्धरण की अगरबत्‍ती जलाकर ही प्रारंभ करते हैं । एक आलोचक कवि ने तो अपनी पहली कहानी के शुरू तक में ऐसा उद्धरण जड़कर ही कहानी का ‘गणेशाय नम:’ किया । ये लेखक उस पार्टी के कार्डधारी कर्ता-धर्ता हैं जो विदेशी कंपनियों के दखल के विरोध में सर्वाधिक मुखर है। यहां यह स्‍पष्‍ट कर दूँ—उस पार्टी का विरोध सच्‍चा विरोध है; लेकिन इनका क्‍या किया जाए जिन्‍हें साहित्‍य में सब-कुछ विदेशी ही पसंद है। पढ़े-लिखे उदारमना जो ठहरे ।

 

मौजूदा परिदृश्‍य में स्थिति यह है कि सब एक-दूसरे को दोषी पाते हैं या उसे सिद्ध करते हैं । लेखक तो इसे अपना जन्‍मसिद्ध अधिकार समझते ही हैं कि वे सब जनता-समेत सभी राजनेताओं तक को देशी भावनाओं, रहन-सहन को प्रोत्‍साहित करने का प्रवचन दें । राजनेता लेखकों से आवाहन करते हैं कि वे समाज को चलाने के लिए उसके आगे-आगे देशी लालटेन जलाएँ और वे स्‍वयं बल्‍ब और सोडियम ट्यूब की रोशनी में मस्‍ती करें । पत्रकार की स्थिति दोनों से मिलती-जुलती है—पीजा, और रम पीते हुए देशी मट्ठे की तारीफ में लिखना । व्‍यवसायी/उद्यमी यों तो अपने व्‍यापार की खातिर स्‍वदेशी का जाप जपते हैं, पर अपनी इच्‍छाओं की पूर्ति उन्‍हें ग्‍लोबल चीजों में ही नज़र आती है । इसी दुश्‍चक्र में है देश की नीति, अर्थनीति और राजनीति।

 

फिर भी लेखक की जिम्‍मेदारी यहां सबसे ज्‍यादा है । कम-से-कम वे तो अपने साहित्‍य और संस्‍कृति को इतनी हीन ग्रंथि से न देखें कि उन्‍हें 10 में से आधी पुस्‍तकें भी अपने समाज के लेखकों की प्रभावित करने वाली न लगें। आत्‍म-धिकार की भी एक सीमा होती है । आपका दृष्टिकोण वैश्विक है, लेकिन जहां खड़े हैं वह भी तो विश्‍व का ही हिस्‍सा है। यदि ऐसा है तो उन्‍हें ही कौन पूछेगा या पूछ रहा है ? कहीं उन्‍हें यह मुगालता तो नहीं कि उन्‍हें भी विदेशी लेखक उद्धृत करेंगे, इसलिए उन्‍हें दरियादिली, उदारमनस्‍वता से काम लेना चाहिए ?

 

ये वही लोग हैं जो जनता से रात-दिन अपनी भाषा-संस्‍कृति-साहित्‍य पर गर्व करने-कराने के लिए स्‍वयं अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों की तरफ लपके रहते हैं। इनकी कथनी और करनी का अंतर उन राजनेताओं, नौकरशाहों से रत्‍ती भर भी कम नहीं, बल्कि ज्‍यादा कहा जाएगा ।

 

ऐसे साक्षात्‍कार को पढ़कर आम पाठक किस पुस्‍तक को पढ़ने की प्रेरणा लेगा ? पश्चिम की या अपनी ? धार्मिक या वैज्ञानिक ‘लौट-फिरकर वही विदेशी पुस्‍तकें, विदेशी नाम’। और इधर मुँह करते ही हमारी संस्‍कृति, हमारी भाषा, हमारे लेखक। दूरदर्शन भी तो लगभग यही कर रहा है—जय हनुमान, जय श्री कृष्‍ण या पश्चिमी तर्ज पर   अंताक्षरी । और हम इसे तो लतियाते हैं, लेकिन इन बड़े लेखकों को इसी संदर्भ में बहुत पढ़ा-लिखा मानकर माफ कर देते हैं ।

 

कहीं यह दिखाने की संस्‍कृति का ही हिस्‍सा तो नहीं है ?

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