हिन्‍दी लेखक और प्रकाशक

हाल ही में सम्पन्न विश्व पुस्तक मेला लौट-लौटकर मेरे सामने आ खड़ा होता है । विश्व पुस्तक मेले का मतलब एक आम हिन्‍दी पाठक के लिये हिन्दी मंडप ही होता है । पिछले कई वर्षों से इसमें शामिल प्रकाशकों की संख्या लगातार बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है । अकेले इस तथ्य से आप एक साथ कई गलत निष्कर्षें की तरफ बढ़ सकते हैं । जैसे कि यदि प्रकाशक बढ़ रहे हैं तो पुस्तकों की दुनिया भी बढ़ रही होगी और पुस्तकों की दुनिया का सीधा मतलब है पाठकों की संख्या । एकदम गलत । होना तो वैसे यही समीकरण चाहिये लेकिन गणित इतना सरल नहीं है । मैंने प्रकाशक से पूछा इस पुस्तक की कितनी प्रति बिकी हैं ? बड़े झिझक से बोला केवल एक । यह पुस्तक के अंतिम दिन की बात है और कुल पाठकीय बिक्री कितनी हुई है ? बोला दस हजार रुपये की मुश्किल से । उसके पास बच्चों की किताबों सहित 100 पुस्तकें हैं । यदि दस दिनों में मेले में इतनी बिक्री हुई है तो खरीदकर पढ़ने वाले पाठकों की संख्या का अनुमान लगाया जा सकता है ।

लेकिन तुरंत यह निष्कर्ष निकालना भी गलत है कि खरीदने वाले पाठक नहीं हैं । पेपर बैक हिन्दी पाठक अभी भी खरीदता है । क्योंकि उसकी आर्थिक क्षमता में वही संभव है । जन चेतना, साहित्य, उपक्रम, संवाद, वसुंधरा या अन्य बड़े प्रकाशकों के यहाँ जो भीड़ थी वह इन्हीं पेपरबैक पुस्तकों की खरीद के लिये थी और यहाँ कुछ स्टॉलों पर लाखों की बिक्री हुई ।

इस पुस्तक मेले की अच्छी बात यह कही जा सकती है कि कुछ प्रकाशकों ने यह एहसास किया है कि बिना पेपरबैक के पाठक नहीं आने वाला । सजिल्द पुस्तकें पुस्तकालयों के खारे कुएं में तो झोंकी जा सकती है, व्यक्तिगत हिन्दी पाठक के झोले में नहीं । पुस्तकों को एक वाजिब कम कीमत पर निकालने की बात प्रकाशक जितना जल्दी समझ लें उतना ही अच्छा है । यह लेखक, प्रकाशक पाठक और स्वयं हिन्दी भाषा के हित की बात है । लेखक तभी तक लेखक है जब तक कि उसका कोई पाठक है । वरना आप लाख एक-दूसरे का परिचय बताते रहिये कि ये बहुत बड़े लेखक हैं, सामने वाले के चेहरे पर तो भाव तभी आयेगा जब उसने उसकी कोई किताब देखी हो, पढ़ी हो । प्रकाशक की फिलहाल की फिजां में तो यह संभव नहीं लग रहा । यदि राजभाषा नीतियों की विकृति से उपजी सरकारी खरीद बंद हो जाये तो कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ते प्रकाशन गृह तुरंत बंद हो जायेंगे । यानि कि हिन्दी प्रकाशन जगत के भ्रष्टाचार की बदौलत पाठक तो पहले ही नहीं बचा, प्रकाशक भी नहीं रहेगा । अतः दूर दृष्टि का तकाजा है कि प्रकाशक लेखक को भी जिंदा रखे और अपने धंधे को भी ।

प्रकाशक को जैसे ही यह सलाह दी जाती है वह या तो अकड़ में आपसे बात ही नहीं करेगा या तुरंत कहेगा हिन्दी में पाठकों के भरोसे हमारा पेट नहीं भर सकता । उसकी बात आंशिक रूप से सच भी है लेकिन इस स्थिति के लिये लेखक के साथ-साथ प्रकाशक भी कम जिम्मेदार नहीं है । यदि ऐसा न होता तो जो कल तक पुस्तकें सप्लाई करते थे या प्रिटिंग प्रेस या कागज के व्यवसाय में थे वे सबके सब प्रकाशक नहीं बन जाते और रातों-रात सौ-सौ किताबों का सेट नहीं ले आते । इसकी खास वजह है पुस्तक की कीमत आठ से बीस गुना ज्यादा रखी जाये । पचास प्रतिशत तक की छूट के बावजूद उसके मुनाफे की कल्पना की जा सकती है । यही कारण है कि यदि किसी ने प्रयोग के तौर पर भी शुरू में एक-दो पुस्तकें भी छापी तो उसके ठाठ में भी इस व्यवसाय का चस्का लगते देर नहीं लगी है और वह मजे में साल-दो-साल में कार बंगला वाला प्रकाशक हो जाता है । ऊपर से उसके प्रभा मंडल में शान अलग । पुलिस, विश्वविद्यालय, राजस्व, रेलवे समेत भारत सरकार के आला अफसर या उनकी बीवियों की लिखी पुस्तकों के ढेर उसके सामने लगे हैं । यह उसकी मर्जी पर है कि वह उसमें से किसे छापकर उपकृत करे । बिक्री तो ये अफसर स्वयं करायेंगे ही । उन्हें लेखक बनने का खिताब और अहं की पुष्टि और इधर प्रकाशक की चांदी । पुस्तकें एक-एक ऊंची कीमत पर लाइब्रेरी उर्फ खारे कुएँ के हवाले । यहाँ तक कि बड़े लेखक, आलोचक भी इसी समीकरण का हिस्सा बन चुके हैं । इनका लेखन में नाम बड़ा है तो इनके प्रकाशक भी दिल्ली के नम्बर वन की कोटि के हैं । ये भले ही लायब्रेरी खरीद के खिलाफ वर्षों से लेख लिख रहे हें, क्या ये शपथ लेकर कह सकते हैं कि इन्होंने इतनी महंगी किताबों को स्वयं लायब्रेरी में खरीदने को क्यों और कैसे अनुशंषा की । या कभी इन्होंने स्वयं अपनी पुस्तक की कीमत कम रखने के लिये प्रकाशक को मजबूर किया ? बात-बात पर सत्ता, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री को गाली देकर चुनौती देने वाले इन दर्जनों लेखकों, पत्रकारों को प्रकाशक के सामने भीगी बिल्ली की तरह खड़े देखा जा सकता है । यहाँ तक कि ये बढ़-चढ़कर कभी महात्मा गांधी विश्वविद्यालय से इन प्रकाशकों की किताबों को आसमानी कीमत पर छपवाते हैं तो कभी उन्हें मिल बैठकर इसलिये पुरस्कृत करते हैं कि कम-से-कम हजार-पांच सौ प्रतियों पुरस्कार के बूते सरकारी खरीद में तो शामिल हो ही जायेंगी । कुछ अपने संपादन में इन्हीं प्रकाशक विशेष की पुस्तकों की चर्चा या समीक्षा कराके प्रकाशक की जर्रानवाजी हासिल करना चाहते हैं । पिछले दिनों कुछ लेखक भी अपने बेटा-बेटी की खातिर प्रकाशन में कूद पड़े हैं । अफसोस की बात यह कि कल तक इनमें से कुछ प्रकाशक को कीमतें कम करने का उपदेश देते नहीं थमते थे, लेकिन स्वयं भी उन्हीं हथकंडों को अपना रहे हैं । यानि कि आठ गुनी कीमत और लायब्रेरी का सहारा । यदि हिन्दी लेखक, भाषा और पुस्तक को विलुप्त होने से बचना है तो इन सभी अनुभवों से सीखने की जरूरत है और एक सांस्कृतिक आंदोलन की तरह इसे जारी रखना है ।

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