हिन्‍दी में कुछ-कुछ

लिफ्ट से उतरते और कुछ मोबाइल की गिरफ्त में मैं अचानक उन्हें पहचान नहीं पाया । ‘मैं अमुक हूं । मैंने आपकी कविता पढ़ी थी । बहुत अच्छी थी । हम आपकी कविताएं खूब पढ़ते हैं ।’ उनके साथ उतनी ही महंगी सिल्क साड़ी में सजी दूसरी महिला बोली और तीसरी को बताने लगी ‘ये हिन्‍दी में कुछ-कुछ लिखते हैं । आप कैसे लिख लेते हैं आदि-आदि ।’ अच्छा हुआ सरकारी मित्रों की इन पत्नियों ने परिचय दे दिया वरना दिमाग इसमें तो उलझता ही कि मेरी अंतिम कविता अस्सी के दशक में कब छपी थी, इससे ज्यादा दिमाग को चक्कर इसमें आते कि ये मित्र थे कौन । हिन्‍दी पट्टी के ज्यादातर लेखकों को ऐसे अनुभवों से गुजरना पड़ता है जब उनकी कहानी को कोई लेख बताता है, तो कोई लेख को व्यंग्य या कुछ और । संस्मरण, रिपोर्ताज, आत्मकथा, समीक्षा जैसे शब्दों को तो ज्यादातर जानते तक नहीं । अफसोस सबसे ज्यादा तब होता है जब लम्बी कहानी, आलोचना लेख तक को कहते हैं कि कविता पढ़ी थी । अखबार में पढ़ी चीज को पत्रिका में और पत्रिका को अखबार भी उसी सहज भाव से कहते हैं ।

इन महिलाओं की गिनती डिग्री की तराजू पर समाज की सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी महिलाओं में कर सकते हैं । संभ्रात पढ़े-लिखे परिवारों की हैं । पति ऊंची सरकारी नौकरियों में हैं । और सबसे अनौखी अलौकिक बात यह भी कि सरकारी संगठन, उपक्रम द्वारा प्रकाशित पत्रिका के संपादक मंडल में भी हैं । आज ये संपादक मंडल की बैठक में आयी थीं । जब द्विभाषी पत्रिका के संपादक मंडल की हिन्‍दी साहित्य की विधाओं के बारे में यह समझ है तो पत्रिका क्या होंगी आप अंदाजा लगा सकते हैं । ये सरकारी पत्रिकाएं इतने चिकने-चिपुड़े कागज पर छपती हैं कि आंखें फिसलने लगें । लेकिन आंखों को फिसलने से रोकने का भी इंतजाम हैं । पन्ने तो खोलिये । पृष्ठ दर पृष्ठ रंगीन फोटो । उपहार बांटते । पुरस्कार लेते, देते । वैसे अगले अंकों में ‘बूझो तो जाने शीर्षक’ से एक प्रतियोगिता इस बात की होनी चाहिये कि कौन पुरस्कार लेने वाला था और कौन देने वाला । इनमें पुरस्कार लेने वाला इतने मरियल तुड़ी-मुड़ी पोशाक में नहीं होता जिसे आप सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और रघुबीर सहाय के ‘रामदास’ की तरह तुरंत पहचान लें । शुरू के कई पृष्ठों पर उस जे.बी. संगठन के अध्यक्ष, नेता, सैक्रेटरी के ऐसे आप्त वचन पूरे पृष्ठ के फोटों के साथ छपे होते हैं कि उसे देखकर सिर्फ सरकारी आदमी ही प्रसन्न हो सकता है । बीच में कहीं कोई साहित्यनुमा चीज पढ़ने को मिल गयी तो आपका सौभाग्य । वैसे योग और भोग के प्रतापी युग में व्यंजनों और योग पर अवश्य हर अंक में कुछ न कुछ मिलेगा । अपने-अपने बाबाओं, गुरूओं के फोटो के साथ । यदि इसमें कुछ हिन्‍दी भाषा में हुआ तो वे आपको खुश करने के लिये यह बताना भी नहीं भूलते कि हमने हिन्‍दी में भी कुछ-कुछ दिया है । वाह । दे दो पद्मश्री हाथों हाथ इन्हें हिन्‍दी का उपकार करने के लिये । और यह भी कि यदि संपादक मंडल या संगठन की सर्वेसर्वा ने ये लेख लिखा है तो उनकी उस कमसिन उम्र का फोटो होगा जिससे आगे आपके आंखें बढ़ेंगी ही नहीं ।

वैसे इन सरकारी उपक्रमों की पत्रिकाओं से रूबरू होना उस पूरे सच, सरकारी यथार्थ से रूबरू होना भी है । प्रेमचंद की एक कहानी का सहारा लूं तो सच आदमी तुरंत बोलता है, झूठ के लिये कई बार सोचना पड़ता है खोखलेपन, आडंबर, अपव्यय, सतहीपन के दर्शन हिन्‍दी की ऐसी ही पत्रिकाओं और उन्‍हें निकालने वालों में ही हो सकते हैं ।

आखिर हिन्‍दी विधाओं, साहित्य की इस समझ के लिये जिम्मेदार कौन है ? परिवार, स्कूल, संगठन या पूरा समाज ? या अंग्रेजी की नकल जिसमें ज्यादातर चीजों को ‘आर्टिकल या पोइम’ के खाने में रखा जाता है । बंगला, मलयालम के लेखक को तो ऐसे दुर्भाग्य से शायद नहीं ही गुजरना पड़ता होगा । कुछ लोग तसल्ली इस बात से भी कर सकते हैं कि ‘यार ! पढ़ी तो । उसे वे कविता मानें या कहानी ।’ लेकिन नहीं । भारतेन्दु से शुरूआत मानें तो हिन्दी की 150 वर्ष की यात्रा का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता कि हिन्दी की इतनी समृध्द विधाओं को यहाँ का पढ़ा-लिखा समाज इतना ‘गैल का बथुआ’ मानकर चले । हमारे उन कर्णधारों को कुछ सोचने और करने की जरूरत है तो शिक्षा संगठनों, बोर्डों, विश्वविद्यालयों में वाइसचांसलर, चेयरमैन, सेक्रेटरी हैं । जब तक मैट्रिक तक हिन्दी को गंभीर ढंग से नहीं पढ़ाया जाता, एक समझ पैदा नहीं की जाती तब तक ऐसी विद्रूपताओं से सामना रोज होता रहेगा । कम-से-कम माँ-बाप हिन्दी के अखबारों, पत्रिकाओं से भी अगली पीढ़ी को हिन्दी की इन विधाओं के परस्पर संबंध या अंतर को समझा सकते हैं । सब कुछ स्कूल पर भी नहीं छोड़ा जा सकता ।

ऐसा नहीं कि हिन्दी विधाओं की समझ के लचर के नायाब नमूने ये बनी-ठनी महिलायें या टाई, शूट वाले इनके पति ही हैं । खुर्जा के एक महाविद्यालय के हिन्दी के प्राचार्य किसी लेखक की मोटी ताजी किताबों के नामों का परिचय इस रूप में दे रहे थे कि इन्होंने अमूक लेख लिखे हैं । टाई, शूट उनके वैसे ही थे जैसे लार्ड कार्नवालिस या मार्ले मिंटो पहनते थे । बस हिन्दी पट्टी का नवधनाढ्य वर्ग कभी इससे आगे नहीं बढ़ा । ऐसे मोड़ पर याद आते हैं नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, नित्यानंद तिवारी जैसे विद्वान । ‘जे.एन.यू. में नामवर सिंह’ पुस्तक पढ़ते वक्त पहली बार यह बात दिमाग में और फख्र से रेखांकित हुई कि जे.एन.यू. निर्माण के उस अंग्रेजी माहौल में नामवर जी उस उम्र में भी धोती कुर्ता में अपना लोहा मनवा पाये । अमूल के योध्दा वर्गीज कुरियन को जब बडौदा के सरकारी संस्थान ने प्लेट में रखकर टाई दी तो उन्होंने विनम्रता से वहीं वापस यह कहते हुए कर दी कि किसानों के बीच टाई कहाँ लगाऊंगा । समझ और विचार का दम हो तो चोगा बदलने की जरूरत कमजोरों को ही होती है । यह बात मुझे कुछ दिन पूर्व ‘हंस’ संपादक के कक्ष से बाहर निकलते टाई बांधे उस हिन्दी प्राध्यापक को देखकर ज्यादा याद आयी जो हिन्दी में कुछ भाषण के लिये आई.आई.सी. निकल रहे थे ।

हिन्दी समाज में कुछ तो ऐसी जड़ता है ही जो समझने और बदलने का नाम नहीं लेती ।

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