हिन्‍दी का कुआं

ऐसी खबरें बहुत दूर और देर तक आहत करती हैं । राष्ट्रीय नाटय विद्यालय द्वारा आयोजित कविता पाठ की कड़ी में जब कन्नड़ कवि नाटककार एच एस शिव प्रकाश सभागार में पहुंचे तो वहाँ एक भी श्रोता नहीं था । आधे घंटे के इंतजार के बाद भी कोई नहीं आया । हिन्‍दी  कवि के साथ ऐसा होता अच्छी बात तो तब भी नहीं थी लेकिन एक करोड़ से अधिक की आबादी वाले हिन्‍दी  भाषी शहर में दूसरी भारतीय भाषा के साथ ऐसा होना बरदाश्त से बाहर है । क्या इसे हिन्‍दी  वालों का दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ व्यवहार का एक नमूना माना जाए । क्या शिव प्रकाश इस घटना के बाद हिन्‍दी  के प्रति वैसे ही सहनशील, संवेदनशील बने रह पायेंगे ? क्या यह प्रकरण इस बात का ताजा प्रमाण नहीं है कि प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च करने और साठ साल से राजभाषा के तानपुरे को देश-विदेश में बजाने के वाबजूद हिन्‍दी  के प्रति आदर सम्मान क्यों कम होता गया ।

 

ऐसा रातों-रात नहीं हुआ । जैसे जातिवाद, सामन्तशाही की जड़ें सैकड़ों साल में इतनी गहराई तक पहुंची है वैसा ही हिन्‍दी  की दुनिया में हुआ है । यहाँ सिर्फ अपने को, अपने विचार  को सर्वश्रेष्ठ मानने-मनवाने की सार्वजनिक रूप से शिक्षा दी जाती है । प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कभी जातिवादी आग्रह से तो कभी क्षेत्रीयता के दवाब में । पाठयक्रम समिति के अनुभवों पर ही नजर डालूं तो ये लक्षण कभी-कभी इतनी तीखे होकर सामने आते थे कि आप तोबा कर लें । किसी के नाम से कोई बिदक सकता है तो किसी के काम से । असहिष्णुता या क्रूरपक्षधरता के ऐसे पाठ प्रतिबद्धता, विचारधारा के नाम पर इतनी बार पढ़ाये गये हैं कि स्वयं हिन्‍दी  की दुनिया ही तार-तार नजर आती है। इसी का थोड़ा और विस्तार कुछ हद तक कवि शिव प्रकाश प्रकरण में लक्षित है।

 

आजादी के तुरंत बाद की स्थिति पर नजर डालें तो ऐसे प्रकरणों से भी कुछ सीखा जा सकता है । गांधी, राजगोपालाचार्य, आयंगर, मालवीय सभी हिन्‍दी या हिन्‍दुस्तानी के हिमायती थे । लेकिन जैसे-जैसे राजभाषा के राजकीय अश्वमेघ रथ पर सवार बांके संविधान की दुहाई देते हुए धारा तीन-तीन के कोड़े लेकर चाबुक बरसाने लगे,  देश हिन्‍दी  से दूर होता गया । हाल ही में प्रकाशित प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा की पुस्तक ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में बहुत विस्तार और निष्पक्षता से देश की भाषा समस्या का विवेचन किया गया है । रामचंद्र गुहा का यह निष्कर्ष सही लगता है कि यदि एक अनूठे धैर्य और साहस के साथ नेहरू ने भाषा के मामले में लचीली और आत्मसाती नीति नहीं अपनायी होती तो आज मौजूदा भारत भी कम से कम उतने टुकड़ों में नजर आता जितना पूर्व सोवियत संघ । एक भाषा एक राष्ट्र के नारे ने सोवियत संघ के तोड़ने की भूमिका तैयार की तो पाकिस्तान ने उर्दू को पूर्वी हिस्से पर थोपकर बंगलादेश बनाने की । श्रीलंका के जातीय संघर्ष में भी तमिल भाषियों पर सिंहल भाषा थोपे जाने की अहम भूमिका है । शुरू के दशकों में देश-विदेश के राजनीतिक पंडितों की देश के टूटने की बार-बार चेतावनियों और संदेशों के बाद भी यदि राष्ट्र कायम है तो इसमें भाषा के लचीलेपन और परस्पर सम्मान और सौहार्द का कम योगदान नहीं है।

 

भविष्य में इसी सौहार्द और मुहब्बत को बढ़ाने की जरूरत है । विशेषकर अहिन्‍दी  भाषी राज्यों के साथ । त्रिभाषा फार्मूला हिन्‍दी  राज्यों में क्यों आज तक लागू नहीं हुआ ? राजभाषा नीति और उससे पैदा लोकतंत्र का यह अंतर्निहित संदेश तो नहीं था । क्यों सामाजिक न्याय का दर्शन भी दशकों की बहस के बावजूद चंद शब्दों से आगे नहीं बढ़ पाया ? जब दक्षिण के पांच-सात राज्यों की भाषा का कोई चिह्न भी इन राज्यों में ढूठे नहीं मिले तो क्या भाषा का यह रूप भविष्य में अलगाव को बढ़ावा नहीं देगा । हर बार के रूदन क्रंदन की तरह थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि संसाधनों के अभाव में जब हिन्‍दी भाषी राज्य अपने बच्चों तक को अपनी भाषा में स्कूली शिक्षा नहीं मुहैया करा पा रहे हैं तो दूसरी भाषा की शिक्षा कैसे दे सकते हैं ? लेकिन किसी दूसरे विकल्प की तलाश तो की ही जा सकती है । क्या बी.ए., एम.ए.के स्कूल कॉलेज के पाठ्यक्रमों में दक्षिण भारतीय या उत्तर पूर्व के लेखकों की अनूदित रचनाओं को ज्यादा से ज्यादा शामिल करके इस कमी को कुछ हद तक पूरा नहीं किया जा सकता । यशपाल दर्शन के तहत बने एन.सी.ई.आर.टी. के नए स्कूली पाठ्यक्रम में इस ओर पर्याप्त ध्यान दिया गया है लेकिन विश्वविद्यालय स्तर पर अभी बहुत बड़े पैमाने पर भाषा समन्वय की इस दिशा में काम करने की जरूरत है । एन.सी.ई.आर.टी. की तरह विश्वविद्यालय स्तर पर भी ऐसा प्रयास अपेक्षित है । दूसरी भारतीय भाषाओं को जानना दूर-दूर के उन समाजों, भूगोल, इतिहास, परंपरा, संस्कृति को समझना है जिनके बिना भारत शब्द की कल्पना नहीं की जा सकती । शुद्ध ज्ञान की परिभाषा पर भी यह बात खरी उतरती है । नयी भाषा यानि कि उस भाषा में उपलब्ध सारे ज्ञान तक आपकी पहुंच । अभी तो हिन्‍दी  प्रांतों में भाषाशिक्षण इस ढंग से हो रहा है कि उन्हें हिन्‍दी  भी नहीं आती । कन्नड़ की तो बात ही छोड़िए ।

 

वैसे ऐसा नहीं है कि हिन्‍दी  के सभागारों में यह पहली बार हुआ हो लेकिन दूसरी भारतीय भाषाओं के कवि-लेखक मन से पढ़े-पढ़ाये जाते तो हिन्‍दी  के इस कुएं में इतना अंधेरा नहीं होता ।

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