हिन्दी साहित्‍य की पाठकीयता (समकालीन सरोकार – फरवरी 2013)

क्या हिन्दी साहित्‍य की पाठकीयता घट रही है ? यदि हॉं तो बढ़े कैसे ? (समकालीन सरोकार – फरवरी 2013)
बहस/विमर्श
पहले कुछ अनुभव :- दिल्ली के जाने-माने स्कूल डी.पी.एस. (अब तो पूरे देश भर में हैं) में सितम्बर के महीने में हिंदी दिवस के आयोजन में जाना हुआ । घंटे-दो-घंटे तक कई तरह की पूजा-अर्चना हिंदी के बहाने हिंदी में हुई । एक छोटा सा नाटक हुआ । दर्जनों कविताएं पढ़ी गईं । एक अतिथि के नाते अब मेरी बारी थी । अच्छी बात यह थी कि सभागृह बच्चों और शिक्षकों से भरा हुआ था । शायद बारहवीं तक के बच्चे। । मैंने अपनी बात के क्रम में बच्चों के सामने प्रश्न उछाला । क्या आपने पिछले दो-चार वर्षों में हिंदी की कोई किताब पढ़ी है ? माहौल एकदम चुप्पी में बदल गया । दो-चार नहीं, पिछले दस वर्षों में ? चुप्पी और घनी हो गई । हिंदी के एक-दो शिक्षकों के चेहरों पर बेचैनी साफ नजर आ रही थी । उन्होंने बच्चों को उकसाने की कोशिश की तो एक बच्चे ने हाथ उठाकर कहा ‘सरस भारती’ । एक और हाथ आगे आया ‘बाल भारती’ यानि कि कोशिश के बावजूद भी वे सिर्फ अपने पाठ्यक्रम में लगी हिंदी की किताब का नाम बता पाए । बात मैंने यहीं खत्म नहीं होने दी । मैंने पूछा अंग्रेजी की कोई पढ़ी ? मानो पूरे हॉल में रोशनी लौट आई हो । किसी ने ‘अलकेमिस्ट’ का नाम लिया तो किसी ने चेतन भगत आदि की दर्जनों अंग्रेजी की देशी-विदेशी किताबों के नाम गिना दिये ।

दूसरा अनुभव :- दिल्ली राज्य का ही एक और विश्व विख्यात संस्थान- दिल्ली मेट्रो कारपोरेशन । हिंदी पखवाड़े के वैसे ही दिन और आयोजन । इस बार श्रोता कर्मचारी और अफसर थे । वैसा ही प्रश्न कोई किताब या पिछले पांच-दस वर्ष में पढ़ी या खरीदी हो ? यहां खरीदना मैंने जान-बूझकर जोड़ा था । वैसी ही चुप्पी । एक दो ने प्रेमचंद या रवीन्द्र नाथ टैगोर की किसी कहानी, उपन्यास का नाम बताया और एक श्रोता ने उत्साह में किताब का नाम ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ बताया और उसका लेखक बताया प्रेमचंद । सैंकड़ों अनुभवों में से बस एक और । हिंदी किताबों की खरीद के लिए हम समिति के मेम्बदर बैठे थे । मैं इधर आई जिस भी नयी किताब, उपन्यास का नाम लेता सरकार में हिंदी का ब्रांड एम्बेसडर उर्फ घोषित हिंदी अधिकारी सहमत नहीं होता । उसकी हर बार ना इस आधार पर होती कि हमने तो ये नाम कभी नहीं सुने । हार कर मुझे कहना पड़ा कि ‘तो आप ही पुस्तक और लेखकों के नाम सुझाइये जो आपने पढ़ी हों ।’ इस घेरे में आते ही उनका सच सामने आ गया । मैंने पिछले पन्द्रह सालों में कोई किताब नहीं पढ़ी । किताब पढ़ने की फुर्सत कहां मिलती है। सरकार में अनुवाद, संसदीय समितियां, आंकड़े जुटाने का काम इतना होता है ।

यानि कि जिस हिंदी या हिन्दुस्तानी को स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई से गुजरे महापुरुषों ने अपने अनुभवों के आधार पर- महात्मा गांधी से लेकर अम्बेडकर, राजगोपालाचारी, नेहरू, मौलाना आजाद, टंडन, रवीन्द्र नाथ ठाकुर तक ने देश में सबसे ज्यादा बोली, समझी जाने वाली भाषा के रूप में आगे किया था आज न उसे स्कूल के विद्यार्थी पढ़ रहे हैं, न राजभाषा के वे कर्मचारी जिन पर सरकार करोड़ों खर्च कर रही है । यही कारण है कि हिंदी साहित्य की किताब सौ वर्ष पहले जरूर एक हजार छपती थीं आज सिमटकर तीन सौ से पांच सौ प्रतियों तक रह गई हैं । यहां प्रेमचंद को स्मरण करना प्रासंगिक रहेगा । 1907 में ‘सोजे वतन’ पर जब पाबंदी लगाई गई और प्रेमचंद की पेशी उत्तर प्रदेश के जिला मेजिस्ट्रेड के सामने हुई तो उनसे पूछा गया कि कितनी प्रतियां छपी थीं । प्रेमचंद का जवाब था तीन सौ बिक गई हैं सात सौ बाकी हैं । याद कीजिए उस समय आज के मुकाबले कितनी कम आबादी थी और उसमें भी कितने निरक्षर थे और राज भी अंग्रेजी था । यानि कि अंग्रेजी राज में हिंदी भाषा और साहित्यन और किताबों की स्थिति बेहतर थी बजाए आज के ।

यहां हम स्पष्टत: हिंदी साहित्य की पठनीयता की बात कर रहे हैं अखबारी संख्या की नहीं । पिछले दिनों विश्व बैंक के साक्षरता अभियान के तहत साक्षर हुए उनकी भी नहीं जिनकी संख्या को हिंदी अखबारों की संख्या के साथ जोड़ कर पठनीयता के बढ़ने का भ्रम फैलाया जाता है । वैसे इनका हिंदी अखबार पढ़ना भी कम उत्साहवर्धक नहीं है । इसे भी एक अच्छा लक्षण मानना चाहिए । लेकिन साक्षरता के इस फैलाव को हिंदी के अच्छे साहित्यह की पठनीयता से कैसे जोड़ा जाए; यह हमारे पूरे सांस्कृतिक, शैक्षिक विमर्श के लिए बड़ी चुनौती है ।

मैं इस पूरे विमर्श को एक बड़ी उम्मीद से देखता हूँ । विशेषकर जनता के भरोसे पर । क्या ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की सफलता हिंदी की ताकत की मिसाल नहीं है ? क्या किसी और भाषा में यह कार्यक्रम इतना सफल हो सकता है ? हिंदी फिल्में और संगीत बार-बार यह सिद्ध करते हैं कि न केवल देश बल्कि विदेशों में भी हिंदी आज भी उतनी ही लोकप्रिय है जितनी कि पचास के दशक में । तो फिर हिंदी स्कूलों, सरकारी दफ्तरों या हमारे विश्वविद्यालयों से गायब क्यों होती जा रही है ? याद रखिऐ जब भाषा स्कू्ल से गायब होती जाती है तो देर सवेर उसे देश से भी गायब होने में समय नहीं लगेगा ।

पाठक बढ़े कैसे ? – मैं पिछले लगभग तीस वर्ष से दिल्ली में हूं । तीस वर्षों में दिल्ली की आबादी दस गुना बढ़ी है लेकिन सरकारी स्कूल उसी अनुपात में कम होते जा रहे हैं । सरकारी स्कूल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का वह नमूना है जिसे राष्ट्र और राज्य‍ कहलाने के हक और अधिकार के बूते और संविधान में प्रदत्‍त समानता के स्वप्न को पाने की खातिर पूरा करना ही चाहिए । किसी वक्त हर नागरिक के लिए सरकारी शिक्षा अस्सी-नब्बे प्रतिशत लोगों के लिए सहज उपलब्ध थी और इसी अनुपात में हिंदी समेत भारतीय भाषाओं की पढ़ाई-लिखाई और प्रोत्साउहन भी । शायद इसी दबाव के तहत और लोहिया जैसे राजनेता के कारण अपनी भाषा के प्रति उत्साह था । कौन भूल सकता है डॉ.दौलत सिंह कोठारी को ? न केवल एक वैज्ञानिक, शिक्षा विद के नाते बल्कि संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवाओं में अपनी भाषाओं में उत्तर लिखने की छूट देने वाले । 1980 के आसपास के वे वर्ष सचमुच भारतीय भाषाओं के लिए चमकते सूर्य के समान थे । उसी अनुपात में हिंदी पाठकों को समर्थ करने वाली पत्रिकाएं दिनमान, सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान । उत्तर प्रदेश का अनुवाद, राजस्थान, मध्य प्रदेश की ग्रंथ अकादमियॉं, मेकमिलन आदि प्रकाशकों से हिंदी की मौलिक किताबें, अनुवाद भी खूब सामने आईं ।

पतन की शुरूआत अस्सी के बाद होती है और नब्बे के उदारीकरण के बाद तो भारतीय भाषाओं की स्थिति काबू से बाहर हो रही है । यानि कि वही सत्ता या शासन जो इस दुर्गति के लिए जिम्मेसदार है केवल वही इसे ठीक कर सकता है । देश भर में सरकारी इशारे पर ही निजी स्कूल, इंजीनियरिंग कॉलेज, विश्वविद्यालय बढ़ रहे हैं और यह केवल अंग्रेजी के नाम पर फल फूल रहे हैं । दिल्ली, में तो पिछले दिनों अंग्रेजी की देखी देखी जर्मन, जापानी, फ्रेंच भी आगे आ रही हैं । रूसी का जमाना लद गया । और अफसोस कि स्कूलों में हिंदी का भी लद रहा है ।

यदि हिंदी को –(1) साहित्यू और भाषा के रूप में बचाना है तो उसे कम-से-कम दसवीं तक स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य किया जाए ।

2. इस प्रयास को आगे बढ़ाते हुए विश्व विद्यालयों में अपनी भाषा में पढ़ने-पढ़ाने को हर संभव प्रोत्सा‍हित किया जाना चाहिए । विशेषकर दिल्ली, उत्त़र प्रदेश जैसे राज्यों में । 1974 में जब डॉ.कोठारी संघ लोक सेवा आयोग की सेवाओं की परीक्षाओं में अपने प्रतिवेदन में लिख रहे थे कि दिल्ली विश्व विद्यालय में बीस से तीस प्रतिशत छात्र इतिहास, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र अपनी भाषा में पढ़ते-लिखते हैं । आज दिल्ली विश्वविद्यालय अपनी भाषा में पढ़ने-लिखने की सुविधा भी नहीं दे रहा और यह हाल तब है जब यहां लगभग सत्तर प्रतिशत विद्यार्थी उत्तर प्रदेश, बिहार के हैं । मुझे अच्छा लगा कि कलकत्ता के कॉलिजों में बंगाली माध्यम अभी भी बचा है । हालॉंकि खतरा प्रादेशिक भाषाओं पर धीरे-धीरे बढ़ रहा है । हमने अपनी भाषा के हक की लड़ाई को ऐसे कैसे छोड़ दिया ? बुद्धि‍जीवियों और राजनेताओं को इसे समझने की जरूरत है ।

तीसरा कदम : पुस्तकों, पत्रिकाओं को शिक्षा से जोड़ना होगा । हिंदी की साहित्यिक, गैर-साहित्यिक किताबों, पत्रिकाओं के प्रचार-प्रसार को फैला कर । हाल ही का एक अनूठा अनुभव – इटावा में पिछले सौ वर्ष से हर वर्ष आयोजित नुमाइश में पहली बार दिसंबर 2012 में पुस्तक मेला भी शामिल था । नौचंदी, नुमाइश की तरह पुस्तक मेले के बहाने । और अंतिम सुझाव शिक्षा की पूरी तस्वीर बदलने की भी । नकल के साम्राज्य में –वो परीक्षा में हो या साहित्य, और शोध ग्रंथों में हिंदी का पाठक पैदा नहीं हो सकता ।

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