हिन्दी की किताब: हक से मांगो मुफ्त

यों यह मेरी पांचवी पुस्तक थी, पिछली किताबों के अनुभव या हश्र को देखते हुए इस बार पुस्तक की रूपरेखा के समानांतर ही यह विचार जन्मने लगा कि इस बार सभी दोस्तों को लिखित में सूचित करुंगा । पहले विचार सस्ते और आसान रास्ते पोस्टकार्ड भेजने का था लेकिन कृष्ण कुमार जी की भूमिका और डा. योगेन्द्र सिंह जी के उत्साहवर्द्धक शब्दों के बाद मैंने किताब के विवरण का पूरा पृष्ठ ही सभी को भेजने का निश्‍चय किया । प्रकाशक को कहा कि उन्हें 25% कमीशन हर पाठक को देना ही होगा । वे भी मान गये । मन प्रसन्न था कि इस बार कोई दोस्त यह नहीं कहेगा कि यार! तुम्हारी किताब का नाम क्या है ? कहां से मिलेगी ? हमें तो पता ही नहीं चला । देते क्यों नहीं हो ? अंतिम वाक्य का ज्यादा जवाब था यह पैम्फलेट भेजना । न केवल नई किताब, पुरानी किताबों के प्रकाशकों के नाम भी लिख दिए थे ।
पत्र लिखना आधुनिक जीवन से लगभग गायब ही होता जा रहा है । 5-6 साल बड़ौदा में रहने के बाद लौटने पर दोस्तों से फोना-फोनी तो हुई कईयों के पते अस्त-व्यस्त हो गये थे । इन्हें ढूंढ़ना भी आसान नहीं था । खैर इस बात की तसल्ली हुई कि पुस्तक या सभी पुस्तकों के बारे में इन सबको मुकम्मिल सूचना तो इस बार मिली । अब ये पुस्तक ले तो भी ठीक न लें तो भी । कम से कम मुझे यह अपराधबोध तो नहीं होगा कि यार तुम बताते भी नहीं हो । या प्रकाशकों के शब्दों में लेखक को भी कुछ करना चाहिए किताब के प्रचार-प्रसार में ।

मैंने यह सब काम स्वयं किए । यानि कि लैटर बॉक्स में डालने तक का । पूरी निश्चिंता के लिये कि कोई छूटे नहीं ।
लैटर बॉक्स में डालने की कहानी का भी उल्लेख यहां जरूरी है । 13 दिसम्बर 2001 की घटना के बाद पार्लियामेंट के आसपास का सारा क्षेत्र आतंकवादी दृष्टि से रेडियोएक्टिव हो गया था । रेल भवन की अपनी खिड़की से मैंने स्वयं गोलियों की आवाज और सिपाहियों और आतंकवादियों को गिरते, लुढ़कते, भागते देखा था। अत: रेल परिसर का क्षेत्र तो सबसे ज्यादा सुपरएक्टिव था । मैं पत्रों को लैटर बॉक्स में डालने पहुंचा तो पत्र पेटी का ताला खुला था । मैंने सोचा कि सिर्फ इसी में कुछ गड़बड़ी होगी । दूसरे की तरफ गया वहां भी यह गड़बड़ थी । सामने कृषि भवन की पत्र पेटियां भी खुली पड़ी थीं । पता चला कि छब्बीस जनवरी की गणतंत्र दिवस की तैयारी के सिलसिले में यह करना पड़ा है । पत्र पेटी में कोई विस्फोटक न रख जाये कोई आतंकवादी इस एहतियात के तौर पर । मैंने शाम को सारे पत्र कनॉट प्लेस जाकर डाले । अब मुझे सिर्फ इंतजार था । दोस्तों के फोन का ।

इससे पहले मुझे अनुभव था कि दिल्ली में डाक दूसरे दिन ही मिल जाती है । फिर भी मैंने तीसरे दिन से पूछना शुरू किया कोई फोन तो नहीं आया । हफ्ते भर तक कोई फोन नहीं । एकाध दोस्त को छोड़कर कि वे बाहर जा रहे हैं । अत: पुस्तक मेले में नहीं आ पायेंगे । यह भी कम तसल्ली की बात नहीं थी । आखिर पत्र तो मिल गया । मेरी रचनाओं की सूचना तो मिल ही गयी उन्हें । यानि कि अगड़म-बगड़म करने की सूचना ।
एक उच्च अधिकारी और संस्कृत की उलटबासियों के विशेषज्ञ मेरे कार्यालय में बैठे हुए थे । मैंने उन्हें भी पुस्तक-परचा थमा दिया । मेरा पर्चा उन्होंने पढ़ा ही नहीं । सरेआम मेरी ओर वापस करते हुए बोले किताब कहां है ? किताब दो । एक लेखक मित्र को सूचना मिली कि मेरी किताब आ रही है तो वे दफ्तर में ही आ गये । कहां है किताब ? मैंने बताया कि अभी तो मैंने भी नहीं देखी तो उन्हें यकीन नहीं आया । मैंने थोड़ी चालाकी से पुस्तक परिचय का कागज उन्हें भी थमा दिया कि क्या पता इस बार वे खरीद ही लें क्योंकि पिछली सारी किताबें तो उन्हें मुफ्त में सादर भेंट कर ही चुका हूं । उन्होंने भी उसे उड़ते-उड़ते देखा और बोले मैं विमोचन के वक्त पहुँच जाऊंगा । बचिये कहां तक बचते हैं आप ? किताब का आना इन हिन्‍दी प्रेमियों के लिये भी हलवाई की दुकान का उदघाटन है जिसमें मिठाई का दौना मिलना तय है वरना फिर उदघाटन ही क्यों ? खरीदकर खानी होती तो वहां आते ही क्यों वाले अंदाज में ।

मुझे याद आता है शायद मेरा उपन्यास चौराहे …वर्ष 1992 में छपकर आया था । मेरे एक बंगाली मित्र शंकर बनर्जी बैठे हुए थे । रेलवे की दोस्ती के अलावा उनसे एक लेखक-पाठक का भी संबंध था । मुझसे न केवल वे उम्र में बड़े थे बल्कि एक वरिष्ठ आई.पी.एस. अधिकारी भी थे और मध्यप्रदेश के महानिदेशक/पुलिस पद से सेवानिवृत्त हुये थे । मैंने जैसे ही उपन्यास उनकी तरफ बढ़ाया उन्होंने बड़ी गंभीरता से उलट-पुलट कर उसका नाम और प्रकाशक का पता नोट किया और बोले मैं इस किताब को स्वयं खरीदूंगा । मुझे याद भी नहीं था कि मैंने उनको अपनी पहली किताब ‘तीसरी चिट्ठी’ (कहानी संग्रह) भी दिया है । उन्होंने ही याद दिलाया कि मैंने तुम्हारी कहानियां पढ़ी हैं और बंगाली समाज में किसी भी लेखक मित्र की किताब आने पर उसे वे स्वयं खरीदते हैं । पुस्तक संस्कृति के इस आयाम से मेरा यह पहला परिचय था और मैं लगभग भौंचक भी था क्योंकि इससे पहले मैं कई बार इस हादसे तक से गुजर चुका हूं कि आपने उनको पुस्तक देखने को दी और वे उसे हक से लेकर ही चले गये । बावजूद इसके कि वे पढ़ते ही नहीं हैं लेकिन आलमारी में सजाये तो रख ही सकते हैं । हिन्दी संसार को ऐसे उदाहरणों से सबक लेने की जरूरत है ।

भारत सरकार में राजभाषा के नाम पर हिन्‍दी के प्रचार-प्रसार में अफसरी कर रहे हिन्दी अधिकारी तो साफ इस अंदाज से देखते हैं कि हमें नहीं दी तो हम देखते हैं कि पुस्तकालय में कैसे घुसती है । बावजूद इसके कि उन्होंने पढ़ना तो एम.ए. के अंतिम पेपर वाले दिन ही बंद कर दिया था, घर में सजाने के लिये वह भी शौक यदि बचा रह पाया हो, तो चाहिए ही । एक हिन्दी अधिकारी का हक पिछले 10 वर्ष से जारी है । उन्हें पता लगा कि चौराहे उपन्यास में उनका जिक्र है तभी से जब भी मिलते हैं हक से कहते हैं मैं बहुत नाराज हँ। मुझे किताब अभी तक नहीं मिली । उनकी उत्सुकता भी है लेकिन खरीदें क्यों जब वे उसके पात्र हैं तो । मैं यहां इस बात को भी रेखांकित करना चाहता हूँ कि हिन्‍दी की पुस्तक के बाजार का संबंध गरीबी से तो है ही उससे ज्यादा मानसिकता से है ।

मैंने प्रसंग को बदलकर इन सज्जन से पूछा तुम्हारी तनख्वाह कितनी है ? उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के स्केल हैं। उनसे भी कुछ ज्यादा । आप जानते ही हैं कि रिजर्व बैंक की तनख्वाह देश में सबसे ज्यादा हैं । आज भी सारे सरकारी तंत्र में । 30-35000 प्रति महीने या प्रतिदिन एक हजार रुपये लेने वाला हिन्दी अधिकारी मात्र पचास रुपये के उपन्यास के लिये दस वर्ष से लार टपका रहा है । मुझे किसी अन्य पाठक को देने में प्रसन्नता होती लेकिन इन अधिकारी को देने में नहीं होती क्योंकि हिन्‍दी की जिस सीढ़ी पर चढ़कर ये यहां पहुंचे हैं कम से कम उसी की खातिर, मित्र की खातिर, अपने चरित्र की खातिर इतना तो ये कर ही सकते हैं ।

दरअसल सबसे कम साहित्यिक संस्कार इसी हिन्‍दी अधिकारी या कभी एम.ए. हिन्दी के छात्र किस्म के लोगों में है । पता नहीं शिक्षा व्यवस्था या कहिये बी.ए., एम.ए. करने के पाजी दोर में उन्हें कैसे पढ़ाया गया है कि वे सामान्य पाठक भी नहीं बचे रहते । पुस्तक से दूर बचकर भागने वालों में वे अव्वल होते हैं । एक प्रशिक्षण कॉलेज के दिनों में मैंने पाया कि हिन्‍दी पट्टी के इंजीनियर, डाक्टर या अन्य समाजशास्त्रीय विषयों के छात्र रहे लोगों में साहित्यिक चेतना या संस्कार कहीं ज्यादा जिंदा थे । फिजिक्स, मैथ और इंजीनियरिंग की किताबों के बीच उन्होंने परसाई, प्रेमचंद से लेकर सुरेन्द्र वर्मा, राजेन्द्र यादव को कहीं बेहतर समझा है । आनंद के लिये इस पढ़ने ने उनमें एक भूख पैदा की है । हमें इस भूख को जिलाये रखना है बस । इसके उलट हिन्दी पाठयक्रम ने या पढ़ाने के ढंग ने इसी भूख को नष्ट किया है सदा-सदा के लिए ।
कहीं ऐसा तो नहीं है कि हिन्दी के इन हलवाईयों का मिठाई बनाते, बनते देखकर ही मिठाई से मन भर गया हो ।
एक रिश्तेदार ने बड़ी संजीदगी से कहा आप चुटकले क्यों नहीं लिखते, चुटकले पढ़ने में खूब मजा आता है । उनकी पत्नी भी साथ ही थीं । उनकी ओर देखते हुए बोले तुमने वो किताब घंटे भर में ही खत्म कर दी थी न जिसे स्टेशन पर खरीदा था । हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए हम दोनों ।

मेरा भी हंसते-हंसते लोट-पोट होने का मन हुआ पर पता नहीं क्यों मुस्कराकर ही रह गया । सही कह रहे हो । फिर हम एक सिर्फ चुटकलों की पुस्तकों का मेला ही लगवायेंगे । और ऐसा भी किया जा सकता है कि हर चुटकले की किताब के साथ एक सलवार, शूट, शर्ट, मुफ्त ।

उनकी पत्नी बोली आप गाने लिखें तो हम भी तो सबको बतायें कि हमारे ..ने कितने अच्छे गाने लिखे हैं । आप तो गाने आराम से लिख सकते हो ।

आइये देखते हैं दफ्तर के मित्र किताब के साथ कैसा सलूक करते हैं ? शायद मेरे पिछले जन्म के दुश्मन ही होंगे ये मित्र जो ऐन उसी वक्त कमरे से बाहर चले गए । वे फिल्मी गीतों के बड़े प्रशंसक हैं और हिन्दी फिल्मों के अधिकारी विद्वान भी । एक बार उन्होंने बताया था कि वे स्कूल, कॉलेज के दिनों मे हिन्‍दी में भी कम्पेयरिंग करते थे और कि उनकी बहनजी भी हिन्‍दी की प्रोफेसर हैं । वे माथे पर पहले से ही पड़ी 10 सिकुड़नों को तीन गुना बढ़ाते हुए बोले मैं हिन्दी पढ़ नहीं सकता । मेरे सिरदर्द हो जाता है । शायद वे इसलिये निकल गए कि उन्हें हिन्दी की किताब पर औपचारिक बधाई भी बरदाश्त से बाहर है । उनकी टेबुल पर किसी वक्त अंग्रेजी के गुलशननंदानुमा उपन्यास और पानी की एक बोतल अकसर रखी होती थी । सदा एक हीन एहसास में बने रहने को अभिशप्‍त एक मित्र खिसियाहट में छूटते ही बोले, आपको हमारी तरह काम करना पड़े तो सब लिखना-विखना भूल जाओ । मौज कर रहे हो तभी ये कागज काले करते रहते हो । कुछ दिनों बाद फिर मिले लेकिन गुस्सा कहां ठंडा होने का नाम ले । इन लेखक, पत्रकारों को मैं अच्छी तरह जानता हूं । मुफ्त की दारू पीते हैं, मुर्गा खाते हैं इनसे जो चाहे लिखवा लो । क्यों रीना जी ? रीना उनकी जिगरी दोस्त है ।

लेकिन मैं तो नहीं खाता मित्र !

हैं तो वे आपके दोस्त ही । मुझे तो जबसे पता चला है इन पत्रकारों के बारे में भगवान कसम! मैंने अखबार ही पढ़ना बंद कर दिया है ये इतने कुत्ते …। मेरे हत्थे चढ़ जायें तो इनकी पैंट उतरवा दूँ ।…फिर चलते-चलते बोले मेरी किताब है कहां ?

सहानुभूति, सम्मान से पुस्तक देखने वाले हजारों में उंगलियों पर गिनने लायक ही थे ।

हाल ही में प्रकाशित एक और पुस्‍तक (हिन्‍दी पट्टी : पतन की पड़ताल) के किस्‍से भी इससे अलग नहीं हैं, बल्कि और भी भयानक व विद्रूप । एक दफ्तरी साहित्यिक आत्‍मा सोफे पर अनशन करके बैठ गई – ‘मुझे आपकी पुस्‍तक चाहिए ही । मैं बिना लिए नहीं जाऊंगा । मैंने उसकी चर्चा बहुत सुनी है ।’ मैंने समझाया, ‘लायब्रेरी में है वहां से ले लो । या कल मैं अपनी लेखकीय प्रति ले आऊंगा ।’ बोले ‘नहीं । मुझे तो सदा के लिए चाहिए । मैं उस पर कुछ काम करना चाहता हूँ ।’ कोई भी लेखक इतने अनुरोध पर फूल उठेगा, लेकिन मैं ऐसे पिघलने लगूं तो सारी तनख्‍वाह पुस्‍तकें बांटने में ही चली जाए । क्‍या साल में दो बार डी.ए. की अप्रत्‍याशित वृद्धि लेने वाले, अपनी पसंद की एक किताब भी नहीं खरीद कर पढ़ सकते ?

मुझे लगा उस पेम्फलेट के बाद संवाद बिल्कुल चुप्पी में बदल गया है । वे लोग जिनको मैंने पुस्तक की सूचना भिजवाई थी, अचानक मानो दिखने बंद हो गए हों कि कहीं शर्मा जी ये न पूछ बैठें कि किताब पढ़ी ? जिसका सीधा अर्थ होता है क्या किताब खरीदी ?

मुझे सचमुच इसमें थोड़ा मजा भी आने लगा था । वैसे निराशा को ऐसे मजे में बदलना पहले दर्जे का हठी ही कर सकता है । मजा ये कि अब वे पुस्तक मांगने की बात नहीं करेंगे कि बधाई हो आपकी नई किताब आई है । मेरी कॉपी कहाँ है ? अब तक उनमें से कुछ कहते थे, अब मैं पूछ सकता हूं । पुस्तक मेले गये ? 40% का कमीशन लिया ?

यह वैसी ही स्थिति मुझे लग रही थी जैसी सांई संध्या या रामकथा का कागज मेरे घर पर छोड़ने के बाद मेरी होती है कि निमंत्रण तो आ गया अब चंदे के लिये आ रहे होंगे ।

यदि मैं सांई संध्या को चंदा देने से डरता हूं तो वे भी तो पुस्तक खरीदने से डर सकते हैं ।

लेकिन क्या दोनों काम एक जैसे हैं ?

मैंने तो चंदा नहीं मांगा मैंने तो सिर्फ सूचित किया है, फिर इन्हें साँप क्यों सूंघ गया ?
क्या हिन्‍दी को लेकर यह समाज किसी अपराध-बोध में जिंदा रहता है कि क्यों खर्च करूं जब मुझे हिन्‍दी की किताब पढ़नी ही नहीं है । घर में रखी रहेगी तो बच्चे भी उसे ही पढ़ेंगे और उसे पढ़कर ‘अंग्रेजी’ ठीक होना रुक सकती है ।

आधा भारत विशेषकर हिन्‍दी भाषी इसी अंग्रेजी को ठीक करने, उसे बोलने की कोशिश में जुटा हुआ है. पिछले अनुभव के बाद इस अनुभव ने भी मुझे कई शिक्षाएं दीं कि ऐसे कामों में भी सफलता केवल 10-20% ही हाथ लगती है और यह भी कम बड़ी बात नहीं है कि पुस्तक को पेपर बैक में आना ही होगा । यानि कि 10-20% के मुनाफे पर ही कीमतें रखी जानी चाहिए 10-20% गुना ज्यादा पर नहीं कि मीडिया, टी.वी., बाजार की अपसंस्कृति से लड़ने के लिये शब्द पुस्तक का संघर्ष इसी रफ्तार से आगे बढ़ेगा कि इससे किसी के प्रति दुर्भावना बिल्कुल मत पालिये वरना न तुम्हारी आस्था रहेगी पढ़ने-पढ़ाने में न उनकी भी – रही सही ।

एक और सज्जन का वाकया भी बता दूं । जोशी जी बोले मैंने आपका नाम पता देखा तो कहा, अरे ये तो हमारे जानने वाले हैं । मुझे बहुत अच्छा लगा । वे फुल्ल-फुल्ल थे । मुझे हिन्‍दी पढ़नी बहुत अच्छी लगती है । मैं तो अपने बच्चों को भी बताता हूं (कौन नहीं बताता इसी अंदाज में) कि जब हम छोटे थे तो दिनकर, प्रेमचंद (कोई नाम नहीं बोल पाए) सबको खूब पढ़ते थे । अंधेरा हो जाता था तो भी किताब को आंखों से लगाए रहते थे । फिर हमारी दादी मना करती थी । फिर सरकारी नौकरी में आ गए फिर नहीं पढ़ पाए (मानो यह भी सरकार का दोष हो)

बात आई गई हो गई । फिर एक दिन मिले आप तो अखबारों में भी लिखते हैं न ! मैंने बताया हाँ, अमुक अखबार में ? वो तो मेरे घर भी आता है । मुझे आश्चर्य हुआ कि फिर अखबार मंगाते क्यों हैं जब पढ़ते नहीं हैं तो ? मुझे आपकी किताब पढ़नी है । आपकी तो किताब भी है न । कब मिलेगी ?

मुझे अच्छा लगा । मैंने मजाकिया लहजे में कहा अभी । हिन्‍दी लेखक को पाठक ढूंढ़े नहीं मिलता है और वह लेखक को ढूंढ़ रहे हैं. चलिए मेरे साथ ।

मैं एक की बजाए सबसे ताजा आई दो किताबें ले आया । उन पर लाल स्याही से लेखकीय प्रति लिखा था । वे बड़े अजीब ढंग से उलट-पुलट रहे थे । मानो यह पूछने का फैसला न कर पा रहे हों कि कुछ आदरणीय-सादरणीय लगाकर क्यों नहीं दे रहे । बोले – आपके पास तो देने के लिये किताबें होती हैं न ? मैं अन्दर से ‘सुन्न’ होता जा रहा था कि क्या कहूं । अरे आप पढ़िये और 10-15 दिन में वापस कर दीजिये । दिल्ली के घरों में किताब रखने की जगह भी कहां है । हाँ एक लेख जरूर पढ़िये जो इस पुस्तक में है । हिन्‍दी की किताब ‘हक से मांगो मुफ्त’ ।

दफ्तर के एक और मित्र ने किताब को ऐसे छुआ जैसे ए.के. सैंतालिस हो । आपने परमीशन ली थी ? डी. एंड ए. के (डिसीप्लीन और अपील नियमावली( तहत इस पर तो कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी हो चुकी है । मेरे अंदर हल्की सी सिहरन दौड़ी । डर की कम, इस बात की ज्यादा कि ऐसे पचड़े आपको कुछ दिनों के लिये तो सोचने, पढ़ने से विलग कर ही सकते हैं । और दफ्तर के इन यारों को यही चाहिए भी । उन्हें जब बताया कि हिन्‍दी पढ़ता ही कौन है आप कुछ भी लिखते रहिये, तब उनकी आत्मा को कुछ शांति मिली । हां कोई नहीं पढ़ता । मेरा संटू अंग्रेजी की किताब आराम से पढ़ता रहता है और हिन्‍दी की भगवान कसम छूता तक नहीं है ।

शाबाश! मेरे उत्तर प्रदेश के अंग्रेजी बाप!
एक दफ्तरी आत्मा बोली कितने पैसे देने पड़ते हैं पुस्तक छपवाने में तो दूसरी ने पूछा कितने पैसे मिलते हैं ? जब मैंने रॉयल्टी का बुझा-बुझा सा जवाब दिया तो उन्होंने दो टूक शब्दों में समझाया कि फिर आप लिखते क्यों हैं ? कोई और काम क्यों नहीं कर लेते ? कवर पर वॉनगॉग की एक प्रसिद्ध पेंटिग्स थी । एक सज्जन बोले ये आपका फोटो बड़ा खराब कर दिया है । मुझे हंसी भी आई मैंने उन्हें समझाया । पुस्तकों से कितना दूर है हिन्‍दी समाज ?

और हो भी क्यों न ? आखिर हिन्‍दी पुस्तक उन्हें देती ही क्या है ?

हम सभी लेखकों का बार-बार एक ही तर्क होता है कि हिन्दी प्रदेश की जनता कपड़ों पर खर्च कर देगी, होटलों में रोज सैकड़ों हजारों बहा देगी, लेकिन किताबों पर खर्च नहीं कर सकती । पाठकों की जब जिसका जो जी चाहता है धुनाई करने लगता है । लेकिन क्या हमने कभी पाठक के नजरिये से विचार किया है कि वह आखिर क्यों किताबें नहीं खरीदता ? पाठकों की दलीलें आत्मस्वीकृति की जाए तो लेखकों के पास किताबों का जो जखीरा है क्या उसमें बहुत सारी सादर भेंट, समीक्षा के लिये मिलने वाली किताबें नहीं हैं ? निश्चित रूप से हम लेखक किताब खरीदते भी हैं । लेकिन हमारे खरीदने के पीछे हमारी रोटी के साथ-साथ हमारे लेखन के क्षेत्र में लगातार उपस्थिति की मांग भी है । हिन्दी का पाठक कहता है कि क्या होगा हिन्दी पढ़ के ? क्या हिन्दी नौकरी देगी ? सामाजिक प्रतिष्ठा देगी ? और उसी स्वर में वह यह भी कहता है कि आप तो अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं और हमें हिन्दी पढ़ने को कह रहे हैं ? जब उसे यह साफ नजर आ रहा है कि देश के ज्यादातर राज्य प्राइमरी स्तर से ही अंग्रेजी शिक्षा की रटाई आरंभ कर चुके हैं, दूर देहातों के गांवों में अंग्रेजी के पब्लिक स्कूल पहुँच चुके हैं तो इस सबके बीच उन्हें हिन्दी की किताब की कैसे और क्यों याद आए कंप्यूटर युग में प्रवेश करने के बाद तो उसे अंग्रेजी की जरूरत और भी ज्यादा लगने लगी है । वह यह भी कहता है कि हिन्दी किताबों में हमारी जिन्दगी का अक्स कहां है ? कहां है बेरोजगारी की भयावहता या दूसरे अन्य मुद्दे जिनके साथ हम दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं । नून-तेल-लकड़ी के संघर्ष में रोजाना की जिंदगी तो समेटी नहीं जा पा रही है आप किता- किताब चिल्ला रहे हो मुझे जरूरत होगी तो मैं ले लूंगा ।

एक तथ्य और ।
कुछ बड़े प्रतिष्ठित नामों की मेज पर इतनी किताबों और इतनी अश्रुमिश्रित श्रद्धाओं के अंबार को देखने के बाद मेरे मन में पूरी श्रद्धा से यह बात आई कि इनको पुस्तक देना इनके बुढ़ापे को और भारी बनाना है । आप अन्यथा मत लीजिये सभी का समय सीमित है यानि कि वही चौबीस घंटे जो दिल्ली के दबाव में सिकुड़कर और भी कम हो जाते हैं । काम, अध्ययन का इतना बोझ, शोधार्थी, समीक्षा, सेमीनार, विश्‍वविद्यालयों की नियुक्ति के साक्षात्कार शहरों में भी, शहर से बाहर भी । और वर्षों से इन्हीं दनदनाती, हर वर्ष आतीं पुस्तकों की बाढ़ । आपके लिए पहली या दूसरी होगी उनके लिए इस साल श्रद्धा के साथ भेंट की गई एक सौ आठवीं है । शादी समारोह में लेखक से मिली इस भेंट को तुरत शादी के पंडाल में ही किसी को न दे दें तो क्या करें ? इन्हें बीनने, संवारने, पलटने तक का वक्त नहीं रहता इन बेचारों के पास । विनोद भारद्वाज जी ने पिछले दिनों कहीं ठीक ही लिखा था कि ऐसी बहुत सी पुस्तकें बेशकीमती श्रद्धापंक्तियों के साथ तुरंत फुटपाथ पर भी आ जाती हैं । तो क्या मैं भी इन्हें फुटपाथ के हवाले ही करने को दे दूँ ? फुटपाथ की याद आते ही मेरे जेहन में इन सभी श्रद्धालुओं के प्रति उमड़े विचार तुरंत बिला जाते हैं । फिर से नए रूप में उगने के लिए कि न देना कहीं धृष्टता या अभिमानी न मान लिया जाये ? जब उन्हें पुस्तक मिलेगी ही नहीं तो वे चर्चा भी कहां करेंगे ? और चर्चा नहीं तो पुस्तक आई या नहीं आई इसका कोई अर्थ नहीं है । खैर न मैं पूरा फैसला देने का कर पाया और नहीं न देने का । इसलिये सभी वरिष्ठ लेखकों, आलोचकों, प्राध्यापकों से माफी !

एक सच्चाई यह भी है कि पुस्तक देते ही लेखक तुरंत उस पर समीक्षा की मांग करने लगते हैं । अत: लेने वाले के भी हाथ कांपते है कि यार पुस्तक तो दे रहे हो, समीक्षा के लिये पीछे मत पड़ना ।

कुछ गैर श्रद्धालुओं को देने का अंजाम भी देख चुका था । उन्होंने किताब उत्साह से ली और बच्चे को थमा दी बेटा देखो तुम्हारे ..ने लिखी है। बच्चे ने देखते ही देखते अपनी नाक उससे साफ कर दी । मुझे एहसास हुआ सचमुच टॉफी से यह बच्चा ज्यादा प्रसन्न रहता । पिछली किताब जिनको दी थी उस पर सब्जी फैली पड़ी थी ।

कुल जोड़-घटा करके यह प्रयोग बहुत अच्छा लगा । राजेन्द्र जी की बात में दम है कि लेखक को भी अपनी किताब के प्रचार-प्रसार में जुटना चाहिए । इसमें कैसी शर्म । ठीक भी है आखिर लेखक अपनी बात को कहीं पहुंचाने के लिए ही तो लिखता है । इस पत्र ने कई उन दोस्तों को पहली बार पुस्तक खरीदने के लिए उकसाया जो खरीदना चाहते तो हैं लेकिन उन्हीं के शब्दों में समझ में नहीं आता कि क्या खरीदें । कंप्यूटर, चुटकुले, ज्योतिष की किताबें तो वे बस यूं ही ले लेते हैं । समय, समाज और संस्कृति के छोटे-छोटे लेखों को पढ़कर वे गदगद थे । ऐसे दोस्तों ने खरीदी जिनकी कल्पना ही नहीं की थी । सच्चे पाठक यही थे । पढ़ने के बाद उनकी आंखों में किताब का असर साफ था । इन प्रतिक्रियाओं से मुझे पहली बार लेखक के कद पाने का एहसास हुआ । उन समीक्षाओं से कही बहुमूल्य ये प्रतिक्रियायें थीं । वैसे भी क्या समीक्षा पढ़ी भी जाती है ? उससे ज्यादा से ज्यादा पुस्तकालय की सरकारी खरीद या सरकारी पुरस्कार में ही मदद मिलती है ।

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