हिन्दी का हंस

बात छोटी भी है और बड़ी भी । छोटी इसलिये कि यह व्यक्तिगत आजादी का मामला है कि कोई राजेन्द्र यादव के संपादन में ‘हंस’ पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के पच्चीस वर्ष के उत्सव में सक्रिय भागीदारी में शामिल हो या न हो । लेकिन बड़ी इसलिये है कि एक मशहूर दलित चिंतक ने शामिल न होने की असमर्थता का कारण यह बताया कि राजेन्द्र जी का ‘हंस’ हिन्दी में निकलता है और मैं हिन्दी के पक्ष में नहीं हँ । यह जोड़ते हुए कि जब राजेन्द्र जी उनकी उस मुहिम में शामिल नहीं हैं जो अंग्रेजी को दलितों के उध्दार के लिए विशेष रूप से देवी के रूप में प्रतिष्ठित करने के प्रचार में लगे हैं तो वे भी ‘हंस’ के साथ नहीं हैं । अब पहले कुछ बातें उस ‘हंस’ के योगदान के बारे में विशेषकर दलित विमर्श के संदर्भ में । धर्मवीर, श्योराज सिंह, बैचेन, सूरज पाल सिंह चौहान से लेकर सैंकड़ों नामों को ‘हंस’ ने बार- बार छापा है और प्रमुखता दी है । दस वर्ष पहले ओमा शर्मा के साथ बातचीत में ‘हंस’ संपादक ने स्पष्ट शब्दों में माना था कि रचनात्मक कमजोरी के बावजूद मैं इन्हें इसलिये छापता हँ कि इन्हें सहारे की जरूरत है । बिल्कुल आरक्षण की तर्ज पर । इससे ‘हंस’ संस्थापक प्रेमचंद की प्रतिष्ठा तो बढ़ी ही है राजेन्द्र जी के सरोकार भी सामने आये हैं । व्यक्तियों के उत्थान पतन को छोड़ भी दें तब भी ‘हंस’ के पूरे वैचारिक विमर्श में दलित और स्त्री सदा अव्वल नम्बर पर रहे हैं । यदि ये अव्वल नम्बर पर हैं तो इनकी भाषा, बोली, विचार को भी उतना ही महत्व देना होगा । क्या ओमप्रकाश वाल्मिकि ‘जूठन’, तुलसीराम ‘मुर्दहिया’ या श्योराज सिंह ‘बचपन कंधो पर’ जैसी आत्मकथा कभी अंग्रेजी में लिख सकते हैं ? क्या ‘हंस’ संपादक को तब तक इंतजार करना चाहिये जब तक ये दलित चिंतक अंग्रेजी में लिखना शुरू न कर दें या राजेन्द्र जी अंग्रेजी-दलितों की तलाश में अमेरिका यूरोप को छानें । पुनर्विचार ‘हंस’ संपादक को भी करने की जरूरत है कि भाषा के मसले पर दलित चिंतन ऐसा एकागी, एकपक्षीय, तर्कहीन दिशा की तरफ क्यों जा रहा है ? क्यों उसके चिंतक यह मानते हैं कि अंग्रेजी के बूते ही वे स्वाभिमान और बराबरी की लड़ाई लड़ सकते हैं ? दलित चिंतन में ऐसा एक भी सुराख पूरे जहाज को डुबा और भटका सकता है । दलित अंग्रेजी पढ़े यह अच्छी बात है लेकिन अपनी भाषा न पढ़े या उसे नफरत से देखे इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा ।

175 वर्ष पहले मैकाले की सारी कोशिशों के बावजूद अभी भी हिन्दुस्तान में अंग्रेजी में सोचने, बोलने या संवाद करने वाले 5 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होंगे । भाषा और संस्कृतियों का प्रसार इतनी आसान बातें नहीं है । आंतरिक जरूरतें और प्रतिरोध बार-बार आड़े आता है । धर्म से भी ज्यादा भाषा समाज को जोड़ती है । पाकिस्तान, बंगलादेश का अलग होना इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है ।

जाने-माने वैज्ञानिक और शिक्षाविद दौलत सिंह कोठारी ने देश के अंतिम आदमी की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये देश के शासन-प्रशासन की सर्वोच्च सेवाओं में 1979 में अपनी भाषा में उत्तर लिखने की छूट दी थी जिसकी उल्टी गिनती इस वर्ष की सिविल सेवा परीक्षा से शुरू हो गयी है । उम्मीद थी कि दलित चिंतकों की तरफ से अंग्रेजी के खिलाफ आवाज ज्यादा आयेगी लेकिन जाहिर है उनमें अधिकांश या तो ‘अंग्रेजी देवी’ के भक्त बन चुके हैं या एक-दो पीढ़ियों से लगातार दिल्ली, मुम्बई और बड़ी प्रशासनिक सेवाओं में रहने के बाद अंग्रेजी उन्हें अपनी भाषा लगने लगी है । याद दिलाने पर भी कहते हैं कि अंग्रेजी तो आनी ही चाहिये । जो नहीं कहते वह यह कि हिन्‍दी या भारतीय भाषाएं आयें या नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । यही वह वर्ग है जो आरक्षण में क्रीमी लेयर की बात को सवर्णों की नई चाल कहकर बिदक उठता है और आरक्षण को किसी भी कीमत पर अपने अमीर घेरे से निकाल कर गाँव के अपनी जाति के दलित गरीबों तक नहीं पहुंचने देना चाहता । क्योंकि हिन्दी इन्हीं गरीबों की ताकत है अत: शहरी दलित उन्‍हें आगे बढ़ाकर अपनी प्रतिस्पर्धा क्यों बढ़ाये ।

दलित चिंतकों को जरा गहराई में जाकर सोचने की जरूरत है कि जो आरक्षण से आये हैं उनमें बहुतायत अपनी भारतीय भाषाओं के बूते ही । अपनी भाषा में लिखने की छूट से इनकी भागीदारी भी बढ़ी है । इसका प्रमाण ये आंकड़े हैं कि जब तक सिर्फ अंग्रेजी में आई.ए.एस. परीक्षा होती थी बहुत कम बैठते थे । 1960 में बैठने वाले थे दस हजार और 1970 में ग्यारह हजार । 1979 में कोठारी समिति ने जैसे ही अपनी भाषाओं में उत्तर लिखने की छूट दी यह संख्या बढकर एक लाख के भी पार हो गयी । एक साथ दस गुना वृध्दि । यदि समावेशी कोई कदम हो सकता है तो बिना भाषा के नहीं । राजेन्द्र जी ‘हंस’ यदि हिन्दी में निकल रहा है तो यह दलितों सहित सभी के हित में है । दलित चिंतकों की अंग्रेजी की वकालत के पीछे कहीं विदेशी पैसे का तो खेल नहीं है ? अंग्रेजी के पक्ष में यदि दक्षिणपंथी ऐसा देवी पूजा भाव दिखाते तो अब तक उनकी चिंदी-चिंदी कर दी जाती । आखिर ये चिंतक क्यों गरीबों से उनकी भाषा छीनना चाहते हैं ? पंडितों द्वारा संस्कृत के प्रचार और इस अंग्रेजी में कोई अंतर है ?

क्या उत्तर प्रदेश में शिक्षा संस्कृति के गिरते स्तर को परोक्ष अपरोक्ष अपनी भाषा हिन्दी के पतन से भी जोड़ा जा सकता है ? हिन्दी की दुर्गति यदि कहीं है तो वह हिन्दी प्रदेशों में और देश यदि फिर पराधीन हुआ तो आप समझ सकते हैं उनके लिये लाल कालीन कौन बिछायेगा ?

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