हिंदी : दिल्ली की खिड़की से

सितंबर आ गया यानि कि कुछ के लिए हिंदी के लिए जार-जार रोने का तो कुछ के लिए उसकी महानता गान का । शेष 99.99 प्रति‍शत इस सबसे बेखबर, निरपेक्ष, उदासीन या अपनी ही दुनिया में मस्त9, व्यस्तं या पस्तक । हर कर्म को एक कर्मकांड या रीति में बदलने का पेटेंट दुनिया में इसी देश के नाम है । धर्म हो, विचार हो, या शिक्षा हमें यथास्थिति को बस ढोए जाना है ।

दिल्लीह उस हिंदी क्षेत्र का हिस्सा है जो संविधान में स्वी कृत हिंदी का केन्द्रा बिन्दूह है । यू.पी., हरियाणा से घिरा । ठेठ खड़ी बोली की खाट पर पसरा ठाट । पिछले दिनों से चुनाव के वक्त. अथवा भोजपुरी, मैथिली के समर्थन में संख्याप का दावा करते बिहार के लोग भी दिल्ली‍ की आधी आबादी अपनी बताते हैं । जाहिर है इसमें देश के प्रसिद्ध साहित्य्कार, प्राध्याीपक, नौकरशाह, राजनीतिज्ञ सभी शामिल हंए । केवल शामिल ही नहीं उनकी ‘क्रीमी लेयर’ दिल्ली में रहती है । इन सब के बीच आइये दिल्लील में हिंदी की स्थिति का जायजा लेते हैं ।

दिल्ली की एक हाउसिंग सोसायटी का अनुभव । आप दिल्ली स्थित किसी हाउसिंग सोसाइटी अथवा सरकारी, गैर-सरकारी दफ्तर, बैंक कहीं भी जाइये- प्रवेश रजिस्टगर में शायद ही कोई हिंदी में नाम पता दर्ज करता हो । और उतना ही दुखद पक्ष यह है कि इन चौकीदारों में शायद ही कोई अंग्रेजी जानता हो । इन सोसायटियों में किसी सूचना के आदान-प्रदान के लिए जो भी नोटिस निकलता है वह अंग्रेजी में होता है । चाहे दरवाजे के अंदर अनधिकृत कारों के प्रवेश का मामला हो अथवा सड़क पर पानी न फैंकने का या ऊपर से कूडा न गिराने का । यानि कि वे सब छोटे-मोटे आदेश, दिशा-निर्देश भी जो जिन कामवालियों, ड्राइवरों या मजदूर वर्ग के लिए संबोधित होते हैं । मयूर विहार में ऐसी ही एक सोसायटी के चौकीदार से जब भी पूछा इसमें क्याै लिखा है उसका हर बार जवाब यही होता है ‘हमें नहीं पता । हमें तो हिंदी आती है । ये तो अंग्रेजी में है । हमें तो सिर्फ बांटने का आदेश है ।’ जिस मैनेजर को नौकरी पर रखा हुआ है वो भी बेचारा हिंदी ही जानता है । उसे अंग्रेजी आती तो ऐसी किसी सोसायटी की मैनेजरी करता ही क्यों । उसने विवशता में बताया कि हमारे सैकेटरी, प्रेसीडेंट अंग्रेजी में बनवाते हैं । कई साल तक इन प्रेसीडेंट की मनुहार, ललकार देशभक्ति आजमाने के बाद जो बात समझ में आई उसे हिंदी या देश की भाषा संस्कृसति के लिए शर्मनाक ही कहा जा सकता है । इन सोसायटी के ज्या दातर पदाधिकारी सेवानिवृत्तन सरकारी बाबू होते हैं । जाहिर है सेवा के दौरान अनेकों विभागों को अपनी कार्यशैली सुस्ती , लालफीता शाही की बदौलत बरबाद कर चुके ये घिसे हुए बाबू भाषा समेत इन सभी बीमारियों को अपने घर और आसपास की सोसायटी में ला रहे हैं । ये बकर-बकर तो हिंदी में ही करते हैं बस लिख नहीं सकते । क्यों कि जिस सरकारी ढॉंचे में इन्होंरने तीस-पैंतीस साल बिताए वहां ये अंग्रेजी ठीक करने उर्फ सुधारने की मश्क्र त में लगे रहे । अंग्रेजी तो इन्हेंस उतनी ही आई जितनी इनकी क्ल र्की की संभावनाएं थीं हिंदी जरूर भूल गये । हिंदी न आने पर सरकारी तर्ज पर दंभ भी आ गया । करेला और नीम चढ़ा । इनमें भोजपुरी, मैथिली समेत वे सभी सूरमा भी शामिल हैं जो इन भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने को आतुर हैं । इसमें अन्नाभ के समर्थक भी हैं और विरोधी भी ।

अब अचानक इन्हेंि कोई चार-छह लाइन हिंदी में लिखने को कहे तो बेचारे हीं हीं से आगे नहीं बढ़ पाते । लिखेंगे तो खुद ही शर्मसार होंगे । यों सही तो उनकी अंग्रेजी भी नहीं होती लेकिन गलत अंग्रेजी में भी रौब, रुतबे और गालियों का अपना मजा है । एक मित्र का अनुभव सही है कि दिल्लीं के किसी भी मॉल में नौकरी कर रहे नौजवानों से आप हिंदी में चार-छह वाक्यल भी नहीं लिखवा सकते । आने वाले दिनों में शायद पढ़ना भी ।

सोसायटी के इन प्रेसीडेंट, सैकेटरी की यह स्थिति तो तब है जब इनमें से ज्यायदातर हिंदी माध्य।म या सरकारी स्कूिलों में पढ़े हैं । बाबूओं की ऐसी सोसायटी से अच्छाट अनुभव पड़ोस में छोटे व्याापारियों की सोसायटी ‘सदर अपार्टमेंट्स’ का है जिसमें हर नोटिस हिंदी में हाथ से लिखा हुआ होता है । आज जनरल बॉडी की मीटिंग हुई शाम तक हिंदी में उसका ब्यौथरा सभी के घर । जबकि हमारी अंग्रेजीदॉं सोसायटी के ब्यौतरे जिन्हें ये ‘मिनट्स और मीटिंग’ कहते हैं दो-चार महीने बाद ही सामने आते हैं । कई बाबुओं, सदस्योंी, सैकेटरी, प्रेसीडेंट द्वारा अंग्रेजी में काट-पीट, सुधार के बाद । पैसा भी ज्यानदा बरबाद, और कोई पढ़ता भी नहीं ।
मॉल और निजी कार्पोरेट क्षेत्र में काम करने वाली पीढ़ी का इसमें इतना दोष नहीं क्योंीकि उन्हें हिंदी माध्य म में पढ़ने-पढ़ाने की सुविधा तक उपलब्‍ध दिल्लीज में नहीं हो पा रही । उस दिल्लीत में जहां लोकतंत्र का सर्वोच्चढ सिहांसन है । जिसके जांबाज दिन-रात ‘समावेशी’ शब्दस का इस्तेसमाल करते नहीं थकते । दिल्ली स्थित यहॉं के सभी विश्वउविद्यालय हिंदी के अपमान के गुनहगार हैं । आपको याद होगा पिछले वर्ष बिहार से दिल्ली विश्व विद्यालय में आकर पढ़ रहे बड़ी संख्याी में विद्यार्थी इतिहास विषय में फेल हो गये थे । सिर्फ इसलिए कि उन्हें हिंदी माध्यडम में लिखने और पढ़ने की सुविधा ही नहीं मिली थी । यही हाल इस वर्ष राजनीति शास्त्रन पढ़ रहे छात्रों का हुआ है । पचास प्रतिशत से अधिक या तो फेल हुए हैं या बहुत कम नंबर आए हैं । किसी वक्त अस्सीस के दशक तक कैम्पयस के स्नांतकोत्तवर विषयों में भी हिंदी माध्यीम की सुविधा उपलब्धर थी । आज दिल्लीप भर में फैले लगभग अस्सी प्रतिशत कॉलेजों में अंग्रेजी में पढ़ाई की जा रही है । जामिया और जे.एन.यू. की कहानी भी इससे अलग नहीं है ।

जाने-माने शिक्षाविद, वैज्ञानिक और भाषाविद डॉक्टहर दौलत सिंह कोठारी ने शिक्षा आयोग के अध्यकक्ष (1964-1966) के रूप में अपनी सिफारिशों में पुरजोर से भारतीय भाषाओं में उच्चव शिक्षा देने की बात कही थी । संसद में विचार-विमर्श भी हुआ और उनकी सिफारिशों को तरजीह देते हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा समेत केन्द्री य सेवा में भी अपनी भाषा को माध्य्म के रूप में वर्ष 1979 से संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में चुनने की छूट दी गई । डॉक्ट्र दौलत सिंह कोठारी ने जब कोठारी समिति (1974-1976) के अध्यदक्ष के नाते जो रिपोर्ट प्रस्तुलत की उसमें वर्ष 1974 में दिल्ली7 विश्व1विद्यालय में अर्थशास्त्रक, इतिहास, भूगोल हिंदी माध्य9म में पढ़ाए जाने के आंकड़े दिये हैं (समिति की सिफारिश 1.34 पृष्ठ् 21) । उनकी दलील थी कि ये नौजवान भी उतने ही प्रतिभाशाली हैं जितने कि अंग्रेजी वाले । अपनी सिफारिशों के समर्थन में डॉक्टरर कोठारी यहां तक कहते हैं कि ‘प्रशासनिक सेवाओं में आने वाला नौजवान यदि देश की भाषा नहीं जानता तो वह शासन की सेवा के लिए योग्या नहीं माना जा सकता । उनका यहां तक कहना है कि न केवल उन्हेंी देसी भाषाएं आनी चाहिए बल्कि उन्हेंा भारतीय साहित्या से भी परिचित होना चाहिए ।’

दिल्ली के बुद्धिजीवियों, प्राध्या्पक, पत्रकारों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि 1974 से आज तक हम अपनी भाषाओं में शिक्षा देने के मामले में प्रगति कर रहे हैं या पतन की अंतिम सीमा तक पहुंच चुके हैं यानि दिल्लीम विश्व विद्यालय में हिंदी माध्यतम से पढ़ाना लगभग शून्यच हो गया है । हाल ही में इंडियन एक्सवप्रेस में छपे (31 जुलाई 2012) आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 सिविल सेवा परीक्षा में उससे पिछले वर्ष की तुलना में ग्रामीण पृष्ठ1भूमि से आए नौजवानों की संख्या0 49 प्रतिशत से घटकर 29 प्रतिशत रह गई है । ऐसा इसलिए हुआ कि कोठारी समिति की संस्तुेतियों के विपरीत सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में ही अंग्रेजी की शुरूआत कर दी गई है । आंकड़े गवाह हैं कि इसका सबसे विपरीत प्रभाव गरीब पृष्ठतभूमि के अपनी भाषाओं में पढ़ने वाले दलित, आदिवासियों पर पड़ेगा । क्याि ये सब नीतियां समावेशी हैं या जन विरोधी ? भाषा के इतने महत्वीपूर्ण मसले पर क्याा दिल्लीि में कोई बड़ी आवाज सुनने को मिली ? कोई रैली, धरना हुआ ? मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ के शब्दोंा को याद करके ‘यहां सब चुप हैं मंत्री, संतरी, नौकरशाह ——– ।’ कभी कोई आवाज सुनाई दी कि हम दिल्ली विश्व,विद्यालय समेत जामिया, जे.एन.यू. में हिंदी माध्य म से पढ़ाए जाने के लिए आंदोलन करें । या दिल्लीो सरकार को कम-से-कम दसवीं तक हिंदी को अनिवार्य रूप से पढ़ाए जाने के लिए विवश करें । वरना उसके किसी कार्यक्रम में भागीदारी नहीं ।

बल्कि हो उल्टास रहा है । बकौल राजेन्द्रन यादव के संपादकीय (हंस) हम मांग रहे हैं लेखकों के लिए अतिथिगृह, आराम, ठहरने की जगह । लेखक का सम्मा)न, समाज में उसकी रचनाओं के पढ़ाए जाने, उसकी भाषा में शासन-प्रशासन चलाने में है या सम्माकन के मुकुट पहनने में ? अशोक वाजपेयी जी भाषा को बीमार या मरने से बचाने के बजाए लेखकों की बीमारी के लिए पतले हुए जा रहे हैं । क्या हमें सिर्फ लेखक की बीमारी ही दु:खी करती है ? ऑल इंडिया इंस्टी‍ट्यूट, राम मनोहर लोहिया अस्प ताल के बाहर बैठे हजारो गरीबों की नहीं ? यदि लेखक की भाषा, साहित्यह बचेगा, उसे पढ़ा, पढ़ाया जाएगा तो अपनी बीमारी से मुक्ति तो लेखक को खुद-ब-खुद मिल जाएगी । क्याउ लेखकों के लिये ऐसे धर्मार्थ ट्रस्टर और किसी लालाओं के ट्रस्टम में कोई अंतर रहेगा ? लगता है जैसे इन सम्माटनीय बुजुर्ग लेखकों ने साहित्यि रचना न की हो कोई जंग जीती हो और अब सत्ताग से पुरस्कानर की अपेक्षा रखते हैं । जब बड़े लेखक ऐसी बातें करें तो जनता क्योंै सुनेगी ? उसे अब आपकी जुबान नहीं जीवन से प्रमाण चाहिए । हम सब हिंदी के नाम पर पुरस्काार, पीठ, अतिथि-सत्काकर की तलाश में है तो हमारी संततियॉं अंग्रेजी के देशी-विदेशी स्कूअल, कॉलिजों की तरफ अग्रसर । सरकार द्वारा गठित ज्ञान आयोग पूरे जोर से अंग्रेजी की वकालत कर ही रहा है ।

कुछ दोस्तस भाषा, संस्कृ ति की हर लड़ाई को ‘कार्पोटाइशन’ के चश्मे- से देख रहे हैं । यह अति से ज्यासदा सरलीकरण भी है, समस्याट से बचकर भागना भी । वे कहते हैं यह सब कार्पोरेट घरानों और उनकी पूंजी का खेल है । चलो मान भी लिया लेकिन उन्हें जगह, रास्तां तो हमारी भूख और अकर्मण्यआता ने ही दिखाया । आपकी भूख अंग्रेजी की है । कई दलित चिंतक तो अंग्रेजी की इस भूख को पेट की भूख से भी बड़ी मानते हुए उसे देवी की तरह पूजते हैं । क्या् अंदाज है सवर्णों के खिलाफ वैकल्पिक विमर्श का यानि कि अंग्रेजी के लिये सवर्ण, दलित, पिछड़े सभी की भूख एक समान । तो सरकार तो यह सब करने से रही । उसने दे दी आजादी निजी स्कूमलों को । खुले आम । वे पूंजी लगा रहे हैं अंग्रेजी पढ़ा, रटा रहे हैं और पैसा वसूल रहे हैं । सरकारी स्कूेलों से भगदड़ शुरू होकर उनके दरवाजे पर लाइन लगी है । दुत्का र, फटकार के बाद भी अंग्रेजी की देहरी चाट रहे हैं । तो अफसोस क्यों ? कार्पोरेट पूंजी निजी अंग्रेजी स्कूंलों में उसी मात्रा में बढ़ रही है जितनी अंग्रेजी की भूख । क्याै विदेशी पूंजी देशी भाषा और संस्कृ्ति को बढ़ावा देगी ? उनका पैसा, उनकी भाषा ।

कार्पोरेट पूंजी या अंग्रेजी बढ़ने का दूसरा कारण है हमारी अकर्मण्यढता । एक विभाग सरकारी स्कूालों को दुरुस्तक करना चाहता था यानि कि पढ़ाई में सुधार हो । एक अधिकारी ने सीधे समर्पण कर दिया । ‘कुछ नहीं हो सकता जी ! टीचर्स, कर्मचारी ऐसी पॉलिटिक्स् में डूबे हैं कि पढ़ने-पढ़ाने की तो नौबत ही नहीं आती ।’ पॉलिटिक्सऐ के लिये कार्पोरेट पूंजी तो जिम्मेंदार नहीं है ? यह तो हमारी अपनी बीमारी है । स्कूसल का प्रिंसीपल उत्तजर प्रदेश, बिहार की तर्ज पर थाने के दारोगा की तरह अपनी जाति का चुना जाता है तो कभी वी.सी. अपनी पार्टी का । गनीमत है अभी स्कू लों में विद्यार्थी यूनियन के चुनाव नहीं पहुंचे । क्यार इसे दिल्ली के एम्सा के हश्र से नहीं समझा जा सकता ? क्योंन कैंसर के इलाज के लिये क्रिकेटर अमेरिका जाता है और कई पूर्व प्रधानमंत्री, मंत्री भी । और क्यों देश के लाखों छात्र अमेरिका, आस्ट्रे लिया ‘भारत छोड़ो’ आन्दोरलन की तर्ज पर भाग रहे हैं । अधिकांश मॉं-बाप की सारी कमाई को लेकर न आने की आशंका, उम्मीनद के साथ । कार्पोरेट पूंजी तो अहसान ही कर रही है जो आपके दरवाजे पर खुद चलकर आ रही है । उसके आपकी तरफ धीमी चाल से तो आप खुद परेशान हो उठते हैं । राज्योंक में होड़ लगी है कि मेरे यहॉं ज्या दा आयें । कोई अमेरिका के राष्ट्रआपति को सीधे अपने यहॉं बुला रहा है तो कोई उसकी विदेश मंत्री से हाथ मिलाकर खुश हो रहा है । क्यां भाषा के प्रश्न को इस कोण से देखना भी जरूरी नहीं है ?

मेरे और मेरे अमीर समाज के बच्चेा इन्हींं अंग्रेज, कार्पोरेट स्कूोलों में पढ़ते हंप । धीरे-धीरे उनके सपने इन्हींे कार्पोरेट कम्पंनियों में सी.ई.ओ. या जो भी पद मिले बनने के हैं । अकर्मण्यनता, जातिवाद, क्षेत्रवाद के चंगुल में फंसी सरकार की तरफ देखना तक नहीं चाहते । हारकर हम भी कहते हैं कार्पोरेट सेक्टरर में जो भी मिले ले लो । मैं भी उन्हींे कार्पोरेट पूंजी द्वारा तैयार कार, गाड़ी में चलता हूँ । कपड़े, कंप्यूटर से लेकर मेरे आसपास की 99% दुनिया उन्हींा की बनायी हुई है सिर्फ दाल रोटी को छोड़कर । मैं इनसे मुक्ति की बजाय इन सुविधाओं से और चिपटना चाहता हैं ।

आजाद भारत की सरकार के सामाजिक, राजनीतिक विमर्श में धर्म, जाति, प्रांत को अलग-अलग सांचों और चालाक सुलझी भाषा में देखने की वैसी ही दृष्टि है जैसी किसी भी सत्ता , मुगल या अंग्रेज की रही होगी । और तो और हिदी लिखना शहर ही नहीं अब गॉंव भी भूलता जा रहा है । दिल्लीऔ से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्कूल, कॉलिज शिक्षा के नाम पर या तो शून्यी है या नकल की डिग्रियॉं बांट रहे हैं । इसका प्रमाण मिलता है उनके आवेदन पत्र या पत्रों से । स्कूकल के प्रिंसीपल, या प्रबंधक या दोनों ने मिलकर उत्तकर प्रदेश के नये मुख्यत मंत्री को पत्र लिखा है । स्कूलल की समस्यारओं को उठाते हुए । है भगवान ! जब प्रधानाचार्य हिदी के लिखे एक पन्ने के पत्र में इतनी गलतियॉं हो सकती हैं तो पूरे स्कूधल के स्त र का अंदाजा लगाया जा सकता है । दो बातें- एक तो पत्र लिखने का न कोई रिवाज रहा, न भाषा पर अधिकार । पिछले बीस बरसों में अंग्रेजी ने इन सभी का हिंदी के प्रति मोह भंग कर दिया है । मोबाईल हाथ में है । बच्चों को कंप्यूटर सिखाना चाहते हैं । पढ़ाई की कक्षाओं में यदि विद्यार्थी है तो केवल इंगलिश स्पीकिंग के कोचिंग सेंटर में । ऐसे में दिल्ली वासी या हिंदी प्रांतों में लोग हिंदी लिखना भूल जायें तो क्या आश्चर्य ।

प्रसिद्ध अफ्रीकी लेखक न्यूगी वा थ्योंगो अपने लेख ‘भाषा का साम्राज्य‍वाद’ (तीसरी दुनिया : संपादक आनंद स्वयरूप वर्मा) में लिखते हैं कि अंग्रेजी सत्ताे की भाषा है जिसे इन देशों में बहुत छोटा समूह ही बोलता है । देशी भाषाएं यदि बची हुई हैं तो अधिसंख्योक गरीब, मजदूरों की वजह से ।
लेकिन भारत में न केवल अमीरों को बल्कि गरीब दलितों को भी कार्पोरेट, विदेशी पैसा भरमा रहा है ।

विज्ञापनों की चिंघाड़ती भाषा के सामने इसीलिये सितंबर में हिंदी का जाप करने से कुछ नहीं होने वाला । वक्ता आ गया है जब जुबान की बजाए हम सबके जीवन में अपनी भाषाएं शामिल हों । और इसकी शुरूआत दिल्ली से करनी होगी जो देश की राजधानी भी है और हिंदी भाषा और साहित्य की भी ।

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