स्‍वदेशी और साहित्‍य

एक कथाकार मित्र ने अपनी नवप्रकाशित पुस्‍तक रजिस्‍ट्री से भेजी है । रजिस्‍टर्ड पोस्‍ट में बीस रूपए लगते हैं । लेखक जाने-माने कथाकार (लेखकों के बीच) हैं, एक पत्रिका के संपादक भी हैं । अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिये उनकी खास पहचान है । उनका आग्रह है कि मैं इस पुस्‍तक पर कहीं विस्‍तार से लिखूं जिससे कि बाकी जनता को भी देश की जटिल सामाजिक संरचना और आर्थिक स्थिति  का पता चल सके ।

 

मेरा मन ऐसे वाकये से प्रसन्‍न तो होता है लेकिन दिमान सुन्‍न भी होने लगता है । लेखक कहानी लिखे, उसे छपवाने की जद्दोजहद से गुजरे, पुस्‍तक को अपने खर्च से समीक्षा करने-कराने के लिए भेजे और फि‍र भी इसकी क्‍या गारंटी  है कि उसकी बात को कोई सुनेगा, समझेगा ! यहां इस सब प्रयास के पीछे जो लेखक की आकांक्षा रहती है उसका आधार निश्चित रूप से एक प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक का यह वाक्‍य रहता है ‘भले ही आपके लेखन को दो लोग ही पढ़ें, तब भी उसकी सार्थकता है । कम से कम अपनी बात तो आजादी से कही आपने ।’ लेखन की शुरूआत के लिए ऐसा वाक्‍य प्रेरणास्‍पद हो सकता है लेकिन लेखन से अपेक्षित परिणाम के लिए नहीं । प्रबंधन के जुमले में कहा जाए तो ‘जब तक समाज की एक निश्चित, उपयुक्‍त संख्‍या तक यह बात नहीं पहुंचे, उसका मन न बदल पाए, अपेक्षित परिवर्तन असंभव होता है ।’ मीडिया, प्रकाशन की दुनिया में ‘ताकि सनद रहे’ कालम में विचार दर्ज तो कर लिया जाता है पर उसका असर समाज में नहीं दिखाई देता । यदि देता तो कम से कम हिन्‍दी समाज कुछ बेहतरी की तरफ बढ़ता लगता ।

 

मेरे सामने यह प्रश्‍न है कि क्‍या हम सब प्रांतीय, देशी भाषाओं के लेखक भी कुटीर उद्योग, लघु उद्योगों की तरह अपने अस्तित्‍व के लिए नहीं छटपटा रहे हैं ? बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों की उपभोक्‍तावाद की आंधी ने धीरे-धीरे सब देशी उद्योगों, दस्‍तकरी का सफाया कर दिया है । उदाहरण के लिए कोका कोला, पेप्‍सी ने शायद ही किसी देशी पेय को बाजार में छोड़ा हो । देशी जूता उद्योग को भी बड़े-बड़े विज्ञापनों वाले ऊंची कीमतों के जूतों ने बाजार की चमचमाती मुख्‍यधारा से गलियों में खदेड़ दिया है । साबुन, पाउडर, टूथपेस्‍ट तो दिन-प्रतिदिन मीडिया की बदोलत रोटी से भी महत्‍वपूर्ण बना दिये गये हैं । कपड़ा उद्योग और उन्‍हें बनाने वाली छोटी-छोटी मिलों पर भी विदेशी रेडीमेड का ताजा और तीव्र आक्रमण हुआ है । ये सब हो रहा है आराम, गुणवत्‍ता, विश्‍व स्‍तर के नाम पर । क्‍या इसकी तुलना लेखन के क्षेत्र में अंग्रेजी पुस्‍तक – पत्रिका बनाम देशी लेखन से नहीं की जा सकती ? बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों का जो आक्रमण खान-पान की जिन्‍दगी में नये-नये उत्‍पादों से हो रहा है, साहित्‍य-संस्‍कृति में वैसे ही अंग्रेजी के माध्‍यम से हो रहा है और वह भी घातक तरीके से । इसीलिये बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों के गर्भ से निकली अंग्रेजी संस्‍कृति ने पिछले 10 वर्षों में ढेरों भारतीय अंग्रेजी लेखक पैदा किये हैं । यह सचमुच पैदा करने जैसी ही बात है जिसमें किसी लेखक को विभिन्‍न मुद्राओं में ग्‍लैमर की चाशनी में डालकर रातों-रात राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सभी अंग्रेजी के दैनिकों, साप्‍ताहिकों आदि में इस तरह प्रस्‍तुत किया जाता है गोया न तो इससे पहले किसी ने उस जैसा लिखा, न आगे कोई लिखेगा । हिन्‍दी या प्रान्‍तीय भाषाओं के लेखकों को वर्षों के लेखन के बावजूद हिन्‍दी प्रान्‍तों में भी नहीं पहचाना जाता है जबकि आक्रामक प्रचार के चलते अंग्रेजी के इन बेस्‍ट सेलरों को देश के कोने-कोने में जाना जाता है । उच्‍च और मध्‍यम वर्ग में उनके पाठकों की बड़ी तादाद न हो पर कम से कम लोग उनके नाम तो जानते ही हैं । सामान कैसा है, क्‍या है, इसको जानने से पहले ही उनकी पुस्‍तकों की हज़ारों प्रतियां बिक जाती हैं । लेखक को भी खूब पैसा मिल जाता है । यह है, बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियों के उत्‍पादों के बरक्‍स भारतीय भाषाओं में लिखे जाने वाले स्‍वदेशी साहित्‍य का हश्र । अब बिहार, ओडीशा, उत्‍तर प्रदेश का लेखक कितनी भी यंत्रणादायक स्थितियों में और कैसा भी जिए, कुछ भी लिखे, क्‍या बहुराष्‍ट्रीय उद्योगों के अंग्रेजी साहित्यिक उत्‍पादों का मुकाबला कर पायेगा ?

 

आज स्‍वदेशी के बैनर तले सभी दलों, विचारधाराओं के कार्यकर्त्‍ता धीरे-धीरे गोलबंद हो रहे हैं । उन्‍हें छुटपुट सफलताएं भी मिल रही हैं । कुछ दिनों पहले आयोडीन नमक के मामले में उनकी जीत का उदाहरण बड़ा उत्‍साहवर्द्धक है । गुजरात में अमूल ने तो एक छोटे से उद्योग से शुरूआत करके दुनिया की बड़ी से बड़ी कम्‍पनियों को दूध और मक्‍खन के क्षेत्रों में पछाड़ दिया है । क्‍या साहित्‍य में ऐसे सामूहिक प्रयास की जरूरत नहींहै ? पहले हिन्‍दी भाषा भाषी क्षेत्रों में, फि‍र दूसरी भाषा के लेखकों को भी साथ लें, तो क्‍या अंग्रेजी पुस्‍तकों, संस्‍कृति के वर्चस्‍व पर लगाम कसी नहीं जा सकती ? उस स्थिति में न किसी को व्‍यक्तिगत अनुरोध करने की जरूरत पड़ेगी और उसके बाद भी दूर तक जाएगी- लाखों पाठकों तक । मौजूदा स्थितियों की तरह लेखक की बात लेखक तक ही सीमित नहीं रहेगी । अफसोस यही है कि बाकी क्षेत्रों में जहॉं स्‍वदेशी के प्रति एक निष्‍ठा से लोग आगे आ रहे हैं, साहित्‍य में स्‍वदेशी ही इस धारणा की चर्चा भी नहीं सुनाई पड़ती ।

 

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