स्‍लीमैन के संस्‍मरण

रहा होता । शिक्षा, बराबरी, राष्‍ट्रीय संस्‍थान, अनुसंधान कानून का राज, लोकतंत्र सभी की शुरूआत अंग्रेजों ने की वरना मुगलों के दो-चार ताजमहलों, मस्जिदों, मकबरों, मदिरों वेद-पुराणों के बूते तो इतना बड़ा देश नहीं बन सकता था ।

स्‍लीमैन 1809 में ब्रिटिश फौज में एक अंग्रेज सिपाही के रूप में भर्ती हुए । पहली तैनाती हुई पटना, दानापुर में । 1814 से 1816 तक चले नेपाल युद्ध में भीषण महामारी की चपेट में आकर मरते-मरते बचे । 1820 में सिविल सेवा में चुने गये और 1830 में नरसिंहपुर, दमोह, सागर, ओरछा, दतिया, ग्‍वालियर में तैनाती हुई  । यही वह वक्‍त है जो इस पुस्‍तक में दर्ज हुआ है । दुनिया जानती है कि उन दिनों पूरा देश ठगी, सती जैसी कुप्रथाओं के आतंक में था । ठगों की क्रूरता और अमानवीयता को उन्‍होंने बहुत नजदीक से जाना और इसीलिए उनके विनाश की उन्‍होंने कसम खाई । बतौर अनुवादक राजेन्‍द्र चंद्रकांत राय की भूमिका स्‍लीमैन की जो छवि सामने आती है ‘वह अफसरियत में डूबे हुये अधिकारी की न होकर एक अधिक मानवीय समाज के गहरे प्रेक्षक सभ्‍यताओं के अध्‍येता तथा भारतीय-समुदाओं एवं धर्मों को विनम्रतापूर्वक समझने की क्षमताओं से युक्‍त मनुष्‍यों की है । उन्‍होंने अनेक स्‍थानों पर यूरोपियनों की तुलना में भारतीयों की श्रेष्‍ठता को बिना संकोच के रेखांकित किया है और भारतीय सभ्‍यता का एक अधिक उदार तथा विकसित सभ्‍यता के रूप में मूल्‍यांकन भी । नर्मदा पर लिखते हुये वे ऐसे मिथकों की खेज भी करते हैं जिन्‍हें या तो हम जानते ही नहीं या फिर हमने उन्‍हें भुला दिया है । धर्मों में व्‍याप्‍त अवैज्ञानिक तथ्‍यों पर भी वे अपना दृष्टिकोण प्रस्‍तुत करते हैं किंतु अनादरपूर्वक नहीं । जिज्ञासु की तरह । जरूरत के मुताबिक वे धर्म के ज्ञाताओं के साथ चर्चाएं भी करते हैं ।’

स्‍लीमैन की तुलना करें आज के सिविल सेवकों से । नब्‍बे प्रतिशत दिल्‍ली, नोएडा की मलाईदार, मजेदार पोस्टिंग के दीवाने रहते हैं । चुनौतियां स्‍लीमैन के सामने थीं तो वे आज और कई रूपों में और भी विकरालता से सामने खड़ी हैं । यहीं ब्रिटिश शासन की खूबी सामने आती है कि एक निष्‍ठावान सामान्‍य सैनिक स्‍लीमैन अपने काम के बूते लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से होता हुआ अवध का रेजीडेंट भी नियुक्‍त होता है और महारानी विक्‍टोरिया द्वारा पुरस्‍कृत भी । ऐसा नहीं कि गलती हमारे मौजूदा नौजवान अफसरों की है, हमारे राजनेता उससे कई गुना ज्‍यादा जिम्‍मेदार हैं । पुस्‍तक को पढ़ते हुए बहुत बातें सीखी जा सकती हैं । स्‍लीमैन ने भारत पहुंचते ही अरबी, फारसी समेत भारतीय भाषाएं सीखीं; भारतीय धर्म और रीति-रिवाजों का अध्‍ययन किया । इसी ज्ञान के कारण ही तो वे समाज की उन बुराइयों के रेशे-रेशे को अपनी डायरियों में और संस्‍मरणों में दर्ज कर पाए । ये सभी संस्‍मरण दो मुख्‍य किताबों में शामिल हैं ‘जर्नी थ्रू किंगडम ऑफ अवध’ और ‘रैम्‍बेल्‍स एंड रिकलेक्‍शन्‍स ऑफ एन इंडियन आफीशियल’ । हाल ही में मैनेजमेंट गुरु रमा पुर्जापुरकर की किताब में भी यह बात रेखांकित की गई है कि नयी बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनी जहां भी जाती हैं सबसे पहले वहां के समाज, भाषा, रीति-रिवाजों पर ध्‍यान देती हैं । उनकी सफलता का राज इसी में छिपा हुआ है । लेकिन भारतीय नौकरशाही में उसे न जाने कौन से हाथ अंग्रेजी के माध्‍यम से अमेरिका, इंग्‍लैंड की कम्‍पनियों और उनके साहित्‍य को पढ़ने को उकसाते हैं बजाय अपने देश को जानने, समझने के । यही कारण है कि वर्ष 2011 में सरकार ने जो मूर्खतापूर्ण निर्णय किया था ‍जिसमें भारतीय भाषाएं चाहे किसी को न आए,  अंग्रेजी ज्ञान ‍सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में अनिवार्य कर दिया गया था । एक  और सबक जो स्‍लीमैन के जीवन से मिलता है वह यह कि मैरिट का सम्‍मान अंग्रेजी हुकुमत खूब करती है । आजाद भारत में तो जाति, क्षेत्र महत्‍वपूर्ण बन गया है । जैसे समाज में चार जातियां वैसे ही नौकरियों में । एक और सबक कि भाषाओं के विद्वान अर्थशास्‍त्र, इतिहास समाज के अध्येता के रूप में भी उन्‍हें उतना ही सम्‍मान मिला । भारतीय नौकरशाही तो इन गुणों को अवगुण मानती है और किसी भी नौकरशाह को इन्‍हीं आधारों पर खारिज कर देती है ।

राजेन्‍द्र चंद्रकांत राय की तारीफ की जानी चाहिए इस किताब की पूरी प्रस्तुति के लिए । लगभग 52 उपशीर्षकों में यह संस्‍मरण प्रस्‍तुत किये गये हैं और हर शीर्षक में दर्जनों रोंगटे खड़े करने वाले किस्‍से हैं । ठगी का एक छोटा सा नमूना । एक बार जब मुगल अफसर अवध क्षेत्र से गुजर रहा था तो ठग उसके पीछे लग गये । मुगल अफसर को ठगी के किस्‍सों का  पता था । इसलिए मुगल अफसर ठगों से बार-बार बचता रहा । जिस सराय में वह टिका वहां पहले से ठग पहुंचे हुए थे । रास्‍ते में उनके साथ उन्‍होंने लगने की कोशिश की यह कहकर कि अकेले राह चलने के बजाय साथ चलना ठीक है । मुगल अफसर फिर समझ गया । लेकिन ठग कहां मानने वाले थे । रास्‍ते से गुजरते हुए मुगल अफसर ने देखा कि छह गरीब मुसलमान अपने एक मुर्दा साथी को रखे हुए रो रहे हैं । ठगों ने बताया ‍कि वे अपने साथी को दफन करना चाहते हैं किन्‍तु कुरान शरीफ न पढ़ पाने के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे । आप मदद करेगे तो इस दुनिया में और दूसरी दुनिया में इसका ‍सिला जरूर ‍मिलेगा । बस मुगल अफसर पिघल गया । उनके पास पुस्‍तक भी थी और उन्‍हें लगा कि इस नेक काम में तो उन्‍हें मदद करनी चाहिए । मुर्दे को दफन करने के ‍लिए गड्ढा पहले ही खुदा हुआ था । अपने सिपाहियों के साथ जैसे ही वे दुआ के लिए बैठे ठगों ने मुगल अफसर और उनके दोनों सिपाहियों की गर्दन रूमाल से कसकर खुदी हुई कब्र में दफना दिया ।

ऐसे ही जहर खुरानी के दर्जनों किस्‍से इस पुस्‍तक में हैं । वे लिखते हैं कि जहर खुरानी वाले पूरे देश में फैले हुए हैं । किसी भी रास्‍ते पर जाएं । एक गरीब की कहानी जरूर पढ़ने लायक है (पृष्‍ठ 90-91) गरीब किसान के एक ही बेटा था । पत्‍नी की मौत हो चुकी थी । उसने जैसे-तैसे एक कम्‍बल खरीदा था । ठगों की निगाह उस कम्‍बल पर गई । वे रात गुजारने के बहाने पड़ोस में ठहर गये । बस उसी में उन्‍होंने बाप-बेटे को जहर दे दिया । क्रूरता की हद । सिर्फ एक कम्‍बल के लिए । लेकिन इन ठगों को यह अहसास भी नहीं होता था ‍कि वे कुछ गलत कर रहे हैं । ये ठग भी यही मानते थे कि उनके देवता उनसे ऐसा कराते हैं । इसलिए उन्‍हें इसका कोई अफसोस नहीं । ये ठग भी उन्‍हीं देवी देवताओं की पूजा करते हैं जैसे बाकी जनता और चोरी डकैती से मिले धन का वैसे ही देवी देवताओं पर चढ़ाते हैं । स्लीमेन लिखते हैं कि एक बार एक सरदार से जब कहा ‍कि तुम हत्‍याएं बंद क्‍यों नहीं करते तो उसका तर्क था –‘ईश्‍वर न करे ऐसा हो, उसने कहा हम सदा हत्‍याओं से परहेज करते हैं, परंतु जब कोई हमारा विरोध करता है तब हम उस पर हमला भी  करते हैं और उसे मार भी देते हैं । और ऐसा तो आप लोग भी करते हो । मैंने सुना है ‍कि सैन्‍य टुकडि़यों का बड़ा सम्‍मेलन ऊपरी प्रांतों में सम्‍पन्‍न हुआ है और उन्‍होंने दूसरे देशों में जाकर उन पर कब्‍जा करने का निर्णय लिया है । यदि कोई उनका विरोध करेगा तो वे उन लोगों की हत्‍याएं करने को भी तैयार हैं । हम भी तो यही कर रहे हैं । संसार के प्रत्‍येक राष्‍ट्र का लगभग ऐसा ही इतिहास है । राष्‍ट्रों ने भी इसे प्रसन्‍नता पूर्वक ग्रहण किया है । राजा रजवाड़े भी और कुछ नहीं, एक बड़े लुटेरे ही हैं । राष्‍ट्र में शक्ति संतुलन के बहाने उनकी महत्‍वकांक्षाओं को भी पूरा किया जाता है ।’

चेचक, हैजा या कोई भी बीमारी हो सभी के लिए कोई न कोई देवी देवता इन्‍होंने बना रखा है । एक रोचक किस्‍सा पढि़ए । एक गांव में एक व्‍यक्ति के हाथ से मूर्ति टूट गई । उसे इतना अपराधबोध हुआ कि वह गले में फंदा डालकर लटक गया । लेकिन किसी तरह बचा लिया गया । पंडित, पुरोहितों ने बताया कि यदि तीन सौ किलामीटर दूर बनारस के पंडों को दान दे दो प्रायश्चित हो जाएगा । लेकिन तभी उसके घर में बच्‍चे को चेचक निकल आई । चेचक को देवी मानते थे और उनका विश्‍वास था कि यदि चेचक निकली हो तो कोई भी आदमी गांव से बाहर नहीं जा सकता । वह आदमी चला गया । उसके बाद चेचक का प्रकोप बढ़ा तो उसी को जिम्‍मेदार माना गया । मानो पूरा भारतीय समाज तर्क से तो ‍किसी चीज को समझना ही नहीं चाहता । संस्‍मरणों में वे लिखते हैं कि हिंदुओं में यह रिवाज है कि जिनकी मृत्‍यु चेचक के कारण होती है उनका दाह संस्‍कार नहीं किया जाता बल्कि दफन किया जाता है । मान्‍यता यह है कि चेचक देवी के कारण नहीं होती बल्कि चेचक सवयं देवी ही है । इसलिये इस बीमारी से ग्रस्‍त व्‍यक्ति की मृत्‍यु होने पर दाह-कर्म करना असल में देवी को ही जला डालने के बराबर माना जाता है । (पृष्‍ठ 153-157) ये बातें बताती हैं कि भारत में ज्ञान, विज्ञान क्‍यों नहीं पनपा ।

स्‍लीमैन अपने संस्‍मरणों में आगे दर्ज करते हैं- भारत की भारी भरकम जनसंख्‍या का तीन चौथाई हिस्‍सा व्‍यक्तिगत बीमारियों का कारण शैतानी आत्‍माओं और बुरी नजरों को ही माना जाता है । जो लोग मंत्रों और प्रार्थनाओं के जरिये बीमारियों को दूर करने का हुनर जानते हैं, उन्‍हें ओझा-गुनिया कहा जाता है । ऐसे लोगों को जो परम् प्राकृतिक शक्तियां प्राप्‍त हों, उसे ईश्‍वर का उपहार माना जाता है । इसीलिये ओझा-गुनिया बिना कोई शुल्‍क लिये ही बीमारियों को दूर भगाने का कार्य करते हैं । ये लोग अपनी आजीविका को लिये खेती या मजदूरी जैसा पारंपरिक कार्य करते रहते हैं और साथ-साथ लोगों को स्‍वस्‍थ करने का धार्मिक कर्म भी । पेचीदा धार्मिक नियमों को, जैसा कि हिंदु धर्म के नियम हैं, पुजारियों द्वारा और भी पेचीदा बना दिया गया है, ठीक उसी तरह जैसा कि अंग्रेजी को वकीलों ने बना रखा है । एक हिन्‍दु अपने पंडित की सलाह के बिना कुछ भी नहीं कर सकता और एक अंग्रेज अपने वकील की सलाह के बिना कुछ भी नहीं करता ।      

ऐसे सैंकड़ों प्रसंग इस किताब में हैं जो रोचक, सांस रोककर पठनीय तो हैं ही इन्‍हें जानकर संवेदनशील वैज्ञानिक सोच वाला व्‍यक्ति भारतीय समाज की ऐसी स्थितियों पर सिर भी पीट सकता है । इतिहास, समाज शास्‍त्र, धर्म, ज्‍योतिष में रुचि रखने वालों के लिये बहुत ही उपयोगी पुस्‍तक । अगले संस्‍करण में भाषा और प्रूफ की गलतियों को जरूर दूर करना होगा । अनुवाद तो ऐसा है कि मानो स्‍लीमैन ने इसी भाषा में लिखा है ।

पुस्‍तक का नाम : स्‍लीमैन के संस्‍मरण
अनुवादक : राजेंद्र चंद्रकांत राय
प्रकाशक : साहित्‍य भंडार
50, चाहचन्‍द्र, इलाहाबाद-211 003
मूल्‍य : 800/- रुपये (400/- पेपर बैक मूल्‍य)
पृष्‍ठ : 439

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