स्कूल में हिन्‍दी

एन.सी.ई.आर.टी. ने भाषा शिक्षण पर एक छोटा सा संवाद पिछले वर्ष आयोजित किया था । लगभग बीस प्रतिभागी देश के अलग-अलग हिस्सों से, अधिकतर शिक्षक केन्द्रीय विद्यालयों, सरकारी स्कूलों, से और कुछ निजी स्कूलों के । लेकिन व्यथा सबकी एक सी ही थी । मेरे लिए यह सुनना लगभग अप्रत्याशित था कि हिन्‍दी पढ़ाना सबसे मुश्किल हो गया है । दूसरी प्रादेशिक भाषाओं के प्रतिनिधि या शिक्षक वहां नहीं थे यदि होते तो बाकी भारतीय भाषाओं की स्थिति को भी समझने में मदद मिलती । सभी का स्वर एक सा ही था कि बच्चे हिन्‍दी पढ़ने में ध्यान ही नहीं देते । यहां तक कि होमवर्क भी मुश्किल से करते हैं । पी.टी.एम. की बैठक में शायद ही कभी कोई माँ-बाप हिन्‍दी के बारे में पूछने, शिकायत करने या सुझाव देने आता हो । यह इसलिए कि रात-दिन बच्चों के अभिभावक उन्हें गणित, विज्ञान, या अंग्रेजी पर तो सायास ध्यान दिलाते हैं; शत-प्रतिशत तक पहुंचने के लिए टयूशन, कोचिंग क्लास भी कराई जाती हैं । लेकिन हिन्‍दी का क्या करना है यह तो हम सब बोल ही लेते हैं । ऐसे माहौल में हिन्‍दी शिक्षक की चुनौती क्लास में और स्कूल के अंदर और बाहर बहुत बढ़ जाती है ।

मेरे लिए आश्चर्यजनक पक्ष यह था कि निजी स्कूलों के बारे में तो वर्षों से सुनते ही आ रहे हैं कि वहां हिन्‍दी बोलने पर जुर्माना या दूसरे दंड की व्यवस्था कर दी गई हैं और सब कुछ जानते-समझते हुए भी माँ-बाप ऐसी तानाशाही के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाते । आवाज न उठाने की बेचारगी इसलिए है कि आवाज उठाई तो जितनी कोशिश रिश्वत और सिफारिश के बूते दाखिला मिला है कहीं उस स्कूल से बच्चे को बाहर ही न कर दिया जाए । आज से दस बारह साल पहले कम से कम केन्द्रीय विद्यालयों में तो ऐसी स्थिति नहीं थी । उनका सबसे खूबसूरत पक्ष था तो यही कि हिन्‍दी अंग्रेजी या दूसरी प्रादेशिक भाषाओं को समान सम्मान से देखा जाता था । उसके अनिवार्य कारण भी थे जैसे शिक्षक भी पूरे देश के अलग-अलग प्रांतों से होते हैं तो अभिभावक और विद्यार्थी भी और इन सभी को एक सूत्र में हिन्‍दी भी जोड़ती है और अंग्रेजी भी । प्रांत विशेष की जरूरत के हिसाब से बच्चे प्रादेशिक भाषाओं को भी सीखते हैं । लेकिन पिछले कुछ वर्षों से केंद्रीय विद्यालय भी निजी स्कूलों की होड़ में या अभिभावकों के दबाव में अपनी भाषाओं से दूर हो रहे हैं । यदि यकीन किया जाए तो दिल्ली के एक केंद्रीय विद्यालय से शिकायत मिली है कि वहां भी निजी स्कूलों की होड़ा-होड़ी हिन्‍दी बोलने पर पाबंदी लागू कर दी गई है ।

निजी स्कूलों के किस्से जितने बताए जाएं उतने कम हैं और ये किस्से निजी स्कूलों से ज्यादा अभिभावकों और स्कूल के अंग्रेजी समीकरण के ज्यादा हैं । एक अभिभावक ने दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल से अपने बच्चे को यह कहकर निकाल लिया कि मैं उस स्कूल में इतनी फीस देता हँ लेकिन मेरी उम्मीदों के मुकाबले स्कूल में उतनी अच्छी अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जा रही है । उम्मीदों की ऐसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए उनमें से कई अमीर अभिभावक मसूरी, शिमला या देश के दूसरे हिस्सों के स्कूलों में बच्चों को भेज रहे हैं जिन्हें बोर्डिंग स्कूल कहा जाता है यानि कि बच्चे स्कूल में ही पढ़ेंगे और वहीं के अहाते में रहेंगे और जब बाकी समाज के साथ संपर्क ही नहीं रहेगा तो मजबूरन अंग्रेजी अच्छी होती जाएगी । इस सब के लिए उन्हें चाहे अपनी ममता की कुर्बानी देनी पडे या खजाने की । थोड़े और अंग्रेजी के मारे बारहवीं पास करते ही बच्चों को अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड इसी अच्छी अंग्रेजी की तलाश में रवाना कर रहे हैं ।

किसी प्रोजेक्ट के लिये एम.बी.ए. की एक छात्रा आई हुई थी । दिल्ली में पली बड़ी । यह छात्रा हिन्‍दी बोल तो लेती थी लेकिन लिखना लगभग भूल चुकी है । उसने बताया कि आठवीं के स्कूल के बाद उसने शायद ही हिन्‍दी कभी लिखी हो । मैं पढ़ तो लेती हूँ लेकिन लिखना बहुत मुश्किल हो गया है । स्कूल के दिनों में भी उसके ‘नीली घंटी’ नाम के स्कूल में सख्त हिदायत थी कि यदि कोई हिन्‍दी में बात करते हुए पाया गया तो उसे स्कूल से निकाल देंगे । स्कूल से निकालने की धमकी मामूली नहीं है । इसकी आवाज अभिभावकों तक पहुँची और फिर अभिभावकों से लौटकर बच्चों तक । यानि कि कोई जरूरत नहीं हिन्‍दी में बोलने की यदि स्कूल वाले अंग्रेजी के लिए कह रहे हैं तो सीखो और जल्दी सीखो । हिन्‍दी भाषी समाज हो या पंजाबी या बंगाली धीरे-धीरे सभी ने स्थिति को स्वीकार कर लिया है ।

इस छात्रा की कुछ टिप्पणियां और भी गौर करने लायक हैं जैसे उसने बताया कि जहां हर महीने अंग्रेजी की डिबेट या इंगलिश की किताब के बारे में हर सप्ताह बोलने के लिए कहा जाता था, निबंध प्रतियोगिताएं होती थीं और इनाम स्वरूप अंग्रेजी की किताबें या दूसरे पुरस्कार दिये जाते थे हिन्‍दी की क्लास में या हिदी के लिए साल के सितम्बर को छोड़ कर कभी कुछ नहीं होता था ।

यह वह साँचा है जिसे समझना स्कूलों में हिन्‍दी , शिक्षा और भाषा के समीकरण और अंतत: हमारे समाज में भारतीय भाषाओं की स्थिति को समझने के लिए बहुत जरूरी है ।

कुछ और बच्चों ने तो हिन्‍दी की क्लास के बड़े रोचक मगर खतरनाक अनुभव सुनाए उन्होंने बताया कि जब वे सातवीं आठवीं में थे तो हिन्‍दी के शिक्षक (गनीमत है शिक्षिका नहीं) जैसे ही क्लास में घुसते कुछ बच्चे इंक पैन से उनके कपड़ों के पीछे इंक छिड़क देते थे । पूरी क्लास इन हरकतों में साथ होती । जैसे ही शिक्षक पढ़ाना या बोर्ड पर कुछ लिखना शुरू करते बच्चे अपनी पूरी योजना के तहत बताते कि सर, आपकी शर्ट के पीछे इंक लगी हुई है । शिक्षक का ध्यान बंटता और कई बार बहस के क्रम में बिना कोई पढ़ाई हुए वक्त कट जाता । कारण यहां भी वही धारणा थी कि निजी स्कूलों में ये बच्चे इतनी फीस देकर हिन्‍दी पढ़ने के लिए नहीं आए । हिन्‍दी का पीरियड तो एक रिलेक्स होने का पीरियड है ।

मोटा-मोटी यदि सर्वे किया जाए तो जितना सम्मान निजी स्कूलों में और शायद धीरे धीरे सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी के शिक्षक को मिलता है उतना हिन्‍दी के शिक्षक को कतई नहीं ।
ऐसे परिवेश में हिन्‍दी शिक्षक के लिए चुनौती और जिम्मेदारी और भी बडी हो जाती है । इसीलिए उसे अपने ज्ञान, अनुशासन और प्रबंधन की क्षमताओं को और बेहतर करना होगा । जबकि मामला है इसके उलट । जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे कुछ विश्वविद्यालयों को छोड़ दें तो हिन्‍दी के पठन पाठन, पाठयक्रम की विधाएं बेहद उबाऊ, बासी और मध्यकालीन लगती हैं । अभी एक दो दशक पहले तक हिन्‍दी साहित्य सूर-कबीर-तुलसी के अंधेरे के बाहर शायद ही कुछ देखता था । दूसरे सामाजिक विषयों या विज्ञान और आधुनिकता के नये विमर्शों के साथ हिन्‍दी का अध्यापक या पाठयक्रम शायद ही कोई संबंध रखता हो । और ऊपर से वे सभी कारण जैसे- न कोई प्रतियोगिता का अवसर और न कोई दूसरे प्रोत्साहन । प्रादेशिक भाषाओं के बूते अंतर्राष्ट्रीय नौकरी की बात सर्वविदित तो है ही । ये सभी कारक मिलकर ऐसी निर्मिति बनाते हैं इन स्कूलों में हिन्‍दी फालतू और सरकारी औपचारिकता भर रह जाती है ।
इसे एक और नजरिये से भी देखने की जरूरत है । यदि इंग्लैंड के शिक्षा परिदृश्य से तुलना की जाए तो जैसे हमारे यहां अंग्रेजी शिक्षक कम से कम शहरों में सदाबहार महक बनाये हुए हैं वैसी ही हैसियत इंग्लैंड में खेल शिक्षक की है । हमारे यहां खेल शिक्षक भी लगभग एक फालतू सी स्थिति में हैं । यदि इंग्लैंड, यूरोप में खेल शिक्षक ऐसी केंद्रीय भूमिका में हैं या उसे वह महत्व मिला हुआ है तो यह उन देशों में खेल के प्रति प्राथमिकता का भी बयान माना जा सकता है । इंग्लैंड की शिक्षा के उद्देश्यों से भी सबक सीखे जा सकते हैं जैसे- उनकी प्राथमिक शिक्षा का बीज वाक्य है – एक अच्छा नागरिक बनने के गुण पैदा करना । मशलन स्वास्थ्य, सफाई, सामाजिक आचरण आदि । अगले चरण में स्कूल समाप्त होने तक का उद्देश्य है ऐसी शिक्षा देना जो रोजगार में मदद करे जिससे कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें । तीसरे चरण की शिक्षा सिर्फ उनके लिए है जो किसी विशेषज्ञता की तरफ बढ़ना चाहते हों । वे गतिणज्ञ, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर जो भी बनना चाहें । इन प्राथमिकताओं के अनुसार बच्चों की प्रतिभा खुद-ब-खुद रास्ता ढूंढ़ लेती है । हमारे जैसे गुलाम देशों में कागज पर स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक चाहे जो लिखा हो व्यवहार में यदि कुछ शाश्वत सत्य है तो वह है अंग्रेजी । आजादी के साठ वर्ष के बाद यह सत्य सभी को सुंदर भी लगने लगा है ।
लेकिन इस हफ्ते मुम्बई हाईकोर्ट के एक निर्णय ने पूरे देश का ध्यान खींचा है । मुम्बई हाईकोर्ट में दाखिल यू.पी.एस.सी. के हलफनामे के अनुसार वे उम्मीदवार जो लिखित परीक्षा अंग्रेजी माध्यम से पास करके आए हैं वे अब अपना साक्षात्कार क्षेत्रीय भाषाओं यानि हिन्‍दी , मराठी, मलयालम आदि में भी दे सकते हैं । अभी तक की अनिवार्यता यह थी कि यदि आपने लिखित परीक्षा अंग्रेजी माध्यम से दी है तो आपको साक्षात्कार भी अंग्रेजी में ही देना लाजिमी है । संघ लोक सेवा आयोग के इस कदम की सर्वत्र सराहना हो रही है । यू.पी.एस.सी. ने इस समाधान के लिए एक समिति का गठन किया था और उस समिति की सिफारिशें यू.पी.सी.सी. ने मानते हुए केन्द्र सरकार को भेज दी है । उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार उन्हें मान लेगी । अच्छा पक्ष यह है कि संघ लोक सेवा आयोग ने खुले मन से इसे स्वीकार किया है ।

लेकिन चौंकाने वाली और विचित्र बात यह है कि इस खबर को जितना जोर शोर से प्रचारित प्रसारित किया गया, अखबार में जगह मिली और मीडिया के दूसरे मंचों पर जगह मिली उतनी बड़ी जीत यह है नहीं । निश्चित रूप से अपनी भाषा में बात आसानी से और असरदार तरीके से कही जा सकती है । लेकिन ऐसा परीक्षार्थी शायद ही कोई हो जिसने अंग्रेजी माध्यम से मुख्य परीक्षा पास की हो लेकिन वह अपनी प्रादेशिक भाषा के भरोसे ही साक्षात्कार देगा । इसका दूसरा खतरा यह भी है कि प्रादेशिक भाषा में ही पढ़ने की अनिवार्यता एक ऐसा चयन बोर्ड बनाने के लिए मजबूर होगा जिसमें सिर्फ उसी भाषा के समझने वाले साक्षात्कारकर्ता हों । यदि अपनी भाषा के महत्व का ढोल पीटना इतना महत्वपूर्ण है तो 2011 की प्रारंभिक परीक्षा का स्वरूप इतने चुपचाप ढंग से क्यों बदल दिया गया जिसमें पहले चरण में ही अंग्रेजी का प्रवेश हो गया है । प्रारंभिक चरण में अंग्रेजी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं की संस्तुति कोठारी समिति ने 1975 में गठित अपनी रिपोर्ट में की थी लेकिन सरकार ने जो माना और जो 1979 से लेकर 2010 तक की परीक्षाओं में लागू रहा उसमें प्रथम चरण में न अंग्रेजी थी, न हिन्‍दी और अन्य भारतीय भाषाएं । सिर्फ था तो एक वैकल्पिक विषय और सामान्य ज्ञान । कोठारी समिति के बाद जो दूसरी समितियां गठित की गई जैसे- प्रोफेसर सतीश चंद्र कमेटी (1989) या उसके दस वर्ष बाद प्रोफेसर अलग समिति उन्होंने भी पहले चरण में सिर्फ अंग्रेजी की संस्तूति कभी नहीं की । फिर पहले ही चरण में अंग्रेजी का प्रवेश क्या सभी भारतीय भाषाओं को और उनको बोलने वालों को प्रभावित नहीं करेगा । यह तो वही बात हुई गुड़ खाये लेकिन गुलगुलों से परहेज । भारतीय भाषाओं में साक्षात्कार तक तो वे तब पहुँचेंगे जब पहले चरण में अंग्रेजी की बाधाओं को पार कर पाएंगे । पहले चरण के चार सौ नंबर के पेपर में तीस नंबर की अंग्रेजी कोई छोटी बात नहीं है । जिस परीक्षा में लाखों लोग बैठते हैं वहां एक-एक नंबर के अंक से हार और जीत का फैसला होता है । और इस परिवर्तन का दूसरा पक्ष यह है कि नयी प्रणाली का प्रश्न पत्र उन उम्मीदवारों के ज्यादा पक्ष में जाता है जो अंग्रेजी से लदी हुई परीक्षाएं जैसे – कैट, जी.आर.ई. या दूसरी परीक्षाएं देते रहते हैं । कोठारी समिति की रिपोर्ट के आधार पर 1979 में सिविल सेवा की परीक्षा (आई.ए.एस) इस देश की शासन व्यवस्था में बहुत बड़ी क्रांति मानी जा सकती है । इसका अंदाजा इन आंकड़ों से लग सकता है जहाँ आजादी से लेकर 1970 तक परीक्षार्थायों की संख्या सिर्फ दस हजार तक पहुंच पायी, 1979 में अपनी भाषाओं की आजादी मिलते ही उनकी संख्या दस गुनी बढ़ गई यानि कि एक लाख से भी ज्यादा ।

शायद समावेषी कदम ऐसे ही होते हैं जिसमें पूरे समाज की भागीदारी हो उनकी अपनी जुबान, भाषा के बूते । यह कदम टुकड़े-टुकड़े आरक्षण या ऐसे कई कदमों से महत्वपूर्ण साबित हुआ है ।

संघ लोक सेवा आयोग के अंग्रेजी के प्रति पलड़ा झुकने से सकूलों में रही-सही हिन्‍दी या प्रादेशिक भाषाएं कितना बच पाएंगी यह पूरे समाज के समक्ष चुनौती है ।

लेकिन यह सब जानते हुए भी हिन्‍दी के राजनेताओं बुध्दिजीवियों की चुप्पी क्या बताती है ?

One thought on “स्कूल में हिन्‍दी”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *