साक्षात्कार

डॉ. सुनील सुमन और रविप्रकाश मिश्र की प्रेमपाल शर्मा से बातचीत

 

प्रश्‍न । – लेखन के प्रति आपका झुकाव कैसे और कब हुआ ?

उत्‍तर –  कोई भी लेखक कोई निश्चित दिन या तारीख नहीं बता सकता कि वो लेखन के प्रति कब और कैसे आया लेकिन हर लेखक के साथ कई कारण लेखन की तरफ आने के हो सकते हैं ।

मेरा बचपन निपट छोटे किसान परिवार से संबंध रखता है । सबसे जरूरी काम थे खेती, किसानी और संबंधित काम जिसमें भैंस चराने, कुट्टी काटना शामिल थे । इसमें कोई अनोखी बात नहीं है । इस देश में हर ग्रामीण बच्‍चे का बचपन ऐसा ही होता है । हम तो फिर भी अपने को सौभाग्‍यशाली मानेंगे कि थोड़ी बहुत जमीन तो थी जिस पर खाने भर को अनाज पैदा हो जाता था ज्‍यादातर दलित परिवार के बच्‍चों के पास तो इतनी भी सुविधा नहीं होती । एक दलित आदिवासी या मजदूर के बच्‍चों के जीवन और उसकी कठिनाइयों की मैं कल्‍पना कर सकता हूँ । खेती का काम खत्‍म करते-करते स्‍कूल जाते और ऐसे ही बढ़ते-बढ़ते वि‍ज्ञान में स्‍नातक पढ़ाई के लिए खुर्जा के कॉलिज में पहुंच गये । झुकाव साहित्‍य की तरफ नहीं किताबें पढ़ने की तरफ शायद पांचवी छठी क्‍लास से ही हो गया था । यदि स‍ही याद कर पाऊं तो घर में मेरे पिताजी की शायद सातवीं कक्षा की एक इतिहास की पुस्‍तक थी । मैं उसे बार बार पढ़ता और उसमें डूब जाता । मेरे बाबाजी के कमरे में भी धर्म की दस पांच किताबें थीं जिनमें सुख सागर, कुछ स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी और कुछ चाणक्‍य नीति जैसी किताबें थीं । महाभारत और सुख सागर के प्रति ऐसा चस्‍का लगा कि बाबा दोपहर को जैसे ही सो जाते मैं उनकी किताबों की पोटली चुपचाप निकालकर नीम के पेड़ के नीचे पढ़ता रहता । कुछ डरते हुए भी क्‍योंकि वे अपनी किताबें किसी को छूने नहीं देते थे कि कहीं फट न जाएं या बच्‍चे इधर उधर न कर दें । इसी क्रम में एक और किताब याद आती है ‘भारत के क्रांतिकारी’-मनमथ नाथ गुप्‍त की

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लिखी। वर्षों तक मैं उस किताब को बार बार पढ़ता रहा हूँ । शायद इतिहास के प्रति मेरा झुकाव बहुत कुछ इसी किताब की देन है । शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, जतिन दास जैसे क्रांतिकारियों के कारनामे पढ़कर उत्‍साह से भरा   रहता । खेती का काम करते-करते भी मेरे अंदर गुस्‍सा और कुछ कर गुजरने की बिजली दौड़ती रहती ।

उन्‍हीं किताबों के बीच से गुजरते हुए ग्‍यारहवीं, बारहवीं तक मुझे मुंशी प्रेमचंद्र की कहानियां, उपन्‍यास मिल गये । उन दिनों स्‍कूल की लायब्रेरी में हफ्ते में एक दिन जाना अनिवार्य था । (अफसोस कि इंटर कॉलेज पहासू और करोरा की वे लायब्रेरी अब दशकों से बंद हो चुकी हैं) वहां से भी तरह तरह की किताबें पढ़ने को मिल जाती थी । मैं छात्र तो विज्ञान का था लेकिन शायद खाली समय में जितना साहित्‍य पढ़ा होगा उतना विज्ञान नहीं । विज्ञान पढ़ने के पीछे कोई ऐसा कारण नहीं  था कि मेरी विज्ञान में कोई जन्‍मजात रुचि थी । विज्ञान इसलिए लेना पड़ा कि क्‍लास में पहले दूसरे स्‍थान पर आता था । ग्‍यारहवीं कक्षा में गणित के अध्‍यापक चाहते थे कि मैं गणित की शाखा में आऊं तो जीवविज्ञान के अध्‍यापक मुझे बॉयोलॉजी की तरफ ले गये । कुछ कुछ मॉं बाप के सपने भी शामिल होते गये कि पता नहीं पांच सात भाई बहनों में एक डॉक्‍टर भी बन जाए । खैर डॉक्‍टरी बनने न बनने की दास्‍तां फिर कभी ।साहित्‍य पढ़ने में जो आनंद आता गया मैं बयान नहीं कर सकता । कई बार ऐसा होता कि सारी रात लालटेन की रोशनी में पूरी किताब ही पढ़ते हुए ही गुजर जाती और लालटेन का शीशा काला पड़ चुका होता । ईमानदारी से कहूं तो हो सकता है बी.एस.सी. के दिनों में मेरे अतिरिक्‍त रूप से साहित्‍य पत्रिकाएं आदि पढ़ने से विज्ञान की पढ़ाई पर विपरीत असर पड़ा हो लेकिन उसका कोई गम नहीं । जो दृष्टि मुझे प्रेमचंद, जेनेन्‍द्र, सुदर्शन, शरतचंद्र की कहानियों और उपन्‍यासों के साहित्‍य ने दी वह कोई और स्‍कूली शिक्षा या विश्‍वविद्यालय नहीं दे सकता ।

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प्रेमचंद को पढ़कर पहली बार जाना कि समस्‍याओं के बीच से गुजरते हुए कैसे कहानियॉं बुनी जा सकती हैं ।

शायद पहली कहानी इंटरमीडिएट में या कॉलेज के शुरू में तभी लिखी । शीर्षक था ‘ऊपरी व्‍याधा’ । यह कहानी भूत प्रेत, अविश्‍वास के खिलाफ एक पहली प्रतिक्रिया थी । इन्‍हीं दिनों एक और दोस्‍त के बहाने कहानी लिखी । यह दोस्‍त एक दलित परिवार से था और मेरा अजीज मित्र (अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इसका नाम विनोद आर्य था जिसकी पिछले वर्ष 27 अक्‍तूबर 2010 को उत्‍तर प्रदेश के सी.एम.ओ. के रूप में हत्‍या हो गई) । वह सीधा-सादा, सरल दोस्‍त पढ़ने में इतना मेधावी नहीं था लेकिन कहीं से चालाक भी नहीं था । उसके पिता मेरे क्षेत्र के ब्‍लॉक डेवलेपमेंट ऑफिसर थे और खुर्जा बी.एस.सी. के दिनों में हम साथ ही आते-जाते रहते । मेरे गॉंव के बहुत सारे लोगों को यह बात बहुत अच्‍छी नहीं लगती थी । सिर्फ कहानी ही नहीं उसी दौर में मैंने राम प्रसाद बिसमिल और दूसरे क्रांतिकारियों की कविताओं की तर्ज पर तुकबंदियां भी कीं ।

एक तरफ यह यात्रा चुपचाप चलती रही तो दूसरी तरफ मैं विभिन्‍न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के सिलसिले में सन् 1977 में दिल्‍ली पहुंच गया । यहां की दिल्‍ली पब्लिक लायब्रेरी और साहित्‍य अकादमी जैसे पुस्‍तकालयों ने साहित्‍य संस्‍कृति और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मानो जान फूंक दी । सचमुच मैं गदगद हूँ और आज भी हूँ कि पुस्‍तकालय किसी व्‍यक्ति के निर्माण में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं । आशा, निराशा की तरंगों पर बैठे इस दौर में मैंने पांच सौ से अधिक कविताएं तो लिखी ही होंगी । 1979 से लेकर 1980 के बीच जिनके छह संग्रह मेरे पास आज भी हैं । उसमें से एक संग्रह ‘आदमी को तलाशते हुए’ मैंने जरूर 89 में प्रकाशित कराया था । कुछ कविताएं छपी भी लेकिन अधिकांश ‘अभिवादन व खेद सहित’ वापिस आ गईं । ऑल इंडिया रेडियों

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के युवा वाणी का भी आभारी हूँ कि दिल्‍ली पहुंचने के शुरूआती दिनों में रेडियो ने मुझे बार-बार कविता पढ़ने का मौका दिया । कुछ पैसा भी मिलता था और प्रेरणा भी । साहित्‍य में कम लेकिन प्रतियोगिताओं में मुझे ठीक ठाक सफलता मिलती गई । धीरे-धीरे कविताओं की बजाय मैं गद्य लेखन की तरफ भी बढ़ता गया और 83-84 के आसपास मेरी दो-तीन कहानियां प्रकाशित हुईं । उन्‍हीं दिनों एक कहानी टाइम्‍स ऑफ इंडिया की पत्रिका सारिका में ‘तीसरी चिट्टी’ नाम से छपी और इसके बाद धीरे-धीरे कविता छूटती गई और गद्य लेखन यानि कि कथा साहित्‍य में लगातार आगे बढ़ता रहा ।

पहला कहानी संग्रह ‘तीसरी चिट्टी’ वर्ष 1989 में प्रकाशित हुआ और उपन्‍यास ‘चौराहे’ वर्ष 1992 में ।

 

प्रश्‍न-2 आपने विविध विधाओं में रचनाएं लिखी हैं । आप खुद को किस विधा में सबसे निकट पाते हैं और क्‍यों ?

उत्‍तर- ज्‍यादातर लेखकों की तरह मेरी शुरूआत भी कविता से हुई लेकिन बहुत जल्‍द ही मैं कहानियों की तरफ आ गया । मुझे लगता है कि कहानियां, या कथा-साहित्‍य, उपन्‍यास समेत मेरे अधिक निकट हैं । कहानी में आप अपनी बात बेहतर ढंग से कह पाते हैं और उतने ही प्रभावी ढंग से पाठक के पास तक पहुंचाई भी जा सकती हैं । आप नकली कथ्‍य, शब्‍द जाल के भरोसे कहानी में पठनीयता पैदा नहीं कर सकते । यों कविता भी बीच-बीच में लगातार लिखता रहा हूँ । लेकिन अपने आनंद के लिए ज्‍यादा क्‍योंकि जब मुझे ही दूसरे की कविताएं ज्‍यादा पल्‍ले नहीं पड़ती तो मेरी कविताएं भी शायद दूसरे पर कुछ ऐसा ही असर करती हों । कहानी के क्रम में पिछले दिनों मुझे पत्रिका, अखबारी कॉलम में भी बहुत आनंद आने लगा है । विशेषकर जनसत्ता के कॉलम ने मुझे गद्य के प्रति बहुत आश्‍वस्‍त किया है । मैं यह मानता हूँ कि किसी भी लेखक का

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यह हट नहीं होना चाहिए कि वह गद्य लिखेगा या कविता, कहानी । अपनी बात को कहने के लिए खुद ही विधा उसकी कलम से बाहर आने लगती है । फिर भी कहानी या गद्य मेरी नजर में आधुनिक साहित्‍य का बेहतर संवाहक, माध्‍यम है ।

 

प्रश्‍न 3 शिक्षा संबंधी समस्‍याओं के प्रति गंभीरतापूर्वक सोचना आपने कब से शुरू किया और इसक पीछे मूल प्रेरणा क्‍या रही है ?

उत्‍तर – यदि आपने मेरी पुस्‍तक ‘पढ़ने का आनंद’ पढ़ी हो तो उसकी भूमिका में   मैंने यह बात लिखी है कि शिक्षा में मेरी रूचि कैसे और कब पैदा हुई । निश्चित रूप से बच्‍चों के पढ़ाई के समानांतर मैं इन प्रश्‍नों से रूबरू हुआ । दाखिले के समय की भाग दौड़ और तरह-तरह की झंझटें, बच्‍चों के स्‍कूल का माहौल, शिक्षकों की शिकायतें ; उनके व्‍यवहार और बातचीत, पी.टी.ए. की रस्‍म अदायगी में शामिल फैसनेवुल नव धनाढय मध्‍य वर्गीय मॉं-बाप के स्‍कूल, सरकार और पूरी व्‍यवस्‍था के प्रति एक तरफा आरोप ; इसके साथ ही अंग्रेजी का दंभ और पूरे माहौल में अपनी भाषा से दूर होने के आचरण ; सैंकड़ों परतें मुझे रोज बैचेन करती थीं और या कहूं कि करती हैं । अभी पिछले हफ्ते ए.आई.आई.एम.एस. (एम्‍स) में अनिल मीणा नाम के एक बच्‍चे ने आत्‍महत्‍या की है । मेरा मन पिछले दस दिनों से अभी भी अशांत बना हुआ है । जो खबरें छन कर आ रही हैं उनका निष्‍कर्ष यह है कि किसी जातिगत भेदभाव का शिकार यह बच्‍चा नहीं हुआ । यह शिकार हुआ है‍ भाषाई दमन का । अंग्रेजी के आतंक का । इसके दोस्‍त बताते हैं कि वह इस बात से परेशान रहता था कि न मेरी समझ में अंग्रेजी आती है न मैं अंग्रेजी में प्रश्‍न पूछ पाता हूँ । मैं करूं तो क्‍या करूं ? राजस्‍थान के एक गॉंव में पला बढ़ा अपनी भाषा के बूते चिकित्‍सा के सर्वोच्‍च संस्‍थान में दाखिला मिलने पर भी अंग्रेजी की तलवार ने उसकी जान ले ली । कब समझेंगे हमारे अमेरिका, इंग्‍लैंड से पढ़े हुए प्रधानमंत्री, शिक्षा मंत्री या सैंकड़ों

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बुद्धिजीवी कि अक्‍ल का पैमाना अंग्रेजी कतई नहीं हो सकती । यह अकेली घटना नहीं है । पिछले दिनों कई इंजीनियरिंग कॉलेजों में बच्‍चों ने ऐसे ही पत्र छोड़े हैं आत्‍महत्‍या से पहले । ज्‍यादा दिन नहीं हुए एक बच्‍ची की पिटाई इतनी की गई कि वह दुनिया ही छोड़ गई । कारण-वह अंग्रेजी की कुछ स्‍पैलिंग नहीं बता पा रही थी और इस बात से टीचर खफा थी । मजदूर की बेटी किस परिवेश से अंग्रेजी सीखेगी और क्‍यों उसे सीखनी चाहिए ? लेकिन पूरा देश अंग्रेजी के पीछे बावला हो रहा है । मुझे लगता है कि जब तक समान शिक्षा और अधिकांश शिक्षा शुरू से अंत तक अपनी भाषा में नहीं दी जाती तब तक न हम सही नागरिक पैदा कर पाएंगे और न ही शिक्षा में फैली दूसरी बुराइयों को । कभी-कभी मुझे लगता है कि यह काम कहानी, उपन्‍यास लिखने से भी कहीं ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है । यदि शिक्षा की तस्‍वीर बदल गई तो पूरे देश की बदल जाएगी । क्‍या लेखक का उद्देश्‍य ऐसा ही सामाजिक परिवर्तन लाना नहीं होता ?

प्रश्‍न-4 प्राथमिक, माध्‍यमिक और उच्‍च शिक्षा में आप सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण किसे मानते हैं और क्‍यों ?

उत्‍तर- निश्चित रूप से सबसे महत्‍वपूर्ण है प्राथमि‍क शिक्षा । प्राथमिक शिक्षा इसलिए कि पहला कदम पूरे देश को सार्थक रूप से साक्षर बनाना होना चाहिए । केरल और हिमाचल जैसे राज्‍य अच्‍छा काम कर रहे हैं । इसी क्रम में फिर प्राथमिकता दूंगा माध्‍यमिक शिक्षा को । माध्‍यमिक शिक्षा जिसके बूते नागरिक अपने कर्तव्‍य, अधिकारों को समझ सकें और लोकतंत्र में भागीदारी के लिए तैयार हो सकें । यह पड़ाव पूरा होने पर ही उच्‍च शिक्षा आती है । कितना विचित्र लगता है कि जब देश की आधी आबादी लिखने पढ़ने से भी मरहूम हो तो चंद अमीर इंजीनियर, डॉक्‍टरी की डिग्री लेकर इतराते फिरे । शिक्षा की यह असमानता शहरी अमीर वर्ग में एक दंभ भी पैदा कर रही है और उच्‍च शिक्षा में अंग्रेजी के बढ़ते प्रयोग ने इसे गरीबों से और दूर कर दिया है । उच्‍च शिक्षा वह

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तकनीकी हो या किसी और विशेज्ञता की सिर्फ उन्‍हीं के लिए उपलब्‍ध होनी चाहिए जो शोध और दूसरे क्षेत्रों में योगदान करना चाहते हों । काम रेलवे की खलासी का और डिग्री इंजीनियरी और पी.एच.डी. की । इन स्थितियों में न आप खलासी के काम के साथ न्‍याय कर पाएंगे और न अपनी शिक्षा के प्रति । इस परिदृश्‍य को तुरंत बदलने की जरूरत है ।

प्रश्‍न 5 भारत में शिक्षा की दुर्दशा के लिए कौन-कौन से कारण उत्‍तरदायी थे ? उत्‍तर- जो बातें मैंने अभी तक कही हैं वे सभी प्रासंगिक हैं । बस एक बात मैं जोड़ना चाहूंगा कि 1947 में आजादी के बाद समान शिक्षा की ओर कदम बढ़ाया गया । आजाद भारत की तीन-चार पीढि़यां सरकारी स्‍कूलों में समान शिक्षा लेकर पढ़ीं हैं । गरीब अमीर ज्‍यादातर एक साथ उन्‍हीं फर्शों या टूटी बेंचों पर बैठे हैं । दून या अजमर के मैयो जैसे स्‍कूल इक्‍का दुक्‍का थे । संविधान में उल्लिखित समाजवाद पचास साठ के दशक में एक उम्‍मीद जगा रहा था । सन् 90 तक आते-आते मानो सब कुछ बिगड़ने लगा । पिछले बीस वर्षों की स्थिति को देखते हुए तो ये लाइनें याद आती हैं कि ‘मर्ज बढ़ता गया ज्‍यों-ज्‍यों दवा की’ । सरकारी स्‍कूल खत्‍म हो रहे हैं या कहिये कि किये जा रहे हैं । यानि कि समानता का स्‍वप्‍न खुद नष्‍ट किया जा रहा है । कहां तो कोठारी आयोग और दूसरे शिक्षाविदों की सिफारिशें थीं कि उच्‍च शिक्षा चिकित्‍सा और इंजीनियरी समेत अपनी भाषाओं में दी जाएं और कहां ये दुर्दिन कि नर्सरी के बच्‍चों को भी विदेशी भाषा रटाई जा रही है । इस अंग्रेजी से न समानता रहेगी न बच्‍चों की रचनात्‍मकता बचेगी । इस पूरी पीढ़ी को यह कहकर बहकाया जा रहा है कि अंग्रेजी से तुम्‍हें नौकरी मिलेंगी । कहां ? बी.पी.ओ, आई.टी. में । इसी को कठोर भाषा में कहूं किसी के शब्‍दों को दोहराउ तो क्‍या यह मजदूर या वैश्‍या । पैदा करने से कम खतरनाक है ? ऐसी शिक्षा के बूते हम अमेरिका इंग्‍लैंड की तो छोड़ो अपने एशिया के देशों से भी मुकाबला नहीं कर सकते।

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प्रश्‍न 6 एक तरफ यह कहा जा रहा है कि भारत एक आर्थिक महाशक्ति वालादेश बनने जा रहा है, दूसरी तरफ शिक्षा के मामले में हम काफी पिछड़े हुए हैं । इस विरोधाभास पर आप क्‍या कहना चाहेंगे ?

उत्‍तर- भारत एक आर्थिक महाशक्ति वाला देश ; दुनिया की नंबर एक ताकत है ; आदि-आदि अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाली बात से ज्‍यादा नहीं है । इस बात पर गौर कीजिये कि यह कह कौन रहा है ? सत्‍ता पक्ष ? वे जो शासन चला रहे हैं या उस सांचे का हिस्‍सा हैं जिन्‍हें कम मेहनत करने के बावजूद भी हजार गुना तनख्‍वाह मिलती हैं । आर्थिक महाशक्ति वाला देश अपने अस्‍सी प्रतिशत देशवासियों को न स्‍कूल उपलब्‍ध करा पाया, न उनमें शिक्षक, टॉयलेट या ब्‍लेक बोर्ड तक की सुविधाएं । इसके लिए विरोधाभास शब्‍द ही पर्याप्‍त नहीं है यह हमारे लोकतंत्र का दोगलापन है । इस झूठ के खिलाफ यदि वंचित तबका आवाज नहीं उठा रहा तो यह उनके धैर्य की अंतिम परीक्षा है । शिक्षा में असमानता की यह बात सिर्फ गांव और शहर तक ही सीमित नहीं रही । शहर का मध्‍य वर्ग अपने बच्‍चों के दाखिले के लिए जिस कदर परेशान और तनाव में रहता है ऐसा उदाहरण दुनिया भर में कोई नहीं होगा । दुनिया के किसी भी देश के नागरिक को अपने नजदीकी स्‍कूल में पढ़ने का अधिकार है । एक के बाद एक भारत की शिक्षा संबंधी रिपोर्टों ने भी पड़ौसी स्‍कूल की वकालत की है । फिर क्‍यों ऐसे सख्‍त कानून नहीं बने जहां चपरासी, सचिव और मंत्रियों के बच्‍चे एक साथ पढ़ पाते ? इस विरोधाभास को देखकर और लगातार बढ़ती खाई पर तो आप हताशा में सिर ही पीट सकते हैं । इस स्थिति को आज और अभी बदलने की जरूरत है ।

प्रश्‍न 7- हिंदी का बौद्धिक जगत शिक्षा को लेकर कितना सतर्क हैं ? उसकी चिन्‍तायें क्‍या हैं ?

 

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उत्‍तर – कम-से-कम हिन्‍दी के बौद्धिक जगत की चुप्‍पी  को देखकर तो इसे शर्मनाक ही जा सकता है । न उसने समान शिक्षा के लिए कभी आवाज उठाई और न वे अपने भाषाओं में खुद शिक्षा प्राप्‍त करने के लिए लामबद्ध हुए । बहुत से बहुत उनकी चिंताएं हिंदी के प्रयोग, हिंदी पुस्‍तकों की खरीद या विश्‍व विद्यालयों में हिंदी शिक्षकों की भर्ती से आगे कभी नहीं जा पाईं । दरअसल हिंदी का बौद्धिक जगत लगातार परजीवी बनता जा रहा है । जिन राजनीतिक दलों या सत्‍ता से उनकी लालटेन को तेल मिलता है यदि उन राजनीतिक दलों में ही शिक्षा और भाषा को लेकर कोई चिंता नहीं है तो छाया की तरह पीछे चलने वाला  यह बौद्धिक जगत क्‍यों चिंता करेगा ? वरना हिंदी क्षेत्र देश का सबसे पिछड़ा हिस्‍सा विशेषकर शिक्षा में होने के बावजूद ऐसी चुप्‍पी । पिछले दिनों का एक और उदाहरण देना उचित रहेगा । डॉ. दौलत सिंह कोठारी एक जाने माने शिक्षाविद और वैज्ञानिक थे । शिक्षा आयोग के अध्‍यक्ष के नाते उन्‍होंने जितने उच्‍चे स्‍वर से समान शिक्षा और शिक्षा में अपनी भाषा की वकालत की उतनी आजाद भारत में किसी ने भी नहीं की । उन्‍हीं की रिपोर्ट के बूते देश की सर्वोच्‍च नौकरशाही आई.ए.एस. में अपनी भाषाओं में उत्‍तर लिखने की छूट मिली । वर्ष 1979 से अपनी भाषाओं में छूट के कारण कभी पटना का रिक्‍शे वाला तो कभी पूना के मोची का बेटा-बेटी आई.एस. में पिछले तीस सालों में चुने जाते रहे हैं । इतना लाभ गरीबों को आरक्षण से भी नहीं मिला होगा जितना अपनी मातृभाषा में उत्‍तर लिखने की छूट से । आंकड़े बताते हैं कि दलित और जनजातियों के पचास प्रतिशत से अधिक बच्‍चे अपनी भाषा के बूते ही इन उच्‍च सेवाओं में चुने गये हैं । कोठारी की सिफारिशों के हिसाब से अपनी भाषा में उत्‍तर देने की छूट भारतीय वाणिकी सेवा, इंजीनियरी सेवा, चिकित्‍सा सेवा में भी लागू होनी थी लेकिन कुछ भी नहीं हुआ । और 2011 में अंग्रेजी के वापसी की फिर से शुरूआत हो रही है । लेकिन न हिंदी के किसी लेखक की कोई आवाज

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कहीं से सुनाई दी, न किसी तथाकथित बुद्धिजीवी प्रोफेसर, वाइस चांसलर की । दरअसल जो अपने समाज से इतना कटा हुआ हो या अपनी ही चिंताओं में इतना डूबा है उसकी चिंताओं में ऐसे प्रश्‍न कभी नहीं आ सकते ।

प्रश्‍न 8 एक तरफ जहां अंग्रेजी का वर्चस्‍व बढ़ता जा रहा है वहीं दूसरी तरफ आपका मातृभाषा में बुनियादी शिक्षा पर जोर देना कहां तक तर्कसंगत है ?

उत्‍तर –मैं फिर से दोहरा दूं कि मैं अंग्रेजी का विरोधी नहीं हूं लेकिन पढ़ाई विशेषकर प्राथमिक और माध्‍यमिक शिक्षा में अंग्रेजी से जो नुकसान होगा या हो रहा है उसकी भरपाई कभी भी नहीं की जा सकती । मैं एक अनुभव से अपनी बात कहना चाहूंगा । पिछले दिनों एक अंग्रेजी अमेरिकी दंपती फ्रांस से हिन्‍दुस्‍तान में किसी अध्‍ययन के लिए आए हुए थे । उनका बच्‍चा सात-आठ साल का था । मैंने पूछा कि फ्रांस में इस बच्‍चे को किस भाषा में शिक्षा दी जाती है तो उन्‍होंने कहा कि फ्रांस में है तो फ्रैंच में ही होगी अंग्रेजी में क्‍यों ? यदि हम पुर्तगाल में होते तो पुर्तगाली में और चीन में होते तो चीनी में । क्‍योंकि बच्‍चे की समझ मातृभाषा में शिक्षा देने से जल्‍दी और अच्‍छी विकसित होती है । महात्‍मा गांधी, रवीन्‍द्र नाथ टैगोर से लेकर दुनिया भर के शिक्षाविदों ने यह बात दोहराई है । आजादी के बाद अलग-अलग राज्‍यों के कोठारी आयोग समेत कई शिक्षा आयोगों ने भी । उनकी अपनी भाषा में शिक्षा देना यह नागरिकों का बुनियादी अधिकार है । मैं तो कहूंगा कि शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ अपनी भाषा में शिक्षा का अधिकार भी संविधान में शामिल किया जाना चाहिए । केवल तभी भारतीय बच्‍चों की रचनात्‍मकता खुलकर सामने आएगी और शोध और विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में वे तभी चमकेंगे ।

प्रश्‍न-9 विदेशों में शिक्षा की जो स्थिति है उसके सामने भारतीय शिक्षा प्रणाली कहां तक ठहर पाती है ?

 

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उत्‍तर – एक शब्‍द में कहूं तो विदेशों में विशेषकर यूरोप, अमेरिका आज जहां हैं वे शिक्षा की बदौलत हैं और उसके बरक्‍स भारतीय शिक्षा की स्थिति को सिर्फ शर्मनाक ही कहा जा सकता है । क्‍या पैंसठ साल कम होते हैं किसी भी समस्‍या से निपटने के लिए ? आजादी का मतलब तभी है जहां हर नागरिक शिक्षित हो, स्‍वस्‍थ हो । केवल तभी वे लोकतंत्र में भागीदारी कर सकता है । इससे लोकतंत्र भी मजबूत होगा और देश भी । लेकिन हम कहां हैं ? पचास प्रतिशत से अधिक निरक्षर हैं और जो साक्षर भी हैं वो सिर्फ रटंतु तोते । हमें तो अंग्रेज शासन का आभारी होना चाहिए कि उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍तर के विश्‍वविद्यालय स्‍थापित किए । इलाहाबाद,कलकत्‍ता, अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय । अंग्रेजी भाषा के लिए अंग्रेज उतने जिम्‍मेदार नहीं हैं । उसकी जिम्‍मेदार हैं भारत का सत्‍ता पक्ष अमीर वर्ग, जो भाषा का इस्‍तेमाल गरीबों की आवाज को दबाने के लिए कर रहा है । उसे पता है कि लोकतंत्र में सभी की भागीदारी हो गई तो फिर वे शासन कैसे कर पाएंगे ? और इसीलिए शासन की भाषा, शिक्षा की भाषा अंग्रेजी रखी जा रही है ।

क्‍या किसी और देश में विद्यार्थी परीक्षा के नाम पर भाषा के दबाव में आत्‍महत्‍या करते हैं ? केवल विद्यार्थी ही नहीं अभिभावक, मॉं-बाप तक को भारतीय शिक्षा का चौखटा तनावग्रस्‍त बनाए हुए हैं । मानचेस्‍टर विश्‍वविद्यालय के एक प्रोफेसर जब फरवरी-मार्च के महीने में हिन्‍दुस्‍तान में थे तो वे जिन संभ्रांत घरों में जाते थे उन सभी में जैसे कर्फ्यु लगा होता था । बच्‍चों की परीक्षा है, ट्यूशन जाना है, कोचिंग क्‍लास में दाखिला नहीं मिला, की समस्‍याओं से लदे । वे लगभग एक सदमे में थे कि इस देश का क्‍या होगा ? और इस सबके बावजूद भी कहीं कोई हासिल है ? कहीं कोई मौलिक शोध सामने आये हैं ? तकनीकी डॉक्‍टरी, कृषि किसी भी क्षेत्र में ? मच्‍छर यहां हैं लेकिन मलेरिया पर रिसर्च डॉक्‍टर रोनाल्‍ड रोस करते हैं । वे भी 1920 में । हम कोई और दवा खोज पाए ? हमारे कॉलेजों में लेबोरेटरीज़ की स्थिति बहुत दयनीय है उतनी ही पुस्‍तकालयों की    भी । अंग्रेजों के समय विश्‍वविद्यालय, पुस्‍तकालय स्‍थापित हुए । सत्‍तर-अस्‍सी के दशक तक ठीक-ठाक चलते रहे । लेकिन उसके बाद ? प्रोफेसर कृष्‍ण कुमार ने अपने एक लेख में विदेशी और भारतीय शिक्षा प्रणाली की तुलना करते हुए ठीक कहा है कि विदेशी विश्‍वविद्यालय सिर्फ दो खासियतों की वज‍ह से हमसे आगे बने हुए हैं । पहला बेहतर पुस्‍तकालय और दूसरा शिक्षक विद्यार्थी के बीच सही तालमेल आदि । विदेश में कोई छात्र अपना शोध पत्र अपने अध्‍यापक को देता है तो अध्‍यापक उसे उतने ही ध्‍यान से तुरंत हफ्ते दस दिन में पढ़कर सुझाव देता है । हमारे यहां न विद्यार्थी शिक्षक का तालमेल है, न शोध पर कोई ऐसे सुझाव तुरंत मिलते । इसी का दुष्‍परिणाम यह है कि ऐसे शिक्षकों या विश्‍वविद्यालयों से निकले हुए छात्र फिर उतने ही घटिया शिक्षक बनते है और हर घटिया माल की तरह सबकी आश्रयदाता भारतीय राजनीति । कथाकार संजीव के शब्‍दों में शिक्षक विशेषकर हिंदी राज्‍यों में तो वेतनभोगी राजनैतिक कार्यकर्ता   हैं । जब शिक्षा राजनीति का औजार हो तो उस पर वैसे ही कड़वे फल आएंगे ।

प्रश्‍न 10 भारत में शिक्षा को लेकर जनसंचार माध्‍यमों का रूख क्‍या है ? आपकी नजर में इनकी भूमिका किन-किन रूपों में समाजोपयोगी हो सकती है ? उत्‍तर – जनसंचार माध्‍यमों के रुख की चर्चा तो बाद में पहले राजनैतिक सत्‍ता  शिक्षा पर कितनी गंभीर है उसकी बात करते हैं । अभी उत्‍तर प्रदेश और कुछ दूसरे राज्‍यों में चुनाव हुए हैं । शिक्षा की जरर्जित स्थिति का बयान समूचा उत्‍तर प्रदेश है । धुंआधार नकल, स्‍कूलों में से शिक्षक नदारद । दसवीं के बच्‍चे को अपना नाम लिखना तक नहीं आता और विश्‍वविद्यालयों में या तो सैंकड़ों पद खाली हैं या कांट्रैक्‍ट से काम चलाया जा रहा है ।

क्‍या किसी भी राजनैतिक पार्टी ने इन मुद्दों को चुनाव का मुद्दा बनाया ? पिछले पचास वर्षों के घोषणा पत्र को देखें तो क्‍या कभी शिक्षा, परीक्षा की भाषा

पर विचार मंथन हुआ ? यानि जिस औजार से पूरे देश को बदला जा सकता है वहां की राजनैतिक पार्टियां इस मुद्दे पर विचार ही नहीं करना चाहती । इसमें राजनीति की कोई गलती नहीं है । वे अपने उद्देश्‍य में सफल हैं क्‍योंकि यदि यह जनता शिक्षित हो गयी, स्‍वावलंबी हो गयी, तो इनको वोट बैंक नहीं बनाया जा सकता । फिर तो जनता मनमर्जी बेहतर प्रतिनिधि चुनेंगी और यह किसी भी दल को मंजूर नहीं है । इसी की छाया जनसंचार माध्‍यम है । जनसंचार माध्‍यम आखिर है क्‍या ? अखबार, टेलीविजन या मीडिया और उन पर कब्‍जा है पैसे वाले रईसों, राजनीतिज्ञों का । पहले तो इनके मालिक किसी शिक्षा में परिवर्तन या सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्‍य से जनसंचार के धंधे में नहीं आए और दूसरे उनके पास कोई ऐसी दृष्टि भी नहीं है । यदि दृष्टि होती तो क्‍या मीडिया अंधविश्‍वास, कूपमंडूकता, गणेश के दूध पीने की खबरों से इतना आक्रांत रहता । सीरियल सास बहू या पूजा-पाठ करते चिकने-चुपड़े चेहरों से लदे हुए हैं तो सुबह-सुबह कहीं तीन देवियां किसी का भविष्‍य बता रही हैं तो कहीं धंधे में लाभ के ताबीज बेचे जा रहे हैं ।

निश्चित रूप से यह कुशिक्षा, कुसंस्‍कृति का प्रचार है । जनसंचार वाकई जनता का हित चाहते हैं तो शिक्षा में जो कुछ वो करे न करें, कम-से-कम अंधविश्‍वास के खिलाफ लड़ाई और वैज्ञानिक चेतना को बढ़ाने में आगे आ   आएं । वह भी इस देश पर उपकार होगा ।

प्रश्‍न-11 भारतीय शिक्षा का भविष्‍य कैसा है ?

उत्‍तर मौजूदा दीवारों पर लिखी इबारत तो यही बता रही है कि अंधेरा और बढ़ेगा । गरीब के हाथ से सरकारी स्‍कूल भी चले जाएंगे । सरकारी स्‍कूल खत्‍म तो वे मंदिर और मस्जिद द्वारा चलाए गये मदरसों या मंदिरों की तरफ जाएंगे यानि वैज्ञानिक शिक्षा और भी कम होती जाएगी । जिस ढंग से अंग्रेजी को बढ़ाया जा रहा है इससे भारतीय साहित्‍य और भाषाओं की तो मौत होगी ही हम अपनी भाषा में शिक्षित प्रशिक्षित समझदार नागरिक भी पैदा नहीं कर पाएंगे ।

विदेशी भाषाओं की निकट भविष्‍य में चांदी होने वाली है । सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं फ्रेंच, चीनी, जर्मनी सभी की क्‍योंकि अपनी भाषा के खत्‍म होने से जो जगह बनेगी ये अमीर देश अपनी संस्‍कृति को फैलाने के लिए तैयार बैठे हैं । और विदेशी विश्‍वविद्यालयों की तो सरकार खुद खुशामद करके ला रही है यानि कि इतिहास में यदि तक्षशिला, नालंदा गायब हुए हैं तो कल के इलाहाबाद, दिल्‍ली, अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय को गायब होने में भी समय नहीं लगेगा ।

प्रश्‍न 12 इन दिनों आप क्‍या लिख रहे हैं और अपने लेखन को लेकर आपकी भविष्‍य उकी योजनाएं क्‍या हैं ?

उत्‍तर – शुरूआत कहानी, उपन्‍यासों से हुई थी लेखन की । लेकिन फिलहाल शिक्षा, नौकरशाही और सामाजिक समस्‍याओं के मद्देनजर लगातार लेख और कॉलम लिख रहा हूँ । जहां भी मौका मिलता है उस मंच का इस्‍तेमाल करता हूँ । विश्‍वविद्यालय हो, भारत सरकार हो, एन.सी.ई.आर.टी. की पाठ्यक्रम समिति हो या दोस्‍तों के बीच गप्‍पबाजी । यदि लेखन परिवर्तन का नाम है तो मुझे उम्‍मीद है कि इन लेखों का संदेश जनता तक पहुंचेगा । क्‍या यह सब कहानी, उपन्‍यास से कम महत्‍वपूर्ण है ? जनसत्‍ता, हंस, युवा संवाद, पुस्‍तक वार्ता, कथादेश, समयांतर और दूसरी पत्रिकाओं का मैं आभारी  हूँ जो लगातार मेरे लेखन को प्रोत्‍साहित करती रही हैं । मैं कभी-कभी इस लेखन को गुरिल्‍ला लड़ाई भी कहता हूँ । ये सारे लेख पांच पुस्‍तकों में भी संग्रहित करके प्रकाशित हुए हैं ये हैं ‘समय, समाज और संस्‍कृति’, ‘हिंदी पट्टी पतन की पड़ताल’, ‘शब्‍द और सत्‍याग्रह’,  ‘पढ़ने का आनंद’, ‘विकल्‍प के सूत्र’ आदि ।

पिछले कुछ दिनों से मन के कोने से यह आवाज भी आ रही है कि कुछ कहानियां जो अंदर ही अंदर बरसों से दबी पड़ी हैं उनको आकार दे दूं । कॉलम लेखन को थोड़े धीमा करते हुए । सरकारी छदम और बेबसी के इर्दगिर्द भी कुछ उपन्‍यास जैसा मन में खदक रहा है । देखते हैं कि क्‍या हो पाता है । और जरूरी भी नहीं कि सब कुछ हमी कर डालें । देश भर में उर्जावान लाखों नौजवान हैं जो इस परिदृश्‍य को बदल के रख देंगे । मैं एक छोटा पुर्जा भर हूँ ।

 

फरवरी 2012

 

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