सरकार और प्रशासनिक सुधार (जागरण 19-12-15)

सरकार और प्रशासन एक सिक्के के दो पहलू नहीं एक-दूसरे के पर्याय हैं। किसी भी सरकार उसके मुखिया प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री की सफलता उसके प्रशासन की दक्षता, कार्य कुशलता है। उस राज में जनता कितनी सुख चैन से रहती है, प्रगति करती है जिसने उसे लोकतंत्र के जरिये चुना है। नयी सरकार या कहिये मोदी सरकार ने लीक से छटकर कुछ प्रशासनिक कदम उठाये हैं जिन पर पूर्वाग्रहों को छोड़कर गौर किया जाना चाहिए। हाल ही में उठाया गया कदम हैं क वर्ग के पदों को छोड़कर अन्य सभी पदों की भर्ती में साक्षात्कार समाप्त करना। सीधी भाषा में कहा जाए तो लिखित परीक्षा के आधार पर ही आपको चुना जायेगा।

भारत जैसे देश में जहॉं बेरोजगारी की भयानकता डराती है और भ्रष्टाचार के सबसे ज्यादा मामले नौकरियों में उजागर होते हैं, वहॉं इससे भ्रष्टाचार और बेईमानी को रोकने में बहुत मदद मिलेगी। हजारों परीक्षाएं केन्द्र और राज्य सरकारों की भर्ती में ऐसी हैं, जिन पर इसका सकारात्मक असर पडे़गा। साक्षात्कार के नाम पर पिछले दरवाजे से जो आते थे, उन पर अंकुश लगेगा। पुरानी एन.डी.ए. सरकार में तत्कालीन रेल मंत्री नीतिश कुमार ने भी रेल में अराजपत्रित पदों पर ऐसी “शुरुआत’’ की थी। भर्ती नियमों में कई बार तो लिखित और साक्षात्कार के नम्बर बराबर होते थे जिसकी बदौलत बेईमान उम्मीदवार साक्षात्कार में अपने प्रभाव भाई-भतीजावाद या रश्वत के बूते फायदा उठा लेते थे। उम्मीद की जानी चाहिये कि यदि लिखित परीक्षा ही ढंग से संचालित हुई तो नौजवान पीढ़ी का विश्वाश ईमानदारी पर लौटेगा। याद कीजिये हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चैटाला और आई.एस. अधिकारी समेत ऐसी भी भर्ती के गोलमाल में तिहाड़ जेल में हैं। उत्तर प्रदेश के भर्ती आयोग के चेयरमैन को ऐसी अनियिमताओं के कारण हटा दिया गया है। केन्द्र सुनिश्चित करे कि राज्यों की सभी भर्तियों में भी साक्षात्कार के अंक समाप्त किये जाये।

सबसे ज्यादा बुरा हाल तो विश्वविद्यालयों की नौकरी का है जहॉं लिखित परीक्षा होती ही नहीं है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वहॉं बेईमानी के कितने रूप प्रचलित हैं। जिन संस्थाओं के पास देश की भावी पीढ़ी को नैतिक बनाने की जिम्मेदारी है जब उन्हीं की भर्ती केवल सिफारिश के आधार पर हो तो वही हश्र होगा जो आज सामने है। यदि आप किसी राजनैतिक पार्टी या उसके शिक्षक संगठन या विश्वविद्यालय के अधिकारियों से नहीं जुड़े तो लाख डिग्रियों के बाद भी आप सड़क नापते रहेंगे। मोदी सरकार को विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती के लिये भी कुछ नियम लिखित परीक्षा आदि का प्रावधान करना होगा। “शुरूआत के तौर पर केन्द्रिय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों, वाइस-चांसलर की भर्ती का काम संघ लोक सेवा आयोग को भी दिया जा सकता है।

मोदी सरकार का दफ्तरों मे समय पर पहुंचने की सख्ती का मामला कुछ पुराना जरूर है लेकिन उसका असर दिखने लगा है। जिस समय बायोमेट्रिक मशीन लगी थीं सरकारी बाबुओं के चेहरे हताशा में देखने लायक थे कि अब देखें कौन हमें लेट बैठने को कहता है? कि सरकार को काम से मतलब होना चाहिए न कि घड़ी से। जैसे ही सख्ती से वेतन में कटौती की बात हुई, वे सभी दफ्तर समय पर पहुंचने लगे जो भजन, जागरण या मुहल्ले के रिश्तेदार को अस्पताल में देखने का बहाना बनाकर आये दिन गायब रहते थे। जब बैंक या दूसरे कर्मचारी समय पर पहुंच सकते हैं तो ये सरकारी कर्मचारी क्यों नहीं जिन्हें पिछले तीन वेतन आयोगों ने ठीक-ठाक वेतन, भत्ते दिये हैं।

सातवीं वेतन आयोग की रपट भी पहली बार समय से पहले आयी है। नये वेतन मान पहली जनवरी 2016 से लागू होंगे लेकिन यह वेतन आयोग के इतिहास में पहली बार हुआ है वरना पिछले वेतन आयोग, 2006 की रिपोर्ट 2008 में आयी थी और 1996 की 1998 में। कार्मिक मंत्रालय ने सभी मंत्रालयों को ऐसे निर्देश दिये हैं कि ऐसी सभी समितियॉं अपना काम नियत समय पर पूरा करें। बाबरी मस्जिद का मामला हो या दुर्घटनाओं के सैकड़ों अन्य कमीशन, कभी-कभी तो दशकों तक जनता को इंतजार करना पड़ता है। न केवल रिपोर्ट समय से पहले आयी है पुरानी प्रशासनिक खामियों को दूर करने का भी प्रयास है। आज़ादी के बाद एक ही सिविल सेवा परीक्षा से चुने गये आई.ए.एस., आई.पी.एस. और केन्द्रीय सेवाओं की बराबरी को समझा गया है। उम्मीद है दो-चार नम्बरों के आधार पर जो आई.ए.एस. अपने को ऊँचा मानते थे और बेहतर वेतनमान पाते थे उन्हें सभी के बराबर ठीक ही रखा गया है। महिलाओं की दी जाने वाली ‘चाइल्ड केअरलीव’ को तर्क संगत बनाया गया है तथा उन पिताओं को भी दिये जाने की सिफारिश की है जिनके बच्चों की मॉं नहीं हैं। अच्छा रहता यदि ये छुट्टियॉं बिल्कुल ही समाप्त कर दी जाती क्योंकि जिन विभाग में महिलाओं की संख्या ज्यादा है जैसे नर्स, डॉक्टर या स्कूल शिक्षक या महिला-स्कूल, वहॉं ‘चाइल्ड चेअरलीव’ देने से प्रशासनिक काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। देश की गरीबी को देखते हुए सरकारी कर्मचारी वैसे भी कम मौज में नहीं हैं। इसमें बच्चे की उम्र सीमा अठारह साल से घटाकर 8 साल की जानी चाहिए।

पुरानी सरकार के मंत्रियों के साथ काम कर चुके निजी सचिवों को भी नये मंत्रियों के साथ तैनात नहीं करने के आदेषों पर भी सरकार की नुक्ताचीनी की गयी थी। क्यों? सभी मंत्रालयों के अनुभव बताते हैं कि भ्रष्टाचार की जितनी सड़कें, पगडडियॉं है ये पुराने घाघ अधिकारी मंत्री से ज्यादा जानते और भ्रष्टाचार में डूबे होते हैं। इसीलिये ऐसे निजी सचिव भी सैंकड़ों में थे जो हर सत्ता के मंत्रियों के साथ रहे। पहली बार उन्हें इस सरकार ने झटका दिया है। उम्मीद की जानी चाहिये कि संस्था का रूप ले चुके भ्रष्टाचार को रोकने में इससे मदद मिलेगी।

सबसे बड़ी जीत भाशा के मोर्च पर है। हिन्दी सारे देश में बेहतर समझी, बोली जाती है। संविधान भी उसी में काम करने की मान्यता देता है। लेकिन इसे इतनी सहजता से कभी वह स्वीकृति नहीं मिली जो मोदी सरकार में मिली है। प्रधानमंत्री के हर भाषण, उद्बोधन, मन की बात से लेकर विदेशों में अपनी भाषा में सहज संवाद करने से मंत्रालय के बड़े बाबू तुरंत समझ गये कि अंग्रेजी के नखरे, लटके-झटके अब ज्यादा नहीं चलेंगे। विशेषकर जब प्रधानमंत्री ने सचिवों को सरल, सहज हिन्दी में अपनी बात करने का संकेत दिया तो रातो-रात सभी को हिन्दी आ गयी। यह “सरकार-प्रशासन दोनों के हित में है। अपनी भाषा के पक्षधरों को इस पर खुषी बनानी चाहिए कि आजादी के बाद पहली बार अपनी जनभाशा को प्रतिश्ठा मिली है।

लेकिन कुछ प्रशासनिक सुधार अभी और अपेक्षित हैं और तुरंत। मंत्रियों द्वारा अधिकारियों के अचानक समय से पहले स्थानान्तरण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सिविल सेवा बोर्ड बनाने का निर्णय दिया था। सुप्रीम कोर्ट का सुझाव था कि कलक्टर, पुलिस कप्तान जैसे पदों पर कम से कम दो साल का कार्यकाल हो। हर राज्य में ऐसे मामले हैं जहॉं ईमानदार, निडर अफसरों को बार-बार ट्रांसफर करके परेशान किया जाता है। उ.प्र., बिहार जैसे राज्य इनमें सर्वोपरि है। केन्द्र को कुछ सख्त कदम उठाने की जरूरत है।

कहने की जरूरत नहीं कि शिक्षा और भाषा कभी भी पुरानी सरकारों के एजेंडों में प्रायमिकता नहीं ले पाई। भूतपूर्व केविनेट सैक्रेटरी टी.एस.आर. सुब्रह्मयम की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय टीम शिक्षा में सुधार के लिये गठित तो भी गयी है लेकिन जब तक ‘समान-शिक्षा’ के पक्ष में बदलाव नहीं किया जाता, उपरी टीम टाम विवादों को ज्यादा पैदा करेगी बजाये बुनियादी सुधार के। समान शिक्षा ‘सबका साथ, सबका विकास’ की धुरी बन सकती है। सिविल सेवा परीक्षा के प्रथमचरण सी-सैट में कांग्रेसी सरकार ने वर्श 2011 में अंग्रेजी थोप दी थी। नयी सरकार ने उसे हटाकर भारतीय भाषा और प्रशासन के पक्ष में एक एतिहासिक काम किया है। अच्छा हो यदि सरकार संघ लोक सेवा आयोग की अन्य परीक्षाओं जैसे भारतीय वन सेवा, चिकित्सा सेवा, इंजीनियरिंग आदि में भी अंग्रेजी के साथ सभी भारतीय भाषाओं में उत्तर लिखने की छूट दे।

 

इतनी सुविधाओं के बावजूद भी सैकड़ों अधिकारी बरसों से ड्यूटी से गायब हैं। ये गये तो थे विदेश अध्ययन अवकाश आदि तिकड़मों से लेकिन उसके बाद लापता। सरकार ने एक-एक कर इन्हें बरखास्त करना “शुरूकर दिया है। इसके अलावा किसी भी बहाने सरकारी खर्चे पर विदेश जाने वाले अधिकारियों, मंत्रियों तक पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है, तांकि मटरगस्ती कम हो सके। जाहिर है यह न मंत्रियों को पसंद आ रहा, न उन अधिकारियों को जो ख्वाबों में रहते ही विदेशों में हैं।

हमारे जनवादी सोच वाले बुद्धिजीवी अक्सर सरकारी अकर्मन्यता और बेईमानी को लोकतंत्र का नासूर मानते हैं जो ठीक भी हैं। लेकिन जब कोई सत्ता इन पर नकेल डालने के लिये कदम उठाती है तो उसका खुलकर समर्थन क्यों नहीं? सरकारी स्कूल, अस्पताल, परिवहन व अन्य सेवाओं में पारदर्शिता और कार्यकुशलता लाकर ही निजीकरण रोका जा सकता है। सिर्फ निजीकरण के हवाई विरोध से नहीं।

कुल मिलकार इन सभी सुधारों से भ्रश्टाचार पर लगाम तो लगी है लेकिन दषकों से जमी-जमायी लाल फीता “शाही, काहिली से क्या पीछा छूड़ाना इतना आसान है? ये सब रक्षात्मक अंदाज़ में रोज़ नयी सरकार में सुराख ढूंढते रहते हैं। देष में साम्पदायिकता और गौ हत्या की एकाध घटनाओं ने भी इन सुधारों पर परदा डाला है। यह जरूर है कि जब तक आम आदमी को इनका फायदा नहीं मिलता तब तक अच्छे दिनों का इंतजार करना ही पड़ेगा। देश को वाकई नई उुंचाईयों पर ले जाना है तो नित नये ऐसे प्रशासनिक सुधारों की निरंतरता बनी रहनी चाहिए। जनता तक इसके लाभ पहुंचेंगे तो वह विरोधियों की आवाज़ सुनना खुद ही बंद कर देगी।

 

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