सरकारी स्‍कूल-सरकारी कर्मचारी

खबर सुनने में तो बहुत अच्‍छी है कि कर्नाटक सरकार अपने सभी सरकारी कर्मचारियों को केवल सरकारी स्‍कूलों में पढ़ाने का फरमान जारी करने वाली है। यह एक वर्ष पुरानी उस समिति की सिफारिशों के आधार पर करने की योजना है जिसमें सरकारी स्‍कूलों को सुधारने का सबसे मजबूत उपाय यही बताया था कि जो कर्मचारी सरकारी कोश से तनख्‍वाह लेते हैं उन्‍हें अपने बच्‍चे सरकारी स्‍कूल में ही पढ़ाने होंगे। और ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान। ऐसी खबर अनोखी नहीं है। अगस्‍त 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने विस्‍तृत निर्णय में स्‍पष्‍ट आदेश दिया था कि न केवल सरकारी कर्मचारी बल्कि विधायक, बैंक आदि उपक्रमों के कर्मचारियों को भी अनिवार्य रूप से अपने बच्‍चे सरकारी स्‍कूलों में ही पढ़ाने होंगे। मामला वहां भी सरकारी स्‍कूलों की बदहाली का ही था। लेकिन तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी आजतक उस आदेश को लागू करने के लिए किसी भी दल, मंच की तरफ से कोई सुगबुगाहट नहीं हुई। 2015 में तब अखिलश सरकार थी। न उस सरकार ने निर्णय को लागू करने में दिलचस्‍पी दिखाई न उसके बाद आजतक केन्‍द्र और योगी सरकार ने । क्‍या यह कोर्ट, संविधान का अपमान नहीं है? क्‍या आरक्षण और दूसरे मसलों पर ईंट से ईंट बजाने वालों को नहीं पता कि संविधान में समान और अपनी भाषाओं में शिक्षा देने की बात कही गई है और देश के कई न्‍यायालयों के निर्णय भी इस पक्ष में रहें है। लेकिन हर अगले दिन समानता का सपना और धुंधला नजर आ रहा है।

शिक्षा के बूते ही समानता की बात दुनिया भर में फैली है  और समानता के गरभ  से  पैदा हुआ है लोकतंत्र। लेकिन जब लोकतंत्र के नाम पर बनी सरकारें ही असमान शिक्षा की पैरवी करें तो लोक का डूबना तय है। तीस वर्ष पहले जहां नब्‍बे प्रतिशत बच्‍चे सरकारी स्‍कूल, कॉलिजों में समान छत, फीस के साये में पढ़ रहे थे आज पचास प्रतिशत भी सरकारी स्‍कूलों में नहीं हैं। लाल बहादुर शास्‍त्री, अब्‍दुल कलाम से लेकर दौलत सिंह कोठारी वैज्ञानिक माशेलकर तक पूरी की पूरी तीन पीढि़यां समान शिक्षा ने देश को दी हैं। ऐसा नहीं है कि राजनेता इससे अनभिज्ञ है लेकिन शिक्षा को कमाउ धंधा मानने वाली ताकतों का इतना दबाब है कि राजस्‍थान, उत्‍तर प्रदेश से लेकर देशभर की सरकारें हजारों स्‍कूलों को बंद कर चुकी हैं। ब्रिटिश विरासत की भारतीय रेलवे में भी चार सौ से ज्‍यादा रेलवे के स्‍कूल थे जो घटकर मुश्किल से सौ बचे हैं और उन्‍हें भी बंद करने की साजिश चल रही है।

इसलिए कर्नाटक सरकार की बातों पर यकीन नहीं हो पाता .और तो और कर्नाटक की देखा देखी उत्‍तर प्रदेश की सरकार ने भी ऐसा ही सगूफा छेड़ा है। हो सकता है यह जनता को मूर्ख बनाने की कोशिश हो। लेकिन गांधी जी को याद करें तो समानता के हक की भूखी जनता, सत्‍ता को ऐसा करने को मजबूर कर सकती है। लेकिन क्‍या हमारी जनता में भी समानता का कोई भाव बचा है? यही कारण है कि कर्नाटक और उत्‍तर प्रदेश दोनों ही जगह इस आधार पर विचार का विरोध शुरू हो गया है कि यह मूल अधिकारों का हनन , व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता पर चोट होगी। जाहिर है जब तक सरकारें पूरी निष्‍ठा से कमर न कस लें तब तक कुछ नहीं होने वाला है। सरकारें गौ हत्‍या जैसे मसलों पर तो रातों रात सक्रि‍य हो जाती है, धारा 377 के अमीर पैरोकार भी सफल हो जाते हैं, समान शिक्षा के लिए एक कदम भी कोई नहीं बढ़ाता। काश! राजनीतिज्ञ समान शिक्षा और अपनी भाषा में शिक्षा की कीमत और अर्थ समझ पाते ?

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