समीक्षा – वैज्ञानि‍क यशपाल की जीवनी

बिमान बसु द्वारा लिखित प्रोफेसर यशपाल की सचित्र जीवनी विज्ञान प्रसार ने छापी है । बहुत रोचक और आकर्षक प्रस्‍तुति ।  भारत-सरकार का एक विभाग विज्ञान प्रसार पिछले कई वर्षों से देश भर में वैज्ञानिक चेतना और चिंतन फैलाने के काम में जुटा है । सुबोध मोहंती जैसे समर्पित वैज्ञानिक की अगुआई में पूरी टीम इस लक्ष्‍य  को प्राप्‍त करने के लिए सक्रिय है ।  इन प्रयासों के क्रम में विज्ञान प्रसार में प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की जीवनियॉं सस्‍ते दामों पर छापीं हैं ।  चार्ल्‍स डार्विन, मेंडेल, प्रोफेसर यशपाल, येल्‍लागडा सुब्‍बाराव आदि-आदि । वैज्ञानिक चेतना फैलाने में संभवत: जितना कारगर वैज्ञानिकों के बारे में जानना, उनके जीवन प्रसंगों से गुजरते हुए वैज्ञानिक उपलब्धियों का जानना  जितना प्रेरित आमजन को करती है उतना उनके कोरे सिद्धांत नहीं । जीवनी लेखन का काम यदि बिमान बसु जैसे जाने माने विज्ञान संचारी करें तो ऐसे प्रस्‍तुतियों में चार-चॉंद लग जाते हैं ।  बिमान बसु लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका  साइंस-रिपोर्टर  से तीस वर्षों से भी अधिक समय  तक जुड़े रहें और पूरा देश विज्ञान प्रसार में उनके योगदान को जानता  है ।

बचपन से लेकर उनकी शिक्षा, वैवाहिक-जीवन, प्रधानमंत्री के साथ उनके पचास चित्रों समेत मात्र सौ पृष्‍ठों की किताब में उनके जीवन के महत्‍वपूर्ण प्रसंगों को छुआ गया है । प्रोफेसर यशपाल के कई परिचय एक साथ हैं – एक जाने-माने वैज्ञानिक प्रसिद्ध शिक्षाविद् और विज्ञान को जन-जन तक अपनी भाषा में पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध  संचारक ।  कई बार लगता है कि हर परिचय दूसरे से बेहतर है ।

 

वर्ष 1926 में, आज के पाकिस्‍तान में जन्‍में यशपाल जी का बचपन क्‍वेटा, बलुचिस्‍तान में बीता । पुस्‍तक में वर्णित कुछ  हादसें  न भूलनेवालें है – 1935 में आए एक जबरदस्‍त भूकंप में उनके पुश्‍तैनी घर समेत सबकुछ नष्‍ट हो गया । बचपन की पढ़ाई उर्दु और अंग्रेजी में हुई और आगे चलकर हिंदी भी सीखी ।  बचपन में कई बीमारियों से भी गुजरें लेकिन स्‍वयं पढ़ने की आदत से भी लगातार रास्‍ता बनाते गए ।  नेहरू, गॉंधी, रस्किन, इमर्सन, थोरो, टैगोर  सबको उन्‍होंने अपनी बीमारी के दिनों में ही पढ़ डाला ।  वे लिखते हैं कि ‘ मैं उस बीमारी के  प्रति आभारी हूँ क्‍योंकि मैं उस समय इतना पढ़ पाया । ‘

अब शुरू होता है वैज्ञानिक बनने की यात्रा । वर्ष 1949 में पंजाब विश्‍वविद्यालय  में भौतिकी विषय से स्‍नातकोत्‍तर करने के बाद एम0आई0टी0 कॉलेज से भौतिकी से ही पी0एच0डी0 की और फिर एक के बाद एक पदों पर चलते गए । जिन प्रमुख संस्‍थानों से जुड़े रहे वे हैं  टाटा इंस्‍टीच्‍युट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, अंतरिक्ष विभाग, योजना-आयोग के प्रमुख सलाहकार, सचिव, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग आदि ।

शिक्षाविद् के रूप में भी उन्‍हें पूरा देश जानता है । 1986 से 1991 तक विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्‍यक्ष रहें और पिछले‍ दिनों एन0सी0ई0आर0टी0 द्वारा गठित नेशनल कैरिकुलम फ्रेमवर्क  के भी अध्‍यक्ष रहें ।  निदेशक कृष्‍ण कुमार के साथ एन0सी0ई0आर0टी0 में लीक से हटकर ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया है जिसे यदि पूरे देश में लागू किया जाए तो शिक्षा की तस्‍वीर बदल सकती है ।

 

प्रोफेसर यशपाल की एक और खासियत है और वह है विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के प्रयासों में सक्रिय  भागीदारी ।   यहॉं वे पूरी तरह से अपनी भाषा-बोलियों के हिमायती हैं क्‍योंकि वे मानते हैं कि जबतक विज्ञान अपनी भाषाओं में  नहीं पढ़ा जाएगा तब तक वह बहुत दूर तक नहीं पहुँचेगा ।  इसीलिए वे एक ऐसे व्‍यक्ति के रूप में भी लोकप्रिय हुए हैं जो आम आदमी की भाषा में विज्ञान की व्‍याख्‍या कर सकता है ।  एक लंबे अरसे तक दूरदर्शन पर टर्निंग-प्‍वाइंट नाम से उन्‍होंने विज्ञान का कार्यक्रम दिया ।

पुस्‍तक में ढ़ेरों प्रेरणादायक प्रसंग हैं ।  जातिप्रथा में विश्‍वास  नहीं करने के कारण प्रोफेसर यशपाल अपने नाम में कुल-नाम नहीं लगाते ।  1970 के आसपास विज्ञान पढ़ने-पढ़ाने की पूरे पद्धतियों को बदलने के लिए प्रोफेसर सदगोपाल आदि के साथ वे किशोर-भारती से भी जुड़े ।  प्रोफेसर यशपाल उन वैज्ञानिकों में से हैं जो बच्‍चों की जिज्ञासा के बूते अनुसंधान में यकीन करते हों । उनका कहना है कि  ‘बच्‍चे पाठ्यक्रम बनाने वालों से कहीं ज्‍यादा नई जानकारी रखते हैं । मानव देखने, प्रयोग करने और समझने के लिए जन्‍मा है ।  लेकिन, प्राय: हमारी शिक्षा पद्धति हमारी इस मेधा को कुंठित या  धुंधला कर देती है । मैं यह मानता हूं कि एक दिन हमें पढ़ाने और समझने का ऐसा तरीका अपनाना होगा जो मुख्‍य रूप से बच्‍चों द्वारा खोजे और पूछे गए प्रश्‍नों पर आधारित होगा ।‘

ऐसी पुस्‍तकें पूरी पीढ़ी को तो प्रेरणा देती है  वैज्ञानिक चेतना जगाने में भी मशाल का काम करती है । हर विद्यार्थी को ऐसी जीवनियॉं पढ़नी चाहिए ।

पुस्‍तक : यशपाल
लेखक : बिमान बसु
प्रकाशक : विज्ञान प्रसार, ए-50, इंस्‍टीच्‍युट एरिया, सेक्‍टर- 62, नोएडा, उ0प्र0
कीमत : 225 /-

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