समाज का आइना है पुलिस

स्त्री की हिफाजत, हैसियत, बराबरी के किसी मुद्दे पर इतना बड़ा तूफान भारतीय समाज में शायद पहले कभी महसूस न किया हो । दिल्लीह में ही लोग सड़कों पर नहीं उतरे, मणिपुर, जम्मूी, चैन्नेल से लेकर मुम्बडई, कलकत्ताप सभी शहरों में आक्रोश और पश्चा्ताप के अलग-अलग स्व र सुनने को मिले । हमारी सामाजिक गिरावट की विडंबना का एक नमूना यह भी रहा कि फिजा में फैली फांसी की मांग के बावजूद भी लगभग देश के हर शहर और गॉंव से बलात्कांर की घटनाएं भी लगातार आती रहीं । इस पूरे जायज शोर के बीच दो आवाजों को साफ-साफ सुना जा सकता है । एक- अपराधियों की सजा क्याच फांसी होनी चाहिए ? और दूसरा- कि हमारी पुलिस ऐसी निकम्मीइ, बर्बर क्योंह है ? यानि जितना कटघरे में बलात्काआरी रखे जा रहे हैं वैसा ही कटघरा पुलिस व्य वस्थाी के लिए । पुलिस पर चारों तरफ से इतना शिकंजा कसा जा रहा है कि कम-से-कम दिल्लीप में तो फिलहाल उसकी चौकसी और चुस्ती चारों तरफ दिखती नजर आ रही है । पिछले पखवाड़े में रात के किसी भी पहर में जब भी दिल्लीक की सड़कों से गुजरना हुआ पुलिस के सिपाही पूरे चौकन्नेंपन से तैनात थे । कई-कई अवरोध लगाए हुए । एक-एक वाहन और आदमी की जांच करते हुए । नीली और लाल बत्तीं टिम-टिम करती पी.सी.आर. वैन भी घने कोहरे के बीच दिखाई दीं । ऐसे बुरे दिनों की याद दिलाती जो किसी शहर में दंगा होने पर होता है । याद कीजिए दिल्लीन में दिसंबर 2012 के ये दिन पिछले पचास साल के सबसे सर्द दिन भी रहे हैं ।
दामिनी कांड में जो बर्बरता बरती गई उसके लिए कोई भी सजा कम है और उसी अनुपात में पुलिस व्यजवस्थाी को भी सजा मिलनी चाहिए । क्यों कि इन्हीं अपराधों को रोकने के लिए तो पुलिस को उन्हेंस नौकरी मिली हैं और आप मेरे थाने-तेरे थाने की बहस में उलझे हैं । संवेदन शून्यपता की बर्बर मिसाल । हालांकि वह समाज भी कम अपराधी नहीं है विशेषकर वह अमीर बड़ी-बड़ी कारों वाले, जो घायलों की लाख गुहार लगाने के बावजूद भी तमाशायी बन आते और जाते रहे ।

 

मगर इस संदर्भ में चारों तरफ से गरियाये जा रहे पुलिस के सिपाहियों की सहानुभूति में दो शब्द जरूर कहना चाहता हूं । लगभग दस वर्ष पहले की बात होगी जनवरी के महीने में एक आपातकाल स्थिति में जनपथ के पास आना हुआ । 26 जनवरी की तैयारियां पूरे जोरों पर भीं । रात के दो बजे सिपाही जहां-तहां खड़े थे चुस्तद, चौकस । । कुरेदने पर उन्होंिने बताया कि रात की ऐसी ड्यूटी में न कभी पानी मिलता, न चाय । कई बार तो शौचालय जाने के लिए भी परेशान हो उठते हैं । पुलिस के ये सिपाही यह मानकर संतोष कर लेते हैं कि कश्मीनर की पोस्टिंग से तो दिल्लीक की पोस्टिंग आसान ही है । सियाचीन या दूसरी सीमाओं पर तैनात जवानों से तो लाख गुना अच्छी‍ । रात में ड्यूटी कर रहे पी.सी.आर. वैन के सिपाही भी बताते हैं कि कई बार तो लगातार अड़तालीस घंटे की ड्यूटी देनी पड़ती है । क्याह हमने इनकी इन कठिन स्थितियों की तरफ सोचा जो धीरे-धीरे इन्हेंी अमानवीय बनाती जाती हैं ? आपने अखबारों में पढ़ा होगा कि झारखंड, छत्तीपसगढ़ और दूसरे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात अर्ध सैनिक बलों के हजारों जवान इन्हीं स्थितियों से भागकर स्वैकच्छिक सेवानिवृत्ति ले रहे हैं । एक अनुमान के अनुसार पिछले दो वर्षों में लगभग पचास हजार लोगों ने नौकरी छोड़ी है । कारण जो सामने आए हैं वे हैं – एक तरफ नक्सलवादी हमलों, बारूदी सुरंगों का डर और दूसरी तरफ इन जंगलों में कभी पचास डिग्री तक का तापमान तो कभी भयानक सरदी । मलेरिया, डेंगू और दूसरी बीमारियों का आतंक अलग । हजारों मील घर परिवार से दूर जब इन्हेंे जायज छुट्टियों की मनाही कर दी जाती है तो ऐसे मामले भी लगातार आ रहे हैं कि वे अवसाद और निराशा में अपने ही सहकर्मी या अधिकारी पर गोली चला देते हैं । जिन सिपाहियों की पूरी उम्र ऐसे अन्याहयों को सहते हुए बीती हो उनसे पश्चिमी मानदंडों के अनुकूल मानवीय गरिमा और व्ययवहार की उम्मी द करना क्याप कुछ ज्यादती नहीं है ?

 

आइये इस बात की भी जांच करते हैं कि आखिर कौन लोग हैं जो सिपाही की नौकरी में भर्ती होते हैं या करना चाहते हैं । ये समाज के सबसे गरीब तबके के लोग हैं । खुदा के लिए इनके जाति विश्लेाषण पर मत जाइये जैसा कि पिछले दिनों कई रंगों के बुद्धिजीवी अपने-अपने स्वा र्थों से कर रहे हैं । पुलिस की नौकरी में कोई अमीर, खाते-पीते परिवार का बच्चाज नहीं जाता । गरीबी ही इनकी जाति है । आप कोई भी सर्वेक्षण और आंकड़े उपलब्धो करा लीजिये इनमें से लगभग शत-प्रतिशत देश के अलग-अलग सरकारी स्कूपलों में पढ़े हैं । कम फीस वाले सरकारी स्कू लों की तारीफ की जानी चाहिए कि कम-से-कम इन्हें शिक्षा की रोशनी तो मिली जिसके बुते वे आज शासन में शामिल हैं । प्राइवेट स्कूकल की फीस तो इनके मॉं-बाप दे भी नहीं सकते थे । हॉं सरकारी स्कूइलों में कुछ बातें इन्हों ने जरूर देखीं या स्कू‍ल परिवेश से सीखी हैं । क्या् सरकारी स्कूशल, अस्पइताल, पोस्टन ऑफिस में लोग समय से पहुंचते हैं ? प्रसिद्ध पत्रकार पी.साईंनाथ के दर्जनों रिपोर्ताज और हम सबके अनुभव बताते हैं कि उत्तेर प्रदेश, बिहार के स्कूरलों में ऐसे भी मामले हैं जहां सिर्फ तनख्वाजह के लिए महीने में एकाध बार शिक्षक आते हैं । कभी आए भी तो बच्चोंे को डांटने या मिड-डे मिल बांटकर चले गये । सरकारी संस्था नों से शुरू हुई ये बीमारियां देश के विश्वोविद्यालयों तक में हैं । एक पूर्व शिक्षा सचिव ने बीस वर्ष पहले लिखा था मुश्किल से चालीस-पचास प्रतिशत अध्यांपक दिल्लीप विश्वशविद्यालय में नियमित रूप से पढ़ाने आते हैं । नि:संदेह किसी घायल को देर से पहुंचाना या मेरे थाने, तेरे थाने की बहस में उलझना अक्षम्य अपराध है । लेकिन अपने काम के प्रति लापरवाही तो उसने इसी समाज से सीखी है । क्याय मौजूदा दलित, सवर्ण विमर्श में संस्थासनों की कार्यकुशलता और उनकी मानवीय चिंताओं को आपने पिछले बीस सालों में कभी महसूस किया ? लगता है कि जैसे सभी ने निकम्मे पन के आगे आत्मयसमर्पण कर दिया है और यहीं निजी क्षेत्र प्रवेश पा रहा है । वे निजी स्कू्ल हों या अस्प्ताल, डाक-विभाग, इंश्यो रेंस, सफाई, एयर लाइंस आदि कोई भी । कहीं ऐसा तो नहीं कि पुलिस व्यआवस्था को इतना बदनाम कर दिया जाए कि यहां भी निजी क्षेत्र की गुंजाइश बन जाए । दिल्ली और दूसरे महानगरों में फैले हजारों अपार्टमेन्टोंइ, कारखानों के लिए तो निजी सुरक्षा व्ययवस्था आ ही गई हैं । वे दिन दूर नहीं जब शहर या महानगर भी किसी निजी सुरक्षा एजेंसी को सौंप दिये जाएं ।

 

इन सिपाहियों की भर्ती प्रक्रिया से आप सभी परिचित होंगे । उत्तहर प्रदेश में पिछली सरकार ने अपनी जाति के ऐसे लोगों को भी भर दिया था जिनके पास कागज के पर्याप्तं सर्टिफिकेट भी नहीं थे । भर्ती में लाखों की बोलियां लगती हैं और उसके बाद सबसे महत्वेपूर्ण होता है तो घुटनों का दम यानि जो दौड़ भाग कर सकें । क्याी ऐसी अर्धशिक्षित पुलिस आधुनिक शैली के उन पढ़े-लिखे शातिर, अक्लरमंद बदमाशों का मुकाबला कर सकती है जो न केवल दिमागी स्त र पर इनसे कोसों आगे हैं, अत्याैधुनिक हथियारों से भी लैस हैं ? तंबाकू, खैनी चबाते हुए कंधों पर लकड़ी की बंदूक लटकाये ये अपना भी वजन ठीक से संभाल लें तो गनीमत है । तंत्र भी ऐसा प्रशिक्षण नहीं देता जो नयी चुनौतियों का सामना करना सिखाये । नमूने के तौर पर दिल्ली समेत किसी भी हिंदी भाषी राज्यु में दर्ज एफ.आई.आर. की भाषा देख सकते हैं । वह न हिंदी है, न उर्दू, न फारसी । समझ से परे । समाज की सुरक्षा के लिये इनसे क्याी और कैसे उम्मीहद करें ।

 

मैं दिल्ली् में पिछले तीस वर्ष से हूं । धीरे-धीरे मैं भी सतह से उठते आदमी की तर्ज पर बेरोजगार, अर्ध बेरोजगार, निम्न वर्ग से होता हुआ शायद अब उच्च मध्यर वर्ग में शामिल हो चुका हूं । इस बीच सभी दोस्तर दुश्म न दिल्लीग के ही हैं । मुझे नहीं याद कि हमारे सैंकड़ों दोस्तोंि में से किसी का बेटा-बेटी पुलिस या अर्धसैनिक बल में कांस्टे बल की नौकरी में भर्ती हुआ हो । वे पत्रकार, सेक्रेटरी, प्रोफेसर, संपादक, एन.जी.ओ. या सरकार के किसी भी पद पर जाति, धर्म के आधार पर अधिकार मांगते नजर आयेंगे । पुलिस या सेना के इन छोटे पदों पर कतई नहीं । कौन जाना चाहता है इन पदों पर ? इन्हींछ में से दर्जनों रोज-रात की ड्यूटी करते हुए दिल्लीक के अमीरों की बड़ी गाडि़यों से सड़कों पर कुचल दिये जाते हैं । अमीर हुंकारते हुए कहते हैं ‘हमें नियम बता रहा है पुलिस का फड्डा ।’ शायद ही हमारे किसी रिश्तेददार, दोस्ती के बेटे का सिर सीमा के अंदर या सीमा पार काटा गया हो ? तो इनके पक्ष में कौन बोलेगा ?

 

कई पुलिस आयोगों की बड़ी-बड़ी सिफारिशों के बावजूद भी इनकी बुनियादी सुविधाओं और नौकरी में प्रोन्न ति आदि के मामले पर शायद ही कोई ध्याबन दिया गया है । तीस-पैंतीस साल पहले उत्तौर प्रदेश की पुलिस की नौकरी में एक मित्र ने सब इंस्पेाक्टगर की नौकरी शुरू की थी । मेधावी, स्वेस्थि नौजवान था जिसे 1972 में 26 जनवरी की परेड़ में शामिल होने के लिए चुना गया था । 1978 में नौकरी शुरू होने के वक्तट भी वह सब-इंस्पेिक्टदर था और आज भी । उसकी नौकरी पूरे उत्तयर प्रदेश में गाजियाबाद से गाजीपुर तक घूमती रही है । बच्चेी कभी गांव में, कभी साथ । बच्चोंद की पढ़ाई भी बिखरी-बिखरी । उत्ततर प्रदेश जैसे राज्यों की दुर्व्य वस्था में प्रोन्नपतियों और दूसरे मसले जाति और धर्म पर ज्याउदा निर्धारित होते हैं बजाए किसी वस्‍तुनिष्ठम परीक्षा या पैमाने के । मैं 5 वर्ष वड़ोदरा में था । वहां कानून व्यैवस्था की हकीकत दिखाने के बहाने मैंने कई बार उसे दशहरा पर्व के दौरान जब गुजरात गरबा के पूरे शबाब पर होता है । बुलाना चाहा उसका हर बार जवाब होता दशहरा, दीवाली, होली पर तो हमें कभी भी छुट्टी नहीं मिल सकती । जब दिल्लीव या दूसरे शहरों का वह मध्यी वर्ग अपने परिवार वालों के साथ दशहरा, जन्मजदिन, नव वर्ष मना रहा होता है तब ये पुलिस के सिपाही या सैनिक कड़ी सरदी में समाज और सीमाओं की रक्षा कर रहे होते हैं । और यदि गलती से कोई गुनाह हो जाए तो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से लेकर पूरा देश उनके खिलाफ । यहां तक कि कई बार ऐसे गुनाहों को छिपाने के लिए ये भी वैसे ही भ्रष्टन तरीकों का सहारा लेते हैं । दो दशक पहले एक पुलिस वाले का बयान छपा था कि हम सबसे पैसे लेते हैं लेकिन हमें कभी-कभी पत्रकारों को देने पड़ते हैं खबरों को दबाने के लिए ।

 

हाल ही में पश्चिमी उत्तथर प्रदेश में एक दिन एक नौजवान आई.पी.एस. के साथ बिताने का सुयोग हुआ । रुड़की आई.आई.टी. से निकला यह नौजवान पूरे उत्सादह में तो जरूर था लेकिन इस उम्मी द के साथ कि दो साल के अंदर दिल्ली में प्रतिनियुक्ति मिल जाएगी । यहां बहुत दिनों तक आप काम नहीं कर सकते । उसके दो निष्कदर्ष बहुत नौकदार थे । एक यह कि किसी अमीर रसूख वाले गुंडे को कोई सजा नहीं होती । उसके जानने वाले राजनीतिक नेता पहले ही हमारे हाथ बांध देते हैं और दूसरे कि मैं गांव के आदमियों को बहुत भोला समझता था लेकिन मुझे तो अभी भी किसी ईमानदार की तलाश है । उनके सामने या पड़ौस में मर्डर हुआ है । लेकिन वे साफ कह देते हैं कि हमने कुछ नहीं देखा। ऐसे में आप सच का साक्ष्यर कहां से लाएंगे । उसने एक लड़की की हत्याि का मामला विस्ताेर से बताया । पिता ने रिपोर्ट दर्ज कराई कि मेरी बेटी की हत्याी हुई है । अगले दिन तक कुछ समझौता हो गया तो कहा कि पुलिस ने दबाव में मुझसे दस्तयखत कराए थे । हम सबको पता है कि कम-से-कम हिंदी भाषा राज्योंक में पुलिस एफ.आई.आर. क्यों दर्ज नहीं करती क्यों कि हर सत्ताद का आदेश यही होता है कि वे राष्ट्री य स्तीर पर उनकी कानून व्यंवस्था् की पोल उजागर तो भी न हो ।
मौजदा भड़कते विमर्श में यदि इस पक्ष पर ध्याजन नहीं दिया गया तो हम वहीं खड़े रहेंगे जहां सौ साल पहले थे । पुलिस है तो आखिर इसी समाज का हिस्साज । उसी का आईना ।

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