सत्ता और समाज (समीक्षा)

कुछ किताबों को पढ़कर आप वहीं नहीं रहते जो पढ़ने से पहले थे । विशेषकर ऐसे समय में और ऐसे देश में जहॉं लोकतंत्र, भाषा, राजनीति के मनमाने मॉडल रोज बन-बिगड़ रहे हों । ऐसे झीने अंधेरे में कोई चिंतक विकल्प़ के ऐसे सूत्र सुझाए जो हर वाम, दक्षिण और भ्रष्टं समझौतावादी राजनीति से अछूते हों तो आपकी विचारधारा बुनियादी रूप से बदल सकती है । वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘लोक चिंतक ग्रंथमाला’ की कड़ी में प्रकांशित ‘सत्ता और समाज’ इसी वर्ग में रखी जा सकती है । इस किताब को बेहद पठनीय बनाया है इसके संकलनकर्ता और संपादक अभय दुबे ने । किताबों की दुनिया में इसे मौलिक प्रयोग ही माना जायेगा । पहले 119 पृष्ठों में लेखक का विस्तार से परिचय के साथ-साथ लगभग 80 पृष्ठों में लंबी बातचीत है आधुनिकता, सेकुलरवाद, भाषा ग्रासरूट थियरी, आरक्षण, दलित राजनीति गांधीवाद, मार्क्सवाद और हिंदुत्व सभी मुद्दों पर । जो लोग देश की मौजूदा स्थिति को दस-बीस प्रतिशत भी समझते हैं वे इन मुद्दों की प्रासंगिकता को जानते हैं । इस बातचीत का एक-एक शब्द समाजशास्त्र, इतिहास के कई जिल्दों पर भारी पड़ेगा । अभय दुबे का लेख ‘विकल्पी साधना और विद्रोही मन’ तथा धीरूभाई सेठ से लंबी बातचीत इन दोनों विशिष्ठ बुद्धिजीवियों की रचनात्मक मुठभेड़ को सामने लाती है । सच बताऊं तो इससे पहले मैंने सीएसडीएस का नाम तो सुना था लेकिन उसके विविध क्रियाकलाप की कोई ज्यादा जानकारी मुझे नहीं थी । फिलहाल इस साक्षात्काधर से केवल धीरूभाई का अध्ययन, उनका योगदान ही सामने नहीं आता, स्व्तंत्र भारत में सीएसडीएस जैसे संस्थानों के बौद्धिक योगदान का महत्व पूर्ण पक्ष भी पाठकों तक पहुंचता है । धीरूभाई की तो बातें और भी प्रभावित करती हैं विशेषकर आरक्षण जैसे विवादी मुद्दों पर उनकी बेबाक और लीक से हटकर राय । उनकी बातों में एक प्रमाणिकता का सच इसलिए भी है कि वे गुजरात के एक छोटे से गांव से अपनी भाषा में पढ़कर बड़ौदा विश्व विद्यालय के रास्ते दिल्ली तक पहुंचे हैं और इस अर्थ में जाति व्य‍वस्था के झोलों, सिकुड़नों, विकारों को समकालीन शहरी बुद्धिजीवियों से कहीं बेहतर समझते हैं । उनका कहना एकदम सही है कि गांधी के नेतृत्व के विशिष्ट पहलूओं और भारत के सांस्कृतिक संदर्भ की उपेक्षा करके हम समस्याएं हल करने की तरफ नहीं बढ़ सकते । बजाय इसके हम पहले हल सोचेंगे और फिर उन समाधानों को लागू करने के लिए समाज में समस्याएं पैदा करेंगे ।

धीरूभाई का यह कथन भी बहुत लेखकों को मुश्किल से पचेगा कि ‘कुछ लोग आमतौर पर संस्थाओं को एक संकीर्ण और कुंठित नजरिए से देखते हैं । उन्हें तो हर संस्थाओं में जाति-पांति की अनुकृति देखने की आदत है । ऊपर कौन है, नीचे कौन है, बीच में क्या है । अगर ऐसा नहीं दिखाई पड़ता है तो उन्हें संस्था समझ नहीं आती है । लेकिन इससे कहीं महत्वपूर्ण बात धीरूभाई देश की भाषा समस्याए के बारे में कहते हैं । उनका मानना है कि ‘प्रांतीय भाषाओं में अध्यापन ही मौलिक समाजशास्त्र और बेहतर शिक्षा की तरफ ले जा सकता है । वे अफसोस जाहिर करते हैं कि अंग्रेजी में उस समाज की व्याख्या कैसे की जा सकती है जो उसके नागरिकों की भाषा ही नहीं है ।’

विकासशील समाज अध्यगयन पीठ/सीएसडीएस देश के उन जाने-माने संस्था नों में से है जिसने समाज विज्ञान के अनेक क्षेत्रों मसलन आरक्षण, उदारवादी लोकतंत्र, चुनाव, गैर पार्टी राजनीति आदि में विकल्पक का मॉडल तलाशने की कोशिश की है । रजनी कोठारी, धीरूभाई सेठ, आशीष नंदी, रामाश्रय राय, वशीरूद्दीन अहमद, हर्ष सेठी, विजय प्रताप, योगेन्द्ऱ यादव, शिव विश्वदनाथन, भीखू पारेख, अभय दुबे समेत जैसे दर्जनों नामचीनों ने मिलकर काम किया है । विकासशील समाज अध्यदयन पीठ (सीएसडीएस) की त्रिमूर्ति कोठारी, आशीष नन्दीह, धीरूभाई माने जाते हैं । धीरूभाई के ही शब्दों में ‘इस संस्थाक की स्थाकपना 1963 में हुई । तब इसका दफ्तर आई.पी. एस्टेखट में हुआ करता था । इसकी शुरूआत रजनी कोठारी ने गोपाल कृष्णद के साथ की थी । फिर इन दोनों के साथ रामाश्रय राय जुड़े जो काफी उर्वर लेखक थे । फिर बशीरुद्दीन अहमद आए जिन्होंिने अपने कामकाज से सेंटर को उसकी मुख्यउ छवि दी । अर्थात् उन्होंदने ही चुनावी अध्यजयन और सर्वेक्षण रिसर्च की परंपराएं डाली जिनका लाभ आज तक सेंटर को मिल रहा है । इस चतुष्कोनण में मुझे और आशीष नंदी को भी जोड़ने पर एक षड्कोण बनता है । बाद में अन्याुन्यो परिस्थितियों के कारण यह रजनी, नंदी और मेरा त्रिकोण रह गया (पृष्ठम 69-70)

केवल साक्षात्का।र ही नहीं विकल्पं साधना और विद्रोही मन के शीर्षक से अभय दुबे ने धीरूभाई का बेजोड़ रेखाचित्र दिया है । रजनी कोठारी के शब्दों में उनकी दृष्टि मध्यअवर्गी है क्योंाकि उनके मन में कमजोर वर्गों के प्रति गहरी हमदर्दी है । लेकिन वे वामपंथ की तरफ भी जाना नहीं चाहते । धीरूभाई ऐसी किसी भी सोशल इंजीनियरिंग के साथ खड़े होने के लिए तैयार नहीं थे जिसके पीछे समाज का अंतिम सत्यभ पा लेने की दावेदारियॉं हों । फिर चाहे वह दावा बाएं बाजू की तरफ से किया जा रहा हो या फिर दाएं बाजू की तरफ से । धीरूभाई ने ऐसे तमाम आग्रहों को अपनी विशिष्टा शैली में ‘पोल पोटिज्मई’ की संज्ञा दी । कभी-कभी यह उत्सुमकता भी पैदा होती है कि इनके परस्पैर संबंध, एक-दूसरे की विचारधारा, काम के प्रति क्याु नजरिया रहा । अभय कुमार दुबे ने कभी प्रत्यपक्ष, तो कभी किसी मुद्दे के संदर्भ में धीरूभाई के सामने ऐसे प्रश्‍न उठाये हैं जो इन सभी विचारकों को बारीकी से उनके सिद्धांत, काम, मतभेद, कार्यप्रणाली सभी कुछ जानने का मौका यह पुस्तोक देती है । आशीष नंदी के बारे में धीरूभाई की टिप्पकणी । ‘आशीष नंदी की लेखन शैली खास तरह की है । वे बौद्धिक और अकादमीय सम्प्रे षण समान्या समाज वैज्ञानिकों की तरह नहीं करते । अपने विचारों को बिना क्वामलीफिकेशंस के रखते हैं । वे विशेषणों का इस्तेकमाल नहीं करते । वे अपनी बात सीधे कहते हैं । यह स्टाफयल की बात है । वे पॉलिमिक्सज करते हैं, और जम कर करते हैं । इसके कारण उनकी बातों को समझना और उनकी छानबीन करना बहुत कम लोगों के लिए संभव रह जाता है । अधकचरा वामपंथी विमर्श आशीष के विचारों पर हमले की कोशिश जरूर करता रहा है । लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली है । आज स्थिति यह है कि आशीष नंदी की बातों को ग्लोनबल स्तहर पर मान्यथता मिलती दिखाई दे रही है । उत्तकर-आधुनिक दुनिया में आशीष के विचार बौद्धिक रूप से फैशनेबुल बनते जा रहे हैं । आशीष नंदी ने जो शास्त्र विकसित किया है उसके विस्तािर में जानेपर कई बातों से मेरी असहमतियां हो सकती हैं, पर समग्र दृष्टि से मैं उन्हेंि सेंटर के बुनियादी सरोकारों की निरंतरता में ही देखता हूं । हमारे यहां के वामपंथी डिस्कोिर्स में समस्याब यह रही है कि वह बारीकियों और नफासत को दरकिनार करके अपने से असहमत लोगों का मोटा-मोटा चित्र खींचने में महारत हासिल कर चुका है । यही उसने नंदी के साथ किया है । (पृष्ठम 21, 94, 95, 96)
आशीष नंदी के बारे में वे और विस्ताचर में जाते हैं : बुनियादी रूप से वे मुद्दों को राजनीतिक रूप से परखने वाले समाज वैज्ञानिक हैं, न कि विचारधारात्मिक रूप से । बुनियादी रूप से ही कहें तो वे सेकुलरवाद विरोधी भी नहीं हैं । अगर मुझे नंदी पर कोई निबंध लिखना हो तो मैं तो उन्हेंह अभिजनवादी चिंतन और वर्चस्वह के आलोचक के रूप में पेश करना पसंद करूंगा। आशीष का जोर इस पहलू पर ज्यावदा है कि आधुनिकता के कारण धर्म का साम्प्र दायिकीकरण हो गया है । उसकी पैथोलॉजी बन गई है । उनकी बात सही है । लेकिन, आधुनिकता से पहले के जीवन में अधीनस्थेता, उत्पी्ड़न, ऊँच-नीच और शोषण के भी बहुत से रूप थे ।इन बातों पर चर्चा न करने के कारण शायद ऐसा लग सकता है कि वे वल्गार गांधीवाद के हामी हैं । पर, कुल मिलाकर मैंने उन्हें जितना पढ़ा है उससे यही लगता है कि वे पॉलिमिकल लेखक हैं ।

आशीष नंदी पर बात करते हुए धीरूभाई स्‍वयं को भी सामने रखते हैं- मैं आरक्षण पर, उदारतावादी लोकतंत्र पर या गैर-पार्टी राजनीति या वैकल्पिक राजनीति के सूत्रों पर लिखता-बोलता हूं तो एक दूसरे तरीके से मेरा प्रस्थारन बिंदू भी लोकतांत्रिक सिद्धांत ही होता है । मतभेदों के होते हुए भी हम दोनों के काम का सैद्धांतिक मूल एक ही है । मेरी रचनाऍं आशीष की तरह आधुनिकता और सेकुलरवाद को खारिज तो नहीं करतीं लेकिन, मैं भी एक अभिजनवादी विचारधारा के रूप में इन दोनों को ऊँची जातियों और ऊँचे वर्ग के मुट्ठी भर लोगों द्वारा सामाजिक वर्चस्व स्थादपित करने के औजार की तरह इस्तेलमाल करने की आलोचना करता हूं । इन अभिजनों के सेकुलरवाद पर ही निगाह डालिए । यह क्याे है ? यह भारत विरोधी, बहुसंख्यालविरोधी और जनविरोधी प्रतीत होता है । यह अंग्रेजी माध्यतम वाला सेकुलरवाद है, अंग्रेजी माध्यरम वाला आधुनिकतावाद है । पश्चिम से उधार ली गई धारणाओं के तहत साठ के दशक में ये लोग मानते थे कि भारतीय किसान परिवर्तन-रोधी हैं । कम्युलनिष्टं डिस्कोसर्स की भी इसमें एक भूमिका थी । किसानों को दकियानूसी समझा जाता था । इस तरह के आधुनिकतावाद और सेकुलरवाद को भारतीय जनता ने बार-बार गलत साबित किया है ।’
आशीष के साथ मेरे मतभेद भी साफ हैं । मैं परंपरा को भारतीय अस्मिता का पर्याय नहीं मानता । मैं उसे आधुनिकता के विकल्पै के रूप में नहीं देखता । मेरे मतभेदों का एक और बिंदू है और वह है राज्यक की भूमिका को लेकर । इस मामले में मेरा रजनी कोठारी के बाद के लेखन (लोकायन के बाद के) से भी मतभेद है । हो सकता है कि आशीष के मुकाबले में कुछ राज्यरवादी जैसा लगूं, पर मैं भारत के संदर्भ में राज्या को एक बहुत महत्व पूर्ण एजेंसी मान कर चलता हूं । राज्यद की भूमिका के बिना लोकतंत्रीकरण संभव नहीं था ।(पृष्ठए 97)
समाज शास्त्री धीरूभाई जी की कुछ मूल्यिवाद विचार टिप्पीणियॉं गौर करने लायक हैं :-
1. ब्राह्मणवादी परंपरा :- हमारी ब्राह्मण परंपरा में ज्ञान और क्रिया के बीच एक तरह का द्विभाजन रहा है । यह परंपरा ज्ञान को इतना विशुद्ध मानती है कि धारणा के स्तजर पर उसका अमल की दुनिया से नाता ही नहीं रहता । इस ब्राह्मणवादी परंपरा को ज्ञान की औपनिवेशिक राजनीति ने और प्रभावी बनाया । अंग्रेजी भाषा, उसके जरिए मिलने वाले ज्ञान और उसी के आईने में पूरे समाज को देखने-समझने की प्रवृत्ति पैदा हुई । ब्राह्मणवाद और औपनिवेशिक चिंतन की इस दोस्ती ने समाज के धरातल पर ज्ञान को उतारने की प्रक्रियाओं को कमतर की श्रेणी में धकेल दिया । दरअसल, सचेत रूप से लोकायन के तहत संवाद करने के जरिए मैं इसी बर्फ को तोड़ने की कोशिश कर रहा था । मैं समाज विज्ञान के हलकों में अनुभवपरक ज्ञान को प्रतिष्ठा दिलाना चाहता था । मेरे इस प्रयास को इम्पीकरिकल की श्रेणी में घटाया नहीं जा सकता । ज्ञान की अनुभवपरकता समाज विज्ञान में प्रचलित अनुभवसिद्ध अनुसंधान से अलग तरह की चीज है । लोकायन संगठन इन्हींञ कुछ प्रश्नों को तलाशने के लिये धीरूभाई क्षेत्र का मानस पुत्र था । लोकायन ने ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की संभावनाएं पैदा कीं । लोकायन ने संवाद के जरिए यह संभव बनाया कि लोग अपनी परिस्थितियों को स्वीयं परिभाषित करें न कि दूसरे उन्हें अपनी परिभाषाएं थमाने की कोशिश करें। यह लोकतंत्रीकरण समाज के ज्ञान को गहन बनाता है (पृष्ठप 77) लोकायन संस्थार के प्रयोजन, आंतरिक मतभेद, टकराव आदि की बहुत लम्बीा दास्ताेन परिचय में अभय कुमार ने लिखी है ।
2. भाषा नीति पर- अंग्रेजी को सभी राज्योंे के स्कूेलों में शुरूआती स्त र से ही एक विषय के रूप में ढंग से पढ़ाया जाए लेकिन शिक्षा के माध्य म के रूप में उसका इस्तेकमाल हतोत्सा हित करते हुए अंतत: खत्मष कर दिया जाना चाहिए । दरअसल, हिंदी के बजाय हमें अंग्रेजी पर एक राष्ट्री य नीति बनानी चाहिए । अगर यह नीति ऊपर बताई गई दिशा में हुई तो राजनीतिक अथवा शिक्षा शास्त्री य आधार पर अनौचित्यतपूर्ण दोहरी शिक्षा प्रणाली को काफी हद तक कमजोर ही नहीं करेगी, बल्कि उसे खत्मप भी कर देगी। अंग्रेजी रहेगी, पर एक कामकाजी भाषा के रूप में न कि आभिजात्यत वर्गीय वर्चस्व् के औचार के रूप में । साथ-साथ अन्यक क्षेत्रों की भांति हिंदी पट्टी में भी हिंदी द्वारा अंग्रेजी को प्रतिस्थाेपित किया जाना चाहिए । राष्ट्रीकय स्तोर पर अंग्रेजी विरोध स्वदर देने के लिए हिंदी भाषा प्रभू वर्ग को अन्यए क्षेत्रीय भाषा-भाषी प्रभू वर्ग के साथ बिंदु तलाशने होंगे । इसके लिए अन्हेंद अपना एक भाषा-भाषी होने का चरित्र छोड़ना होगा । संख्यात बल पर भरोसा करने और संकुचित दायरे में इस मुद्दे को परिभाषित करने का रवैया त्या्गना और भी जरूरी है । (पृष्ठय 321 और 345)
3 गैर-पार्टी राजनीति के बारे में – गैर पार्टी संरचनाओं के पहले किस पार्टी के एजेंडे पर पर्यावरण और पारिस्थितिकी एक मुद्दे के रूप में मौजूद थी । यहॉं तक कि औरत की आजादी के सवाल में भी उनकी दिलचस्पीम नहीं थी । कानून आम जनता की जिंदगी को किस तरह से प्रभावित करता है, इस विषय में कौन सोचता था ? पूरा अनौपचारिक क्षेत्र किसी भी तरह की राजनीतिक पहलकदमी से वंचित था । इस लिहाज से अस्सीा फीसदी भारत के प्रति पार्टीगत दायरे का कोई सरोकार ही नहीं था । मैं चुनावी राजनीति को लोकतांत्रिक राजनीति के केवल एक पहलू के रूप में देखता हूं । गैर-पार्टी राजनीति भी लोकतांत्रिक राजनीति की निरंतरता है । उसका दूसरा पहलू है जो वह काम कर रहा है जिसे कर पाने में चुनावी राजनीति असफल रही है । इसका मतलब यह नहीं हो जाता कि गैर-पार्टी संरचनाएं पार्टी-पॉलिटिक्सी के खिलाफ हैं, या उन्हेंं अराजकतावादी होना चाहिए या फिर स्थाीयी तौर पर राज्यॉ विरोधी रवैया अख्तियार कर लेना चाहिए । (पृष्ठम 101)
4. भारत में परिवार-परिवार की संस्था) में बहुत कुछ बदल चुका है । किसी ने इन परिवर्तनों का अध्य यन नहीं किया है । परिवार एक हद तक सिर्फ मियॉं-बीवी और बच्चोंह (न्यूनकलियर) वाली इकाई बनता जा रहा है । शहरी भारत की यही हकीकत है । पश्चिम की तरह हमारे यहॉं नेबरहुड कम्यु।निटी नहीं बनी है । परिवार सक्रिय रूप से राजनीतिक संरचनाओं से नहीं जुड़े हैं । हमारे यहॉं वहॉं की तरह चर्च जैसा कोई सामूहिक धार्मिक संबंध भी नहीं है । वह अपने से बाहर की दुनिया से टीवी वगैरह के जरिए यानी वायर सिस्टूम के जरिए ताल्लुंक रखता है । इस तरह से यह हमारा नया बनता हुआ परिवार अपने एकांत में खड़ा है ।
5. वामपंथ पर कई वामपंथी मित्र आपको संघी रूझान रखने वाले विद्वान के रूप में पेश करते हैं- अभय दुबे का प्रश्नि : जवाब : इसमें सफाई की मुझे कोई जरूरत नहीं है । यह तो एक बड़ा खेल है जो आजादी के बाद से लगातार खेला जाता रहा है । यह नेहरूवादी सेकुलर अभिजनों का खेल है । इसका जन्मे वामपंथियों और नेहरू के वैचारिक गठजोड़ के गर्भ से हुआ है । आप देखेंगे कि सेकुलरवाद का डिस्कोंर्स आजादी के बाद बदल जाता है । आजादी के पहले सेकुलरवाद की अभिव्येक्तियॉं विविधतामूलक और बहुसांस्कृ तिक जमीन से आती थीं । लेकिन, आजादी मिलने के बाद नेहरू और गांधी की साझी सेकुलर परंपरा में विच्छेहद हो गया । नेहरू के नाम से जो सेकुलर विचार बना, उस पर विकास और आधुनिकीकरण के साथ-साथ पाकिस्ता न के निर्माण के बाद मुसलमानों की असुरक्षाओं का प्रश्नि उस पर हावी होता चला गया । इन सब परिस्थितियों में ऊंची जाति के अंग्रेजी पढ़े-लिखे अभिजनों ने आधुनिकता और सेकुलरवाद पर अपनी इजारेदारी कायम कर ली । सेकुलरवाद इन्हींष दिनों राज्य की विचारधारा के रूप में सूत्रीकृत होता चला गया । मैं समझता हूं कि विशुद्ध विचारधारात्मरक प्रतिबद्धताओं के कारण साम्प्र दायिकों और सेकुलरवादियों की व्यमवहार-शैली के बीच कोई फर्क नहीं होता है । दोनों एक-दूसरे की आमने-सामने खड़ी प्रतिकृतियॉं बन जाते हैं । दैनंदिन जीवन की बहुसांस्कृ तिकता इन दोनों के बीच ध्रुवीकरण की प्रक्रिया में चली जाती है । फिर विमर्श ऐसा हो जाता है कि आप या तो सेकुलरवादी हो सकते हैं, या फिर साम्प्रिदायिक । मैं अपने को इस तरह की श्रेणियों में बॉंटने के लिए तैयार नहीं हूं । मैं उस सेकुलरवाद का हामी नहीं हो सकता जो अभिजनों की सत्ताक को वैधता प्रदान करने का काम करता है । (पृष्ठप 99 और 112)
6. भारत में मार्क्सकवाद का एक प्रमुख आधार अमेरिका विरोध रहा है इतना कि कभी-कभी तो इसके सामने विचारधारा की अहमियत भी नहीं रह जाती । मार्क्सिवादी अपने अमेरिका विरोध के कारण इससे नाराज थे । भारत में मार्क्सहवाद का एक प्रमुख आधार अमरिका विरोध रहा है, इतना कि कभी-कभी तो इसके सामने विचारधारा की अहमियत भी नहीं रह जाती । समाज विज्ञान की दुनिया में थमाए गए सिद्धांतों के कारण हम इस पहलू की तरफ ध्या न नहीं देते, और हमारा अनुभव भी उधार लिया हुआ हो जाता है । मसलन, फासीवाद का, नाजीवाद का अनुभव यूरोपीय है ।इसी तरह अंतर्राष्ट्रीायतावाद पर ट्राट्स्की‍ के विचार हैं । यूरोप ने राष्ट्र्वाद का सिद्धांत अपने इन्हींी अनुभवों और विचारों के आधार पर विकसित किया है । पर हम उसी के आईने में भारतीय राष्ट्रधवाद देखने लगते हैं । हम न केवल राष्ट्र वाद का वही सिद्धांत भारत में ले आते हैं, बल्कि यूरोप का अनुभव तक उधार ले लेते हैं । जब तक हम अपने सामाजिक अनुभव और इतिहास को प्राथमिकता नहीं देंगे, उसकी रोशनी में समाज विज्ञान के सिद्धांतों की पड़ताल नहीं करेंगे, तब तक हम ज्याोदा से ज्याेदा एक विजातीय समाज विज्ञान ही रच सकते हैं । इसी चक्क्र में बहुतेरे समाज वैज्ञानिकों ने राष्ट्र वाद को हिंदुत्‍व का पर्याय ही बना दिया । असलियत में गांधी का राष्ट्रतवाद और नेहरू का राष्ट्रंवाद भारतवासियों के लिए मुक्तिकामी अनुभव था । इस राष्ट्रनवाद के प्रभाव में हमने जाति, क्षेत्र और धर्म से परे जा कर समस्तद समाज के बारे में सोचना शुरू किया । हम अपने समाज के इतिहास और उसके विधेयक तत्वों् पर ध्या न देने के लिए तैयार ही नहीं हैं ।
मेरे सामने सवाल यह है कि क्याै समाज भी व्यसक्ति की तरह अनुभव करता है ? मेरी दिक्कसत आपको कुछ उदाहरणों से समझ में आएगी । सेकुलरवाद ले लीजिए । भारतीय संविधान इसका जो अर्थ लगाता है, वह मेरी समझ में एक्सजपीरिएंशल है । लेकिन, जब हम विविधता में एकता कहते थे तो उसकी अहमियत नहीं समझी जाती थी । लेकिन,जब पश्चिम ने बहुसंस्कृएतिवाद कहना शुरू कर दिया तो वह हमारे लिये बहुत बड़ा सिद्धांत हो गया । जबकि हमारे यहां तो हमेशा ही बहुसंस्कृ तिवाद रहा है । अपने समाज को नहीं देखते तो अपने सिद्धांत भी नहीं बनाते । (पृष्ठ् 84 और 85)

 

7. नेहरू पटेल के बारे में :- आजादी के बाद अगर एक नाम लेना हो तो वह है जवाहर लाल नेहरू और नाम लेने की इजाजत हो तो मैं दो लोगों का और जिक्र करना पसंद करूँगा । सरदार पटेल और जयप्रकाश नारायण । जहॉं तक ऐतिहासिक अहमियत का सवाल है । देश को परिवर्तन के रास्तेश पर ले जाने का सवाल है, उसमें नेहरू की हैसियत सबसे ज्याादा बनती है । पर, पटेल के बिना नेहरू की उपलब्धियॉं पचास फीसदी भी नहीं रह जातीं । नेहरू रोमांटिक थे, राष्ट्रह-निर्माता थे । वे राज्य -निर्माता नहीं थे । शुरू में सेकुलर राज्यस की स्थाजपना करना बहुत मुश्किल था । आसानी के साथ सेकुलर भाषा अपना कर उसकी आड़ में राज्य को जातीय बहुसंख्यककवादी बनाया जा सकता था। यह काम नेहरू और सरदार ने मिलकर किया । दोनों की परस्पकर पूरकता एक अभूतपूर्व चीज थी । एक सृजनात्मरक तनाव भी था दोनों के बीच और दोनों मिलकर भी एक ही मंजिल की ओर बढ़ रहे थे । यह नेतृत्वा एक बृहत्त र लक्ष्य। के प्रति समर्पित भी था । जेपी नेहरू और पटेल जैसे नहीं थे । न ही वे कोई महान चिंतक थे । लेकिन, आजादी के बाद जब एक अवधि में चीजें नीचे की तरफ गिर रही थीं, तो उन्हों्ने लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया आगे ले जाने का रास्ताे साफ किया । मुद्दों को लोगों के सामने रखा, एक नई ऊर्जा पैदा की । युवाओं में उछाल पैदा हुआ । (पृष्ठा 115)
8. भारतीय राजनीति की सबसे अच्छीद और सबसे बुरी घटना- संविधान निर्माण से अच्छी कोई घटना भारतीय राजनीति में आज तक नहीं हुई । इसके बाद भाषावार राज्योंट का गठन दूसरे नंबर पर आता है । यह प्रावधान संविधान में नहीं था, फिर भी संशोधन करके भाषाई राज्यं बने । इससे भारतीय राष्ट्रध और राज्य, को नया जीवन मिला । यह बहुत जरूरी था । हमारे यहां तो सब काम जाति से चल जाता था । राज्य की जरूरत ही नहीं थी । इन दोनों प्रकरणों से विधिसम्मभत लोकतांत्रिक शासन के आधार पर चलने वाला राज्य। स्था्पित हुआ ।(पृष्ठं 116)
हिंदुत्वम की राजनीति सबसे खराब घटना है । धार्मिक-बहुसंख्ययकवादी राजनीति, आपातकाल थोपे जाने से भी ज्याादा खराब है । इमरजेंसी तो टल गई, पर इसका टलना आसान नहीं है । इसने ज्यानदा नुकसान किया है ।
9. राजनीतिक दलों में प्राथमिकता क्रम के हिसाब से सबसे ऊपर और सबसे नीचे किसे रखे तो नीचे तो बहुत सी पार्टियॉं आ जाएंगी । इस मामले में बड़ी कड़ी प्रतियोगिता है । देवगौड़ा की पार्टी है, मुलायम सिहं की पार्टी है, और भी कई पार्टियॉं हैं जो किसी भी राजनीतिक और लोकतांत्रिक मानक की परवाह नहीं करतीं । पर पचास के दशक की कांग्रेस को मैं ऊपर रखना पसंद करूँगा।यहां तक कि मेरी निगाह में साठ के दशक की कांग्रेस भी ठीक है । इसके बाद परिवार केंद्रित राजनीति ने उसमें विकृतियॉं पैदा कर दीं । मेरी निगाह में जाति, धर्म और परिवार को केंद्र बना कर राजनीति करने वाली पार्टियॉं लोकतंत्र के लिए कम खतरा नहीं हैं । नक्सालवाद पर इसलिए, कोई एक राय बनती नहीं है । गठजोड़ राजनीति के अलावा कोई चारा नहीं है । उसे सुधरना ही पड़ेगा । फिलहाल ठहराव और गिरावट दिख रही है । पर धीरे-धीरे दो गठजोड़ों वाली प्रणाली की तरफ भारत बढ़ेगा । (पृष्ठट 116 और 117)
10. नक्सीलवाद से मुझे उम्मीवद है कि वह व्यैवस्था में संशोधन करने में मदद करेगा । अगर इस परिघटना का राजनीतिक भूगोल देखें तो पाएंगे कि वह उसी इलाके में बढ़ रहा है जहॉं साधारण विकास कभी नहीं पहुंचा । वहॉं औपनिवेशिक राज्यग से भी बुरी हालत है । इन इलाकों पर लोकतंत्र की किरण भी नहीं पड़ी है । दूसरे, हमें देखना चाहिए कि किन इलाकों में नक्सोलवाद नहीं है । गुजरात एक ऐसा ही इलाका है । वहां के आदिवासियों में भी इसके प्रति दिलचस्पी‍ नहीं है । महाराष्ट्रस के कुछ हिस्सोंव में, जैसे गडचिरोली है । कुल मिलाकर यह एक कठिन दौर है, पर यह गुजर जाएगा । विकास और शासन की बाँहें जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगी, इसका असर कम होता जाएगा । अगर भारत के सबसे खराब भविष्यब की कल्पयना की जाए और सबसे अच्छेो भविष्यभ की कल्पबना की जाए, दोनों में से एक में भी नक्सैलवाद नहीं होगा ।
11. पिछड़ा आयोग सदस्य के नाते धीरूभाई सेठ की टिप्पकणी – आयोग का मेरा अनुभव मुझे बताता है कि जाति प्रथा का असर मंद करने के लिए जो ताकतें और प्रक्रियाऍं खड़ी हुई थीं, वे अब खुद जाति प्रथा की अनुकृति बनती जा रही हैं । प्रगति के कई सोपान चढ़ चुकी पिछड़ी जातियों का एक बड़ा और मजबूत निहित स्वांर्थ बन चुका है । वे अपने से नीची जातियों के साथ वही सुलूक कर रहे हैं जो कभी द्विजों ने उनके साथ किया था । मैं आयोग की पहली टीम का सदस्यक था । कुल मिला कर स्थिति यह बनी है कि आयोग के सदस्यो, उससे जुड़ी नौकरशाही और पूरा का पूरा क्षेत्र ही इसी जबरदस्तह निहित स्वादर्थ की नुमाइंदगी करता नजर आता है । ये लोग सब मिल कर पूरी कोशिश में रहते हैं कि किसी भी तरह से पिछड़ी जातियों को अत्योधिक पिछड़े और कम पिछड़े में वर्गीकृत न होने दिया जाए । जब मैं आयोग में था उस समय भी प्रभुत्व शाली पिछड़ी जातियों द्वारा ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ प्रतिरोध होता था ।

 
आयोग की पहली टीम का ज्यावदातर वक्ती तो मंडल आयोग द्वारा बनाई सूची को तर्कसंगत बनाने में खर्च हो गया, क्योंयकि सूची में बड़ी खामियॉं थीं । अब स्थिति यह है कि मजबूत पिछड़ी जातियों के हितसाधक आरक्षण के फायदे निचली ओ.बी.सी. जातियों तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं । खास तौर से दक्षिण के ओ.बी.सी. जिन्हें सबसे पहले आरक्षण मिल गया था । इन तगड़ी ओ.बी.सी. जातियों को सत्तास भी मिल गई है । वे आरक्षण के फायदे अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहते । जो समुदाय पिछड़े नहीं रह गये हैं, उनकी शिनाख्त नहीं की जा रही है, और न की जाएगी । इंद्रा साहनी वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के विरोध में जाता है यह रवैया । लोकतांत्रिक संस्थाटओं की एक समस्या होती है कि एक सीमा के बाद नौकरशाही और राजनीतिक हित मिल कर उन्हें आपस में होड़ कर रहे हितों के औजार में बदल देते हैं । यह हमारे लोकतांत्रिक निज़ाम के पिछड़ेपन का चिह्न है । (पृष्ठी 105, 102 और 103)
पिछड़ों के लिये आरक्षण की पूरी बहस पर इससे बेहतर टिप्पंणी नहीं हो सकती। पुस्तोक में ‘आरक्षण के पचास साल’ खंड के अंतर्गत चार उप शीर्षकों में इस मुद्दे पर विचार किया है । ये अध्या य हैं- धर्म, जाति निरपेक्ष नीति के विविध आयाम; आरक्षण विरोधियों के तर्कों की असलियत; आरक्षण नीति; एक पुन: संस्का र की आवश्य;कता थी अति पिछड़ों और निजी क्षेत्र में आरक्षण का सवाल । धीरूभाई के शब्दोंस में- आरक्षण के जरिए प्रगति के अवसरों को हड़पने की इस होड़ ने हमारी लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति को अलोकतांत्रिक रुझानों से ग्रस्तप कर दिया है । इसक कारण झूठे-सच्चेी आश्वा्सन दिए जाते हैं, और अंतत: समाज को तनावग्रस्तक होना पड़ता है । बिरादरियों के बीच का भाई-चारा खत्म् होता है । गुज्जारों को दिया गया आश्वातसन तो एक उदाहरण है, मुसलमानों को धर्म आधारित आरक्षण देने के अध्या देश तक जारी किए जा चुके हैं । हिंदू समाज की संरचना की जानकारी रखने वाला कोई भी प्रेक्षक जानता है कि प्रजापतियों (कुम्हा रों) को समाज में अछूत या दलित नहीं माना जाता । लेकिन, पिछले दिनों उन्हें भी (उत्तंर प्रदेश में प्रजापतियों को) अनुसूचित जाति का दर्जा देने का प्रयास किया जा चुका है । (पृष्ठि 244)
एम्स , अलीगढ़ मुस्लिम विश्व(विद्यालय सरीखे अल्पंसंख्यकक विश्वअविद्यालय, शिक्षण संस्थाान, विदेशी विश्विविद्यालयों में आरक्षण का सवाल जैसे सैंकड़ों ज्विलनशील बहसें हवा में जिन्दाा हैं और कभी भी 1990 के मंडल आयोग की याद ताजा करा सकती हैं । तीन वर्ष पहले एम्सद में यह दोहराया जा चुका है । वक्तक का तकाजा है धीरूभाई सेठ जैसे समाजशास्त्री , चिंतक, गैर पार्टी कार्यकर्ता की बातों पर ध्याीन देकर सरकार ‘क्रीमीलेयर’ को बाहर करते हुए आरक्षण को और प्रभावी बनाये । देश हित के लिये भी समाज के हित के लिये भी । संक्षेप में (आरक्षण नीति : एक पुन: संस्काीर की आवश्यहकता) उनके निष्कसर्ष हैं ।
इन्दिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि आरक्षण का अनुचित लाभ उठा रहे समुदायों की शिनाख्त् की जाए और उन्हेंक इस लाभ से बाहर किया जाये । आरक्षण नीति का पुन: संस्कामर करने के लिए आरक्षित समुदायों के बीच पूरे देश में न केवल राज्यी स्तिर पर बल्कि राष्ट्री य स्तकर पर अनिवार्य तौर से श्रेणियॉं बनाना उचित होगा। मसलन, अनुसूचित जनजातियों में माला और जाटव जैसे समुदाय हैं जो वाल्मीौकियों और पासियों के मुकाबले बहुत आगे बढ़ चुके हैं । उपश्रेणियॉं बनाने से यह भी पता लग सकेगा कि आरक्षण का लाभ उठाने से वंचित रह गई जातियॉं कौन-कौन सी हैं और अत्यसधिक कमजोर जातियों को आरक्षण का लाभ उठाने के काबिल बनाने के कौन-कौन से कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं । अगर इन पहलुओं पर जोर नहीं दिया जाएगा तो पूरी बहस आरक्षण के प्रतिशत के आस-पास ही सिमट कर रह जाएगी । पिछड़े वर्गों में घुस आए अगड़े समुदायों और उनके बीच बन चुके जातिगत कोटिक्रम का स्वा्र्थ यही है । (पृष्ठ 246 और 247)
हाल ही में हुए एक महत्विपूर्ण अध्यहयन कास्ट इन ए डिफरेंट माउल्डा (caste in a different mould; understanding the discrimination) लेखक : राजेश शुक्लार, सुनील जैन, प्रीति कक्कiर बिजनेस स्टैंेडर्ड का प्रकाशन में दिए गए तथ्यं आंखे खोलने वाले हैं । संक्षेप में जहां उत्तlर प्रदेश में एक दलित की औसत आय उनचालीस हजार रुपये प्रतिवर्ष है, वहीं पंजाब में तिरेसठ हजार है । बिहार में ओबीसी की औसत आय चालीस हजार है, जबकि महाराष्ट्रत में चौहत्तार हजार । कर्नाटक में एक आदिवासी की औसत आय प्रतिवर्ष बासठ हजार रुपये हैं तो बिहार में सवर्ण जाति की भी सिर्फ इक्याटवन हजार । इतना ही अंतर आदिवासी जनता के बीच है । एक अनपढ़ आदिवासी परिवार की औसत आय केवल साढ़े बाईस हजार प्रतिवर्ष हैं जबकि आदिवासी ग्रेजुएट की पिचासी हजार । गांव के आदिवासी की औसत आय सैंतीस हजार रुपये है तो शहरी का एक लाख से ज्याहदा । यानि देश के अलग-अलग हिस्सोंज में सामाजिक, आर्थिक पिछड़ेपन की तस्वीयर इतनी भिन्नं है कि उसे सिर्फ जाति के नाम पर इकहरे मानदंड से व्याआख्यानयित नहीं किया जा सकता । इस पुस्ततक के सभी ऑंकड़े धीरूभाई की स्थाापनाओं को प्रमाणित करते हैं । दिल्लीं के चाणक्य पुरी में रहने वाले दलित, आदिवासी किसी भी पैमाने से आरक्षण के हकदार नहीं हैं । बल्कि अपनी ही जाति के वंचितों की बाधा बन रहे हैं ।आज यदि लोहिया होते तो धीरूभाई सेठ, राजेंद्र सच्चार, वीजी वर्गीज और दूसरे विद्वानों की तर्ज पर खुद अपने नारे और उसके सिद्धांत को बदल देते ।
पुस्ताक छ: खंडों में बंटी है । पहला आत्म।कथ्यर उनका परिचय तथा अभय कुमार दुबे की लम्बी‍ बातचीत : दूसरा- जातिप्रथा, वर्गरचना और राजनीति, तीसरा दलित प्रश्नस और गैर दलित समाज, चौथा- आरक्षण के पचास वर्ष : पांचवां-लोकतंत्र की चुनौतियॉं और छठा- भूमंडलीकरण और वैकल्पिक चिंतन । अंतिम भाग के तीनों लेख बाजारोन्मुंख या सहभागी लोकतंत्र वैकल्पिक राजनीति के आयाम और जमीनी आन्दोंलनों की परिघटना तथा मानवाधिकार : दुविधा और चुनौती मौजूदा विमर्श में बेहद प्रासंगिक हैं । धीरूभाई ने ठीक ही पहचाना है । भूमंडलीकरण के प्रभाव में विकसित देशों में ये समस्यााएं पिछले कुछ समय से इकठ्ठी हो रही थीं । लेकिन अब इनका प्रभाव उनकी राजनीति व्यिवस्थागएं वैधता के संकट से ग्रस्त हैं । संस्थाअगत रूप से इसका परिणाम शासन व्ययवस्थाएओं की अस्थिरता के रूप में सामनेआ रहा है । पर, इससे भी ज्याइदा यह परिणाम राजनीतिक संस्कृैति के क्षय के रूप में दिख रहा है । आम लोगों में अरूचि और उदासीनता की व्या पक भावना, यहां तक कि राजनीति के प्रति अविश्वांस भी पैदा हो गया है । इन देशों की राजनीतिक व्यंवस्था ओं के आंतरिक संसाधन अपने समाजों की समस्या एं हल करने के लिए अपर्याप्तभ साबित होने लगे हैं । (पृष्ठे 423)
लगभग पांच सौ पृष्ठों में धीरूभाई के मुख्यक चिंतन को समेटने वाले लेखक को पता है कि हिंदी भाषी समाज गंभीर चिंतन से कितना दूर होता जा रहा है । इसीलिए पुस्त क के अंत में उन प्रमुख अभिधारणात्मचक शब्द और उनके तात्पीर्य को समझाने का परिशिष्ट भी शामिल किया है जिसमें संक्षेप में सेकुलरवाद/धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद/प्लू‍रलिज्म , बहुसंस्कृरतिवाद/मल्टीुकल्चऔरिज्म्, अस्मिता/आइडेंटिटी, सांप्रदायिकता/कम्युसनलिज्मव, बहुसंख्यृकवाद/मेजोरिटेरियनिज्मट और अल्पमसंख्य्कवाद/माइनोरिटिज्मी, सहिष्णुंता/टॉलरेंस, आधुनिकतावाद/मॉडर्निज्मर, जातियता/एथ्नीकसिटी, समीकरण/सेमिटाइजेशन की संक्षिप्त/ सारगर्भित व्या ख्याष है ।
एक पुस्ततक यदि उस दौर के हर बड़े समाज वैज्ञानिकों, सामाजिक राजनैतिक घटनाओं, नीतियों को इतने सरल शब्दोंम में सामने लाये, इसे प्रकाशन जगत की बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिये । रजनी कोठारी से इस ग्रंथमाला की शुरूआत हुई है । मेरी समझ से प्रभाष जोशी, अनंत मूर्ति, राजमोहन गांधी, आशिष नंदी, कृष्णग कुमार, राजेन्द्री यादव एम एन श्रीनिवासन, कुलदीप नैयर जैसे कई लोकचिंतक इस ग्रंथमाला की परिधि में शामिल होने के हकदार हैं ।

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