शिक्षा, भाषा मनीषी : डॉ कोठारी

एक वैज्ञानिक, शिक्षाविद, भारतीय भाषाओं के संरक्षक व आध्यात्मिक चिंतक के रूप में डॉ. दौलत सिंह कोठारी अद्वितीय हैं । उनकी विविध स्मृतियों को संजोये उनकी नातिन दीपिका कोठारी की किताब नेशनल बुक ट्रस्ट से आई है । यह महज संयोग की बात है कि नेशनल बुक ट्रस्ट की यह पुस्तक 2010 में प्रकाशित हुई है और इसी वर्ष संघ लोक सेवा आयोग ने सिविल सेवा परीक्षा में डॉ. कोठारी की महत्वपूर्ण सिफारिशों के विपरीत निर्णय लिया है । इस परीक्षा में भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने की यह शुरूआत प्रथम चरण में कर दी गई है । भारतीय भाषाओं और शिक्षा व्यवस्था पर इसके दूरगामी दुष्परिणाम होंगे । डॉ. दीपिका कोठारी ने अपने दादा जी डॉ. दौलत सिंह कोठारी की ’सुनहरी स्मृतियों’ के बहाने उनके व्यक्तित्व के उन पक्षों से अवगत कराया है जो शायद उनके ऊपर आई बड़ी-बड़ी किताबों से बचा रह गया था । किसी बड़े व्यक्तित्व के जीवन के ऐसे अनछुए पहलू पाठक की समझ को एक विस्तार तो देते ही हैं, प्रेरणास्पद भी होते हैं कि एक सामान्य जिन्दगी जीते हुए भी कैसे मनुष्य इतने महत्वपूर्ण काम कर सकता है ।

डॉ. कोठारी के योगदान का सम्यक मूल्यांकन होना अभी बाकी है । शिक्षा आयोग (1964-66), सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए गठित कोठारी समिति, रक्षा विशेषज्ञ एवं विश्वविद्यालय आयोग और अकादमिक क्षेत्रों में प्रो. दौलत सिंह कोठारी के योगदान को उस रूप में नहीं पहचाना गया जिसके कि वे हकदार हैं । स्वतंत्र भारत के निर्माण जिसमें विज्ञान नीति, रक्षा नीति और विशेष रूप से शिक्षा नीति शामिल हैं, को रूप देने में प्रो. कोठारी का अप्रतिम योगदान है । 2006 में उनकी जन्मशती थी लेकिन शायद ही किसी ने सुना होगा । जयपुर से निकलने वाली पत्रिका अनौपचारिक (संपादक : रमेश थानवी) ने एक पूरा अंक जरूर उन पर निकाला था । वरना छिट-पुट एक दो लेखों के अलावा बहुत कम उनके बारे में पढ़ने-सुनने को मिला ।
पहले संक्षेप में डॉ.कोठारी का परिचय : – जन्म 1906 उदयपुर, राजस्थान में और मृत्यु 1993 में । बेहद गरीब परिवार । मेवाड़ के महाराणा की छात्रवृत्ति से आगे पढ़े । 1940 में 34 वर्ष की आयु में दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त । इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जाने-माने भौतिकशास्त्री मेघनाथ साहा के विद्यार्थी रहे । कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से लार्ड रदरफोर्ड के साथ पीएच.डी. पूरी की । लार्ड रदरफोर्ड ने दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर सर मॉरिस ग्वायर को लिखा था कि ‘मैं बिना हिचकिचाहट कोठारी को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त करना चाहता हूँ परंतु यह नौजवान पढ़ाई पूरी करके तुरंत देश लौटना चाहता है ।’

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विज्ञान नीति में जो लोग शामिल थे उनमें डॉ. कोठारी, होमी भाभा, डॉ. मेघनाथ साहा और सी.वी. रमन थे । डॉ. कोठारी रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार रहे । 1961 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए जहां वे दस वर्ष तक रहे । डा. कोठारी ने यू.जी.सी. के अपने कार्यकाल में शिक्षकों की क्षमता, प्रतिष्ठा से लेकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय और उच्च कोटि के अध्ययन केन्द्रों को बनाने में विशेष भूमिका निभाई ।

स्कूली शिक्षा में भी उनकी लगातार रुचि रही । इसीलिए उन्हें राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (1964-1966) का अध्यक्ष बनाया गया । आजाद भारत में शिक्षा पर संभवतः सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज, जिसकी दो बातें बेहद चर्चित रही हैं । पहली – समान विद्यालय व्यवस्था (common school system) और दूसरी देश की शिक्षा स्नातकोत्तर स्तर तक अपनी भाषाओं में दी जानी चाहिए ।

प्रशासन, शिक्षा, विज्ञान के इतने अनुभवी व्यक्ति को भारत सरकार ने उच्च प्रशासनिक सेवाओं के लिये आयोजित सिविल सेवा परीक्षा की रिव्यू के लिए कमेटी का 1974 में अध्यक्ष बनाया । इस कमेटी ने 1976 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी जिसके आधार पर 1979 से भारत सरकार के उच्च पदों आई.ए.एस., आई.पी.एस. और बीस दूसरे विभागों के लिए एक कॉमन परीक्षा का आयोजन प्रारंभ हुआ । सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी कदम जो इस कमेटी ने सुझाया वह था : – अपनी भाषाओं में (संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी भारतीय भाषाओं ) और अंग्रेजी में उत्तर देने की छूट और दूसरा उम्र सीमा के साथ-साथ देश भर में परीक्षा केन्द्र भी बढ़ाये जिससे दूर देहात-कस्बों के ज्यादा-से-ज्यादा बच्चे इन परीक्षाओं में बैठ सकें और देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं देश के प्रशासन में समान रूप से हाथ बटाएं ।
भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, तकनीकी शब्दावली और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के 1981 से 1991 तक कुलाधिपति (चांसलर) भी रहे ।

गांधी, लोहिया के बाद आजाद भारत में भारतीय भाषाओं की उन्नति के लिए जितना काम डॉ. कोठारी ने किया उतना किसी अन्य ने नहीं । यदि सिविल सेवाओं की परीक्षा में अपनी भाषाओं में लिखने की छूट न दी जाती तो गाँव, देहात के गरीब आदिवासी, अनुसूचित जाति, जनजाति के लोग उच्च सेवाओं में कभी भी नहीं आ सकते थे । अपनी भाषाओं में उत्तर लिखने की छूट से इन वंचितों में एक आत्मविश्वास तो जगा ही भारतीय भाषाओं के प्रति एक निष्ठा भी पैदा हुई । अफसोस की बात यह है कि उसी को इस वर्ष से संघ लोक सेवा आयोग उल्टी दिशा में ले जा रहा है । शिक्षा आयोग 1964-66 की सिफारिशों के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1971 में यूनेस्को द्वारा डॉ. एडगर फाउर की अध्यक्षता में जब शिक्षा के विकास पर अंतर्राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया, तब उन्होंने कोठारी आयोग की रिपोर्ट को ही आधार बनाया था । इस आयोग ने अगले दो दशकों तक दुनिया के विभिन्न देशों में शिक्षा के विकास पर कार्य किया ।

यह पुस्तक उनके जीवन के हर पक्ष से अवगत कराती है । उनकी दिनचर्या, खाना-पीना, स्वास्थ्य, अध्यात्म । (पृष्ठ 93) प्रातःकाल दादाजी सिर, चेहरे व गर्दन की मालिश भी किया करते थे । दिनभर में कई बार वे चेहरा धोते व आंखों पर पानी छींटते थे । वे प्रातः 9.00 बजे तक मौन रखते थे । इस दौरान वे जल्दी उठकर माला फेरते, ध्यान करते व स्वाध्याय किया करते थे । जब कभी सुबह 6.00 बजे की हवाई यात्रा होती, तो दादाजी व दादीजी प्रातः 3.30 बजे उठ जाते । सब नियमपूर्वक पूरा करके ही घर से प्रस्थान करते थे ।
दादाजी की दिनचर्या सहज और सधी हुई थी । मैंने उनको शारीरिक रूप से कभी अस्वस्थ होते हुए नहीं देखा । वे जीवन भर कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए । केवल थोड़ा ब्लडप्रेशर रहता था, वह भी कुछ जैनेटिक कारणों से, जिसे वे खान-पान में फेरबदल करके पूरी तरह नियंत्रण में कर लेते थे । (पृष्ठ 93)

कैम्ब्रिज प्रवास के दिनों में कई व्यक्तियों ने अंग्रेजों की संगत, में अपना खान-पान, वेशभूषा बदल ली थी । मित्रों के तर्क थे कि मीट खाने में क्या बुराई है पेड़-पौधों में भी जीवन होता है तो शाकाहारी कैसे हुए ? रोज-रोज के तर्कों के तीर से छुटकारा पाने के लिए एक दिन डॉ. कोठारी बोल पड़े ‘…..तो फिर तुम कुत्ता खाओ, गधा खाओ, आदमी खाओ ….. सभी तो मांस हैं ।’ अचानक भावावेश में बोलते हुए अपने साथी को देख कर सभी चुप हो गए । फिर डॉ. कोठारी बोले, ’दरअसल हम सब एक सीमा बांधते हैं । तुमने भी सीमा बांध रखी है कि ये सब नहीं खाओगे । यही बात मेरी अपनी भी है । फर्क सिर्फ इतना है कि किसने अपनी लाइन कहां खींच रखी है ।’ (पृष्ठ 69)

इन स्मृतियों के बीच से उनका ऐसा व्यक्तित्व उभरता है जो सदा सादगी की प्रतिमूर्ति रहा और इसीलिए अपने आस-पास काम करने वाले माली या दूसरे काम करने वालों के साथ भी बहुत सहज था । ‘भारतीय राष्ट्रीय अकादमी में एक कर्मचारी का नाम भी दौलत सिंह था । दादा जी ने उसकी तरफ देखा और कहने लगे हम दोनों दौलत सिंह हैं । यह महज एक इत्तेफाक है कि मैं यहाँ हूँ और आप वहाँ । स्थिति इसके विपरीत भी हो सकती थी ।’ दादाजी में यह अहम भाव नहीं था कि जीवन में जो कुछ उन्हें मिला वह उनकी कड़ी मेहनत व विलक्षण प्रतिभा का परिणाम था । वे इसे अद्भुत संयोग मानकर अपनी स्थिति के प्रति कृतज्ञता का भाव रखते थे । माली, बैरों आदि के साथ दीपिका जी ने ऐसे कई प्रसंगों का उल्लेख किया है जिन्हें पढ़कर उनके इन गरीबों के प्रति प्यार और सम्मान को देखा जा सकता है । ऐसे व्यक्तित्व दुर्लभ ही होते हैं । एक तरफ दुनिया के नोबल पुरस्कारों से नवाजे गये वैज्ञानिकों, प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू या देश के रक्षा मंत्री के साथ रोज का उठना-बैठना हो और वे फिर भी इतने सहज सरल बने रहें । बताते हैं कि उन्होंने कभी किसी के लिए कोई सिफारिशी चिट्ठी नहीं लिखी । बहुत से लोग उन्हें जवाहर लाल नेहरू के नजदीक मानकर सिफारिश के लिये आते थे लेकिन उनका कहना था कि ’संस्थाओं को अपना काम ईमानदारी से करने दीजिये । ऐसे दखल देने से काम खराब ही होंगे ।’ मौजूदा भारत का हर नागरिक इससे सबक सीख सकता है ।

उनकी सादगी के दर्जनों चित्र इस पुस्तक में हैं । विश्वविद्यालय में रहते हुए जब भी वेतन बढ़ाने की माँग आती वे अपने सहकर्मियों को यही कहते, ‘ऐसे अवसर तुम्हें कहाँ मिलेंगे जहाँ तुम्हें अपनी पसंद का कार्य करने के लिए पैसा भी मिलता हो और रुचि का काम भी करने दिया जा रहा हो । उसकी कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी ।’ एक गरीब देश के नौजवानों को इससे ज्यादा प्रेरणा कौन शिक्षक दे सकता है । शिक्षा को वे अपने जीवन में शायद सबसे उँचा दर्जा देते थे । उन्हीं के शब्दों में ‘शिक्षण एक उत्कृष्ट कार्य है और किसी विश्वविद्यालय का शिक्षक होना सर्वोच्चतम अकादमिक सम्मान है ।’ इसीलिये जीवन पर्यन्त शिक्षा और शिक्षण से जुड़े रहे कभी गुरू बनकर तो कभी विद्यार्थी बनकर । (पृष्ठ 33)

दीपिका लिखती हैं कि ’जब उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और दिल्ली को छोड़ा (पृष्ठ 107) दादाजी-दादीजी ने अपना जीवन दो सूटकेसों व दो बैगों में समेट लिया । इसके बाद मैंने उन्हें हमेशा इतने से ही सामान के साथ देखा । पुस्तकों, कपड़ों व अन्य चीजों के अलावा, एक थाली, कटोरी, चम्मच, गिलास, चीनी, नेलकटर, मेगनिफाइंग लेंस, लौंग व इलायची की डिब्बी, कैंची, चाकू, मोमबत्ती, माचिस, रस्सी, सुई-धागा, टॉर्च आदि जरूरत की सभी चीजें दो बैगों में समा जाते थे । तब हवाई यात्रा में इन वस्तुओं पर कोई रोक नहीं थी और वे इन संसाधनों के साथ आया-जाया करते थे । (पृष्ठ 107)

साईबाबा के साथ मुलाकात का जिक्र भी पुस्तक में है कि कैसे उन्होंने भभूति, अंगूठी हवा में हाथ घुमाकर पैदा कर दी । प्रोफेसर कोठारी ने अपनी गंभीरता के अनुकूल और विज्ञान का चमत्कार के प्रति आदर दिखाते हुए ज्यादा जिरह नहीं की । (पृष्ठ 139) यहाँ लेखिका दीपिका कोठारी के इस निष्कर्ष से असहमति की पूरी गुंजाइश है । नेहरू की विज्ञान नीति के साथ रहा व्यक्तित्व कभी भी ऐसे बाबाओं के चमत्कार के साथ नहीं हो सकता । उनका पूरा काम इस बात का प्रमाण है ।

सुनहरी स्मृतियाँ ’ पुस्तक का महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि पुस्तक के अंत में डॉ. कोठारी पर लिखी दर्जन भर महत्वपूर्ण पुस्तकों की सूची भी यहाँ उपलब्ध है जिसमें ‘शिक्षा विज्ञान और मानवीय मूल्य’, ‘कीर्ति पुरुष’ (उपन्यास), ‘विज्ञान और मानवता’ आदि शामिल हैं । प्रो. कोठारी के व्यक्तित्व और कृतित्व में इतनी ताकत है कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था, विज्ञान नीति और भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के बीच चल रही कई जटिल समस्याओं का समाधान सरकार इसमें ढूंढ़ सकती है ।

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