वाचनालय में क्‍या बांचें

मैं कई मायनों में दिल्‍ली का ऋणी हूँ । लेकिन सबसे ज्‍यादा हूँ यहां के सांस्‍कृतिक संस्‍थानों-विश्‍वविद्यालय, पुस्‍तकालय, अकादमियों का ।1977 में दिल्‍ली आते ही आई.टी.ओ. स्थित एक सरकारी संस्‍थान में नौकरी शुरू हुई । देखा तो बगल में मौलाना आजाद लाइब्रेरी थी । पत्र-पत्रिकाओं के अलावा इतिहास और समाजशास्‍त्र की एक से एक नई पुस्‍तकें । कहां तो नई पत्रिकाएँ तक भी मेरे खुर्जा के कॉलेज में उपलब्‍ध नहीं होती थीं और यहां नई से नई महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकें तुरंत मिल जाती थीं । इधर बाजार में पुस्‍तकों की घोषणा और उधर उस लाइब्रेरी में हाजिर । उसी के पड़ोस में ‘विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन’ और ‘प्रौढ़ शिक्षा निदेशालय’ के पुस्‍तकालय थे । सड़क के उस पार आई.आई.पी.ए. । शाम को थोड़ा पैदल जाकर मंडी हाउस तो वाकई खजाना था । साहित्‍य अकादमी, सप्रू हाउस । कभी कहीं भी जाइए। अंग्रेज़ी-हिन्‍दी में जो भी सर्वश्रेष्‍ठ था, वहां उपलब्‍ध था और बिना रोक-टोक के ।

पिछले दिनों साहित्‍य अकादमी के वाचनालय में बड़े उत्‍साह के साथ गया । लेकिन कोई पत्रिका नहीं । जो पुरानी-धुरानी थीं भी, वे वही थीं तो शायद फोकट में वहां पहुँच जाती हैं । आत्‍म-प्रचार या दानवश, जो भी वहां रख जाए । कारण जानना चाहा तो कोई संतोषजनक उत्‍तर नहीं था । किसी ने कहा, रखने की जगह नहीं है । दूसरे बोले, अकादमी के पास बजट नहीं है । एक ने कहा, पत्रिकाओं की वजह से फालतू की भीड़ रहती थी । यानी कि अकादमी जिस उद्देश्‍य के लिए बनाई गई है—-लोगों में पुस्‍तक-संस्‍कृति के प्रचार-प्रसार के लिए, उसके लोग उस भीड़ को देखकर डरते हैं । और भी खर्चे चल ही रहे हैं तो क्‍या पत्रिकाओं की कटौती से ही अकादमी मुनाफे में आ जाएगी ? अखबारों को बंद करना समझ में आ सकता है, लेकिन पत्रिकाओं को हरगिज नहीं । हममें से किसकी आर्थिक क्षमता इतनी है कि वह एक साथ ‘आलोचना’, ‘बहुवचन’, ‘हिन्‍दी ’, ‘पूर्वग्रह’, ‘साक्षात्‍कार’, ‘रंग-प्रसंग’, ‘समकालीन भारतीय साहित्‍य’, ‘इंडियन लिटरेचर’, ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’, ‘टी.एल.एस’, ‘बुक रिव्‍यू’, ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘समयांतर’, ‘वागर्थ’, ‘कथन’, ‘पहल’ सभी को नियमित रूप से खरीद सके ? कुछ पत्रिकाएं सभी मँगाते भी हैं, अपने-अपने चुनाव के अनुसार । लेकिन यह पुस्‍तकालय का विकल्‍प नहीं है, विशेषकर अकादमी-पुस्‍तकालय का । इनमें कई पत्रिकाएं इतनी महँगी भी हैं कि विद्यार्थी-शोधार्थी इनको खरीदने की हिम्‍मत नहीं कर सकते, विशेषकर तब जबकि हिन्‍दी का शोधार्थी समाज के सबसे कमजोर वर्ग से आता हो । यदि व्‍यक्तिगत प्रतिष्‍ठा के तहत आप खरीद भी लें तो क्‍या घर में उन्‍हें रखने की जगह है ? वैसे भी प्रश्‍न व्‍यक्तिगत रुचियों के बोझ का उतना नहीं है जितना ऐसी संस्‍थाओं को मजबूत करने का है जहां ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग आकर पुस्‍तक-संस्‍कृति से जुड़ सकें । विशेषकर उस दौर में जब पाठक प्रिंट-मीडिया से लगातार दूर भाग रहा हो । कभी इसी अकादमी में किसी भी महत्‍वपूर्ण पत्रिका के पुराने अंकों को टटोला जा सकता था । पुस्‍तकालय संदर्भ-स्रोत की तरह था । साहित्‍य का ‘खुल जा सिम सिम’ सरीखा । पत्रिका पढ़ ली तो उसी से सटी पुस्‍तकों के रैक में नई किताबें भी देख लीं । केवल शोधार्थी ही नहीं, मेरे जैसा पाठक भी रेल भवन से नियमित शाम को पहुँचकर बाबूगिरी की गर्द से अकादमी के वाचनालय में ही मुक्ति पाता था । अब मंजर बंजर बनने की तरफ बढ़ रहा है । यदि साहित्‍य की अकादमी है तो साहित्‍य में जो कुछ हो रहा है, उस सबकी गवाह बने तो क्‍या नुकसान है ? यहां तक कि साहित्‍य-संस्‍कृति के अलावा तकनीकी साहित्‍य भी वहां मिले तो सोने में सुगंध । राष्‍ट्रीय स्‍तर की अकादमी के लिए यह फख्र की बात होगी ।

वाकई यह समय यदि संकट का है तो सबसे ज्‍यादा पठन-पाठन के लिए ही है । दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के कला संकाय पुस्‍तकालय का पत्रिका कक्ष भी अस्‍सी के दशक में दुनियाभर की पत्रिकाओं से भरा रहता था । गाज सबसे पहले इसी पर गिरी । कम लोग ही जानते होंगे कि विश्‍वविद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतनमान वही हो गए हैं जो नौकरशाही की किसी भी प्रशासनिक सेवा के हैं । इसमें कोई बुराई नहीं है । लेकिन विश्‍वविद्यालय के इन बुद्धिजीवियों को इस ओर भी देखने की जरूरत होनी चाहिए कि पुस्‍तकालयों की क्‍या दशा-दिशा बनी हुई है । अच्‍छे पुस्‍तकालय तो उनके शिक्षण में मदद ही करेंगे । इस शीर्ष विश्‍वविद्यालय के पत्रिका-कक्ष/जगह तो अभी उतनी ही बड़ी है, लेकिन पत्रिकाएं वहां पुरानी ही रखी हुई हैं । नए के लिए बजट यहां भी घट चुका है । कुछ लोग पठनीयता के तर्क में अच्‍छी पत्रिका की बजाय सरिता, मुक्‍ता मँगाने का तर्क देते हैं । मेरा इन पत्रिकाओं से विरोध नहीं है, लेकिन ये तो बाजार में बिखरी पड़ी हैं । पुस्‍तकालय में इनकी तलाश के लिए कोई नहीं आता । पुस्‍तकालय विशिष्‍ट और विरासत में रखने लायक चीजों के लिए जाने जाते हैं । बहुत सारी अकादमियों की स्‍थापना पचास-साठ के दशक में हमारे तत्‍कालीन दूरदर्शी नेताओं ने इसी विरासत के सांस्‍कृतिक पक्ष को मजबूत करने के लिए की थी ।

जिस दिल्‍ली को इन्‍हीं संस्‍थानों के बूते मैं कहता था कि यदि आपने पुस्‍तकालयों-विश्‍वविद्यालयों समेत इन सांस्‍कृतिक संस्‍थानों का फायदा नहीं उठाया तो क्‍या धूल-धुआं पीने के लिए दिल्‍ली में डटे हुए हो ? क्‍या मैं अब भी यह कह सकता हूँ ?

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