वर्गीज कूरियन- अमूल : रास्ता है ! – I too have a dream – Amul Story

कम नहीं होते साठ साल! विशेषकर भारत जैसे देश के लिए, जहां किसी भी संसाधन की कमी नहीं. जल, जमीन, मानवशक्ति, प्रतिभा, सदियों की विरासत, ज्ञान-विज्ञान, धर्म, परंपरा सभी कुछ. बल्कि कुछ ज्यादा ही हैं, लेकिन फिर भी हम कहीं न पहुंचने वाले राष्ट्रों की कतार में खड़े हैं या कहें कि विकास की हर कसौटी पर पीछे की तरफ जा रहे हैं. उदारीकरण और ग्लोबलाइजेशन के बूते हमें भ्रम तो विकास का दिया जा रहा है लेकिन हकीकत में हमारी गरीबी, असमानता, कूपमंडूकता, अंधविश्वास का विकास ज्यादा हुआ है.

लेकिन इतने अंधेरे के बीच कुछ काम ऐसे भी हुए हैं जिसके बूते हम फख्र से गर्दन उठा सकते हैं. वर्गीज कूरियन द्वारा सहकारिता आंदोलन के तहत किसानों को संगठित करके पहले दूध उत्पादन और फिर तेल, फल, सब्जी जैसे क्षेत्रों में भी उसी सफलता का दोहराना, स्वतंत्र भारत की कुछ उपलब्धियों में से एक है. देश की लगातार बढ़ती आबादी के बावजूद भी अमूल की सफलता से न केवल भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध-उत्पादक देश बन गया है, प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता भी दोगुनी हुई है. इस प्रयोग और सफलता का सेहरा न किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की बदौलत मिला है, न विश्वबैंक के अनुदान से. यह संभव हुआ वर्गीज कूरियन और गुजरात के किसानों की देशी समझ और सहयोग से.

हाल ही में वर्गीज कुरियन ने इस पूरी कहानी को ‘सपना जो पूरा हुआ’ में बयान किया है. बेहद सहज और ईमानदारी से. इसकी प्रासंगिकता ऐसे वक्त में सबसे ज्यादा है क्योंकि यह पुस्तक उन सारे विकल्पों से रूबरू कराती है जिनको अपनाकर भारत बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल और मौजूदा संकटों से बच सकता है या उन्हें परास्त कर सकता है.

एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते राजनीति से नहीं बचा जा सकता, लेकिन राजनीति कैसे समाज परिवर्तन का हथियार बन सकती है, इसे अमूल के उदाहरण से समझा जा सकता है. आजादी से ठीक पहले के वर्ष गुजरात में खैरा जिले के किसानों, विशेषकर दूध उत्पादन करने वाले किसानों का शोषण हो रहा था. उनसे दूध सस्ते दामों में खरीदा जाता और पोलसन, नेसले जैसी संस्थाएं उसे मुंबई में महंगे दामों पर बेच देती. यानी मुनाफा सारा बिचौलियों के नाम. गुजरात के किसानों में सुगबुगाहट हुई. उन्होंने अपनी सहकारी समितियां बनाईं और इस शोषण के खिलाफ उठ खड़े हुए. वल्लभ भाई पटेल का यह क्षेत्र था लेकिन मोर्चा संभाला आजादी के दौर के उतने ही बड़े राजनीतिज्ञ त्रिभुवन दास पटेल ने. ठीक इसी समय वर्गीज कूरियन जो इस्पात इंजीनियरी के रूप में शिक्षित थे और जिन्हें डेयरी इंजीनियरिंग में कुछ विदेशी प्रशिक्षण भारत सरकार ने दिया था, उनकी अनिच्छा के बावजूद भी गुजरात में पोस्टिंग दी गई. पोस्टिंग के पीछे दबाव यह था कि क्योंकि भारत सरकार ने आपके ऊपर डेयरी इंजीनियरिंग में खर्च किया है, अत: आपको जाना ही पड़ेगा. वर्गीज जल्दी से जल्दी गुजरात से निकल भागना चाहते थे लेकिन धीरे-धीरे जनता या वहां के किसानों या कहिए त्रिभुवन दास पटेल जैसे राजनीतिज्ञ के प्रोत्साहन से वर्गीज सदा के लिए गुजरात या अमूल के होकर रह गए. त्रिभुवन दास पटेल 20-25 वर्षों तक लगातार हर राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकते रहे और अमूल नाम से स्थापित सहकारिता संघ मजबूत होता चला गया. यह कहानी उत्तर भारत या देश के दूसरे हिस्सों से अलग इसलिए रेखांकित की जा रही है कि सहकारिता आंदोलन देश के सारे हिस्सों में राजनीतिज्ञों, उनकी पार्टी के पदाधिकारियों की घुसपैठ के घमासान में पूरे देश में लगभग असफल हो चुका है, लेकिन गुजरात में इसी ने एक नया रास्ता दिखाया.

शायद ही कोई प्रधानमंत्री होगा जिसने अमूल के इस प्रयोग को खुद जाकर न देखा हो और वर्गीज कूरियन और सहकारिता आंदोलन की तारीफ न की हो. नेहरू जी ने प्लांट का उद्धाटन किया, फिर शास्त्री जी गए, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई से लेकर अब तक तमाम प्रधानमंत्री, कृषि मंत्री. ऐसा नहीं कि राजनीतिज्ञों ने अपने नाक घुसेड़ने की कोशिश न की हो लेकिन वर्गीज की निष्ठा, लगन और गुजरात के किसानों की एकजुटता ने किसी भी राजनीतिज्ञ के मंसूबे पूरे होने नहीं दिए. एकाध घटना का जिक्र करना जरूरी है. 1970 के आसपास के एक केंद्रीय कृषि मंत्री चाहते थे कि ऐसी ही एक डेयरी उनके चुनाव क्षेत्र में खोली जाए, लेकिन वे चाहते थे कि वह सहकारी समिति न होकर उनकी निजी डेयरी की तरह हो और कूरियन उसमें मदद करें. कूरियन का जवाब था कि मैं गुजरात के किसानों की सहकारी समिति का सेवक हूं. मैं यदि मदद करूंगा तो केवल सरकार या सहकारिता डेयरी की. निजी डेयरी के लिए किसी और की मदद लीजिए. याद रखिए, अमूल और कूरियन का सारा साम्राज्य इन्हीं कृषि मंत्री के अधीन था. मंत्री नाराज हुए, बदला लेने की कोशिश में भी जुटे लेकिन विफल रहे क्योंकि तत्कालीन प्रधान मंत्री भी कूरियन की निष्ठा को जानते थे और मंत्री जी को चुप बैठना पड़ा. क्या कोई नौकरशाह मौजूदा दौर में ऐसी हिम्मत दिखा पा रहा है? बल्कि उल्टे सरकारी स्कूल, सरकारी अस्पताल, सरकारी प्रतिष्ठानों को बेच-बाचकर निजी उद्योगों की तरफ बढ़ रहे हैं. चापलूसी और पोस्टिंग की जोड-तोड़ में लगी मौजूदा नौकरशाही कूरियन के अनुभव से अपनी पहचान वापस ला सकती है. जब हर नौकरशाह दिल्ली की जुगाड़ में रहता है, कूरियन ने खुद शर्त रखी कि मैं दिल्ली किसी भी कीमत पर नहीं आऊंगा. मैं किसानों के संगठन का नौकर हूं अत: उनके नजदीक आनंद में ही रहूंगा.
कूरियन की निडरता का एक और उदाहरण 1990 से कुछ वर्ष पहले एक और मंत्री ने खाद्य तेलों का पहले जखीरा किया और फिर वे चाहते थे कि उस भंडार को आधे दामों पर एक निजी ठेकेदार को बेच दिया जाए. तर्क यह कि कुछ दिनों बाद इस तेल की खाने की मियाद खत्म हो जाएगी तो कम से कम अभी आधे पैसे तो मिल जाएंगे. कूरियन को पता चला कि मामला प्राइवेट साठगांठ से करोड़ों के घोटाले का है, अत: उस सारे भंडार को खुद खरीद लिया. खाद्य तेलों के क्षेत्र में कूरियन ने अमूल के अनुभवों का फायदा उठाते हुए ‘धारा’ आदि की शुरूआत करके एक नया कीर्तिमान स्थापित किया. जिस समय देश में हर चीज का आयात हो रहा हो, वहां सहकारिता आंदोलन से दूध, खाद्य तेल क्षेत्रों की सफलता एक रास्ता दिखाती है कि यह देश के दूसरे हिस्सों में भी हो सकता है, बशर्ते कि कोई जनता की ताकत के साथ आगे बढ़े.

जाति व्यवस्था और छूआछूत से जूझते समाज में अमूल की सफलता एक आर्थिक सफलता ही नहीं, एक सामाजिक क्रांति का भी संकेत देती है. सहकारिता आंदोलन में सभी किसान शामिल थे. ब्राह्मण, बनिया, दलित, मुसलमान सभी. समितियां गांव-गांव में स्थापित की गई थीं और मोटा-मोटी नियम कि जो पहले आए उसका दूध पहले लिया जाएगा. सुबह-सुबह लंबी लाइनों में यदि दलित पहले आया है तो वह ब्राह्मण के आगे खड़ा होता था. यह बात समाज के उन वर्गों ने भी स्वीकार कर ली जो इससे पहले इस बराबरी को नहीं मानते थे. कभी-कभी वे अपने उपयोग के लिए भी दूध इन्हीं डेरियों से लेते थे. दूध लेते वक्त वह अहसास गायब होता है कि यह दूध किसी ब्राह्मण का है या किसी निम्न जाति का. ‘ यहाँ कुछ स्तरों पर भी बदलाव आए। शुरूआत से ही ग्राम सहकारी समितियों ने इस बात पर बल दिया कि दूध एकत्रण के लिए ‘ पहले आओ, पहले पाओ ‘ के नियम का सख्ती से पालन किया जाएगा। उस स्थिती की कल्पना करें, जब हर जाति, वर्ण तथा धर्म के 5,40,000 किसान 960 गाँवों के दुग्ध एकत्रण केंद्रों में खड़ा होता था, क्योंकि वह उसके बाद आया था । और वह ब्राहाण हरिजन के पीछे खड़ा होता था, क्योंकि हरिजन पहले आया हुआ था। क्या यह सिर्फ क्रमानुसार दूध एकत्रण करना था? क्या यह जाति व्यवस्था पर एक प्रहार नहीें था? इसे क्या कहेंगें, जब दोंनो ही अपने दूध को एक कैन में जाते हुए देखते थे? एक अन्य स्थिति की ओर ध्यान दें तों ऐसे गांव भी थे, जिनकी भैंसों ने दूध देना बंद कर दिया था और वे ऐसे केद्रों से दूध खरीदते थे, जहाँ पर दूध को हरिजन और ब्राहम्ण किसानों से ही एकत्र किया जाता था। क्या इन सब अनुभवों ने जातीय भेदभावों को खत्म नहीं कर दिया था? परंतु हम यह विश्वास करने की बेवकूफी नहीं कर सकते कि जाति व्यवस्था टूट चुकी है। दुर्भाग्यवश यह व्यवस्था भारतीय समाज में बहुत मजबूती तथा गहराई से अपनी पैठ बना चुकी है, किंतु इन सब जातीय बंधनोेंं के बाबजूद आणंद में कैरा सहकारी समिती की दूध एकत्रण तथा अदायगी पद्वतियों को सभी वर्गो के द्रारा स्वीकार किया गया।(पृष्ठ-89 )
प्रश्न उठता है कि कैरा सहकारी समिति वास्तव में क्या थी? निश्चय ही यह सिर्फ दूध से जुड़ी हुई नहीं थी। बहुत शीघ्र ही यह हमारी ग्रामीण व्यवस्था में सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तन का एक उपकरण बन रही थी। यह एक ऐसे कार्यक्रम का निर्माण कर रही थी, जिसमेंें किसान स्वयं अपने विकास के लिए शामिल हो रहे थे।इस बात को मैने त्रिभुवनदास के साथ काम करके जाना। कैरा क्षेत्र का सही विकास वहाँ की गाय एवं भैंसों का विकास नहीं , बल्कि वहाँ की स्त्रियों और पुरूषों का विकास था।आप स्त्रियों और पुरूषों का तब तक विकास नहीं कर सकते जब तक कि आप विकास के उपकरण को उनके हाथ में नही दे देते है। उन्हें विकास की इस प्रकिया में शामिल करना जरूरी है और ऐसे ढ़ाँचे का निर्माण करना जरूरी है, जिसका नेतृत्व वे स्वयं कर सकें। सर्वश्रेष्ठ सरकार कौन सी होती है? यह वह सरकार होती है, जो कम- से- कम शासन करती है और अपने लोगों की योग्यताओं को इस्तेमाल करने के ज्यादा- से ज्यादा अवसर ढूँढ़ती है। (पृष्ठ-91 )
मनुष्यों को बराबर समझने के लिए ऐसे आर्थिक संबंध कितनी प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं वह चकित करता है. सहकारिता के इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी भी विलक्षण रही. जब उन्हें यह अहसास हुआ कि दूध की बिक्री से उनका घर चल सकता है और उसका मुनाफा भी उनके परिवार की बेहतरी के काम आएगा तो और स्त्रियों में भी एक अलग किस्म का स्वावलंबन पैदा हुआ. वे खुद बढ़-चढ़कर आगे आईं. उनको उन आधुनिक डेयरी फार्मों में ले जाया जाता जहां मवेशी रहते थे. उनकी देखभाल करने का प्रशिक्षण दिया जाता तो इससे उनकी समझ में भी स्वास्थ्य, प्रजनन संबंधी जानकारी पैदा हुई. वे स्वयं इस बात को समझने लगी कि भैंस, गायों को क्यों गर्भावस्था में पोष्टिक भोजन देना चाहिए. यहां तक कि कृत्रिम गर्भाधान केन्द्रों पर उन्हें ले जाने से जनसंख्या नियंत्रण की समझ भी उनमें पैदा हुई. शिक्षा का अर्थ सिर्फ डिग्रियां नहीं, ऐसे सामाजिक अनुभव भी आपको समझदार नागरिक बनाते हैं.

अमूल का यह मॉडल विकेन्द्रीकरण का सबसे अच्छा उदाहरण है. गांवों की अर्थव्यवस्था ठीक होगी तो गांव बेहतर होंगे. तब ये लोग न दिल्ली की तरफ भागेंगे, न मुंबई की तरफ जहां राजनीतिक पार्टियां अपना वोट बैंक ढूंढें. स्कूल भी उनके वहीं खोले गए, यहां तक कि पशुओं की देखभाल के लिए पशु चिकित्सक गांव-गांव आ गए. पशु चिकित्सक जब आ गए तो किसानों को लगा कि मनुष्यों के लिए भी तो डॉक्टर चाहिए. इससे सरकारी अस्पताल बढ़े, यानी कि एक के बाद एक सुविधा, समृध्दि के द्वार खुलते गए. उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में विकेन्द्रीकृत, पंचायती राज पर सेमीनार तो 60 वर्ष से हो रहे हैं, जमीनी स्तर पर एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलता जो अमूल की छाया के आसपास भी हो. कुरियन लिखते हैं- दिल्ली में फ्लाईओवरों का निर्माण गलत नही है, किंतु यह तब तक न्यायपूर्ण नहीं है जब तक हम देश भर में गांवों तक सड़कों का निर्माण नहीं करते है। रंग-बिरंगी रोशनियों के साथ फव्वारों के निर्माण में भी कोई बुराई नहीं है। निश्चय ही दिल्ली को सुंदर लगना चाहिए। लेकिन यह बड़ा ही अन्यायपूर्ण है, जब हम अपने सभी गांवों को पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं करवा पाते है। इस बात में भी कोई बुराई नहीं है, यदि बंबई मेंं अत्याधुनिक निजी अस्पताल है और दिल्ली में चिकित्सा संस्थान है। लेकिन यह सब तब न्यायसंगत नहीं रह जाता है जब हम एक किसान के नवजात शिशु की ऑंखों में दवाई की दो बूँदे ं भी नही डाल पाते और वह बच्चा अंधा हो जाता है । इन कार्यो को करने में हमारा कुछ भी नहीं लगेगा, जबकि हम करोड़ों रूपये शहरों में पाँच सितारा अस्पतालों के निर्माण में लगा देते हैं। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि नीतियों का निर्माण हमारे हाथों में है- एक विशिष्ट वर्ग के हाथों में है और जब हम नीतियाँ बनाते है, संभवत : इनके बारे में जागरूक नहीं होते है। हम अपने पक्ष में नीतियाँ बनाते है। हम इस भूमि के संसाधनों क ा प्रयोग काफी हद तक अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए ही करते है। इस बात का सबसे अनोखा पहलू यह है कि हम यह सब बिना सोचे-समझे करते है। (पृष्ठ-93)
राजीव गांधी का प्रसिद्व वक्तव्य कि जब शीर्ष स्तर से 100 पैसा जारी किया जाता है तो वह निचले स्तर पर 15 पैसे के रूप में पहुँच पाता है, कई तरह से इन सब पर प्रकाश डालता था। इसका समाधान प्रजातांत्रिक ढ़ाँचा कायम करने में ही विद्यमान हो सकता है, जिन्हें नौकरशाही के बजाय स्वयं जनता नियंत्रित करती है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी की जगह सचिवालय में है, न कि मैदान में। भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी मूलत ‘आया राम, गया राम ‘ होता है। वह नियमित अंतरालों पर स्थानांतरित कर दिया जाता है और जब उसे मालूम होता है कि वह अल्पावधि में स्थानांतरित कर दिया जाएगा तो उसके लिए प्रतिबद्वता दिखाना करीब-करीब असंभव हो जाता है। मै कभी नहीं समझ सका कि क्या कृषि सचिव ऐसा व्यक्ति भी हो सकता है, जो कृषि की बचत नहीं जानता हो। जिस व्यक्ति ने पैंतीस वर्ष पूर्व कोई प्रतियोगी परीक्षा पास की उसे इस पद पर आज अचानक बैठा दिया जाता है; जबकि कल तक वह शायद विधि सचिव था और परसों तक वह रक्षा सचिव रहा था। देश को प्रशासित करने की यह कितनी अजीब व्यवस्था है!
यदि हम वस्तुओं का वितरण करने में अपनी जनता की बजाय नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों पर निर्भर रहे, जैसा कि हम बहुत लंबे समय से निर्भर रहते आए है, तो राष्ट्र के रूप में सफल होने के लिए हमारे पास कुछ नहीं बचेगा। नौकरशाह तथा राजनीतिज्ञ ही अधिक-से-अधिक शक्तिशाली बनते जाएॅगे। यहाँ यह बात ध्यातव्य है कि आणंद के मुख्य शत्रु सरकार के दुग्ध आयुक्त और दुग्ध विभाग थे, जो किसी पोल्सन या निजी व्यापारियों से कहीं बड़े शत्रु थे।(पृष्ठ-184)
धर्म, जाति के विवादों में कुरियन को भी कभी-कभी लाया जाता रहा. सफलता के शीर्ष पर पहुंचे हुए कूरियन पाकिस्तान के बुलावे पर और विश्वबैंक के अनुरोध पर पाकिस्तान गए. पाकिस्तान भी चाहता था कि कुरियन अमूल जैसी संस्था के निर्माण में उन्हें भी सहयोग दे. कूरियन ने यथासंभव कोशिश भी की, लेकिन मज़ेदार प्रसंग दूसरा था. पाकिस्तान के एक अधिकारी ने पूछा कि आप एक ईसाई हो और वह भी गुजराती नहीं, हिंदुओं के गुजरात ने कैसे जगह दे दी? कूरियन का जवाब था, 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया था, गुजरात में पुलिस महानिदेशक मुस्लिम थे, गृह सचिव ईसाई और गुजरात के राज्यपाल एक मुसलमान. भारत धर्म संप्रदायों से परे एक लोकतांत्रिक देश है इसलिए ऐसा प्रश्न मेरे लिए अप्रासंगिक है.
जैसे-जैसे अमूल की सफलता बढ़ती गई, तत्कालीन बहुराष्ट्रीय कंपनियाें, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों के विरोध भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उभरने लगे. इन देशों से दूध सामग्री का आयात बंद हो गया था, अत: कभी क्वालिटी को लेकर प्रश्न उठाया जाता, तो कभी दूसरे तर्क. एक तर्क यह भी था कि जिस देश के पास खाने को अन्न नहीं है, क्या उसे दूध के क्षेत्र में आगे आना चाहिए? क्योंकि दूध के लिए पशु चाहिए और पशुओं के लिए चारा. जब ऑपरेशन फ्लड के लिए सन् 1960 के अंत मेंं हमारे प्रस्ताव की समीक्षा की गई तब इस बात को लेकर गंभीर चर्चा हुई थी कि क्या भारत जैसा देश पूरा उत्पादन कर सकता है या क्या उसे इसका उत्पादन करना चाहिये? जिन देशों में विकसित डेयरियाँ थीं, उन्होंने हमारी आलोचना यह कहकर की कि जिस देश में खाने को भोजन नही है और जो खाद्य पदार्थो का आयात करता है, जिसकी जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है, जिस कारण से वहाँ खाद्य पदाथों की मांग बढ़ेगी – क्या ऐसे देश में मूल्यवान् भूमि को खाद्य उत्पादन की बजाय जानवरों के चारे के रूप में बदलना चाहिए? इनसानों एवं जानवरों के बीच भूमि और उसके उत्पादों के लिए संघर्ष का निर्माण कर ऐसी परिस्थिति में क्या हमें दूध उत्पादक होना चाहिए? उनका दूसरा तर्क था कि पोषण की मात्रा के रूप में देखें तो दूध इतनी बड़ी आवश्यकता नहीं थी । इन सभी तर्को को देने के बाद विकसित देशों ने पूछा कि क्या भारत दूध के साथ अन्य पशु उत्पादों को वहन कर सकता है? इस तरह हम क्यों ऐसा कार्यक्रम चाहते है, जो दूध उत्पादन को प्रोत्साहन दे? मेंने सोचा कि इस आलोचना में कुछ दम तो है। लेकिन तभी मैंने यह भी सोचा कि विकसित देशों की विकसित डेयरियाँ अपने भले के लिए विकासशील डेयरियों का साथ क्यों देंगी और विकसित डेयरियाँ कभी भी इन विकासशील देशों को आत्म-निर्भर बनता हुआ नहीं देख सकतीं। विदेशी भारतीय उपभोक्ता बाजार पर कब्जा करने के इच्छुक थे, जो सारे यूरोप से भी बड़ा बाजार था, जिसे दुर्भाग्यवश आगे आनेवाली सरकार ने और आसान बना दिया। उनको पछाड़ने का हमारे पास एकमात्र हथियार है कि हम उनसे बेहतर और सस्ते उत्पाद बनाएँ। डेयरी क्षेत्र में हमारी सहकारिता ने इसको बरकरार रखा है, यहाँ तक कि नेस्ले जैसी बड़ी कंपनी के आगे भी हम नहीं झुके।यदि हमारी सहकारिता नहीं होती तो हम अब भी बेबी फूड़ (बच्चों का आहार ) संघनित दूध और अनेक दूसरे डेयरी उत्पादों का आयात कर रहे हाते, जैसा कि हमारे पड़ौसी देश कर रहे हैं। मुझे यह बताते हुए गर्व होता है कि हमारे किसान और हमारी सहकारिता ने इस देश में डेयरी उत्पादों में विदेशी पूँजी निवेश को नियंत्रित रखा है।

वर्षों तक बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने मिल्क पाउडर को भारतीय बाजारों में बेचने के लिए यह तर्क देती रहीं कि भैंस के दूध से मिल्क पाउडर नहीं बनाया जा सकता. कूरियन ने इस चुनौती को स्वीकार किया और चंद वर्षों के अंदर ही भैंस के दूध से मिल्क पाउडर बनाने में दुनिया के देशों में सबसे पहले सफलता हासिल की. मुझे अपने जीवन का एक मूल्यवान् किंतु दु:खद अध्याय यह भी पढ़ना था कि विशेषज्ञों की तकनीकी सलाह विकसित देशों के आर्थिक हितों के अनुकूल होती है। इनका विकासशील देशों की वास्तविकताओं और जरूरतों से कोई सरोकार नहीं होता । यहाँ भी बिना किसी हिचक के न्यूजीलैंड एवं इग्लैंड के विशेषज्ञों ने हमें बताया कि भैंस के दूध को दुग्ध पाउडर में नही बदला जा सकता। (पृष्ठ-56 )
अपने देश की जरूरतों के हिसाब से यह जरूरी था क्योंकि हमारे यहां भैंस दूध उत्पादन में ज्यादा बड़ी भूमिका निभाती हैं.
इस पूरे प्रयोग पर सैंकड़ों किताबें आई हैं. श्याम बैनेगल के निर्देशन में मंथन जैसी फिल्म भी. लेकिन देश के अधिकांश हिस्सों में अभी भी इस प्रयोग, इसकी आत्मा, इसकी दृष्टि को समझकर सहकारिता आंदोलन को पूरे देश में फैलाने की जरूरत है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ हम 20 साल से तो हवाई नारे, सेमीनार सुन ही रहे हैं, यदि एक भी काम हम ऐसा कर पाएं तो देश की तस्वीर बदल सकती है.

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