लोहे के पेड़

मैं हिन्दी पढ़ता हूँ, पढ़ाता नहीं हूँ । लेकिन कुछ संयोगवश अपने पास-पड़ोस के नवीं- दसवीं बच्चों के साथ बतियाने का मौका मैंने जबरदस्ती लिया । जबरदस्ती शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूं कि इस शहर में वास्तविक जरूरत के बावजूद प्रोटोकोल की दीवारें उस बेतकुल्लफी से आपस में नहीं मिलने देतीं जैसे मेरे बचपन के दिनों में नीम के पेड़ के नीचे कोई बच्चा किसी से भी कुछ भी पूछने के लिए स्वतंत्र था । यहां किसी के घर की घंटी बजाने से पहले भी दस बार सोचना होता है । पार्क के एक कोने में 3-4 बच्चे बतिया रहे थे कि यार!  हिन्दी समझ में नहीं आती । बड़ी कठिन है । हां यार!  मैं तो पागल ही हो जाता हूं रटते-रटते । खैर यह हिन्दी की कठिनता नहीं, संस्कारों का हिन्दी विरोध बोल रहा था । मैंने पुचकारते हुए कहा- बेटा जो तुम बात कर रहे हो वो हिन्दी में ही है न!  मैं पिछले पांच मिनट से देख रहा हूं आप हिन्दी में ही बात कर रहे हो । फिर कठिन कैसे हुई ? अंकल! वो किताबों में है न ।वो बड़ी कठिन है । त्रिलोचन, शमशेर… अच्छा देखें तो कहने पर एक दौड़कर पाठयपुस्तक भी ले आया । देखो अंकल ये कितनी अच्छी है- लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम के गाता चल । नम होगी यह मिट्टी जरूर, तू आंसू कण बरसाता चल । ऐसी कविता तो अच्छी लगती है । बच्चन की भी अच्छी है जो बीत गई सो बात गई । वे और सोचने लगे । महादेवी वर्मा की गौरा भी अच्छी है । कबीर के दोहे भी । अंकल कुछ कविताएं तो इतनी बोर हैं कि इसीलिए बहुत से लड़के हिन्दी पढ़ते ही नहीं हैं ।

राष्ट्रकवि दिनकर की इस कविता ने मेरे अतीत को मानों हरा कर दिया। मैं विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं । मेडिकल प्रवेश परीक्षा में असफल रहने के बावजूद विज्ञान के ही विषयों के बीच में हिन्दी पढ़ता-वढ़ता । लेकिन प्रेमचंद, दिनकर दो नाम ऐसे हैं जिन्हें बार-बार पढ़कर भी मन पूरा नहीं भरा । रश्मिरथी, जयद्रथ वध से लेकर सैकड़ों कविताएं दिन-रात एक ओज से भरे रखने में समर्थ थीं । मिथकों के इतने भव्य मूल्यों के साथ इतनी सरल-सहज भाषा में प्रस्तुति अद्वितीय है । इसकी तुलना बाद में राही मासूम रजा द्वारा लिखित ‘महाभारत’ सीरियल के संवादों से ही की जा सकती है । बाद में दिनकर जी ने ‘उर्वशी’ जैसा महाकाव्य भी लिखा और संस्कृति के चार अध्याय जैसे, सामान्य आदमी की सांस्कृतिक समझ के लिए पुस्तक भी । फिर उनके मरने के दो-चार सालों में ही अपने वक्त के राष्‍ट्रकवि या अपने समय के सूर्य (‘उर्वशी’ में पुरूरवा अपने समय का सूर्य है मैं) । दिनकर का भी अध्याय बंद कर दिया गया क्योंकि विश्वविद्यालयों में एक नई प्रगतिशीलता के सूर्य उग चुके थे प्रत्यक्षत: जिसके प्रकाश में केवल वहीं लेखक दिखाई देते थे जो वामपंथी राजनीति के साथ थे ।

सत्तर तक तो भी बच्चन, दिनकर, पंत, नवीन, धर्मवीर भारती चर्चा योग्य रहे, उसके बाद तो आलोचना के नाम पर धीरे-धीरे इन सबको बहिष्कृत करने की शुरुआत होती है । मूल्यांकन की नहीं, बहिष्कृत करने की । नब्बे के दशक में दलित राजनीति ने इसे एक धक्का और दो के अंदाज में एक कदम और आगे बढ़ाया जिसमें राजनीति में गाँधी  को जितना दुत्कारा गया, साहित्य में उनकी छायाओं को । प्रेमचंद का ‘कफन’ तक फाड़ डाला गया और यह नई-नई शोधों के नाम पर आज भी जारी है । यदि राजनीति में यह सब कुछ अस्वीकार का दौर था तो साहित्य में केवल वही स्वीकार माना गया जो जाति या धर्म पर आधारित था और दलगत राजनीति का बिछोना था, कम्बल था ।

जाति प्रगतिशीलों के लिए साहित्य की मोहर बनी तो धर्म, विरोधी कैम्प के आलोचकों के लिए । नब्बे के दशक में ही मंडल, कमंडल के घँसेदार विमर्श में काफी हाऊस, मंडी हाऊस से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय तक कोई मंच या फोरम ऐसा नहीं बचा जो न उजड़ा हो । साहित्य-सांस्कृतिक खेमेबाजी का अप्रतिम उदाहरण बन गया ।

दिनकर जैसे बड़े लेखकों को भी इसमें नहीं बख्शा गया। मात्र 30 वर्ष ही हुए हैं उनकी मृत्यु के । कौन से प्रगतिगामी लाइन या शब्द हैं उनके साहित्य के । यूरोप, रूस के एक से एक विस्मृत लेखक कवि पर रोज-रोज लिखने वालों को दिनकर से क्यों ऐसी अरुचि है ?  आज भी उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो सुनकर कविता का असर महसूसा जा सकता है । क्या हमारे आलोचकों ने जनता की भावना को भी सुनना बंद कर दिया है ? क्या दिनकर बच्चन जी से भी नीचे हैं ? शायद नहीं । लेकिन बच्चन जी फिल्मी नायक अमिताभ के पिता हैं ।

लेखकों को खुदा का दर्जा इसलिए दिया जाता है कि वे अपने हठों-पूर्वाग्रहों से आगे निकलकर जनता को रास्ता दिखाएं । यहां उल्टा हो रहा है। कौन समझाए कि नयी पीढ़ी खेलते-खेलते ही तुम्हारी भाषा को न पढ़ने की कसम खाती जा रही है और आप हैं कि प्रगतिशीलता को दार्शनिकता के दांत में दबाये चुप मंद-मंद मुस्करा रहे हैं ।

दृष्टि और विचार का यह कठमुल्लापन पिछले तीन दशक की आलोचना का कुछ-कुछ पर्याय रहा है । इतना कि इसकी अच्छी बातों पर भी शक होने लगा है । कभी शिवप्रसाद सिंह को धकेला गया तो कभी किसी और को । कब किन कारणों से कोई गीतांजलिश्री या विनोद शुक्ल आकाश में पतंग की तरह उड़ा दिए जाते हैं कोई नहीं जानता ।

इसका एक नुकसान तो यह हुआ है कि हिन्दी साहित्य से व्यस्क तो बाहर हो ही गए नई पीढ़ी दो कदम बचकर निकल रही है । क्या पिछली 30 वर्ष की आलोचना और हिन्दी के सिकुड़ते संसार के बीच कोई रिश्ता बनता है ? निर्मल वर्मा वहीं हैं, कहानी भी वहीं लेकिन कब वे नोबेल पुरस्कार के लायक घोषित कर दिए जाएं और कब कचरे में डालने लायक ।

वैसे हिन्दी प्रदेश की कौन-सी संस्था बची है ? राजनीति, विश्वविद्यालय से लेकर नौकरशाही या समाज तक । फिर भी मैं उम्मीद के खिलाफ हिन्दी लेखन से उम्मीद पालने को अभिशप्‍त हूं । हिन्दी के इन लोहे के पेड़ों को सचमुच दिनकर जैसे कवियों की ओज रसपूर्ण कविता ही हरा बना सकती है ।

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