लोहिया और भाषा समस्या

2010 लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष है। आजाद भारत में यदि गांधी का कोई सच्चा उत्तराधिकारी बनने का हकदार है तो वह केवल लोहिया हैं । समाज के हर पक्ष के लिए चिंतित । भाषा समस्या हो या पिछड़ों समेत पूरे समाज का विकास या राजनीति में संघर्ष, ईमानदारी, नैतिकता के प्रश्न । काश ! यह शख्स लम्बी उम्र पाता, क्योंकि मात्र 57 साल की उम्र में इनका निधन हो गया था ।

मैं विशेष रूप से लोहिया  के  भाषा  संबंधी चिंतन को सामने रखना चाहता हूं । लोहिया अकेले राजनेता हैं आजाद भारत के जिन्होंने अपनी भाषा के मुद्दे पर राष्ट्रीय संदर्भ में विचार किया और आंदोलन भी चलाए । क्योंकि वे मानते थे कि बिना भाषा के लोकतंत्र गूंगा-बहरा है । विशेषकर ऐसे समय में जब देश की शिक्षा नीति एक नई करवट ले रही है, पिछले 5-7 सालों में पाठयक्रम से लेकर गुणवत्ता, शिक्षा का अधिकार, न मालूम कितने विषय रोज अखबारों में उछलते हैं, तब लोहिया के भाषा संबंधी चिंतन की प्रासंगिकता ऐतिहासिक रूप से और भी बढ़ जाती है ।

लोहिया का भाषा संबंधी चिंतन कुछ मामलों में गांधीजी से भी ज्यादा है। बहुत विस्तार से- वर्णमाला से लेकर शिक्षा, शोध, बोली, भारतीय भाषाओं की परस्‍पर जुगलबंदी से लेकर अंग्रेजी का कहर सभी पर लिखा है उन्होंने और इसमें आजादी के बाद के दस-पन्‍द्रहवर्षों के प्रामाणिक अनुभव बोलते हैं । आप समझ सकते हैं कि इस दौर में एक ही पार्टी का केन्द्र और राज्य पूरे देश पर शासन था और तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नेहरू भी बहुत लोकप्रिय थे । बावजूद इसके कि लोहिया जी की आवाज लगातार उपेक्षित की जाती रही पूरे राष्‍ट्र के लिये उनके विचार आज और भी प्रासंगिक हैं ।

लोहिया भाषा को देश की बहुत सारी समस्याओं के निदान की तरह देखते हैं । मस्तराम कपूर द्वारा संपादित ‘लोहिया रचनावली’ के एक खंड में उनके भाषा संबंधी चिंतन पर लगभग 500 पृष्ठ शामिल हैं । मैं उस चिंतन की कुछ बातें पहले आपके सामने रखूंगा जिससे कि लोहिया की पूरी दृष्टि को समझा जा सके ।

भाषा से देश के सभी मसलों का सम्बन्ध है । किस जबान में सरकार का काम चलता है, इससे समाजवाद तो छोड़ ही दो, प्रजातन्त्र भी छोड़ो, ईमानदारी और बेईमानी का सवाल तक जुड़ा हुआ है । यदि सरकारी और सार्वजनिक काम ऐसी भाषा में चलाये जाएं जिसे देश के करोड़ों आदमी न समझ सकें तो होगा केवल एक प्रकार का जादू-टोना । जिस किसी देश में जादू, टोना, टोटका चलता है वहाँ क्या होता है ? जिन लोगों के बारे में मशहूर हो जाता है कि वे जादू वगैरह से बीमारियाँ आदि अच्छी कर सकते हैं, उनकी बन आती है । लाखों-करोड़ों उनके फंदे में फंसे रहते हैं । ठीक ऐसे ही जबान का मसला है । जिस जबान को करोड़ों लोग समझ नहीं पाते, उनके बारे में यही समझते हैं कि यह कोई गुप्त विधा है जिसे थोड़े लोग ही जान सकते हैं । ऐसी जबान में जितना चाहे झूठ बोलिये, धोखा कीजिये, सब चलता रहेगा, क्योंकि लोग समझेंगे ही नहीं । आज शासन में लोगों की दिलचस्पी हो तो कैसे हो ? वह कुछ जान ही नहीं पाते कि क्या लिखा है, क्या हो रहा है । सब काम केवल थोड़े से अंग्रेजी पढ़े लोगों के हाथ में है । बाकी लोगों पर इन सब का वही असर पड़ता है- जो जादू-टोने या गुप्त विधा का । अपने देश में पहले से ही अमीरी-गरीबी, जात-पात, धर्म और पढ़े-बेपढ़ के आधार पर एक जबरदस्त खाई है । यह विदेशी भाषा उस खाई को और चौड़ा कर रही है । अपनी भाषाएं पढ़े-लिखे कम लोग हो सकते हैं, पर समझ सब सकते हैं । लेकिन अंग्रेजी तो अधिक से अधिक 100  में एक आदमी समझ सकता है, वह भी मुश्किल से । मैंने जानबूझ कर अपनी भाषा कहा है हिन्दी नहीं कहा । देश में और भी भाषाएं हैं, केवल हिन्दी नहीं, और सभी एक सी हैं ।

इसीलिये लोहिया भ्रष्टाचार का आधार भी विदेशी भाषा में बढ़ते काम काज को मानते हैं । जो अंग्रेजी नहीं जानते उनका गुजारा नहीं हो पाता । इन्‍हीं अंग्रेजीदाँ अफसरों की बातें हिन्दुस्तान के करोड़ों लोग नहीं समझ पाते और जो दलाल वगैरह होते हैं उन्हें पैसा बनाने का मौका मिल जाता है । यह सब चलता रहता है । कानून वगैरह सब अंग्रेजी में बनाते हैं जिससे जनता को उनका मतलब समझने में दिक्कत होती है । और अफसरों को अपना काम निकालने में आसानी रहती है । कहने का मतलब यह है कि जब तक अंग्रेजी की बीमारी बनी रहेगी, तब तक ईमानदारी कायम हो ही नहीं सकती, एकदम नामुमकिन है । मेरा यह मतलब नहीं कि अंग्रेजी के खत्म होते ही ईमानदारी आ जायेगी । हाँ, इतना मेरा विश्वास है कि जब अंग्रेजी खत्म हो जाएगी तभी ईमानदारी कायम हो सकती है, और हो भी जाएगी ।

लोहिया जितना हिन्‍दी  के पक्ष में हैं उतना ही दूसरी भारतीय भाषाओं के । वे साफ कहते हैं कि यह आंदोलन हिन्‍दी  की स्थापना के लिए नहीं लोक भाषाओं की स्थापना के लिए है । वे बार-बार एक ही बात कहते हैं कि अंग्रेजी हटे कैसे ? प्रांतीय भाषाएं कैसे आगे बढ़ें ? बंगाली, मराठी, तमिल को अंग्रेजी के सामने कैसे प्रतिष्ठित किया जाए ? और इसीलिए हिन्‍दी  की बात लोहिया जब भी कहते हैं दूसरी भाषाओं के साथ बराबरी के स्तर पर थोपने के लिए नहीं । वे कहते हैं,‘हिन्दी की हिमायत वही कर सकता है, जो उसकी बराबरी में अंग्रेजी को न लाये, बल्कि हिन्दुस्तान की दूसरी भाषाओं को और जो हिन्दी को अन्य भारतीय भाषाओं के साथ राष्ट्र की उन्नति का साधन और अंग्रेजी को गुलामी का साधन समझे । हिन्दी और अंग्रेजी के असली झगड़े को नजर-अन्दाज कराने के लिए ये झूठे झगड़े दूसरी भाषाओं से चले । सरकारी नीति रही कि अंग्रेजी की साम्राज्यशाही उन्हें खत्‍म नहीं करनी थी, तो उन्होंने किया यह कि हिन्दी को भी उसी  साम्राज्यशाही का एक छोटा हिस्सा दिलाने की कोशिश की । अंग्रेजी का कुछ हिस्सा हिन्दी को भी मिल जाए । यही सरकारी नीति रही । अब यह साफ बात है कि हिन्दी साम्राज्यशाही नहीं चल सकती । गैर हिन्दी इलाके इसको कभी स्वीकार नहीं  करेंगे । सरकार की इस साजिश  ने हिन्दी  को बहुत नुकसान पहुंचाया । गैर हिन्दी लोगों को अपनी नौकरियों वगैरह का डर लगा । सरकारी नीति के कारण ही कई बड़े इलाकों के लोग हिन्दी की कट्टर मुखालफत करने लगे । आपको जानकर ताज्जुब होगा कि महात्मा गाँधी के बाद मैं पहला आदमी हूं जो तमिलनाड़ु में लगातार 25 सभाओं में हिन्दी बोला । लोगों ने मुझे क्यों सुना ? तमिलनाड़ु में हिन्दी का घोर विरोध है । मैं जानता हूं कि मुझे लोगों ने इसलिए सुना कि मैं हिन्दी और तमिल को बराबरी देना चाहता हूं । नेहरू साहब चाहते हैं, हिन्दी और अंग्रेजी को बराबरी देना । मालूम ऐसा होता है जैसे क्लाइव के बेटे, पोते गद्दियों पर बैठे हों ।

पिछले दस-पन्‍द्रह बरसों में क्‍लाइव के यही पोते, बेटे नयी शिक्षा नीति के बहाने अंग्रेजी की सरेआम वकालत कर रहे हैं । आजादी के बाद तो डॉ. कोठारी, त्रिगुण सेन, जयप्रकाश नारायन जैसे सैंकड़ों लोग लोहिया की भाषा नीति के साथ थे । आज तो लोहिया, जयप्रकाश जैसे समाजवादियों के कंधों पर चढ़कर सत्‍ता में आये राजनेता भी अंग्रेजी की पालकी ढो रहे हैं । यह कहते हुए कि अंग्रेजी के बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता । और फिर इसी तर्क को पीछे स्‍कूलों तक ले जाया जा रहा है कि जब अंग्रेजी में ही पढ़ाई करनी है तो शुरू से क्‍यों नहीं । पहले एक विषय के साथ शुरू हुई अंग्रेजी की यह मुहिम अब प्राइमरी स्‍तर की पढ़ाई का माध्‍यम भी अंग्रेजी में करना चाहती है । है दुनिया का कोई मुल्‍क ऐसा जहॉं भाषा की ऐसी क्रूर यातना से छोटे-छोटे बच्‍चे गुजर रहे हों और अंग्रेजी ठीक से न बोल पाने के लिये प्रताडि़त होते हों । क्‍या किसी यूरोपीय देश में स्‍कूली शिक्षा उनकी अपनी भाषा पुर्तगाली, फ्रेंच या स्‍पेनिश में छोड़कर अंग्रेजी में दी जा रही है ?

लोहिया इन्‍हीं को संबोधित करते हुए कहते हैं,‘बहुत से लोग डरते हैं कि अंग्रेजी के बिना मुल्क टूट जाएगा । मेरी तो समझ में नहीं आता कि मुल्क अंग्रेजी से कैसे जुड़ा हुआ है ? इस गलतफहमी का बहुत बड़ा कारण यह भ्रम भी है कि अंग्रेजी विश्व भाषा है । मैं आप से प्रार्थना करता हूं कि आप इस भ्रम को दूर कीजिए । अंग्रेजी विश्व भाषा नहीं है । अंग्रेजी तो क्या कोई भी भाषा विश्व-भाषा नहीं है । जिस  प्रकार अंग्रेजी दुनिया में फैली उसी तरह उससे पहले संस्कृत, अरबी, लैटिन आदि भाषाएं भी फैल चुकी हैं । आज उनके साम्राज्य नहीं हैं और मैं कहता हूं कि अंग्रेजी का भी नहीं रहेगा । क्या आप समझते हैं कि चालीस करोड़ चीनी और बीस करोड़ रूसी कभी भी इस बात को स्वीकार करेंगे कि अंग्रेजी विश्व-भाषा  मानी जाए । सब बातों  में राष्ट्रीय  आत्मसम्मान का प्रश्न आ जाता है । मैं समझता हूं कि यदि कभी भी कोई भाषा विश्व भाषा बन सकी तो वह किसी देश की भाषा नहीं होगी, बल्कि सभी देशों की भाषा का सम्मिश्रण होगी ।’

आज दिल्ली के चौराहों, दुकानों, बाजारों की हालत यह है कि हर तरफ अंग्रेजी पत्रिकाएं और अखबार ही दिखाई देते हैं मानो आप हिन्दुस्तान में नहीं ऑक्सफोर्ड, अमेरिका की सड़कों से गुजर रहे हैं । यहां मुझे बी.बी.सी. के मशहूर संवाददाता मार्क टली की कुछ बातें याद आ रही हैं । कुछ वर्ष पहले उन्होंने एक पत्रिका में लिखा था कि लोकनायक भवन के आसपास या दिल्ली के किसी भी कोने में मुझे हिन्‍दी  की किताबें ढूंढ़ने में बहुत मुश्किल पेश आती है । उन्होंने मजाक में यह भी कहा कि हिन्दुस्तान के लोग शेक्सपीयर, मिल्टन के उद्धरणों को हूबहू उदधृत करने में समर्थ हैं इतनी क्षमता के साथ कि इंग्लैंड वाले भी शर्मिंदा हो जाएं । सत्ता के नेहरूवादी दौर में इसकी शुरूआत लोहिया के समय में हो गई थी । वे लिखते हैं –‘पूरे यूरोप से मैंने सिवाय पेरिस के और कहीं विदेशी भाषा का दैनिक पत्र निकलते नहीं देखा । पेरिस में एक है और वह अमेरिकनों ने अपने लोगों के लिए जो लाखों की तादाद में वहाँ हैं, निकाला है । हमारे यहाँ तो अखबार ज्यादातर अंग्रेजी में हैं । नतीजा यह है कि आप सब लोगों को यह विश्वास हो गया है कि अंग्रेजी के अखबार ज्यादा अच्छे हैं । हमारे यहाँ अंग्रेजी में छपने वाले अखबारों की करीब आठ लाख प्रतियाँ निकलती हैं । थोड़े से अखबार जो हिन्दी में निकलते हैं, उनकी दशा ही खराब है और हो भी कैसे नहीं, आप लोग खुद भी विज्ञापन  देना हो तो अंग्रेजी  अखबार ही पसन्द करते हैं ।

नयी शिक्षा नीति के चलते तो भारतीय भाषाएं अगले दस बरस में स्‍कूल, कॉलेजों से ही नहीं, पूरे मुल्‍क में बाहर हो जायेंगी । उच्‍च शिक्षा अपनी भाषा में इस बहाने नहीं दी जा रही कि किताबें, शोध की सुविधा नहीं है ।

हिन्‍दी  के खिलाफ कुतर्क आजादी के तुरंत बात ही शुरू हो गए थे कि हिन्‍दी और भारतीय भाषाओं में पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं । पिछले दिनों बड़े-बड़े बुध्दिजीवी भी कई ज्ञानियों के प्रभाव में इसमें शामिल हो गए हैं कि भारतीय भाषाओं में किताबें नहीं हैं । यदि प्रतिप्रश्न किया जाए तो क्या प्राइमरी स्तर के लिए भी हिन्‍दी  और भारतीय भाषाओं में किताबें नहीं हैं, जहां अंग्रेजी को पहली क्लास में ही खींच करके लाने की कोशिश ज्ञान आयोग कर रहा है । क्या माध्यमिक स्कूल स्तर की किताबों की कमी है ? और क्या उच्च स्तर पर भी कुछ विषयों को छोड़कर ज्यादातर अध्ययन, अध्यापन अपनी भाषा में नहीं किया जा सकता ? लोहिया के विचार इस मुद्दे पर भी बहुत स्पष्ट हैं ।

‘किस भाषा में कितने विषय की कितनी किताबें हैं, यह एक गौण अथवा संदर्भ का सवाल है । अगर हिन्‍दी सभी विषयों के लिए सटीक और रंगीन बन जाए, तो लाख-पचास हजार किताबों के लिखने या उलथा करने में क्या देर लगती है । जब लोग अंग्रेजी हटाने के संदर्भ में हिन्‍दी किताबों की कमी की चर्चा करते हैं, तब हंसी और गुस्सा दोनों आते हैं, क्योंकि यह मूर्खता है या बदमाशी ।’

जिस तरह बच्चा पानी में डुबकी लगाए बिना, छपछपाने, डूबने-उठने बिना तैरना सीख नहीं सकता, उसी तरह असमृद्ध  होते हुए भी इस्तेमाल बिना भाषा समृद्ध नहीं हो सकती । इस्तेमाल सब जगह हो और फौरन; विज्ञानशाला और अदालत, अध्ययन, अध्यापन इत्यादि सभी जगह । हो सकता है कि शुरू में बेढंगा लगे, अटपटा हो और गलतियां हो जाएं । क्षेपक के तौर पर मैं इतना कह दूं कि मौजूदा अंग्रेजी की गलतियों से हिन्‍दी  की ये गलतियां कम हानिकारी होंगी । उसका सवाल और है । भाषा को संवारने-सुधारने का काम जितना भाषाशास्त्री या शब्दकोश निर्माता करते हैं, उससे  ज्यादा वकील-जज, राजपुरुष,  अध्यापक, लेखक, वक्ता, वैज्ञानिक इत्यादि किया करते हैं अपने इस्तेमाल के द्वारा । इनके इस्तेमाल से भाषा सुधरती है, न कि सुधर जाने के बाद ये लोग उसका इस्तेमाल करने बैठते हैं ।

एक रोना और रोया जाता है कि यदि अंग्रेजी नहीं आयी तो तथाकथित ‘ज्ञान’ से वंचित रह जायेंगे मानो सारा ज्ञान अंग्रेजी की बपौती हो । ‘ज्ञान’ और ‘सूचना’ में फर्क है । सारा ज्ञान ‘विदेश’  में ही नहीं होता कुछ अपना भी होता है या कहिये अपने ‘ज्ञान’ की गठरी खोलने के लिये कुछ यकीन, विश्वास की जरूरत है और यह केवल  अपनी समझ से आता है । और यह ‘समझ’ पैदा  होती है या  ज्यादा  बेहतर  ढंग  से  आती है अपनी भाषा से । ‘सूचना’ तो लगातार बनती, बढ़ती हैं  और इस  हिसाब से  तो हम  सदा पीछे ही बने रहेंगे । अंग्रेजी की खिड़की खुली तो रहे लेकिन अपना दरवाजा बंद मत कीजिये ।

लोहिया कहते हैं-‘भाषा का मसला विशुध्द संकल्प का है और सार्वजनिक संकल्प हमेशा राजनैतिक हुआ करते हैं । यह केवल इच्छा का प्रश्न है । अगर अंग्रेजी हटाने और हिन्‍दी  अथवा तमिल चलाने की इच्छा बलवती हो जाये तो मूक वाचाल हो जाये । वे निष्कर्ष देते हैं कि इस संकल्प की हत्या करने में कोई कसर नहीं रही ।’ यह 60 के आसपास का चिंतन है ।

हाल ही में ‘समझ के माध्यम’ की एक बैठक में ज्ञान आयोग के एक सदस्य कहते हैं कि अगले 10 वर्षों में दुनिया के सबसे ज्यादा नौजवान भारत में होंगे । और यदि इन्हें अंग्रेजी आएगी तो दुनिया भर में इनको नौकरियों के अवसर मिलेंगे । कितना भोला तर्क है मानो हमने नौजवान पैदा ही दुनिया भर में सप्लाई के लिए किये हैं । क्या बिना समझ के किसी भाषा का कोई अर्थ रह जाता है ? लगभग इसी अंदाज में हमारी सत्ता गुणवत्ता की दुहाई दे रही है । चुपके से यह कहते हुए कि ऐसी गुणवत्ता केवल अंग्रेजी से ही संभव है । क्या पिछले 20 सालों में बढ़ती हुई आत्महत्याओं का संबंध भाषा, परीक्षा का दबाव, बस्ते के बोझ सबको जोड़कर देखा जा सकता है ? बस्ते के बोझ का जिक्र इसलिए जरूरी है कि   प्रो.यशपाल की अध्यक्षता में 1992 में दी गई यह बहुत महत्वपूर्ण रिपोर्ट है । प्रो.यशपाल बहुत सुलझे हुए शिक्षाविद और चिंतक हैं और ज्ञान के नाम पर बच्चों के मस्तिष्क में सूचना भरने के सख्त विरोधी ।

 

इस रिपोर्ट के शुरूआत में उन्होंने एक बहुत पते की बात कही है और वह यह है Non -Comprenhensive यानि बहुत सारी किताबों, सूचनाओं के बोझ के कारण बच्चों की पढ़ाई समझ में न आना । वे कहते हैं कि बच्चों के स्कूल छोड़ने का बहुत बड़ा कारण पढ़ाई समझ में न आना है । वे यहां तक कहते हैं कि जो बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं वे ज्यादा साहसी और ईमानदार हैं बजाय उनके जो स्कूल में बने रहकर और रटकर समझौता करते हैं । मेरा प्रश्न सिर्फ इतना है कि काश प्रो.यशपाल नासमझी के कारणों में भाषा के योगदान पर थोड़ी और विस्तार से चर्चा करते क्योंकि सच यह है कि बस्ते के बोझ में ‘भाषा का बोझ’ सबसे खतरनाक है । और गुणवत्ता के नाम पर यदि सरकार एक विदेशी भाषा को लादने के लिए शिक्षा नीति बना रही हो तो करोड़ों बच्चे और तनाव में आ जायेंगे । लगता है इससे आत्महत्या, डिप्रेशन, अज्ञान और बढ़ेगा । दुनिया भर के शिक्षाविद यह मानते हैं कि जितनी रचनात्मक ऊर्जा, शोध, अनुसंधान अपनी भाषा के पढ़े-लिखे नागरिक करते हैं, परायी भाषा के नहीं करते । लेकिन दुनिया भर की ग्लोबल बातों की दुहाई देने वाले बुध्दिजीवी तक अपनी भाषा में पढ़ने के मामले पर क्यों चुप्पी साध जाते हैं इसे समझना बहुत मुश्किल है ।

आज लोहिया जीवित होते तो मौजूदा स्थिति पर ऐसे चुप नहीं बैठते । कई बार लगता है कि 50 और 60 के दशक में अपनी भाषाओं को लेकर जो आंदोलन उन्होंने चलाए शायद उसी का नतीजा था कि 1967 के आसपास आने वाले शिक्षा आयोग की सिफारिश में अपनी भाषाओं में पढ़ने की बात पुरजोर से की गई है ।  शायद उसी आंदोलन के ताप का असर हो कि 1979 में कोठारी आयोग ने संघ लोक सेवा आयोग में आई.ए.एस. और अन्य केन्द्रीय सेवाओं की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की छूट दी । लेकिन उसके बाद तो लगभग चुप्पी ही है वरना संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित भारतीय इंजीनियरी सेवा, सिविल सेवा परीक्षा, सांख्यिकीय परीक्षा से लेकर दर्जनों परीक्षा आज सिर्फ अंग्रेजी में ही नहीं होती । यदि परीक्षाओं का माध्यम भारतीय भाषाएं और हिन्‍दी  होती तो देश अंग्रेजी की तरफ ऐसा दिवाना नहीं होता ।

यदि लोहिया की आवाज देश ने ठीक से सुनी होती, लोहिया की भाषा, हमारा लोकतंत्र समझ पाता तो न केवल हिन्दी बल्कि सभी भारतीय भाषाओं के साथ ऐसा संकट न आता कि एक-एक कर पश्चिम बंगाल से लेकर गुजरात, महाराष्ट्र तक हर रंग के राज्य सभी अपनी भाषा छोड़कर अंग्रेजी की तरफ दौड़ रहे हैं । हाल ही में महाराष्ट्र में टैक्सी ड्राइवरों को मराठी की अनिवार्यता की बात उठायी गयी थी । उसके अगले दिन ही इंडियन एक्सप्रेस की मुख्य खबर थी ‘पिछले एक वर्ष में 27 मराठी माध्यम के स्कूल बंद किये गये हैं । कारण पर्याप्त बच्चे उधर पढ़ने नहीं आते।’

ऐसे में क्या भाषा बचेंगी और क्या लोकतंत्र ? लोहिया शताब्दी वर्ष में भी हमारी नींद टूट जाये तो भारतीय भाषाओं को बचाने का संभवत: यह अंतिम प्रयास हो ।

पिछड़ों की समस्या को लेकर हम सड़कों पर उतरे हैं । उद्देश्य था पूरे समाज के विकास के लिए पूरे समाज की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए । लेकिन क्या भाषा के बिना पूरा समाज भागीदार हो भी पा रहा है या सिर्फ अमीर,(स्वर्ण, पिछड़े सहित) की भागीदारी ही पर्याप्त है ? भाषा को लेकर भी हम सड़कों पर उतरें तभी लोहिया को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

2 thoughts on “लोहिया और भाषा समस्या”

  1. बहुत जरूरी है कि जो बातें आपने लेखन के माध्यम से बताई हैं उनका वीडियो भी बनाया जाये। वीडियो से बात ज्यादा अच्छे से समझ आती है।

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