मेरे क्षेत्र शिक्षा की चुनौतियां – विश्व विद्यालय कॉलिज (रिपोर्ताज-2)

23 दिसम्बकर पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जन्मदिन होता है । कुछ ऐसा संयोग हुआ कि उन्हीं के क्षेत्र बागपत के पास बड़ौत जैन डिग्री कॉलिज में मुझे उसी दिन जाने का सुयोग हुआ । अपने क्षेत्र की शिक्षा की समस्याओं से रूबरू होने के लिए एक अच्छा मौका भी । थोड़ा बहुत दावा कर सकते हैं कि हमने दुनिया देख ली है, यूरोप, इंग्लैंड के विश्‍‍वविद्यालय देखे हैं, सिंगापुर और मलेशिया के भी । आस्ट्रेलिया, जर्मन, अमेरिकी विश्वंविद्यालयों, संस्थानों आदि के बारे में सुना है और कुछ अच्छा सा इम्प्रेशन जवाहर लाल नेहरू के पाठ्यक्रम या दिल्ली विश्वनविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग, डी स्कूल, जूलॉजी, बॉटनी, डिपार्टमेंट आदि का भी । तो एक छोटा सा पैमाना विश्व‍विद्यालयी शिक्षा का हर समय सामने रहता है कि कम-से-कम इतना तो होना ही चाहिए । एक ठीक-ठाक सी इमारत, लाईब्रेरी, कुछ सक्रिय प्रयोगशालाएं, चहचहाते नौजवान चेहरे । अच्छीस बात यह कि कॉलिज की प्रिंसिपल डॉ. ज्योोत्सोना एक महिला होने के नाते कॉलिज में अनुशासन बाकी था । मेरी दृष्टि को पूर्वाग्रह से न देखा जाए तो मेरा अनुभव रहा है कि महिलाएं कॉलिजों की अच्छीन प्रिंसिपल, अध्यारपिका साबित होती हैं । दिल्लीव विश्वहविद्यालय में आए दिन हड़ताल होती रहती है । मेरे पिछले बीस वर्ष के अनुभव बताते हैं कि हड़ताल के बीच में भी यदि कॉलिज खुले होते हैं तो महिला कॉलिज ही इंद्रप्रस्थह कॉलिज, जानकी देवी कॉलिज, लेडी श्रीराम, गार्गी आदि । इन कॉलिजों के आसपास हल्लाद-गुल्लाज, थोड़ी भीड़ भी कम ही दिखाई देती हैं । शायद यही कारण है कि कितनी भी दबाकर रखी हुई महिलाओं या लड़कियों के समाज में उनके परीक्षा परिणाम लड़कों के मुकाबले बेहतर होते हैं । याद कीजिए पिछले दस सालों के आंकड़े- सी.बी.एस.सी. की दसवीं, बारहवीं की परीक्षाओं में लड़कियां हमेशा लड़कों से आगे रहती हैं । इसलिए मैं वर्षों से कहता आ रहा हूं शिक्षा के कार्यकलाप आदि केवल महिलाओं के लिए ही छोड़ दिये जाएं तो क्याो बुराई है ? कुछ अपवादों को छोड़कर क्याए नौकरियां ज्यायदातर नब्बे. प्रतिशत, पुरुषों के पास नहीं हैं ? जैसी जरूरत उसी हिसाब से नौकरियां । सदियों से प्रताडि़त दलित, आदिवासी समाज के लिये जैसे कुछ कदम उठाये हैं, महिलाएं तो और भी हकदार हैं । दस वर्ष के लिये यह प्रयोग भी सही ।

1916 में एक स्कूाल से शुरू हुआ कॉलिज 1947 में स्ना तक कॉलिज में और फिर आज बीस विषयों में स्नासतकोत्तसर । सभाग्रह भी अच्छा9 खासा बड़ा था । लेकिन कुछ बातें गौर करने लायक हैं । पता नहीं क्योंा हम समय के पाबंद नहीं हो पाते ? जब बच्चों को बारह बजे एक सभाग्रह में आने के लिए कहा जाता है तो हमारा वहां डेढ़ बजे पहुंचना क्याब आदर्श प्रस्तुात करता है ? यह हाल तब था जब मैं बार-बार घड़ी को देखते हुए उन्हें याद दिला रहा था । याद रखिए लोग जीवन से सीखते हैं और वैसे ही विद्यार्थी । वरना वे भी जब मरजी आएंगे और जब मरजी जाएंगे । सैंकड़ों वर्षों से पता नहीं पूजा-अर्चना की कौन-सी घुट्टी है जिसे परम्प रा के नाम पर हम निभाते जा रहे हैं । काम की बात पर आने से पहले एकालाप वंदना, माल्या्र्पण अतिथि की प्रशंसा आदि-आदि में शायद हम बहुत ज्यालदा वक्त देते हैं । इतना कि क्षोभ भी होता है । ऐसा इस क्षेत्र के लगभग सभी स्कू ल, कॉलिजों में होता है । शिक्षा की एक चुनौती यह भी है कि इस पूजा-अर्चना को चंद मिनटों तक सीमित होना चाहिए । यह इसलिए भी जरूरी है जिससे बच्चेे और शिक्षक पूरी तल्ली नता से ऐसे किसी संवाद विमर्श, बहस, सेमीनार में शामिल हों क्योंेकि कोई भी ऐसा सेमिनार तब तक सार्थक नहीं कहा जा सकता जब तक कि उसमें परस्पकर वार्तालाप न हो । केवल भाषणकर्ता अतिथि को सुनना पर्याप्तज या अंत नहीं होना चाहिये । बच्चों , छात्रों और अन्यअ पक्षों को भी कुछ समय दिया जाना जरूरी हो । कॉलिजों के ऐसे सभी सेमीनारों में सहभागिता को अनिवार्य बनाने की जरूरत है । वरना अंत होते-होते सभागृह खाली हो जाये। ऐसा ही हुआ । छात्र, छात्राएं सरेआम बीच में उठकर जाते रहे । किसी को ट्रेन पकड़नी थी किसी कोा बस । छात्रों के इस पक्ष की तरफ भी कॉलिज को संवेदनशील रहना होगा । भेड़-बकरी की तरह खदेड़कर जबरन बिठाने को कोई अर्थ नहीं है ।

सांस्कृीतिक पक्ष इसी क्षेत्र में स्थित खुर्जा के एक कॉलिज में उनके स्थाकपना दिवस पर जब जाना हुआ तो लगभग चार-पांच घंटे फिल्मी् गानों पर लड़के-लड़कियां थिरकते रहे । विरोध सिर्फ इतना है कि यदि किसी अतिथि को बुलाया जाए तो उससे पूछ लिया जाए कि वे ऐसे सांसकृतिक कार्यक्रम में उपस्थित रहना चाहेंगे या जिस संबोधन के लिए उनको बुलाया गया है उसी समय पहुंचना चाहेंगे । वरना मुख्यह अतिथि को बुला कर बिठाये रखना उन्हेंथ सजा देना है । जिन्होंुने बंगाल, केरल या उत्तकर-पूर्व के राज्यों के कॉलिजों की सांसकृतिक छटाएं देखी हैं, वे ऐसे कार्यक्रमों को देखकर माथा पीट लेंगे । क्यार बंगाल में बिना रवीन्द्रं नाथ टैगोर, काजी नसरुल्ल, इस्लाकम या दूसरे प्रमुख लेखकों के नाटक, कविता के बिना कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम संभव है ? मुझे याद नहीं कि अपने क्षेत्र के इन स्कू लों में बचपन से लेकर आज तक कभी प्रेमचंद की किसी कहानी या किसी और महत्वीपूर्ण नाटककार जयशंकर प्रसाद, सेठ गोविंद दास, राम कुमार वर्मा की कोई प्रस्तुूति देखी हो ? यदि पांच साहित्यंकारों के भी नाम पूछे जाएं तो शायद ही इस क्षेत्र के लोग बता पाएं । संस्कृ‍ति का मतलब सिर्फ पूजा-अर्चना ही नहीं होता, संस्कृषति की जड़ें बहुत दूर तक आपके समूचे समाज, साहित्यज तक जाती हैं । हां यहां हर कॉलिज, स्कू‍ल की दीवारों पर संस्कृकत के कुछ श्लोसक या नैतिकता बघारते आदर्श वाक्यह जरूर लिखे होते हैं । क्या दीवारों पर लिखने मात्र से परिवर्तन आ जायेगा ?
माननीय चौधरी चरण सिंह को याद करते हुए दो-तीन वक्ता कम-से-कम दो घंटे तो बोले ही होंगे । लेकिन भक्ति भाव के अलावा कहीं भी उनके भाषण में चौधरी चरण सिंह के भूमि सुधार और प्रशासन की महत्ववपूर्ण बातों समय पालन, जाति विरोध को रेखांकित किया गया हो । चरण सिंह के अनुयायियों ने अपनी खुरापातों से उन्हेंम एक जाति विशेष का नेता बना डाला जबकि चरण सिंह सही मायनों में सभी किसानों, कामगारों के हितैषी थे ।

अपने क्षेत्र की ऐसी कई विभूतियां जिनमें वैज्ञानिक, राजनेता, साहित्यतकार सभी शामिल हैं पर फिर भी ऐसे आयोजन नियमित होने चाहिए । जैनेन्द्रं कुमार अलीगढ़ के थे राम कुमार वर्मा खुर्जा के, शमशेर बहादुर सिंह मुजफ्फरनगर आदि-आदि । विश्व विद्यालय इन सबके बहाने गोष्ठियां आयोजित करें तो अच्छाा हो । इसके अलावा विश्वद स्तकर के वैज्ञानिक डार्विन, आइंस्टाोइन या भारतीय वैज्ञानिक मेघनाथ साहा, जगदीश चन्द्र बसु, सेठना आदि की जन्महशती पर भी हो तो अच्छाय रहेगा ।

पता नहीं जब भी विश्व‍विद्यालय में ऐसे सुझाव दिये जाते हैं तो चेहरे समतल, सपाट हो जाते हैं यानि कि उन्हों ने शायद पहली बार ऐसे नाम सुने हों ।

क्षेत्र के लोगों को यह भी याद दिलाया गया कि जब हरियाणा में कई नौजवान ओलम्पिक पदक के दावेदार हो सकते हैं तो मेरठ क्षेत्र में कोई क्यों नहीं ? मेरठ तो वैसे भी बलिष्ठक नौजवानों का क्षेत्र है । संभवत: कॉलिज, विश्विविद्यालय के स्त र पर खेल सुविधाओं को प्रोत्सा हित करने की जरूरत है ।

पुस्तरकालय का पक्ष इस क्षेत्र के हर कॉलिज की तरह शिक्षा की सबसे कमजोर कड़ी है । पता लगा कि मुश्किल से दो प्रतिशत बच्चेह ही किताबें इश्यूब कराते हैं । क्याल इसमें दोष इन प्राध्याापकों का नहीं है जिन्होंरने बच्चों को पुस्तरकालय के बारे में कभी प्रोत्सावहित ही नहीं किया । या बहुत ईमानदारी से कहा जाए तो जब प्राध्या‍पक ही कुंजी से पढ़ाएंगे तो पुस्ताकालय जाने का सुझाव कौन देगा । हमारे प्राध्याबपक भूल जाते हैं कि अच्छेस पुस्त कालय प्राध्या पकों के काम को बहुत आसान बना देते हैं । जिन चीजों को प्राध्याजपक नहीं पढ़ा पाते किन्हींक कारणों से बच्चेु पुस्तेकालयों से उसे और बेहतर कर सकते हैं ।

कुछ समस्यााएं तो पूरे उत्तोर प्रदेश की ही करूण कहानी बन चुकी हैं जैसे स्कूंली शिक्षा में नियमित अध्यायपक नहीं हैं वैसा ही हाल कॉलिज, विश्वीविद्यालयों का है । इस कॉलिज में रसायन शास्त्र् विभाग में दस शिक्षकों के पद हैं जिनमें से सिर्फ दो भरे हुए हैं । और ऐसा ही भौतिकी में- आठ में से सिर्फ तीन । बताया गया है सभी विभागों की हालत यही है । यानि कि मुश्किल से तीस-चालीस प्रतिशत नियमित अध्याापक । फिर ये नौजवान पढ़ेंगे कहां ? और क्याु पढ़ाएंगे ? बड़े होकर मुम्ब ई, पूना, बंगलौर भागेंगे और जब वहां के राजनेता इनकी बढ़ती संख्या् से नाराज होते हैं तब आपको चोट पहुंचती है । क्या आप चाहते हैं कि हम अपनी संस्था्ओं को ऐसे ही बरबाद करते रहें और हमारी पीढि़यां भार स्वयरूप दूसरे राज्यों की तरफ भागें ? तहकीकात करने पर पता लगा कि उत्त र प्रदेश की बदलती सरकारों की वजह से ऐसा हो रहा है । पब्लिक सर्विस कमीशन के सदस्यल दूसरी राजनैतिक पार्टी के हैं तो मौजूदा निजाम किसी भी शिक्षक, प्रधानाचार्य की भर्ती को आगे नहीं बढ़ने देगा और वैसा ही दशकों से बार-बार हो रहा है । कोचिंग क्लामस में पढ़ाने वालों को बुलाकर जैसे-तैसे पाठ्यक्रम पूरे करने की इतिश्री की जाती है । ये नौजवान क्या खाकर वैज्ञानिक, डॉ., खिलाड़ी या समाजशास्त्रीब बनेंगे । सचमुच इनका दोष है भी नहीं । व्यकवस्थार का है ।

शिक्षा में हाल में एक और विकृति आई है । कुछ संस्थाकओं को अल्प-संख्यकक का दर्जा दे देना । यह कॉलिज जैनियों का है लेकिन जल्दीै यह भी अल्पासंख्यरक घोषित हो जाएगा । यानि कि कमीशन से भरने की जरूरत नहीं रहेगी । लेकिन इस बात की क्या् गारंटी कि आप अपने नकारा बच्चों , रिश्ते दारों को उस कॉलिज में शिक्षक के नाम पर नहीं भर देंगे ? जब सी.बी.एस.सी या दूसरे संगठन पूरे देश के लिए बेहतर काम कर सकते हैं तो इन राज्योंक के आयोग क्योंे नहीं ? शिक्षा के प्रति राजनीतिज्ञों का ध्याहन कभी नहीं गया । पढ़ा, समझदार नागरिक तो इनकी जड़ें पहले उखाड़ेगा ।

क्याि मेरे क्षेत्र के राजनेताओं, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, प्राध्या,पकों सुन रहे हो ? अपने क्षेत्र की महानता, प्रशंसा के राग बहुत हो चुके । जरा निष्प्क्ष होकर सोचें तो यह क्षेत्र उत्तरर प्रदेश का ही नहीं, दुनिया का सबसे हिंसक, महिला विरोधी क्षेत्र बनता जा रहा है । यहां हिन्दूरओं की माला और मुसलमानों की मलाला पर समान पाबंदियां हैं । उनके पढ़ने, लिखने, बाहर निकलने, मोबाइल रखने, पश्चिमी कपड़े पहनने पर । समाज और शिक्षा का यह पक्ष चिंता पैदा करता है

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