मेरा क्षेत्र : शिक्षा की नयी चुनौतियां (रिपोर्ताज-1)

एक साथ कई चित्र मेरे दिमाग में उभर रहे हैं और हर चित्र के साथ पिछले चालीस वर्ष का इतिहास भी । वे स्कूल, वे सड़कें, वे कॉलिज, वे खेत-खलिहान सभी कुछ । सूत्र रूप में कहूं तो तस्वी।र और धुंधली, बिखरी है । दिल से कहूं तो भयानक ! विशेषकर तब जब देश के बाकी राज्य् विशेषकर दक्षिण या गुजरात, राजस्थाहन बेहतर होते गये हैं । शायद ‘शिक्षा’ वह शब्द है जिससे इस विकास या विनाश का कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है ।

अभी दो हफ्ते पहले दिसंबर 2012 में गॉंव जाना हुआ था । खुर्जा से थोड़ा आगे पहासू के पास । गांव दीघी, जिला-बुलंदशहर । गॉंव में दो सरकारी स्कू ल बचपन यानि सन् 1960 से देखता आया हूं । साठ सालों में एक प्राईमरी स्कूलल में दो कमरे और जुड़ गये हैं जहां पिछले दस वर्षों से आठवीं तक की लड़कियां भी पढ़ती हैं कुल मिलाकर बीस-तीस । शिक्षा के नाम पर बेहतरी हुई है तो बस लड़कियों के लिए आठवीं तक की क्ला स । बाकी तो सब कुछ बिखर गया है । दोनों स्कू लों में उतने भी बच्चे नहीं रहे जितने चालीस साल पहले थे । ये सभी बच्चेद उन गरीबों और मजदूरों के हैं जिन्हेंत मिड-डे-मील मिलता है । वे अपनी थालियां लेकर आते हैं । उनमें कभी आटा डाल दिया जाता है तो कभी दलिया आदि । एक निश्चित समय पर स्कूलल में थोड़ी हलचल होती है और फिर सन्ना टा । इतना सन्नाशटा कि स्कू‍ल का सरकारी अध्यांपक भी डरने लगता है । कहता है ‘कोई स्कू ल के इंस्पेाक्शान के लिए आ जाए तो बच्चे कहां से लाऊंगा ?’ डॉंट से बचने के लिए जिस दिन इंस्पे क्शकन का अंदेशा होता है, वह बच्चों के मॉं-बाप के घर जाकर अनुरोध करता है कि बच्चेे आज पूरे दिन स्कूपल में रहें । उन्हींह की एक सहकर्मी अध्यारपिका दूर मेरठ से आती हैं । गॉंव वालों का आरोप है कि वो महीने में एक बार भी मुश्किल से आती हैं । इस बार पता लगा कि महिला का ट्रांसफर उनके घर के पास हो गया है । लेकिन सबसे बुरी खबर यह थी कि दूसरे स्कूकल में, जिसे बड़े स्कूेल के नाम से जानते थे और जहां प्रधान अध्यायपक सहित पांच-छह अध्या,पक दशको से होते थे, इस समय वहां एक भी नियमित शिक्षक नहीं है । पूरा बड़ा स्कूचल एक शिक्षा मित्र के भरोसे चल रहा है । दूसरे शिक्षा मित्र की भर्ती भी अधर में लटकी हुई है ।

क्यास मैं शिक्षक की नियुक्ति के लिए कोशिश करके देखूं ? गाँव वालों के चेहरों पर चुप्पीे पसर गई । एक बोला ‘उससे कोई फर्क नहीं पड़ता । पिछले दस-पन्द्रोह सालों से शिक्षा मित्र ही कुछ पढ़ाते हैं । सरकारी अध्याकपक या तो आएंगे ही नहीं और आएंगे भी तो उनका पढ़ाने का कोई इरादा नहीं होता ।’ मुझे याद है कि इसी स्कूंल के शिक्षकों की शिकायत करने पर दस वर्ष पहले मैंने गांव वालों से प्रतिप्रश्ना किया था कि जो शिक्षक हमारे गॉंव के हैं और दूसरे गॉंव के स्कूंल में तैनात हैं, क्यान वे समय पर पढ़ाने जाते हैं ? उनका बगलें झांकते हुए कहना था कि वे भी नहीं जाते । तो पहला कदम तो सुधार की दिशा में यही होगा कि हमारे अपने गॉंव के शिक्षकों को खुद बदलो । उनसे कहो कि वे समय पर जाया करें । कथाकार, उपन्याॉसकार संजीव भी साथ थे । उन्हों ने बड़ी महत्वापूर्ण बात कही । ‘यू.पी., बिहार के सरकारी शिक्षक वेतन भोगी राजनैतिक कार्यकर्ता हैं । पूरे समय राजनीति करने वाले ।’

क्याि हर पांच साल और कभी-कभी उससे पहले भी बदलने वाली सरकारों को अहसास नहीं है कि बिना शिक्षा के हम कैसे नागरिक बना रहे हैं ? इन्हींद स्थितियों का परिणाम है कुकुरमुत्तों की तरह उग आए निजी स्कूनल । गलत-सलत अंग्रेजी नामों वाले और उतनी ही गलत-सलत अंग्रेजी पढ़ाने वाले । लेकिन पैसा वसूली में पूरे । बच्चे या उनके मॉं-बापों के सामने कोई और विकल्प् नहीं लगता इसलिए इन स्कूललों में शिक्षा के स्तवर के मामले में वहां भी निराशा हाथ लगेगी । और यह बात साबित हो जाती है कि पांचवीं के बच्चें वाकई दूसरी कक्षा की किताब भी मुश्किल से पढ़ पाते हैं । लिखना और भी निराशाजनक ।

चालीस वर्ष पहले हम भी इन्हीं स्कूंलों में अपनी बोरी लेकर जाते थे और पहला अक्षर ज्ञान, गणित, किताबों का पढ़ना यहीं सीखा था । स्व र्णकाल तो नहीं था लेकिन अध्यावपक भी आते थे और पढ़ाते भी थे । यदि गांव के आज के किसान, मजदूर मॉं-बापों को फुरसत नहीं है तो उन दिनों भी ऐसी फुरसत नहीं थी । खेती वाला खेती करे, पढ़ाने वाला पढ़ाए । अपने काम से काम । छुट्टी से एक घंटा पहले आप सबको याद होगा जोर-जोर से पहाड़े रटने की आवाज जो छुट्टी का संकेत भी होता था । खेल-खेल में पढ़ाई की शुरूआत ।
दशक दर दशक उत्तकर प्रदेश के गॉंव के स्कू़ल तो उजड़े ही जिन स्कूालों से हमने दसवीं, बारहवीं की उसका भी नजारा वैसा ही था । कई वर्षों के बाद अपने इंटर कॉलिज करोरा जाना हुआ । एक पुलिस अफसर भी साथ थे । वे भी चकित थे इस बदहाली पर । कमरों की खिड़कियां खुली हुई थीं और बच्चे खुले मैदान में अलग-अलग समूहों में धूप में पढ़ रहे थे जमीन पर बैठकर । यह अच्छीर बात लगी कि कम-से-कम उन्हेंम धूप तो मिल रही है वरना उन अंधेरे कमरों की बैंचों पर बैठकर तो वे बीमार ही हो जाएं । उत्सुगकतावश बायोलॉजी और कैमिस्ट्रीो की प्रयोगशालाएं भी खुलवाईं । उन दिनों बायोलॉजी की प्रयोगशाला में कई छोटे-मोटे कीड़े, वनस्पकतियां आदि अध्यवयन के लिए शीशे के जार में रखे होते थे हम बच्चों के लिये रहस्य्, रोमांच की सी दुनिया । उस प्रयोगशाला में एक विशेष गंध होती थी इन सब रसायनों की । अब उनका नामों निशान भी नहीं था । मैं चाहता था कि माईक्रोस्कोगप देखने को मिले । माईक्रोस्कोाप पिछले बीस साल से प्रयोगशाला में नहीं आया है । तब ये बच्चेह कैसे विज्ञान पढ़ेंगे, समझेंगे और क्याे खाकर वैज्ञानिक बनेंगे ?

गांव में मटर के खेतों पर घूमते हुए मुझे बार-बार जेनेटिक्स के पिता-फादर ग्रेगोर मेंडेल याद आते हैं । मटर के पौधों पर अपने प्रयोगों और निष्कसर्षों से निकले सिद्धांत जीव विज्ञान के साथ-साथ विकासवाद को समझने में भी बहुत उपयोगी रहे । यूरोप की शिक्षा का जादू देखिये कि एक पादरी वैज्ञानिक बनता है जबकि हमारे डिग्रीधारी वैज्ञानिक, अपनी बातों, करमों से पंडे, पुजारी, धार्मिक शिक्षक ज्या्दा नजर आते हैं । अनौखा अनुभव रहा कि ज्यारदातर शिक्षक ‘सत्सं ग’ में जाते हैं । अधिकांश ब्राह्मण, शिक्षक गाँव-गाँव में सत्सं ग, जागरण होने लगे हैं, कुछ संस्कृजत के श्लो्क आते हैं इन्हेंक या रट लिये हैं । मैंने मजाक या गुस्साह जाहिर किया तो तपाक से जवाब मिला- खाली समय में क्यान बुरा है ? रिटायरमेंट के बाद वक्त‍ कट जाता है धर्म के कामों में । शिक्षक का धर्म अच्छीम वैज्ञानिक शिक्षा देनाहै या उन्हें् कूपमंडूक बनाने वाली धार्मिक शिक्षा देना। सत्संमग कराने वाले होते हैं शहरों में बेईमानी से पैसे कमाने वाले अफसर या प्रोपर्टी डीलर । क्याष पुन्य‍ कमाने का लोभ और पाप करने के लिये नहीं उकसाता ? और सत्सं ग या जनता को अफीम बांटना कैसे पुन्या कहा जायेगा ?

कुछ वर्ष पहले मेरा एक और अनुभव से साबका हुआ था । जिस पर संक्षेप में फिर से बताना चाहूंगा कि गॉंव का मेरा भतीजा इस बात से प्रसन्नक था कि जो बच्चाय अपाहिज था, चल-फिर नहीं सकता था और न जिसने कभी स्कूसल देखा था, उसे भी दसवीं पास का सर्टिफिकेट मिल गया है । कैसे ? क्यों्कि उसकी जगह एक दूसरे बच्चेस ने परीक्षा दी थी । इस खिड़की से पता लगा कि परीक्षा के नाम पर वहां कई तरह की कई विधियां अपनाई जाती हैं । पांच हजार पर आपको खुद लिखना पड़ेगा, दस हजार में कोई और बच्चाप आपकी उत्तेर पुस्तिका पर लिखेगा आदि-आदि । कुछ स्कूहल तो सिर्फ इसी धंधे की बदौलत ही अपने अस्तित्व को बनाए हुए हैं । इन सबका अंजाम कई रूपों में सामने है । जैसे कि पढ़ाई या साक्षरता के नाम पर बच्चेए दसवीं, बारहवीं या ग्रेजुएट तो हैं लेकिन पढ़ने, लिखने के नाम पर शून्यर । इसमें मैं अपने डिग्री कॉलेज खुर्जा को भी शामिल करना चाहूंगा । जो कॉलिज इस क्षेत्र का सबसे मशहूर कॉलिज था, तीन-चार हजार विद्यार्थियों वाला उसकी लाइब्रेरी कई सालों तक बंद रही है । यूनिवर्सिटी के नये नियमों के दबाव में उसका हाल ही में पुनर्रुद्धार हुआ है । आप कल्परना कर सकते हैं कि जिस कॉलिज में कम-से-कम पन्द्राह विषयों में स्नाोतकोत्तशर हो, बिना पुस्तहकालय के वे कॉलिज दसियों साल तक कैसे चल सकते हैं ?
प्रसिद्ध शिक्षाविद और एन.सी.ई.आर.टी. के भूतपूर्व निदेशक कृष्णो कुमार जी ने अपने एक लेख में विदेशी विश्वनविद्यालय खास कर यूरोप, अमेरिका की दो खासियतों की ओर ध्याषन दिलाया था । पहला- हर कॉलिज यूनिवर्सिटी में एक अच्छात पुस्तककालय जरूर मिलेगा । दुनिया भर के प्रसिद्ध जर्नल, अखबार, बैठने की जगह, फोटो कॉपी की सुविधा, कंप्यूदटर सब कुछ । जिसे देखते ही आप किताबों में खो जाएंगे और दूसरा- विद्यार्थी और बच्चों के आपसी रिश्तेि । कॉलिज के हर विद्यार्थी को कुछ-न-कुछ एसाइनमेंट लिख कर देने होते हैं । वहां के शि‍क्षकों की खासियत कि वे हमारे विश्वुविद्यालयों की तरह उसे महीनों, वर्षों तक लेकर नहीं बैठे होते । तुरत-फुरत उनमें संवाद होता है, बहस होती है और क्लाोस रूम के अंदर भी सेमीनार । क्यां मेरे क्षेत्र के प्रोफेसर, शिक्षक, प्रधानाचार्य इससे कुछ सीख सकते हैं ?

मेरे ऊपर अपने क्षेत्र के प्रति नॉस्टेिलजिक होकर अतीतजीवी होने का आरोप लगा सकते हैं । लेकिन मेरे साथ कई घंटों साथ रहे और इस क्षेत्र में पुलिस अधीक्षक के रूप में आई.पी.एस. नौजवान पर तो ऐसा आरोप नहीं लगा सकते जिसकी तीक्ष्णे बुद्धि ने इस इलाके की दुर्व्येवस्थास के कारण तुरंत गिना दिये । उनका कहना था कि जब स्कूणल में, कॉलिजों में पढ़ाई ही नहीं हो रही, कोई पढ़ने का माहौल ही नहीं है तो बच्चेक गुंडे नहीं बनेंगे तो क्या बनेंगे ? कानून व्यरवस्थास के नजरिए से उन्होंंने यह भी जोड़ा कि इस बीच खेती में काम करने का नजरिया बदल गया है । शुगर मिल या दूसरे कारणों की वजह से ज्याहदातर खेती गन्ने और धान की होने लगी है जिनमें किसानों को बहुत कम काम करना पड़ता है । बाकी खाली समय में राजनीति और झगड़े । नौजवान का तीसरा निष्क र्ष बहुत सही लगता है उनका कहना था कि गॉंव के स्तनर पर रोज-रोज होने वाले चुनावों की राजनीति ने पूरे भाई चारे को खत्मन कर दिया है । नागरिक नागरिक नहीं रहा पार्टियों के कारिंदों में बदल गया है । उनका कहना था कि डॉ. भीम राव अम्बेरडकर ने इसीलिए संविधान निर्माण के दौरान पंचायती राज का विरोध इस आधार पर किया था कि अभी भारत जैसे अर्ध शिक्षित लोकतंत्र के लिए यह सही समय नहीं है । इसीलिए पंचायती राज ने सशक्तिकरण चाहे किया हो या नहीं, उत्तसर प्रदेश में गुंडों की राजनीति को तो मजबूत कर ही दिया है और इन सबका असर है पूरी शिक्षा व्यिवस्थाय और समाज पर ।

यह भी कह सकते हैं कि शिक्षा व्यऔवस्थार सुधर गई तो पूरा समाज या कहिए पंचायती राज भी मजबूत हो जाएगा।

लोकतंत्र के संदर्भ में मुझे हाल ही में पढ़ी हुई सिंगापुर के करिशमाई नेता ली कुवान की बायोग्राफी ‘तीसरी दुनिया से पहली तक’ (थर्ड वर्ल्ड टू फर्स्ट ) के कुछ पृष्ठ? याद आ रहे हैं । वे लिखते हैं कि 1992 में रूस के विखंडन के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि अब वक्त आ गया है जब चीन को भी रूस की तरह लोकतंत्र की तरफ बढ़ना चाहिए । उन्हेंश जवाब दिया गया कि लोकतंत्र की जड़े यूरोप और अमेरिका में धीरे-धीरे पिछले तीन सौ, चार सौ वर्षों का परिणाम है । जहां लोग मत का मूल्य और लोकतंत्र का महत्वि भी समझते हैं । एशिया के चीन या भारत समेत ज्यामदातर देश अभी भी सामन्तरशाही या पुरानी समाज व्य वस्थाम के शिकंजे में हैं । इन्हें सच्चेश लोकतंत्र की तरफ बढ़ने में अभी समय लगेगा ।
क्याज आप सबको नहीं लगता कि शिक्षा के संसाधन स्कू़ल, पाठ्यक्रम ही ऐसे लोकतंत्र को हासिल करने के वाहन बन सकते हैं ।

पिछले दिनों निजी विश्वबविद्यालय भी इस क्षेत्र में कम नहीं खुले । लेकिन सबकी दास्तादन एक सी ही । सरकार प्राध्याइपकों को जहां लाखों की तनख्वाबह देती है यहां के शिक्षकों को बहुत कम तनख्वाकह । लगभग शोषण की सीमा तक । पूणे में कानून पढ़ रही दिल्लीद की एक बेटी का कहना था कि उनकी क्लागसें सुबह 7.30 से 12.00 बजे तक होती हैं उसके बाद दूसरी शिफ्ट शुरू हो जाती है और फिर शाम को उसी कॉलिज में तीसरी । प्रबंधन आदि की, नौकरी पेशा लोगों की और हमारे यहां एक ही शिफ्ट में चलने वाले कॉलिजों में सौ की क्लाहस में मुश्किल से दस-बीस बच्चेय होते हैं और वे भी ये शिकायत करते हैं कि हम आकर करें भी क्याम ? प्राध्या‍पक ही नहीं आते क्लािस में । जिस क्षेत्र में शिक्षा इतनी पिछड़ रही हो, जहां ग्रेजुएशन करने वाले छात्रों की प्रतिशतता दुनिया भर में सबसे कम हो, क्या। वहां पुणे और दूसरे राज्योंे से सबक लेते हुए दो शिफ्टों में पढ़ाई नहीं हो सकती ? यदि ऐसा हो तो अपने ही संसाधनों से शिक्षा की तस्वीसर बदल सकती है और तब हमें विदेशी विश्वतविद्यालयों की जरूरत भी शायद न पड़े ।

सांस्कृ तिक पतन भी संस्थालओं का हुआ है । एक निजी विद्यालय में जब जाने का मौका मिला तो कई घंटों तक वहां सांस्कृातिक कार्यक्रम के नाम पर लड़के-लड़कियां सिर्फ फिल्मीि गाने गा रहे थे । उनमें भी विशेषकर वे जिन्हें आइटम शॉंग कहते हैं । दिल्लीी में हाल ही में जिस छात्रा के साथ हुआ, क्याे वह इन्हीं आइटम गानों का विस्ता र नहीं है ? सांस्कृातिक कार्यक्रम मैंने बंगाल और दूसरे राज्योंभ में भी देखे हैं । बंगाल में बिना रवीन्द्र् नाथ टैगोर या दूसरे लेखकों के शायद ही कोई सांस्कृयतिक कार्यक्रम पूरे होते हों । और हमारे क्षेत्र में कॉलिज में पढ़ने वाले किसी भी विद्यार्थी से पूछ लीजिए कि क्या उसने प्रेमचंद, निराला या किसी दूसरे साहित्येकार की रचना पढ़ी है ? यह सब मिलाकर ही एक ऐसा शैक्षिक, सांस्कृदतिक माहौल बनाते हैं और यह माहौल मिलाकर वैसा समाज । हमें इन सभी चुनौतियों के मद्देनजर अपनी शिक्षा नीति बनानी होंगी और तुरंत ।

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