मियामी गोल्ड

क्या आप बता सकते हैं कि रंगों की दुनिया में मियामी गोल्ड या कैलिफोर्निया गोल्ड में क्या अंतर है?  यदि इसमें गोल्ड शब्द नहीं जुड़ा हो तो शायद हमारी कल्पना रंगों की दुनिया के आसपास भी नहीं पहुंच पाये। बाजार  के ग्लोब पर घूमने को स्वतंत्र हमारे भारतीय नागरिक पता नहीं कभी मियामी, कैलिफोर्निया पहुंचेंगे या नहीं पर वे देश या उनके प्रतीक, तरह तरह की कार, कमीज, पतलून आदि हजारों घरेलू वस्तुओं के रंगों के रुप में जरूर हम तक पहुंच गये हैं। आप अंदाजा भी कैसे लगा सकते हैं?  न मियामी का कोई रंग हमारे जेहन में है, न गोल्ड के साथ उसके संबंध का है। आपको आश्चर्य होगा कि कैलिफोर्निया गोल्ड हल्के बादामी रंग का जरूर है तो मियामी गोल्ड बहुत हल्के आसमानी किस्म का है। ऐसा नहीं है कि हमारी भाषा या आसपास के जीवन में 12 रंगों के बाहर रंग ही न हो। अलग-अलग क्षेत्रों में रंगों के लिये सैकड़ों नाम जैसे- सुरमयी , बैंगनी, फिरोजी, प्याजी जामुनी, गेरुई, किशमिशी मिल जायेंगे और ये सब हमारे देशज समाज ने अपने आसपास की जिन्दगी में बिखरी प्रकृति फल फूल और यहां तक जानवरों तक से समभाव से लिये हुये हैं।  लेकिन पिछले वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय बाजार की आंधी में हमारे अपने स्वदेशी प्रतीक पूरे दृश्य से ही तेजी से गायब हो रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि गुलाम समाज इन्हें स्वीकार भी उतनी ही तत्परता से करता है। अपने को इस भ्रम में डालता हुआ कि आधुनिकता की दौड़ में कही पीछे न रह जायें ।

 

विदेशी नामों या अंग्रेजी के प्रति मोह और तकनीक के पिछलग्गू बने रहने के अंजाम है ये लक्षण। सबसे दिलचस्प पहलू तो स्कूली शिक्षा संस्थानों के नामों का है। भारतमाता ग्रामवासिनी जरूर है लेकिन स्कूल इन्हें वही अच्छा लगता जिसका नाम सेंट थॉमस, जासेफ, कारमिल आदि हो। दुहाई भारतीय संस्कृति और संस्कृत की लेकिन उनकी रूह तभी खुश होती है जब उनकी पीढ़ियां अंग्रेजी फ्रैंच बोलती हैं। उनके लिबास वॉन हुसैन होते हैं और शर्ट का नाम बुलडॉग या डिमोन या ऐरो । यदि इस कमीज का नाम सांड, कुत्ता, राक्षस या तीर रखा जाता तो क्या भारतीय आत्माएं इन कमीजों को खरीदेंगी ?

 

विदेशी नामों के प्रति हमारी कमजोरी को जापान से लेकर अमरीकी सभी कंपनियां बख्ूबी समझती हैं इसलिये उन्होंने अपने बाजार को बढ़ाने में जहां अनुकूल लगा है हिन्दी और देशी भाषाओं का भी सहारा लिया है लेकिन ब्रांड नाम या तो वही रहने दिये हैं या उन्हें और संकर अंग्रेजी  जापानी बना दिया है । उन्हें पता है कि ठेठ देहाती नामों की स्वीकार्यता स्वदेशी के नारों के बावजूद भारतीय समाज से गायब होती जा रही है । यहां तक खुद भारतीय कंपनियों तक ने  वैसे ही नाम रखने शुरू कर दिये हैं। बुरा भी नहीं है वरना बहुराष्ट्रीय कंपनियों को टक्कर देने से पहले ही केवल नाम की वजह से ही बेचारे हार जाते । देशभक्ति तो तभी बचेगी जब मार्किट में स्वयं भी जिंदा बचे रहेंगे ।

 

शब्दों का जन्म भी समाज से होता है यानि कि समाज के पीछे शब्द आते हैं जबकि हमारे यहां उल्टा हो रहा है। शब्दों के पीछे समाज भाग रहा है। उन्नत, विकसित समाज नयी तकनीक पैदा करते हैं। इस तकनीक को अपने शब्द गढ़ने होते हैं। उनके लिये ये नाम उतने ही स्वाभाविक होते हैं जबकि जो समाज इनकी नकल करते हैं वहां ये शब्द सदियों तक बाहरी ही बने रहते हैं। कम ही लोग जानते होंगे कि जिसे हम डीजल के नाम से जानते हैं उसका आविष्कर्ता अल्फ्रेड डीजल था। आधुनिक विज्ञान, तकनीक के लगभग सभी नाम परिभाषायें, फार्मुले, अधिकांशत: पश्चिमी देशों के उनके आविष्कर्ताओं के नाम पर हैं और इसीलिये उन्हें ये नाम शायद ही अटपटे लगें। इसीलिये सोचने की जरूरत यह है कि कम से कम भारत जैसे देश जो  शिक्षा के उच्च स्तर  में तो एक खास स्थान रखते ही हैं, जल्दी से जल्दी तकनीक, वैज्ञानिक खोजों में पिछलग्गू बनने के बजाय अपने पैरों पर खड़ा होना सीखें। उस स्थिति में हमारी अनेक खोजों के नाम भाभा, नार्लीकर या सेठना के नाम से या इनके गांव या उपयोग, आविष्कृत वस्तु के हिसाब से अपनी देशी भाषाओं से ही आयेंगे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ऐसे शब्द कितनी तेजी से समाज में स्वीकृति पायेंगे। यह स्वीकृति शब्दों को तो सार्थकता देगी ही, उस समाज के भी विकास में मददगार बनेगी। ये कार तब हमारे यहां बनती और हमारी कंपनियों को भी अमेरिका या ब्राजील  में  बाजार मिलता तो हमारे किसमिशी या गेरुआ रंग को भी अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिलती। तब मुझे शायद ही कैलिफोर्निया गोल्ड या मियादी गोल्ड के अंतर को जानने की जरूरत पड़ती।

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