मातम (1983)

रास्‍ते भर मेरे दिमाग में यह बात घूमती रही कि वहां पहुंचकर मुझे कैसा व्‍यवहार करना चाहिए ।

 

देबू की मां की मौत को आज बीस दिन हो गए थे लेकिन मौत का सन्‍नाटा तो महीनों बना रहता है । घर में बिखरे झूठे बर्तन, रोते बच्‍चे, औरतों का जमाव, किस्‍से-दर-किस्‍से मौत के, बीमारी के । सारी फिज़ा में अलग ही तरह की शमशानी सुस्‍ती व खुसफुसाहट । कब कहां से रोने-चीखने की हूक सुनाई पड़ जाये कोई नहीं कह सकता ।

 

पता नहीं देबू की क्‍या हालत हो ? उम्र तो कम नहीं थी मां की, पर मां आखिर मां ही होती है । यही सारी कल्‍पनाएं कदमों के साथ चलती रहीं और मुझे खुद पता नहीं चला कि कब देबू के घर पहुंच गया ।

 

दरवाजे पर थपकी देकर मैं एक तरफ गुमसुम खड़ा हो गया । मेरे होंठ जुड़े हुए थे और निगाह निरुद्देश्‍य सामने की दीवार पर जमी थी ।

 

दरवाजा खुला तो सामने देबू था, हल्‍का-सा मुस्‍कराते हुए । मेरा मुंह पसरा हुआ था । उसकी शक्‍ल देखकर मेरा मुंह भी फैल गया । साथ-साथ चलते हुए हम बैठक में जाकर बैठ गये ।

 

कुछ क्षणों के लिए चुप्‍पी रही । मेरे होंठ फिर चिपक गये थे ।

 

“मिल गई फुरसत तुम्‍हें ? कहकर उसने मेरे चेहरे पर नज़र डाली । “हां भई अब तो तुम बड़े आदमी हो गये हो । अब क्‍यों आओगे ।”

 

“डैथ किस तारीख को हुई थी ? मैंने उसका उलाहना सीधा निकल जाने दिया, “ज्‍यादा बीमार थीं ?”

 

“तुम्‍हें लैटर नहीं मिला ? मैंने दो लैटर डाले थे—-एक बीमारी का और दूसरा बाद में । तुमने एक का भी जवाब नहीं दिया ।”

 

“दो ? दो तो शायद नहीं । एक मिला है । उसका भी मुझे कल पता चला है । मैं बाहर टूर पर गया था ।” मैं साफ झूठ बोल गया, “मां बीमार कब से थीं ?”

 

 

वह क्षण भर चुप रहा । “पूछो मत यार । इतने खराब दिन चल रहे हैं कि बस । इधर मां बीमार उधर लड़का । कुसुम की तबियत तो अभी भी ठीक नहीं चल रही ।” उसने पीछे सरक कर दीवार से कमर लगा ली ।

 

“अच्‍छा । च्‍च च्‍च । यार तुम राजी खुशी की दो लाइन भी नहीं लिख सकते ।”

 

“बेकार की बात मत किया कर । आज तक तुमने कितनी चिट्ठियों के जवाब दिए हैं ।” उसकी आवाज में गुस्‍सा उभर आया था ।

 

मुझे पता था कि हर बार की तरह वह छूटते ही यही बातें कहेगा लेकिन मैंने मन में निर्णय कर लिया था कि पहले मां की मृत्‍यु के बारे में पूछूंगा फिर पुत्र-प्राप्ति की बधाई दूंगा और उसके बाद कुसुम भाभी के समाचार लूंगा । “तुम यहीं थे उन दिनों ? मां को बीमारी क्‍या थी ?”

 

“मैं यहां कहां था । बीच-बीच में आता रहता था । आठ जुलाई को स्‍कूल खुलने थे, मैं उसी दिन चला गया था । उन दिनों मां को बस हल्‍का-सा बुखार था । दवाई दिलवा गया था । अमित की तबियत भी तो ठीक नहीं रहती यहां गांव में । उसे यहां का क्‍लाइमेट बिल्‍कुल सूट नहीं करता ।”

 

“अमित ? अमित कौन ? अच्‍छा, आई सी—लड़के का नाम रखा है । बताया तो था विनय ने कि…….”

 

उसने मुस्‍कराहट भरी दृष्टि से मेरी ओर देखा । लेकिन अगले ही पल गंभीर हो गया, “बार-बार समझाकर गया था कि दवाएं टाइम पर लेती रहना, परहेज रखना और कोई भी ऐसी-वैसी बात हो तो तुरंत सूचित करना । सोचा था हफ्ते बाद आ जाऊंगा, पर वहां एक नयी मुसीबत आ गई ।” उसने गाल एक हाथ पर टिका दिया ।

 

“क्‍या ?” हम दोनों ने एक साथ एक-दूसरे की ओर देखा ।

 

“अमित की तबियत जाते ही खराब हो गई । उल्‍टी, दस्‍त, टैम्‍प्रेचर 104 से नीचे ही नहीं जाता था । एक दिन तो सारी रात हम डाक्‍टर के यहां बैठे रहे । सुबह चार बजे हमारी जान में जान आयी । अभी है ही कितने दिन का यार । तीन महीने इस आठ तारीख को होंगे ।”

 

“अच्‍छा ।” मुझे लगा कि देबू अब देवव्रत बनर्जी नहीं, श्री डी.वी. बनर्जी, उप स्‍कूल निरीक्षक, मकान नं. 413, चौराहा खंदारी, चार बच्‍चों का बाप और चालीस की उम्र का अधेड़ हो गया है । “अब कैसी तबियत है ? मैंने बच्‍चे के प्रसंग को बीच में ही काटना चाहा ।”

 

“तबियत तो अभी ऐसे ही चल रही है । मैंने बताया न कि यहां का पानी तो उसे सूट ही नहीं करता । उबला पानी देते हैं । कल ही डाक्‍टर के पास ले गए थे । उसने पेट में कीड़े बताये हैं । रोता ही रहता है हरदम ।”

 

मेरी बच्‍चे के बारे में जानने की कतई उत्‍सुकता नहीं थी । मैं उस मां के बारे में जानने को उत्‍सुक था जिसकी खातिर देवव्रत किसी समय शादी भी न करने की प्रतिज्ञा किया करता था । “यार शादी के बाद मां को कौन देखेगा । बड़े भाई साहब का हाल देखो । कभी मिलने भी नहीं आते ।” वह भावुक हो उठता था, “जहां नौकरी करूंगा वहीं मां को लिवा ले जाऊंगा । एक काम वाली रख लूंगा । क्‍या करना शादी-वादी करके ।” उसी देवेन्‍द्र से अब मैं मां के बारे में पूछ रहा हूं तो वह बेटे के बारे में बताने लगता है ।

 

“मां की सीरियसनेस का कब पता चला ?”

 

“बताता हूँ । एक मुसीबत हो तो बताऊँ । रात-दिन के जागने से कुसुम की तबियत भी बिगड़ गई । इसे टाइफाइड हो गया । इसे भी अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था । 15 दिन बाद डाक्‍टर ने जाने की सलाह दी । तब इनको लेकर यहां पहुंचा । पंद्रह दिन पता ही नहीं चला कब निकल गए ।”

 

“तुम यहाँ किस तारीख को पहुँचे ?”

 

“सत्‍ताइस की शाम को । यहां देखा तो मां की हालत एकदम खराब । फौरन डाक्‍टर को बुलाकर लाया । वह काफी अच्‍छा डाक्‍टर है । अमित को केवल उसी की दवा से आराम होता है । मेरा भी पेट इसी ने ठीक किया था ।”

 

“भाई साहब बगैरा कोई था यहां ?”

 

“नहीं, कोई नहीं था । सिर्फ पिताजी थे । वे वैसे ही बीमार रहते हैं । भाई साहब का तो तुम्‍हें पता ही है । दो साल तो उनको बिना आए हो गए । काफी पहले एक पत्र आया था कि मैं इस बार जुलाई में नहीं आ पाऊँगा । बड़ी लड़की के पेपर्स हैं । उसके बाद कोई पत्र नहीं आया ।”

 

“फिर डाक्‍टर ने क्‍या बताया ?”

 

“डाक्‍टर ने पूरा चेकअप किया । ग्‍लूकोज चढ़ाया । दो इंजेक्‍शन भी लगाये । पूरी तरह आराम आ गया था । मगर दो दिन बाद ही अमित की तबियत फिर से सीरियस हो गई । उसे लेकर मेरठ भागना पड़ा । मां को तो यह बात बताई भी नहीं वरना उसे तो बहुत धक्‍का पहुंचता । मेरठ तीन दिन उसे लेकर पड़ा रहा । बस यह समझो कि उसे दूसरा जीवन मिला है । चौथे दिन गांव लौटा तो देखा कि……..मां के होंठ नीले पड़ गये हैं । उसने पहचानना भी बंद कर दिया है । मुश्किल से पंद्रह मिनट पास बैठा हुंगा कि उसने……”

 

उसने रूमाल आंखों पर रख लिया । मैं भी शून्‍य में खो गया । कुछ क्षण हम एक-दूसरे से विपरीत दिशाओं में देखते हुए चुप बैठे रहे ।

 

मैंने बिना कुछ कहे उसकी पीठ पर हाथ रख दिया, “सब वक्‍त की बात है । छह महीने में क्‍या से क्‍या हो गया । एक तरफ अभी-अभी अमित की खुशी आयी थी और अभी यह वज्र आ गिरा ।”

 

“सचमुच मुझे बिल्‍कुल ऐसी उम्‍मीद नहीं थी । सोच रहा था कि अब की बार मां को साथ ले जाऊंगा । वहीं ज़रा ठीक से देखभाल हो जाएगी । और मैं रोज-रोज के आने-जाने से बच जाऊंगा । अमित को खिलाने से मां का भी मन लगा रहेगा और कुसुम की कुछ मदद हो जाती । सब प्‍लान रखा रह गया । कोई आया तो ढंग की नहीं मिलती आज के जमाने में ।” उसने फिर से आंखे पोंछीं । वातावरण पुन: गंभीर हो गया ।

 

“अब क्‍या सोचा है ? ” मैंने पूछा ।

 

“बस कल जाना है ।” उसने गहरी सांस छोड़ते हुए घड़ी में समय देखा । “वहां सारा काम खराब हो गया होगा । जुलाई-अगस्‍त में ही कुछ कमाई हो जाती है । इस बार वह भी बेकार गयी ।”

 

 

“क्‍यों बेकार क्‍यों गये ?” मैं विषय बदलना चाहता था ।

 

“मैं इस बार कमेटी में था । जुलाई में हम लोग मास्‍टरों के ट्रांसफर आदि करते हैं । उसी में कुछ कमाई हो जाती है । एक हजार रुपये तो मैंने खराब कर दिये थे कमेटी में रखे जाने के लिए और सिफ़ारिश अलग से । कम से कम दस हजार का नेट नुकसान हो गया और बीमारी का खर्च अलग । यहां न आना पड़ता तो भी मैं सब संभाल लेता । सचमुच बड़े गलत समय पर मां की डैथ हुई ।”

 

“अब कुछ नहीं हो सकता ?”

 

“होने को तो अभी भी हो सकता है । मेरा बास मुझे मानता भी बहुत है । पर अब कहने तो मैं जाऊंगा नहीं उससे । उसे क्‍या पता नहीं होगा सारी परेशानियों का ।”

 

“एक बार कह कर तो देखो ।”

 

“नहीं, नहीं । अपन से चमचागिरी ही तो किसी की नहीं होती । वो चाहता है कि मैं जाकर मक्‍खन लगाऊँ । तुम्‍हें पता ही है वो हमने सीखा नहीं । अब कोई न कोई और चमचा कमेटी में आ गया होगा ।”

 

“कोई बात नहीं । ये तो सब चलता रहता है । इस साल की कमी अगले साल पूरी कर लेना । पिताजी को तो अब साथ ही ले जाओगे ?”

 

“हां यार । यह भी एक समस्‍या है । समझ नहीं आता क्‍या किया जाये । साथ ले जाऊँ तो मुश्किल, न ले जाऊँ तो मुश्किल । इनकी वजह से कुसुम के चार काम बढ़ जाएंगे और इनका तिनके का सहारा नहीं, ऊपर से नखरे अलग । दिन भर अपनी ही चक-चक लगाये रहेंगे ।”

 

तभी एक लड़की बच्‍चे को देबू की गोद में थमा गई । देबू खड़ा होकर उसे चुप कराने लगा ।

 

वह खड़ा-खड़ा कहने लगा, “वैसे यह सचमुच है बहुत लक्‍की । आठ मई को इसका जन्‍म हुआ था और बारह को मेरे प्रोमोशन के आर्डर आ गये थे । इसकी नानी तो ‘लक्‍की’ कहकर ही बोलती है । रोते नहीं हैं बेटे । देखो, इधर देखो । कौन आया है ।”

 

मैं भी खड़ा हो गया, “हल्‍लो बेटे । हाथ मिलाओ । ऐच्‍छे । शाबाश ।”

 

“इस बार तो यार इसके जन्‍म पर कोई प्रोग्राम भी नहीं करा पाये । अगले साल करेंगे । आना है तुम्‍हें, अभी से कहे देते हैं ।”

 

“बिल्‍कुल यार । न आने वाली तो कोई बात ही नहीं हैं ।”

 

“अच्‍छा बेटे । टाटा करो अंकल को । टाटा ! टाटा !” बेटे का हाथ पकड़ कर वह स्‍वयं हिलाने लगा ।

 

देबू के चेहरे पर मौत की छाया नहीं बेटे के जन्‍म का उल्‍लास साफ बिम्बित हो रहा था। मुझे लगा  मैं कोई मातम नहीं जन्‍मदिन मनाकर लौट रहा हूँ।

 

लौटते समय मेरे दिमाग में कोई असमं‍जस नहीं था ।

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