भाषा का भविष्‍य

बच्‍चों की मेज पर पड़ी आधी-अधूरी डायरियां उलट-पुलट रहा हूं । वैसे तो किसी की डायरी बिना अनुमति के नहीं पढ़नी चाहिए लेकिन सिर्फ इसलिए देख रहा हूं कि सफाई के चक्‍कर में कोई महत्‍वपूर्ण चीज न इधर-उधर हो जाए । एक भी शब्‍द हिन्‍दी का नहीं ? न नाम, न उसमें दर्ज पते । ई-मेल का तो सवाल ही नहीं उठता अभी अपनी भाषाओं में । सूक्तियां भी अंग्रेजी में और भविष्‍य की योजनाओं के खाके भी । कुछ पन्‍ने तो स्‍पष्‍ट रूप से अंग्रेजी के शब्‍दकोष को बढ़ाने के लिए ही हैं । माना इनकी कलम विदेशी पार्कर, मितुशीबिशी के हैं लेकिन उसकी स्‍याही से क्‍या सिर्फ अंग्रेजी ही निकलती है ? क्‍या इस पीढ़ी को कभी अपनी भाषा में कुछ लिखने की जरूरत नहीं पड़ती है ? वरना 2-4 साल की डायरियां, नोटबुक में गलती से भी तो कोई हिन्‍दी का शब्‍द लिखा होता ।

 

मैं दावे से कह सकता हूं कि न हमें इतनी अंग्रेजी आती और न घर में अंग्रेजी पढ़ने, बोलने के प्रति कोई अतिरिक्‍त उत्‍साह या आतंक । घर के पूरे हिन्‍दी परिवेश में इन बच्‍चों ने भी कम-से-कम आठवीं तक सैकड़ों कहानी, कार्टून की किताबें, पत्रिकाएं हिन्‍दी की पढ़ी हैं और अभी भी वे उन्‍हें सभाल कर रखना चाहते हैं । दबे मन में शायद अपनी अगली पीढ़ी की खातिर । नेशनल बुक ट्रस्‍ट, एकलव्‍य आदि प्रकशनों की हिन्‍दी में प्रकाशित शायद ही बच्‍चों की कोई किताब ऐसी हो जो इन्‍होंने न पढ़ी हो । फिर भी डायरी से अपनी भाषा गायब ।

 

आइए ! डायरी से आगे बढ़कर उनकी किताबों का मुआयना करते हैं । ग्‍यारहवीं में विज्ञान के विद्यार्थी होते ही अंग्रेजी का एकछत्र राज्‍य । केन्‍द्रीय विद्यालय में पढ़ने के बावजूद  दिल्‍ली जैसे महानगरों के स्‍कूलों में गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान की किताबें और पढ़ाई सिर्फ अंग्रेजी में होती हैं । विकल्‍प न पढ़ने का, न पढ़ाने का । आई.आई.टी., मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की किताबें, कुंजियां जिनके संस्‍करण पांच-पांच लाख के छपते हैं सब अंग्रेजी में । कोचिंग क्‍लास अंग्रेजी में और अंग्रेजी में ही इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई । कहां जरूरत पड़ेगी हिन्‍दी में कुछ लिखने की ? ये बच्‍चे कभी-कभार अपने गांव भी जाते रहते तो भी अपनी भाषा परिवेश का कुछ संस्‍कार बचाते ? यहां से आगे तो केवल केट, जी.आर.ई. या जी.मैट देकर देश-विदेश के प्रबंधन संस्‍थानों में जाना है और इसीलिए किताबों की अलमारी भरी पड़ी है आक्‍सफोर्ड, कैम्ब्रिज की कई तरह की डिक्‍शनरियों से, ऑक्‍सफोर्ड कॉनसाइज, कैम्ब्रिज एडवांस लर्नर आदि । इस पीढ़ी के पास हिन्‍दी का शब्‍दकोश तो मिलने पर कोई पुरस्‍कार मिलना चाहिए । जब ख्‍वाबों में अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया या कार्पोरेट दुनिया है तो चेतन भगत से लेकर जे.के.रोलिंग, एलकैमिस्‍ट और अंग्रेजी पत्रिकाएं पहले ही यहां पहुंच गए हैं ।

 

ग्‍यारहवीं के बाद स्‍कूल, कालेज की शिक्षा ने उनकी अंग्रेजी ठीक की हो या नहीं हिन्‍दी को जड़ से उखाड़ फैंका है । सरकारी और प्राइवेट दोनों स्‍तरों पर । वे अब न हिन्‍दी पत्रिका चक्रमक या हंस की तरफ देखते, न हिन्‍दी अखबार को । शायद न समय है, न जरूरत क्‍योंकि जहां नौकरियां हैं वहां हिन्‍दी तो कतई नहीं है । इसलिए कुछ और अंग्रेजीदाँ मध्‍यम-वर्ग के बच्‍चे मिडिल या उससे पहले प्राइमरी से ही अपनी भाषा से सप्रयास दूर किए जा रहे हैं । कोठारी आयोग द्वारा केन्‍द्र सरकार में लाई गई भारतीय भाषाओं की भी उल्‍टी गिनती शुरू हो गई है ।

 

किताबों के बीच मुझे बचपन की स्‍मृतियां घेर रही हैं । पांचवी, छठी में पढ़ते हुए घर के किसी कोने में एक किताब मिली । शुरू के कुछ पन्‍ने फटे हुए थे । अंदर एक-दो जगह पिताजी का नाम लिखा था – कृष्‍ण कुमार । उनका हस्‍त लेख अभी तक मेरे दिमाग में गुदा हुआ है । इतिहास की उस किताब को मैं न जाने क्‍यों बार-बार पढ़ता था । पिताजी बहुत मेधावी, परिश्रमी थे लेकिन किसानों-शहरी मजदूरी के पुल पर साइकिल से आते-जाते और इतनी बड़ी गृहस्‍थी के बोझ में ज्‍यादा नहीं पढ़ पाए । पता नहीं उसी किताब का असर था कि विज्ञान, साहित्‍य की लम्‍बी यात्रा के बीच इतिहास अभी भी मेरा प्रिय विषय है । भाषा, साहित्‍य की यही विरासत होती है और यही संस्‍कार की अगली पीढि़यों तक जाते हैं । इस पीढ़ी के पास विरासत में छोड़ने के लिए विदेशी चीजों के अलावा कुछ बचेगा भी ?

 

समाज के एक और पक्ष पर भी नजर डालते हैं । दिल्‍ली के 100 वर्ष पूरा होने पर साहित्‍य कला परिषद के सौजन्‍य से सोसाइटी में गजल कार्यक्रम रखा गया था । गजल, गीत हिन्‍दी के हैं  लेकिन सूचना हर बात की सिर्फ अंग्रेजी में दी जाती है । सूचना पर हस्‍ताक्षर करने वाले हिन्‍दी भाषी विद्वान हैं तो इतना तो समझते ही हैं कि हिन्‍दी गजल सुनने जो आएगा वह कम-से-कम इतनी हिन्‍दी जानता होगा । लेकिन सूचना भी अंग्रेजी में ही होगी और रजिस्‍टर के नाम-पते जैसे काम भी । सरकार से लेकर समाज के इन पहरूओं की चिंता में जितना दर्द अंग्रेजी के लिए रहता है उतना अपनी किसी भाषा के लिए नहीं । हर स्‍तर पर मुखौटे असली चेहरों की जगह ले चुके हैं ।

 

कुछ दिन पहले दफ्तर में धर्म पुस्‍तक ‘गीता’ की जरूरत पड़ गई । इस्‍कान की बदौलत सरकारी दफतरों में गीता खूब पाई जाती है ।  काश ! उसका कर्म सिद्धान्‍त भी कुछ असर करता तो ये बाबू दफ्तर इतनी देर से न आते । खैर !‘गीता’ तो मिल गई लेकिन अंग्रेजी में थी । मैंने पूछा क्‍या अब कृष्‍ण, अर्जुन भी अंग्रेजी बोलने लगे है ? उनसे तुरंत जवाब नहीं बना । भक्ति भाव जवाबों के लिए गुंजाइश ही नहीं छोड़ता । अंग्रेजी की गीता का संदेश साफ है-अंग्रेजी भी ठीक हो जाएगी और परलोक भी । सरकारी दफतरों में अकल से ज्‍यादा महिमा अंग्रेजी की है ।

 

जिस पीढ़ी की डायरी में एक भी शब्‍द अपनी भाषा का न हो उनके दिमाग में कोई हिन्‍दी लेखक कैसे और कब पैर पसार सकता है ? लेकिन क्‍या इसका दोष सिर्फ बच्‍चों का है या उस सांचे का जिसमें इन बच्‍चों को ढाला जा रहा है । अफसोस यह है कि इन मुद्दों पर रोशनी डालने वाली लालटेनों के शीशे या तो काले पड़ गए हैं या इनका तेल खत्‍म हो गया है ।

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