बड़ी कार छोटे लोग

विज्ञान और तकनीक के बूते किसी वक्त की बहुत बड़ी दुनिया छोटी होती गयी है । बड़ी दूरिया सिमटकर चंद घंटों और सैकेंड में तो बड़े-बड़े टेलीफोन, कंप्यू टर मुट्ठी में दबाने लायक । बड़े भव्य पुस्तेकालयों की अलमारी में न समाने वाले हजारों महाकाव्यय, उपन्यातस आप जेब में रखकर घूम सकते हैं । 70 के दशक में भारत में मारूति का जन्म, भी ऐसे ही सपने की परिणिति थी । आकार कम, आराम पूरा । कुछ-कुछ समाजवाद भी ।

लेकिन अलग दिखने वाले अमीरों को यह कैसे बरदाश्ती होता कि उनका नौकर, पी.ए. भी वैसी ही कार रखे । फिर वे अलग कैसे हुए ? इन अमीरों के चेहरे और जेब पर नजरें गढ़ाये, कम्पभनियॉं तुरंत ताड़ गयीं । हर सपने के लिये अलग मॉडल । कोई ऐसी कार चाहता है जिसमें सपनों की तरह पूरे पैर फैलाकर सो सकें । दूसरे जिसमें सामने टी.वी. देख सकें । सौ दो सौ कि.मी. की गति से चलती कार में नाश्तेस का आनन्द ही कुछ अलग है । रैड लाइट पर खड़ी कार में वे चपर-चपर इतनी तेजी से खा रहे थे मानों मिनट में पचास इडली खाने की प्रतियोगिता हो । फिर मोबाईल उठाया । बेखबर कि वे ड्राइंग रूम में हैं या सड़क पर । इन्हों ने बड़ी, इतनी मजबूत कार ली ही इसीलिये है कि जो हमसे टकरायेगा चूर-चूर हो जायेगा ।

इनका आकार धीरे-धीरे बढ़ती हिंसा का प्रतीक बनता जा रहा है । पार्किंग में इनके बाहर निकले थूथन या पुट्ठों से निकलने को जगह नहीं बचती । छोटी गलियों में तो पैदल चलना तक मुश्चिकल है । झगड़े की जड़ कार नहीं जितना कि रास्तां रोके इनका हाथी जैसा आकार । लेकिन विज्ञापन देखकर बाजार की तरफ लपकते छोटे लोग, बड़ी कार से बड़ा होने का भ्रम पाल रहे हैं । जीवन के कई दूसरे पक्षों में भी यह बेहूदगी दिखती है । विदेशी एअरपोर्टों, ट्रेन में चलते मुसाफिरों में सबसे बड़ा सूटकेस लेकर चलने वाले भारतीय महाद्वीप के ही होते हैं । क्यां इसकी जड़ें उस राजनैतिक संस्कृेति में ही तो नहीं हैं जहॉं प्रथम नागरिक के लिये सैंकड़ों एकड़ का आवास मुहैय्या कराया जाता है और फिर उसकी हौ़ड़ा-हौड़ी हर बड़े आदमी को अपना बंगला छोटा लगने लगता है ।

अपनी छोटी कार में बैठे लगता है दहशत के बीच चल रहा हूँ । दायें-बायें एक से एक बड़ी पैटन टैंक नुमा । दिन दहाड़े लूट के शहर दिल्ली़ में ये बड़ी गाडि़यॉं शायद इनका मनोबल बढ़ाती हों । लेकिन बदमाशों के हौसले और भी आगे हैं । वे आजकल फिरौती के लिये बड़ी गाड़ी वालों पर ज्याेदा दांव लगाते हैं ।
स्कू लों के साथ धंधा करने वाले कहने लगे कि बड़ी गाड़ी रखना हमारी मजबूरी है । कई बार हमें बिजनैस ऐसे ही रुतबे से मिलता है । स्कू टर से जायें तो टटपूंजिया समझते हैं । भारतीय समाज में बेटी के लिये लड़का ढूढ़ने निकले पिता के पास बड़ी गाड़ी रखने के पक्ष में तो आप भी होंगे । कभी-कभी सफाई देते हैं ‘मेरी बेटी को यह मॉडल बहुत पसंद था । उसकी ट्यूशन की क्ला।स में जब से उसकी दोस्तक ने ये कार ली है वो रोज जिद करती थी । दूसरा कहता है बेटा और उसकी मम्मीक की पसंद है यह । हम तो सिर्फ ड्राइवर हैं ।’ सारी दुनिया को बाजारवाद के खिलाफ हुंकारते बुद्धिजीवी का लाजवाब जवाब ।

पता नहीं टाटा की छोटी कार का क्याा हुआ ? दरअसल जिन गरीबों को अमीरी रेखा को टच करते ही कार के ख्वा‍ब पूरा करने के लिये सोचा गया था वह गरीब तो और गरीब हो गया और अमीर और ज्या दा अमीर । जो नया मध्यो वर्ग मारूति के ज्याबदातर मॉडलों को तीसरी दुनिया का पिछड़ापन मानता हो उसे कहॉं भायेगी यह खिलौना कार । अब तो कार ही लम्बीी नहीं चाहिये उसके बोलने में भी लम्बाीई झलके काररर…….. ।

आश्चार्यजनक और दु:खद पहलू यह है कि रात-दिन पूंजीवाद, कारपोरेट जगत को गरियाने वाले मेरे कई मित्रों को भी इन्हीं बड़ी कारों का बड़प्प न भाने लगा है । अमेरिका, जापान, यूरोप के पुतलों पर वे दिन-रात घूंसे, लात और जुबान चलाते हैं । लेकिन पुतला नहीं बदलता । इनके पास इनकी गाड़ी की तरह बड़ी बातें हैं, बड़ी फिलासफी और जुबान भी बड़ी । इन्हेंा समझना चाहिये कि जुबान की बजाय जीवन से दुनिया बदलेगी । गांधी का सबक यही था । अन्नाझ का भी कुछ-कुछ ।

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