प्रोफेसर यशपाल: विज्ञान और समाज के पुल/सेतु

प्रोफसर यशपाल (26.11.1926 – 25/07/2017) को सच्‍चे मायने में जन वैज्ञानिक कहा जा सकता है। यानि आम आदमी की भाषा में विज्ञान को समझने, समझाने के लिए जीवन पर्यन्‍त प्रयत्‍नशील। उनका मानना था कि जिस बात को आप  आम आदमी को नहीं समझा नहीं सकते वह विज्ञान अधूरा है। इतना ही नहीं उन्‍हें आम आदमी की समझ –बूझ पर भी बहुत भरोषा था .इसीलिए शिक्षा में वे उस ज्ञान के प्रबल पक्षधर थे जो सदियों से समाज ने अपने अनुभव से  अर्जित किया है। लेकिन उसकी कूपमंडूकता के उतने ही विरोधी। उनके एक एक शब्‍द में अंधविश्‍वासों, तंत्र मंत्र के खिलाफ जंग झलकती है .दूरदर्शन पर बर्षों तक चलने वाला  प्रोग्राम –टर्निंग प्‍वांइट’ इसलिए इतना लोकप्रिय और ज्ञानवर्धक बना। देश के कोने कोने से आये किसी भी प्रश्‍न को वे बच्‍चों की सी  सहजता से उठाते थे और मानते थे किस्कूल यदि बच्चों के इस सहज ज्ञान को विज्ञान की नयी रोशनी में संवर्धित कर पाये तो शिक्षा का कायाकल्‍प हो सकता है।

हर मंच पर स्कूल,विस्वविध्यालय ,मंत्रालय तक उन्होंने  बार बार दोहराया कि बच्चे केवल ज्ञान के ग्राहक ही नहीं है वे उसे सम्रद्ध भी करते है .बराबर के भागीदार.किसान ,आदिवाशी समाज के शब्द ,बोली परंपरागत जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना शहरी किताबी ज्ञान.पाठ्यक्रम में दोनों का सामंजस्य ,संतुलन चाहिए .स्कूल की दीवारों के भीतर  और और उसके भहर के परिवेश में जितना कम फासला होगा शिक्षा उतनी ही बेहतर, सहज ,रुचिकर होगी .माध्यम भाषा की कसौटी पर येश्पल की अवधारणा को परखा जाये तो हमारे शहरी स्कूल उस विदेशी भाषाओं में पढ़ते हैं जो अपने आसपास के परिवेश बहुत दूर हैं .

एक साथ उन्‍हें कास्मिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विज्ञान संपादक, प्रशासक की श्रेणी में रखा जा सकता है। अपने अग्रज समकालीन भौतिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद डॉ. दौलत सिंह कोठारी की तरह। अपनी भाषाओं के प्रति दोनों का प्‍यार वेमिसाल रहा। मुझे याद आ रही है दिल्‍ली की एक गोष्‍ठी। जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में शायद नेहरूजी के ही किसी वैज्ञानिक अवदान के प्रसंग मे थी। प्रोफेसर यशपाल मुख्‍य वक्‍ता थे। बोलने के लिए खड़े हुए। मंच की तरफ देखते हुए पूछने लगे क्‍या हिन्‍दी में बोल सकता हूं? जाहिर है दिल्‍ली के ऐसे मंच बहुत स्‍पष्‍टता और उत्‍साह से हिन्‍दी के लिए हामी नहीं भरते। कुछ मिनट तो वे अंग्रेजी में बोले फिर तुरंत हिन्‍दी की सहजता में उतर आये। प्रसंग भी इतने  आत्‍मीय थे कि उन्‍हें केवल अपनी भाषा में ही कहा जा सकता था। यादगार भाषण था वैज्ञानिक सोच को बढ़ाने के लिए। और यह भी कि जो व्‍यक्ति समाज को समझता है, उनके बीच से एक लंबे संघर्ष से गुजरा है,उसे जनभाषा की ताकत और उसकी संवाद शक्ति का एहसास है। यही कारण है कि प्रोफेसर यशपाल के किसी भी भाषण के बाद प्रश्‍नों की बौछार लग जाती थी। कभी-कभी घंटो तक। क्‍योंकि न वे विज्ञान का आतंक चाहते थे, न अंग्रेजी का। ऐसे ही सामान्‍य प्रश्‍नों को संकलित कर एनसीईआरटी ने एक किताब प्रकाशित की है, हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों में। खोजी प्रश्‍न। Discovered Questions। एक नेशनल बुक ट्रस्‍ट ने भी Random Curiosities  !स्कूल,कॉलेज के विद्यार्थियों  के लिए बहुत जरुरी .

यशपाल का जन्म मौजूदा पाकिस्तान के झुंग में हुआ था .विभाजन की त्रासदी के दौर से गुजरते हुए परिवार ने हरयाणा के कैथल में डेरा डाला .पंजाब यूनिवर्सिटी से भौतिकी में स्नातकोत्तर के बाद आगे की पढाई के लिए ऍम आई टी अमेरिका गए .येहाँ दाखिले का प्रसंग भी शिक्षा –विमर्श के लिए बहुत प्रासंगिक है .प्रवेस परीक्षा में वे असफल रहे तो उन्हें फिर से परीक्षा देने को कहा गया और इस बार उन्होंने बहुत अच्छा किया .सबक यह कि व्यक्ति की छमताओं को मापने के लिए परीक्षा पधातियो को लचीला बनाने की जरुरत है –दुनिया भर के विस्वविध्यालयों की तर्ज़ पर .

विज्ञान के साथ-साथ शिक्षा में उनका मौलिक योगदान रहा है। 1992 में वस्‍ते का बोझ’ शीर्षक से उनकी रिपोर्ट पर्याप्‍त चर्चा में रही है। वे कोचिंग और टयूशन के घोर विरोधी थे . कोचिंग के बूते आईआईटी में चुने जाने के भी वे पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि  यह बनावटी सफलता है। जो सफल हो जाते हैं उन्‍हें दूसरे विषयों का शायद ही कोई ज्ञान होता है और जो असफल रहते हैं वे पूरी उम्र एक निराशा के भाव में रहते हैं। पाठयक्रम, शिक्षक विद्यार्थी अनुपात, नर्सरी के दाखिले में टेस्ट ,माँ , बाप के इंटरव्यू को बंद करना जैसी बातों को उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उठाया और समझाने की कोशिश की। उनकी अध्‍क्षता में बना राष्‍ट्रीय पाठयचर्चा कार्यक्रम-2005 एक एतिहासिक दस्‍तावेज है। हालांकि इसके पक्ष –विपक्ष में कम विवाद नहीं हुआ .पारंपरिक विज्ञान के धुर विरोधी इतिहासकारों ने यह कहकर चुनौती दी कि इसकी प्रमाणिकता  पर संदेह है .लेकिन यशपाल अपनी मान्यता पर अडिग रहे .उनका कहना सही था कि उसे सिरे से नकारने की बजाय नयी वैज्ञनिक कसौटियो पर कसा जाये क्योंकि हर ज्ञान ,समझ समाज सापेक्ष होता है .ग्रेड प्रणाली ,परीक्षा को तनाव –मुक्त करने की उनकी सिफारिशों का दूरगामी महत्व है .कॉमन स्कूल  व्यवस्था की बात कोठारी आयोग ने १९६६ में की थी ,यशपाल भी उसके पूरे समर्थन में थे .एक साक्छात्कार में उन्होंने कहा था कि सरकारी स्कूल इतने अच्छे और ज्यादा हो जाएँ कि बच्चे निजी स्कूल की तरफ झांके भी नहीं .घर की सारी आमदनी इन प्राइवेट स्कूल में बर्बाद हो रही है . 2008 में उच्‍च शिक्षा के कायान्‍तरण के लिए भी  उन्‍होंने एक रिपोर्ट बनायी। दुर्भाग्‍य से इन दोनों ही रपटों को न सही रूप में समझा गया, न लागू किया गया।

जीवन भर अटूट  जिजीविषा और उत्‍साह से काम करने वाले यशपाल जी को अंतिम दिनों में इसका अहसास था। वर्ष 2009 में आकाशावाणी के एक कार्यक्रम में मैनें जब समान शिक्षा, अपनी भाषा में पढ़ाई का माध्‍यम, बढ़ती कोचिंग के प्रश्‍नों पर सरकार की असफलता के बारे में पूछा  तो उनके स्‍वर में उतनी ही निराशा थी। यों उन्‍हें पदमभूषण , पदमविभूषण, कलिग पुरस्‍कार जैसे सर्वोच्‍च पुरस्‍कारों से नवाजा गया, उनकी शिक्षा संबंधी सिफारिशों की चर्चा भी देश भर में  होती है, लेकिन इसे देश का दुर्भाग्‍य न कहें तो क्‍या कहें जहां ऐसे वैज्ञानिक के होते हुए भी वैज्ञानिक सोच के पैमाने पर इतना बड़ा देश दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में हैं। प्रोफेसर यशपाल को सच्‍ची श्रद्धांजलि उनके विचारों, शिक्षा को फिर से जीवित करने, जन जन तक फैलाने में है।

२८.७.१७

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